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कहानी

पनाहगाह
जोगिन्दर पाल

अनुवाद - कृष्ण पाल


सब चले गये तो फत्तू और वीरो भी मेला जाने वाले रास्ते पर दिखायी दिये । वह दोनों उछल उछलकर इतनी तेजी से चल रहे थे, जैसे रास्ते से भी पहले मेले के मैदान में पहुँच जाना चाहते हों।

मिंर्जा उन्हें हकीम सुल्तान शाह के चबूतरे से देख-देखकर हँसने लगा और चेहरे के दोनों तरफ दाढ़ी पर उँगलियों से कंघी करते हुए बोला, ''चलना तो सिर्फ जवानी का ही होता है!''

''वह तो है मिंर्जे!'' हकीम ने अपने हुक्के पर चिलम सीधी करते हुए अपने दोस्त को जवाब दिया, ''मगर जवानी कहीं टिकती भी तो नहीं है।''

''यही तो मुसीबत है मेरे यार! बूढ़े रास्ते अपनी धूल फाँकने के लिए वहीं के वहीं पड़े रहते हैं और जवान लोग तेज-तेज चलकर न जाने कहाँ गुम हो जाते हैं!''

हकीम सुल्तान शाह ने हुक्के की नली को मुँह से परे हटा दिया, ''जवानी के मेले तो चार ही दिन के होते हैं, बूढ़े रास्ते वहीं के वहीं न ठहरे रहें तो जवानों का घर लौटना कैसा हो?''

''वाह! क्या पते की बात कही है!'' मिंर्जा ने खुश होकर हुक्के की नली अपनी ओर खींच ली।

''बुखार की पुड़ियों के साथ-साथ इन बातों की पुड़ियाँ बना-बनाकर भी बेचा करो! हम जमींदार तो जमीन को पोला करने के सिवा कुछ जानते ही नहीं।''

''अब पोला करने के काबिल भी कहाँ रह गये हो मिंर्जे!''

मिंर्जा ने फिर अपनी आँख उठाकर फत्तू और वीरो पर जमा ली, ''जी चाहता है, आँखों में भरकर उनकी तस्वीर सदा के लिए सँभाल लूँ!''

हकीम ने उसकी बात का जवाब देने के लिए मुँह खोला तो मिंर्जा को उसकी आवांज पर हुक्का गुड़गुड़ाने जैसा सन्देह हुआ, ''अपनी शादी से पहले जब वह चोरी-चोरी मिला करते थे तो उन्हें कहीं भी इतना घना और ऊँचा गन्ने का खेत न मिलता था, जो इनके प्यार को अपनी ओट में ले लेता!''

''हाँ शाह!'' मिंर्जा को शायद हुक्के के कश में नशा आ गया था या फत्तू और वीरो के प्रेम की कल्पना से, ''प्यार करनेवालों का कद इतना ऊँचा हो तो गन्ने मीठे हो-होकर उनके सिरों के नीचे मुँहों तक आ जाते थे।''

अब हकीम की बारी थी कि हुक्के के कश का मजा ले, ''वाह, मेरे यार! वाकई जमीन को बड़ा पोला करके बेच डालते हो। तुम्हारे बोल सुनकर जिन्दगी भर चूसे हुए गन्नों का मजा मुँह में भर आया है!'' हुक्के का कश लेकर वह धुएँ का एक घूँट गले से कलेजे में उतार रहा था, ''अपना दूसरा निकाह तो मैंने सिर्फ उम्मत की परवरिश के लिए पढ़वा लिया था। मेरी हड्डियों में अभी तक मेरी पहली ही मरहूम बीवी खनकती रहती है। उसे मैं सैकड़ों भालों के ठीक बीच से निकाल लाया था...नहीं, ठहरो, अभी एक कश और लूँगा!''

मिंर्जा ने फिर उस कच्चे रास्ते की तरफ देखा जो डेढ़-दो कोस पर मेले के मैदान में जाकर मिलता था, ''इतने में ही शायद वह मेले के आसपास जा पहुँचे होंगे!''

''जवानी आप ही मेला होती है मिर्जे! तुम्हारी धुँधली आँखों में कैसे थमे? यह लो, गले को गीला करो।'' उसने हुक्का उसकी ओर बढ़ा दिया, ''और अल्लाह-अल्लाह करो!''

''मेरी सारी जमींदारी ले लो सुल्तान शाह, लेकिन एक ऐसा कुश्ता (भस्म) तैयार कर दो कि साल-छ: माह के लिए बदन में फिर से जान पड़ जाएे!''

''मैंने कहा है ना, अब अल्लाह-अल्लाह करो! इस उम्र में जान पड़ गयी तो बदन और टूटेगा।'' इसी बीच कल्लू मिरासी कराहते हुए हकीम के चबूतरे पर चढ़ आया, ''दाढ़ में बहुत दर्द हो रैया है हकीम जी!''

''और अपनी मिरासिन का गुड़ खाया करो!''

''सुल्तान भी आप हो हकीम जी और शाह भी, आप ही ने तो उस भली लोक को बोलया था, अपने मिरासी को बादामों वाला गुड़ खिलाया करो!''

''अरे मूर्ख, मैंने कब कहा था कि गुड़ खा-खाकर मुँह में खोड़े बना लो यह लो दवा, दाँतों पर मलकर सो जाना।''

''अब और मुझे करना ही क्या है हकीम जी! मिरासिन तो मेले पर गयी हुई है!''

मिरासी उन दोनों से 'सलामालैकुम' कहकर चबूतरे से नीचे उतरा तो मिंर्जा अपने दोस्त से पूछने लगा, ''क्या यह सच है सुल्तान शाह, कि जब फत्तू और वीरो पहाड़ी के पार निकल जाते थे तो मिरासिन इस पार पहरा दिया करती थी?''

हकीम सुल्तान शाह को हुक्के की आवांज से महसूस हुआ कि आग ठंडी पड़ गयी है, इसलिए मिंर्जा को कोई जवाब देने के बजाय वह लोहे का एक तार लेकर चिलम के कोयलों को ऊपर-नीचे करने लगा, ''चिलम में दम देने का तो तुममें दम नहीं, फिर मिंजाईन बेचारी क्यों न बुझती जाए?''

''अच्छा किया, मुझे याद दिला दिया! मेरे जाने से पहले मिंजाईन के लिए पुड़िया बाँध देना!''

''हाँ, हाँ, ले जाना!''

हकीम गत्ते का एक टुकड़ा लेकर बुझती हुई आग पर पंखा करने लगा, जिससे कोयले सुलग-सुलगकर जैसे उसकी आँखों में भी चिनगारियाँ भरने लगे, ''अब दम में दम आया है!''

''क्या यह सच है?''

हकीम ने मिंर्जा की बात पर फिर ध्यान नहीं दिया और मुँह से धुआँ छोड़ते हुए कहा, ''गर्मी जब पानी से निथरकर मुँह में आती है तो तुम्हें क्या लगता है?''

''मुझे लगता है कि गाड़ी की तरह छुक-छुक चलने लगा हँ।''

''मुझे भी यही लगता है। पर असल ताकत का सही इस्तेमाल भी यही है कि सबकी गाड़ियाँ छुक-छुक चलती रहें।''

''यह तो है ही यार मेरे, पर मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दे रहे? क्या यह सच है कि...''

''हाँ सच है!'' फिर उसने पीछे से दरवांजे की ओर मुँह करके कहा, ''अरे भई सुनती हो? मिंर्जा आया है और कहता है चाय पिये बिना नहीं जाऊँगा!''

''अस्सलाम अलैकुम, भाभी! मैं दोपहर का खाना भी यहीं खाऊँगा।''

दोनों हँसने लगे और उनकी हँसी की आवांज सुन-सुनकर एक चूहा अपने बिल से निकलकर उनके करीब ही चबूतरे पर नाचने लगा।

हकीम सुल्तान शाह एकदम गम्भीर मुद्रा में मिंर्जा को बताने लगा, ''मिरासिन को फत्तू बड़ा अजीज है! वह उससे कहा करती है, अपनी उम्र से मैं अगर बारह एक वर्ष बड़ी होती तो तू मेरी ही कोख से जन्म लेता फत्तूफत्तू से वह सिर्फ तीन-चार साल बड़ी है, मगर अपने बच्चे की तरह उस पर नंजर रखती है।''

''हाँ, पहले पहल तो लोग ले उड़े थे कि वह फत्तू पर आशिक है।''

''हाँ, खुली-खुली मिरासिन है, आशिक न सही, बेटा सही...पहले तो वह डर गयी कि फत्तू सैयद मुसलमान और वीरो पक्की हिन्दू, पर फिर उसने देखा कि उन्हें एक दूसरे के लिए जीने से रोका गया तो वह जीएँगे ही नहीं...गाँव में बात खुल गयी तो वह मुझे बताने लगी...आप ही सोचो हकीमजी, हमारी दुनिया में भी इतनी बीमारी वाले लोग साँस लेते हैं, फिर भी अल्लाह पाक की हवा साफ की साफ रहती है और फकीत्तू और वीरो के साँसें तो इतनी साफ हैं कि मुर्दों में भी जान पड़ जाए। हिन्दू और मुसलमान खामखाँ आपस में बिगड़ रहे हैं। मोहब्बत करनेवालों को चुपचाप मोहब्बत से जीने दें...'' हुक्के का कश लेते हुए हकीम को रुकावट महसूस होने लगी तो बात को अधूरा छोड़कर वह नली में फूँकें मारने लगा।

''जब मामला इश्क का हो सुल्तान शाह, तो बात दीन की नहीं, ईमान की होती है।''

''हाँ, इसीलिए मिरासिन डूँगे पानी पर काई बनके पड़ी रही कि किसी की आँख तह पर न जा पहुँचे। हाँ, अब हुक्का फव्वारे की तरह चलने लगा है...तो मैं तुम्हें बता रहा था कि मिरासिन ने हर उपाय किया, बरसात में काई कहाँ ठहरती है! बात खुली और खुलते ही फैल गयी...लो, तुम्हारी भाभी चाय ले आयी है।''

हकीम की बीवी ने उनके सामने दो गिलास रखकर चाय से लबालब भर दिये और मिंर्जा की ओर मुँह करके बोली, ''आप अकेले ही आ जाते हैं, हमारी बहन को साथ नहीं लाते?''

''ले तो आऊँ भाभी, मगर पता नहीं, तुम्हारे मियाँ को किसने हकीम बना दिया है, दवाई खा-खाकर उसकी सेहत और बिगड़ती जा रही है।''

''तो फिर इनसे कहिए, मुझे ही कभी वहाँ ले जाएँ।''

''आये दिन वहीं होती हो, मैं क्या मना करता हँ?...मैं तो कहता हँ, तुम दोनों वहाँ रहो और मैं और मिंर्जा यहाँ! हमें अब तुम लोगों से क्या लेना-देना है!''

''लेन-देन का हिसाब तो ऊपरवाले के पास पहुँचकर चुक ही जाएगा।''

''तो भली लोक, खाते में हमारे एक और हुक्का परोसना भी लिख लो! तुम्हारी मेहरबानी हो जाए तो चाय के बाद ताजा हुक्का पीकर मजा आ जाएगा!''

हकीम की बीवी हुक्का उठाकर लौट गयी तो मिंर्जा ने एक बार मेले के रास्ते पर आँखें टिका लीं, ''रास्ता ऐसा दम सँभाले हुए-सा लग रहा है यार, जैसे जरा सँभलते ही भाग निकलेगा!''

''दुआ करो मिंर्जे, कि बूढ़े और रास्ते हमेशा ठहरे रहें, ताकि नौजवान गुमराह न हों!''

''हाँ, वह तो तुम बता चुके हो!''

वह दोनों अपने-अपने गिलास पर नजर जमाये सोच रहे थे कि चाय अभी बहुत गर्म होगी, जरा ठंडी हो तो उठाएँ। इसी बीच गाँव के सरपंच कंस राव का भतीजा उनके सिरों पर आ खड़ा हुआ, ''राम-राम हकीम चाचा राम-राम मिर्जा चाचा!''

''खुश रहो दुर्गे! कैसे आये?''

''ताऊ ने सौंफ का रस मँगवाया है, हकीम चाचा! रानू के पेट में दर्द हो रहा है!''

''कैसा दर्द है?''

''जैसे पेट में होता है चाचा और कैसा?''

''यह लो, सौंफ का रस है , दो पुड़िया दवाई की भी ले जाओ!''

दुर्गे के जाने के बाद मिंर्जा ने कहा, ''सुल्तान शाह, अभी तक तो तुम एक लाख से भी ज्यादा पुड़ियाँ गाँव के लोगों को दे चुके होगे?''

''हाँ मिंर्जे, एक लाख से भी ऊपर हो गयी होंगी। हर पुड़िया पर कलमा पढ़कर बन्द करता हँ कि दवा में दुआ भी घुल जाएे।''

''इसीलिए मेरी मिंजाईन कहती है कि मर जाएगी मगर दवाई तुम्हारी ही खाएगी। शहर के डाक्टर तो जहर घोलकर दे देते हैं।''

''पथरी से कंस राव की जान निकल रही थी मिंर्जा...चाय उठाओ, ठंडी हो रही है...उसका बड़ा बेटा उसे शहर में आपरेशन के लिए ले जाना चाहता था। मैंने कंस राव से कहा, पहले कलमे की तासीर परख लो! खुदा ने मेरा साथ न दिया तो फिर चीर-फाड़ करवा लेना!''

''हाँ, अल्लाह का फंजल है, अब तो मुण्डू के घोड़े की तरह अपने पीछे सारे गाँव की गाड़ी बाँधे फिरता है...भाभी ने चाय तो बहुत जी-जान से बनायी है।''

''हमारा सरपंच बड़ा नेक आदमी है! फत्तू और वीरो की खुफिया मुलाकातों की खबर जब उसके कानों तक पहुँची तो उसी वक्त सारे काम छोड़कर वह यहाँ मेरे पास आया और बोला, किसी बात की चिन्ता मत करो सुल्तान शाह, फत्तू अकेले रक्खे तेली का बेटा नहीं, हमारी साझी दौलत है! पूरे सौ कोस के घेरे में कोई एक तो हो जो उससे सिर निकालता हो...''

''हाँ, उसे देखकर तबीयत खुश हो जाती है!''

''कंस राव ने वीरो के बाप को भी यह समझाया था कि बात हिन्दू-मुसलमान की नहीं, बात यह है कि फत्तू और वीरो की जोड़ी कितनी सजीली है! सौ हजार बरस बीतते हैं तो कहीं इत्तेफाक से एक ऐसी जोड़ी बनती है!''

''हाँ भाई, जोड़ी तो ऐसी है कि उन्हें इकट्ठा देख-देखकर मेरे खेतों में दुगुने दाने फूट आते हैं!''

''उनकी शादी तो अंजाम पा गयी, मगर पंडित का लौंडा अभी तक फिरकापरस्ती का जहर फैला रहा है।''

''खुदा बचाये, निरा फितना है वह लौंडा! वीरो को असल में वह अपने लिए उड़ा लेना चाहता था, मगर लौंडिया ने घास न डाली तो उसने हिन्दू-मुस्लिम का सवाल खड़ा कर दिया। लड़की वाले दोनों इसीलिए बिदके हुए थे। बेचारे सिर जोड़-जोड़कर मशविरा करते रहते थे कि उन्हें अपने इरादे से कैसे रोका जाए!''

मिर्जा की भारी-भारी सफेद मूँछों में चाय की भूरी झिल्ली फँस गयी थी, जिसे देखकर हकीम हँसने लगा, ''होंठो पर इतने बड़े-बड़े सफेद झाड़ू क्या अपनी झुर्रियाँ साफ रखने के लिए बाँधे रखते हो, इतनी फबी हुई दाढ़ी क्या कम है?''

मिंर्जा ने अपने कन्धे पर लटकते हुए तौलिये से मूँछों को साफ किया और ठंडी साँस लेकर बोला, ''तुम तो जानते ही हो सुल्तान शाह, औरतें मुझे देखते ही घबराती थीं कि आशिंक न हो जाएँ!''

''हाँ यार, तुम भी अपने फत्तू से क्या कम थे? अरे भाई...'' वह अपना सिर मोड़कर बीवी को पुकारने लगा, ''अभी तक हुक्का नहीं हुआ है?''

''नहीं, सुल्तान शाह, फत्तू और वीरो के इश्क का तो जवाब नहीं! इतना बड़ा फसाद होते-होते रह गया, मगर क्या मजाल मस्तों के कानों पर जूँ भी रेंगी हो!''

''मुहब्बत करनेवालों के सिरों में अपनी धुन होती है, जूँएँ नहीं!'' अपनी बीवी को हुक्का लिये दरवाजे से आते देखकर उसकी आँखों में चमक आ गयी।

''देखो, तुम्हारी भाभी हुक्का परोस लायी है।'' उसने हाथ बढ़ाकर बीवी से हुक्का थाम लिया, ''मिंर्जे मेरी सारी हिंकमत तो तुम्हारी भाभी के दम से है!''

''हटिए, खुशामद मत कीजिए!'' हकीम की बीवी ने अन्दर लौटने से पहले अपने मियाँ को प्यार से देखा तो हकीम का ताजादम हुक्का बेअख्तियार गुड़गुड़ाने लगा।

''बहुत-बहुत शुक्रिया है अपने कंस राव का'', हकीम ने मिंर्जा की ओर झूलकर कहा, ''जो दोनों की शादी अमन से अंजाम पा गयी, वर्ना कहीं गड़बड़ हो जाती तो मुसलमान तो आटे में नमक के बराबर थे!''

''मगर आटे में नमक रच-बस जाता है सुल्तान शाह, तो न आटा नमक से अलग होता है, न नमक आटे से!''

''हाँ, आपस में रचना-बसना हो जाए, तो सबका जायका एक ही हो जाता है...लो, अपनी भाभी का हुक्का पीके देखो, दो ही घूँट में जन्नत के मजे आएँगे!''

मिंर्जा ने हुक्का अपनी तरफ खींचकर मुँह से लगा लिया, ''वाह...ह...ह ! जेहन में रोशनी ही रोशनी हो गयी है सुल्तान शाह!...कागज और कलम-दवात लाओ ताकि तुम्हारी जिन्दगी की सलामती का नुस्खा लिख दूँ!'' उसने एक और लम्बा घूँट भरा''वाह...वाह!'' उसी तरंग में उसने और दो-तीन लम्बे घूँट खींच लिए और थोड़ी देर के बाद फिर बोला, ''मेरी आँखों से पर्दे उठ रहे हैं शाह!'' अपने सामने देखते हुए उसकी दृष्टि अचानक सामने मेले के रास्ते पर रुक गयी, ''अरे! वह रास्ता कोई बुरी खबर पाकर सरपट भाग रहा है!''

हकीम जरा-सा घबराकर मिर्जा की तरफ देखने लगा!

''शायद तम्बाकू तुम्हारे कलेजे से जा लगा है...अरे भई, सुनती हो?'' उसने फिर पीछे के दरवांजे की ओर मुँह करके अपनी बीवी को पुकारा, ''मिंर्जा के लिए पानी का एक गिलास लाओ।'' उसने चिलम को हुक्के के मुँह से उठाकर हाथ में ले लिया और लोहे के तार से अंगारों में दबे हुए तम्बाकू को टटोलने लगा।

रास्ते मे पेड़, झाड़ियाँ, खेत...जो भी आये, फत्तू और वीरो को आवांजें देकर पुकारते रहे, मगर वह आपस में इतने मग्न थे कि उनका किसी की ओर ध्यान ही नहीं गया, मानो दोनों धुन में पिछले जन्म से अगले जन्म की ओर जा रहे हों और वर्तमान केवल इसलिए हो कि उनके संफर का सिलसिला न टूटे। 'वीरो!' फत्तू अपनी दुल्हन के कानों में गुनगुना रहा था, ''कल रात तुम सो रही थीं और मैं तुम्हें आँखों में समेटे महसूस कर रहा था कि तुम पकी हुई मिट्टी का कोरा चिराग हो और सरसों के तेल से लबालब भरी हो और तुम्हारा पूरा चेहरा ठंडी लौ बनकर जल रहा है और...''

''लौ ठण्डी भी हो तेली के बेटे, पर होती तो लौ ही है, फिर हमारा बिस्तर क्यों न जल उठा?'' वह खिलखिलाकर हँस पड़े और अभी उनकी हँसी हवा में बज रही थी कि उनके ऊपर से रंग-बिरंगी चिड़ियों का एक झुंड गुजर गया और नए-नवेले जोड़े ने खुलेआम एक-दूसरे को बाजुओं में ले लिया! इसी बीच उनके पैरों के पास से एक काला नाग गुजर गया, मगर उन्हें पता ही न चला! थोड़ी देर में वह रास्ते के बायें लकीर पर मुड़ते हुए एक जंगल में घुस रहे थे, जिसे पार करके उसी लकीर पर उन्हें एक पहाड़ी पर चढ़ना था, फिर वहाँ से मेले में कूद जाना था।

यह मेला कोई व्यापारिक मेला न था, बल्कि यहाँ हंजरत दरवेश के मजार पर आसपास के देहात से हर धर्म के नौजवान मर्द और औरत खाने-पीने, हँसने और मौज उड़ाने के लिए जमा हो जाते थे। हंजरत दरवेश मरहूम अपनी आखिरी उम्र में अपने नौजवान श्रद्धालुओं से घिरे रहते और उन्हें हँसते रहने का निर्देश देते। उनका कहना था कि नौजवानी ही में तो अकारण हँसना भी बुरा नहीं मालूम होता, वरना बुढ़ापे में तो सोच-सोचकर हँसना पड़ता है। एक कहावत प्रसिध्द है कि हंजरत ने सारी जवानी एकान्त चिन्तन में बिता दी और इस लम्बी साधना के बाद उन्हें हँसने की इच्छा बेचैन करने लगी, मगर उनके चेहरे के अंग-प्रत्यंग सालों-साल के निरन्तर चिन्तन से कुछ ऐसे साँचे में ढल गये थे कि जरा-सा हँसने से भी अपने स्थान से उधड़ने लगते और उनकी चीखें निकल जातीं, सो उन्होंने यह राह निकाली कि नौजवानों को हँसते-खेलते देख-देखकर ही अपनी इच्छा की पूर्ति कर लिया करे! उनके मजार पर मायूस नौजवान घंटों हँसते रहते हैं, ताकि वह खुश होकर उनकी मुरादें पूरी कर दें।

जंगल में दाखिल होते ही फत्तू ने वीरो से पूछा कि वह हजरत दरवेश से क्या मन्नत माँगेगी?

''तुम मिल गये हो तो मुझे और क्या माँगना है?''

''फिर भी?''

''फिर भी क्या? मैं तो खुश हँ ही, हँस-हँसकर हजरत को भी खुश कर दूँगी!''

अपने आसपास जंगल के बिखराव को देखते हुए फत्तू को अचानक आभास हुआ कि वह अपने मस्तिष्क में झाँक रहा है! उसने वीरो की कमर को अपनी बाँहों में लेकर अपने साथ जोड़ लिया और जैसे अपने-आपको बताने के लिए बड़बड़ाया, ''देख लूँगा उसे!''

''किसे...? कौन...?'' वह तेजी से उसकी बाँहों से निकलकर उसके सामने खड़ी हो गयी और बदहवासी में उसके मुँह से मुँह जोड़ लिया, जैसे उसके जवाब को अन्दर से बाहर आने से पहले ही अपने अन्दर डाल लेना चाहती हो ! रास्ता एक तरफ मुड़ गया और यह छोटा-सा जंगल अनंत प्रतीत होने लगा।

''घबराने की कोई बात नहीं'', फत्तू ने कहा, ''अपने हकीम चाचा का लड़का यूसुफ है ना, उसने एक अफवाह सुनी थी कि वह पंडित का छोकरा भरोसे मेले में इधर-उधर से कई गुंडों को ला रहा है!''

''तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?''

वह वीरो की ठोड़ी उठाकर उसकी आँखों में देखने लगा।

''बताओ, क्या बताता?...यह कि मुझे उस मेंढक से डर लग रहा है!''

वीरो को अपने आप अपने मर्द की आँखों में एक का दो दिखाई देने लगा और वह अपना भय भूलकर मुस्कराते हुए अपने ऍंगूठे के नाखून से उसके नए कुर्ते का काज ठीक करने लगी।

''अभी तक मैं उसका दिमाग ठिकाने पर लगा चुका होता, मगर सरपंच को वचन दे चुका हँ कि लड़ाई-झगड़े से बचा रहँगा।''

''बचना ही ठीक है!''

''क्या ठीक है? तुम घबराओ नहीं। अगर वह गड़बड़ पर तुल गया है तो उसे देख लूँगा।''

''देख तो उसे मैं आप ही लूँगी...कल मैं भाइये के घर से आ रही थी कि तालाब के पास मिल गया और अकेली पाकर बकवास करने लगा, मगर मैंने उसे खूब सुनायी। मेरी ओर बढ़ने लगा, मगर मैंने उससे पहले ही उसकी तरफ चार कदम बढ़ाकर कहा, ''हिम्मत है तो छू के दिखाओ!''

''तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?''

''क्या बताती...कि उस मेंढक से डर लगता है!''

दोनों एक-दूसरे से लिपट गये और हँसने लगे और पास ही कहीं झाड़ियों में बैठा हुआ बन्दरों का एक गोल उनकी हँसी सुनकर भाग खड़ा हुआ।

थोड़ी देर बाद ही वे जंगल के उस आंखिरी कोने के पास आ पहुँचे।

''मैं सोचती हँ फत्तू...''

''सोच-सोचकर क्यों अपना तेल निकालती रहती हो?''

''तुम्हें तो तेल के सिवा कुछ सूझता ही नहीं । नहीं, पहले मेरी बात सुन लो...लोग कहते हैं कि हमारी जोड़ी बहुत सुन्दर है, मगर मैं चाहती हँ कि हम कुरूप होते और एक-दूसरे को सारी दुनिया से सुन्दर लगते।''

वे जंगल से बाहर निकले तो सारा जंगल जैसे उनके पीछे फैलकर उन्हें देखता रह गया। वह दोनों एक-दूसरे के पीछे दौड़ते हुए पहाड़ी की चोटी पर आ गये और जैसे ही आये, मेला उनके दिलो-दिमाग से लुढ़क कर यहाँ पहाड़ी के इस तरफ जा लगा।

मेले के मुँह पर ही एक कोहकाफ झूला था, जिसकी गोलाई में दो सीटों वाले पंगूड़े बिजली की तेजी से ऊपर-नीचे घूमते हुए एक महाचक्र का दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। फत्तू और वीरो थोड़ी देर पहले इसी चक्र में ओझल हो गये थे और एक-दूसरे को अपने-अपने अस्तित्व से कसकर बाँधे महसूस कर रहे थे कि वह अपने आप ही गोलाइयों में घूम रहे हैं। उनकी प्रसन्नचित्त चीखें उन्हें चारों ओर से पकड़कर गिरने से बचाये हुए थीं, लेकिन वह चाह रहे थे कि चीखें उन्हें छोड़ दें और खुशी से चकनाचूर हो जाएँ और उनकी आत्मा आकाश की सैर को निकल जाए।

झूले से उतरकर अभी तक वह दोनों जैसे झूले में ही झूम रहे थे कि उन्हें अपनी मिरासिन नजर आ गयी, जो बंफै का लाल गोला चूस रही थी।

''भाभी!''

उन्हें देखकर मिरासिन की बाछें खिल गयीं, ''आओ...यहाँ आओ!'' वह उन्हें बुलाते हुए उनके पास आ गयी, और उन्हें भी बर्फ वाले के पास ले आयी, ''लाओ भाई, इनके लिए भी दे दो, चार-चार आने के हिसाब से दो...हजरत दरवेश का मेला है, बरफ को आग लगाकर बेचोगे तो तुम्हारा भला कैसे होगा?...लो पूरे, बारह आने हैं, गिन लो!''

''भाभी!''

मिरासिन चिढ़ी हुई सूरत बनाकर फत्तू की तरफ देखने लगी, ''माँ को भाभी कहते हुए शर्म नहीं आती? मैंने तो अपना बेटा नहीं जना कि तू जो है!'' मिरासिन ने जमीन से जरा-सी धूल उठाकर वीरो के गाल पर लगा दी, ''बहू इतनी अच्छी दिख रही है, मेरी मुई नंजर न लग जाए!''

''भाभी...नहीं माँ...नहीं, मुझसे तुम दो-एक साल ही बड़ी होगी या शायद छोटी ही हो! मैं तुम्हें माँ कैसे कहँ?''

''कह दोगे तो मैं तुम्हारे बूढ़े बाप के तेल से अपना सिर तो न लिथड़ लूँगी। मेरा सारा लेना-देना तो तुमसे है!''

''हमारे बड़े भाई को अकेला छोड़ आयी हो?''

''हाँ, मिरासी को भाई बनाओ, खा बेटा, पर मैं तुम्हारी माँ हँ।''

''पर उसे अकेला क्यों छोड़ आयी हो?''

''अकेला कहाँ छोड़ आयी हँ? उसकी दाढ़ का दर्द जो उसके साथ है! उसी का नाम लेकर मर रहा था, सो मैंने कहा, मेरा क्या है, मरो...और अपने बेटे की छवि देखने यहाँ चली आयी!''

बर्फ वाले ने फत्तू और वीरो को गोले थमा दिये तो मिरासिन उनसे कहने लगी, ''आओ! अब किस्मत वाली चिड़िया दिखाऊँ, वीरो की किस्मत मालूम करेंगे...आओ! मेरा तो सारा हाल उसने खोलकर बता दिया है! इस तराँ पंजे जमा-जमाकर पिंजरे से निकलती है जैसे सोच-सोचकर आनेवाले वख्तों में दांखिल हो रही हो और सीधी उसी कागंज पर जा खड़ी होती है, जिस पर किस्मत लिखी हो ,आओ...यह है...यह लो चवन्नी, भाई! अपनी चिड़िया से कहो कि हमारी बहू की किस्मत बताए!''

पिंजरा खुलते ही रंगदार चिड़िया धीरे-धीरे बाहर आयी, इधर-उधर देखा और चूँ-चूँ करती हुई एक कागज पर वीरो की किस्मत पर आ खड़ी हुई।

चिड़िया वाला कागज उठाकर पढ़ने लगा, ''चार शब्द ही लिखे हैं, बीबी, पर चार तोले सोने से कम नहीं! सुनकर चिड़िया को एक चवन्नी और दे दोगी...लिखा है, अपने प्यारों का प्यारा!''

फत्तू बड़े प्यार से अपनी दुल्हन की तरफ देखने लगा। मगर इसी बीच भीड़ में से किसी ने चिड़ियावाले की ओर एक चवन्नी फेंककर कहा, ''यह लो, दूसरी चवन्नी हमसे ले लो!''

फत्तू ने आँखें घुमाकर देखा कि पंडित का बेटा भरोसे माथे पर तिलक जमाये अपने चन्द मुस्टंडे साथियों के साथ खड़ा खी-खी कर रहा है। वह म्यान से निकली हुई तलवार की तरह तेज और चमकदार हो उठा।

''अपनी चवन्नी उठाकर सबके सामने माफी माँगो भरोसे, वर्ना...''

''वर्ना क्या...हमारी चीज पर कब्ंजा करके हम ही को दीदे दिखाते हो!''

''तुम्हारी चीज पर...'' फत्तू बेकाबू होकर पास ही से न जाने किसकी लाठी झपट लाया और जब उनकी ओर लपका तो किस्मत वाली रंगदार चिड़िया पिंजरे का दरवांजा खुला पाकर फुर्र से उड़ गयी।

वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था।

फत्तू और वीरो के दम तोड़ते-तोड़ते यूसुफ और उसके चन्द साथी भी आ पहुँचे और भरोसे और उसके साथियों पर टूट पड़े, और जब भरोसे दम तोड़ रहा था तो हिन्दुओं के एक गिरोह ने मुसलमानों को आ लिया...और जो हिन्दू और मुसलमान इस दंगे को खत्म कराना चाहते थे, वह अपनी-अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे और समझने लगे कि दूसरे समुदाय के लोग उन्हीं पर हमला करने के लिए दौड़े आ रहे हैं। और इस तरह वह भी एक-दूसरे से भिड़ गये। मेले का मैदान देखते-ही-देखते खून में लथपथ हो गया...हिन्दू और मुसलमान तो लड़ते रहे, मगर उनके खून की लकीरें जमीन पर बह-बहकर इकट्ठी होती रहीं। और जानवर जो उनकी बैलगाड़ियों और एक्कों को खींच-खींचकर उन्हें यहाँ लाये थे, अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से अपलक चुपचाप मानव की दरिन्दगी का तमाशा देखते रहे और शायद हैरान होते रहे कि भूख मिटाने के लिए मारना जरूरी है तो जिसे मारते हैं, पहले उसे तो खा लें, यह तो मारते ही चले जा रहे हैं और कोई किसी को खाता भी नहीं।

और...और कई औरतें...मिरासिन भी...हजरत दरवेश मरहूम के मजार से लिपट-लिपटकर पागलों की तरह हँसे जा रही थीं।

अफवाहों के पर होते हैं न पैर, फिर भी कहाँ नहीं जा पहुँचतीं! अफवाहें फैलाने वाले का कोई पता ही नहीं चलता था। बस यह समझ लीजिए कि अफवाहें आप ही अपने आपको फैलाए चली जा रहीं थीं...एक यह थी कि हजरत दरवेश सभी बड़े-बड़े मुसलमानों के सपनों में आ-आकर उन्हें चूड़ियाँ दे रहे हैं, एक और यह कि मस्जिदों में मुसलमानों से कसमें ली जा रही हैं कि हर एक कम-से-कम इसका सफाया करे...और कई और थीं जो भूतों की तरह बे-पर इनसानी लाशों पर फड़फड़ाकर भयानक स्थितियाँ उत्पन्न कर रही थीं!

सरकार ने हजरत दरवेश के मंजार के आसपास सभी देहातों में कर्फ्यू लगा रखा था। लाउडस्पीकर द्वारा बार-बार घोषणा की गयी कि कर्फ्यू में जो भी बाहर दिखाई देगा, उसे गोली से उड़ा दिया जाएगा। असामाजिक तत्त्वों को फिर भी जो करना था, अपने बचाव का उपाय करके बराबर करते रहे, मगर भोले-भाले लोग झूठ-झूठ आवाजें दे-देकर अपनी-अपनी मौत को बुलाते रहे! कंस राव का जन्मदिन तो था, लेकिन अपनी मौत के दिन किसी के पैदा होने के दिन का खयाल किसे आता है?...लेकिन मिरासी ने हँसकर कहा, ''कर्फ्यू का मैंने क्या बिगाड़ा है, जो मेरा रास्ता रोककर खड़ा हो जाएगा! लाला से अपना इनाम माँगकर अभी लौट आऊँगा!''

''जाना है तो जाओ, मेरी जान क्यों खा रहे हो?'' फत्तू और वीरो के कत्ल के बाद से मिरासिन के होश ठिकाने नहीं रहे थे। वरना वह जो काम अपने मर्द के लिए ठीक न समझती थी, मार-पीटकर भी वह उसे इस काम से रोक लेती थी।

जिन्होंने गोलियों की आवांज सुनी थी, उनका कहना था कि फौंजी ने पहली बार हाल्ट कहा तो मिरासी तेंज-तेंज चलने लगा, दूसरी बार कहा तो उसने दौड़ना शुरू कर दिया और तीसरी बार ंफौंजी की 'हाल्ट' सुनकर इतनी तेंजी से दौड़ने लगा कि ंफौंजी ने गोलियों की बौछार कर दी! किसी को उसकी हाय की आवांज भी न सुनाई दी! मिरासिन को यह खबर सुनाई गयी तो पहले तो उसकी समझ में कुछ नहीं आया, फिर शायद आया या शायद न आया और उसने सिर झुकाकर चुप साध ली! एक बार उसे बताने की कोशिश की गयी तो वह चिल्लाकर कहने लगी, ''हाँ, हाँ, सुन लिया है! इतनी बड़ी बीमारी फूट पड़ी हो तो सभी को बारी-बारी मरनाहोताहै!''

मगर उसी शाम को वह पड़ोस में जाकर रोने लगी, ''मैं अपने इस मुए मिरासी को कहाँ से ढूँढँ? सवेरे का गया हुआ है अभी तक नहीं लौटा।''

उस सारे इलाके में सफेद कबूतर बहुत थे। गुंडे मनमानी करके साफ बच निकलते तो फौंजी अपनी बन्दूकों को आकाश की ओर घुमाकर इन सफेद कबूतरों को ही गिराने लगते और कबूतर फड़फड़ाते हुए उनके कदमों पर आ गिरते। फिर वह विजयी भाव से मार्च करते और उन्हें रौंदते हुए कच्चे मकानों के मलबों की ओर आगे बढ़ जाते।

जब फसाद की रोकथाम के सारे उपाय बेकार हो गये तो सरकार ने निर्णय लिया कि मुसलमानों के लिए तीस-पैंतीस मील की दूरी पर राजधानी के निकट एक गाँव में कैम्प खोल दिया जाएे।

तारापुर गाँव में ंकाफिले की रवानगी की तैयारी हो रही थी कि कंस राव सरपंच और कुछ दूसरे हिन्दू लोग उन्हें विदा करने आये! पहले तो फरीकैन एक-दूसरे को फटी-फटी नंजरों से देखते रहे और फिर गले मिलकर रोने लगे!

''मैं बहुत शर्मिन्दा हँ, सुल्तान शाह!'' कंस राव ने कहा, ''मुझसे कुछ भी न बन पड़ा।''

''हर शरीफ आदमी शर्मिन्दा है लाला,'' हकीम सुल्तान शाह ने सन्तों की-सी दीनता से कहा और कंस राव का सहारा लेने के लिए उसके कन्धे पर अपना बूढ़ा हाथ टिका दिया, ''गैरशरीफों का क्या, शरींफ ही भुगतते आये हैं।'' फिर अचानक कुछ याद आने पर अपनी शेरवानी की जेब में हाथ डाला, ''लाला! रतनलाल की बीमारी लम्बी है, यह तीस पुड़ियाँ बना लाया था कि कोई मिल गया तो उसके लिए दे दूँगा। उससे कहना, वैसे ही मक्खन के साथ एक पुड़िया हर रोंज खाता रहे!''

सरपंच ने पुड़ियाँ अपनी जेब में रख लीं, ''मुझे तो लग रहा है शाह, कि हमारे बाप-दादा...सभी मरे हुए बुजुर्ग आप लोगों के साथ ही गाँव से जा रहे हैं!'' रक्खे तेली के बूढ़े बाप के पोपले मुँह से अचानक निकल गया, ''मगर लाला, अपने बच्चे तो हम यहीं कब्रिस्तान में छोड़े जा रहे हैं, उनका खयाल रखना।''

कंस राव ने बूढ़े तेली का दु:ख महसूस करके जवाब दिया, ''मेरा जी तो चाहता है भैया, अपने ही पेट में छुरा घोंपकर हिन्दुओं से तुम्हारा बदला चुका दूँ!''

इस बीच में फौंजी बिगुल ने काफिले की रवानगी का एलान किया और ठीक उसी समय काफिले में औरतों की टुकड़ी से मिरासिन की चीख आयी...

''हाय, मैं अपनी गाय तो खूँटे पर ही भूल आयी हँ!''

''गाय ही तो है!'' मिंर्जाइन उसे समझाने लगी, ''यह वंक्त अपनी जान बचाने का है।''

''नहीं, यह लोग उस बेजबान को खत्म कर देंगे!''

मिरासिन अभी मुड़-मुड़के देख ही रही थी कि दूसरे फौंजी बिगुल के साथ ही ंकाफिला रवाना हो गया!

''लखी...ई...ई...!'' मिरासिन ने चीखकर अपनी गाय को पुकारा और काफिले से निकलकर उलटे पाँव बेसुध भागने लगी।

मिरासिन की चीख अभी तक उनके कानों में गूँज रही थी और जमीन पर उनके पैर इतने हल्के पड़ रहे थे जैसे वह अपने-अपने अस्तित्व के बिना विचारों-विचारों में जी रहे हों। सारे काफिले में जीवन का अहसास केवल ंफौंजी जूतों की ठप-ठप से हो रहा था।

हकीम सुल्तान शाह के करीब आकर मिंर्जा उनके कान में कहने लगा, ''रास्ते भी हमारे साथ भाग रहे हैं, सुल्तान शाह!''

''क्या?'' हकीम की भरी-भरी आँखों में अपने बेटे यूसुफ की लाश डूबी हुई थी।

''मैंने कहा, ठहरे हुए रास्ते भी हमारे साथ चलते आ रहे हैं।''

हकीम ने एक लम्बी ठंडी साँस खींच ली।

''जब बूढ़ों का ही ठहरना न हो मिंर्जे, तो बस्तियों के रास्ते भी क्यों ठहरे रहें?''

''यही तो मैं कह रहा हँ! इन्हें सँभाल कर साथ-साथ रखो, वर्ना वापस कैसे आएँगे?''

हकीम ने हारी हुई हँसी हँसकर कहा, ''सँभाल के सच पूछो मिंर्जे, तो यूसुफ के जाने के बाद अब कुछ भी सँभाल के रखना फंजूल मालूम होता है।''

''हौसला रखो हकीम, अल्लाह सबसे बड़ा है!''

''हाँ मिंर्जे, अल्लाह सबसे बड़ा है।''

वह काफी देर खामोशी से साथ-साथ चलते रहे और फिर एकदम मिंर्जा ने अपनी गर्दन हकीम की तरफ बढ़ाकर कहा, ''सुल्तान शाह, एक रांज की बात बताऊँ?''

हकीम ने अपने कान खड़े कर लिए।

''अभी-अभी हजरत दरवेश मरहूम मेरे साथ ही चल रहे थे और मुझे बता रहे थे कि मैंने भी फैसला कर लिया है कि अपनी जगह छोड़कर तुम्हारे साथ ही हो लूँ!''

पूरे एक सप्ताह की तलाश के बाद कंस राव मिरासिन को खोजने में सफल हुआ। उसके आदमियों ने शाम के समय उसे मिरासी और फत्तू की कब्रों के पास घुटनों में सिर दिये अपने अस्तित्व की कब्र में जिन्दा पड़े हुए देख लिया।

''अरी ओ मिरासिन!...मिरासिन!''

मिरासिन ने घुटनों से सिर उठाकर उनकी ओर देखा।

''बहुत हो गया भाइयो, अब मेरी जान को छोड़ दो।''

''चलो, हमारे साथ चलो।''

''नहीं, दोनों नहीं, केवल एक!'' उसकी निगाहों में गिड़गिड़ाहट थी, ''कलमा पढ़ कर कोई एक मुझे ले जाओ! फिर आधे घंटे के बाद मुझे तलांक दे देना।''

''कैसी बातें कर रही हो? चलो तुम्हें सरपंच ने बुलाया है!''

सरपंच से मिलकर पहले तो मिरासिन की रोते-रोते हिचकी बँध गयी, फिर गुबार हल्का हुआ तो बताने लगी, ''बड़े बदमाश लोग थे। मैंने सोचा था कि मुझे लखी के पास ले जाएँगे, पर तुम्हें क्या बताऊँ, जुल्मियों ने मेरी इंज्जत की बहुत लूट मचायी। मिरासी बेचारा मेरी फिकर कर-करके कबर में अपना दाढ़ का दर्द भूल गया होगा।''

सरपंच का दिल इतना भारी हो रहा था कि उसे अपनी हल्की-सी मुस्कराहट का आभास भी न हुआ।

''लाला, मैंने हाथ जोड़-जोड़कर मिन्नत की...मुझे मेरे लोगों के पास पहुँचा दो! पापियों ने हँस-हँसकर जवाब दिया...तुम्हारे लोगों को तो पाकिस्तान भेज चुके हैं,इतने साल से पाकिस्तान भी सँभाले बैठे थे और हमारी छाती पर भी मूँग दल रहे थे। पाकिस्तान कौन-सा गाँव है लाला? क्या तुम मुझे उनके पास हुँचा दोगे?''

सरपंच ने उसे दिलासा दी, ''हाँ, पहुँचा दूँगा। अब तुम सो जाओ।''

''मेरा फत्तू कहा करता था कि तुम दिल के पक्के मोमिन हो! मेरी लखी को भी खोज निकालो।''

''जरूर खोज निकालूँगा! अब तुम सो जाओ!''

मिरासिन को सात दिन में पहली बार खुला-खुला आंजादी का सोना मिला तो सोते-सोते उसे सारी रात आभास होता रहा कि नरक की आग से निकलकर बारिश में भीग रही है।

सुबह उसकी आँख खुली तो गुंडों को वासना भरी फुंकारें उसके शरीर से बुखार के द्वारा निकल रही थीं ! सरपंच ने सोचा कि आवश्यक हुआ तो कैम्प में ही इलाज करा लेंगे और उसे सरकारी जीप में बिठाकर ड्राइवर को चलने का निर्देश दिया।

मिरासिन बारह घंटे कैम्प के अस्पताल में पड़ी रही और थोड़ा होश में आते ही उसने पानी माँगा तो डाक्टर उसी दम उसकी ओर लपका और गिलास भरकर उसे प्रेम पूर्वक पानी मिलाने लगा, ''छोटे-छोटे घूँट भरो माँ!

मिरासिन का फुँका हुआ कलेजा छोटे-छोटे घूँट भरते हुए ठण्डा होने लगा और उसने अपनी नर्म-सी दृष्टि बिजली की धीमी रोशनी में नौजवान डाक्टर के चेहरे पर टिका ली!''

''तुम्हारा क्या नाम है?''

''मैं यहाँ डाक्टर हूँ माँ!''

''मेरा फत्तू भी बिलकुल तुम्हारी तराँ ऊँचा लम्बा था...तुम्हारा नाम क्या है?''

''नन्दकिशोर, माँ!''

डाक्टर उसके माथे पर हाथ रखकर उसका बुखार देखने लगा।

''हमारे हकीम साब को खबर कर दो बेटा, मैं भी पाकिस्तान आ पहुँची हँ!''


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हिंदी समय में जोगिन्दर पाल की रचनाएँ