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लोककथा

टोकरीवाली पीठ
अलेक्सांद्र सोल्शेनित्सिन


जब आप किसी उपनगरीय बस में सवार हों और किसी चीज के सख्त किनारों से आपके सीने या पीठ पर दर्दनाक धक्का लगे, कृपया गाली न दें, बल्कि खपच्चियों से गूँथकर बनी उस टोकरी के खुले मुँह पर भरपूर नजर डालें, जिसके तसमों की किरमिच उधड़ी हुई है इसकी मालकिन अपने तथा दो पड़ोसी घरों का दूध, घर में तैयार किया गया पनीर तथा टमाटर लेकर कस्बे को जा रही है, और वापसी में वह रोटी के पचासेक टुकड़े लेकर आएगी, जो दो परिवारों की खातिर पर्याप्त होंगे।

यह मजबूत, लंबी-चौड़ी सस्ती टोकरी खेती-बाड़ी करनेवाली औरत की है। इस टोकरी का मुकाबला दूसरी रंगीन चमकदार, खिलाड़ियों की टोकरी से नहीं किया जा सकता, बावजूद इसके कि उनमें छोटी-छोटी जेबें और चमकदार बकसुए भी होते हैं। इस टोकरी में कुछ ऐसा 'खास' वजन होता है, जिसे कि तजुर्बेकार किसान का कंधा भी नहीं झेल सकता, भले उसने रुईवाली जॉकिट ही क्यों न पहन रखी हो, उसके कंधे इसके बोझ को सह नहीं सकते।

दरअसल, खेतीबाड़ी करनेवाली औरत करती यह है कि वह टोकरी को अपनी कमर के अधबीच लटकाकर तसमों को साज की तरह अपने सिर के चारों तरफ कस लेती है। इस तरह टोकरी का वजन कंधों और सीने में बराबर-बराबर बँट जाता है।

हे मेरे अजीज कलमघसीटो! मैं यह नहीं सुझा रहा हूँ कि इस टोकरी को तुम भी पहनना सीख लो, लेकिन यदि तुम्हें धक्का खाना महसूस हो रहा हो तो कृपया टैक्सी से जाया कीजिए!


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