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लोककथा

अलाव और चींटियाँ
अलेक्सांद्र सोल्शेनित्सिन


मैंने एक गला हुआ लट्ठा, बगैर यह ध्यान किए कि इस पर जीवित चींटियाँ हैं, जलते अलाव में फेंक दिया।

लट्ठा चटचटाने लगा, चींटियाँ हड़बड़ाकर निराशा से चारों तरफ दौड़ पड़ीं। वे ऊपर की ओर दौड़ीं, लेकिन लपटों से झुलस जाने के कारण छटपटाकर रह गईं। मैंने लट्ठे को पकड़ा और उसे एक तरफ कर दिया। तब उनमें से काफी चीटियों ने स्वयं को रेत पर या चीड़ की सुइयों पर आकर सुरक्षित कर लिया।

लेकिन, यह बेहद आश्चर्य की बात थी, वे आग के पास से भागीं नहीं।

वे तब तक भयाक्रांत नहीं हुईं, जब तक कि वे पलटीं, उन्होंने चक्कर काटे। कोई अबूझ ताकत उन्हें बार-बार अपने परित्यक्त देश की तरफ खींचती रही। उनमें से बहुत-सी ऐसी भी थीं, जो जलते लट्ठे पर चढ़ गईं, उस पर चारों तरफ तड़फड़ाईं और उसी पर शहीद हो गईं।


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हिंदी समय में अलेक्सांद्र सोल्शेनित्सिन की रचनाएँ