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लोककथा

पिल्ला
अलेक्सांद्र सोल्शेनित्सिन


हमारे पिछवाड़े वाले अहाते में एक लड़का अपने छोटे कुत्ते शारिक को जंजीर से बाँधे रखता था। किसी हथकड़ी की तरह यह जंजीर उसकी रोएँदार गर्दन के चारों ओर तब से जकड़ी रहती थी, जब वह पिल्ला था।

एक दिन मैंने मुर्गे की कुछ हडि़्डयाँ लीं, जो उस वक्त भी कुछ गरम थीं और जिनसे स्वादिष्ट गंध फूट रही थी। एकदम तभी लड़के ने उस बेचारे कुत्ते को खोला था ताकि वह अहाते का चक्कर लगा सके। वहाँ घनी और पर्तदार बर्फ थी, जिस पर शारिक हिरन की तरह उछ्ल-कूद मचा रहा था। पहले पिछली टाँगों पर और फिर अगली टाँगों पर; अहाते के एक कोने तक; आगे और पीछे... अपनी थूथनी बर्फ में गड़ाता हुआ।

वह मेरी तरफ भागा। वह बिल्कुल झबरा था। मेरी तरफ उछला। हड्डियों को सूँघा और फिर वापस चला गया, बर्फ की ही गोद में।

मुझे तुम्हारी हड्डियों की जरूरत नहीं है, उसने कहा। मुझे केवल मेरी आजादी दे दो...।


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हिंदी समय में अलेक्सांद्र सोल्शेनित्सिन की रचनाएँ