डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कहानी

फाख़्ताएं
जोगिन्दर पाल

अनुवाद - कृष्ण पाल


''यहाँ खरीयत है। आपकी खरीयत नेक चाहता हूं।''

अपने पुराने दोस्त फंजलदीन को चिट्ठी लिखते हुए लोभसिंह को याद आया है कि वह उन दिनों भी उसे खरीयत पर टोका करता था, ''उर्दू के मास्टर हो लोभे, यह भी नहीं जानते कि खैरियत 'खै' से लिखते हैं।''

''बड़े इलमदीन मत बनो फजलेदीन। नुक्ते जितने कम हों सरल उतनी ही और सुथरी होती है।''

''पर...''

''पर-वर छोड़ो। तुम भी अँग्रेंजी पढ़ते हो।'' वे दोनों पाकिस्तानी पंजाब में चविंडे के एक प्राइमरी स्कूल में टीचर हुआ करते थे। ''जरा गहराई से सोचो, तुम्हारी अँग्रेंजी इतनी सरल क्यों है कि अँग्रेजों के बच्चे पर भी फर-फर बोलते चले जाते हैं? हमारे पंजाब के बच्चे इस तरह खुलकर उर्दू क्यों नहीं बोलते?''

''क्या मुझे अपना शागिर्द समझते हो लोभेया? मेरे साथ उर्दू क्यों बोल रहे हो?''

''तुम उर्दू में जवाब जो दे रहे हो।''

''ह हा ह...ह!...''

पाकिस्तान बनने पर लोभसिंह अपने चविंडे से दिल्ली की तरफ निकल आया और मास्टरी छोड़कर यहाँ टैक्सी चलाने लगा।

''एक बार घर जो छूट गया है यारो,'' वह कहा करता, ''तो बैठे-बैठे भी यही लगता है कि कहीं भागे जा रहे हैं।''

दिल्ली में कई साल की रिहायश के बाद एक दिन अचानक उसे पाकिस्तानी डाक का लिंफांफा मिलाअंज मौलवी फंजलदीन हेडमास्टर चविंडाखत पढ़ते हुए वह मानो अपने पुराने यार फंजलदीने को कलेजे से लगाए हुए था।...फंजलेया !ओए हरामंखोर ! तू इधर बड़ा मौलवी बन गया और मुझे पता भी न चलाओ बाप के हेडमास्टर !उसकी आँखों से पंजाब के पाँचों आब उसके मुँह-दाढ़ी में बह निकले थे।

''कोई मर गया भापे?'' उसका जवान बेटा जसवन्त सिंह पूछने लगा।

''नहीं, पुतरा, मुर्दा जी पड़ेया ए।''

इसके बाद लोभसिंह का नियम बन गया कि महीने में एक बार वह सारे काम छोड़कर भी अपने फंजलदीन को खत लिखने बैठ जाता।

यहाँ खरीयत है, आपकी खरीयत...

आपकी !लोभसिंह बेइख्तियार हंसने लगा हैइस काले मुंह मौलवी को तो उसकी औरत भी तू-तू करके घर से धक्का दे देती थी।

''आज फिर पिटके आये हो फंजलदीने?''

''यार, लोभेया, आज तनख्वाह का दिन है न!''

''यार, हमारी धर्मकौर बेचारी तो तनख्वाह के दिन भी बुखार से पड़ी रहतीहै।''

लोभसिंह की बीवी को बारी का बुखार रहता था।

''चलो, आज ही तुम्हें अपने मामे के पास ले जाता हूं। बहुत बड़ी हकीम है।''

''मैं तो चंगा-भला हूं मूरखा! बीमार तो तुम्हारी भाबी है।''

मगर वो भी चंगा-भला कहाँ था? अपनी बीवी का रोग उसे भी अन्दर-ही-अन्दर खाए जा रहा था। 1947 में मुल्क के बँटवारे के मौके पर इतनी आग भड़की कि वे बेघर होकर दिल्ली आ पहुँचे। अगर उनसे चविंडा न छूटता तो धर्मकौर जैसे-तैसे आज भी जिन्दा होती, मगर यहाँ आये उन्हें अभी पूरा एक साल भी न बीता था कि उथल-पुथल में उसे अपनी धर्मकौर वाहेगुरु को सौंपनी पड़ गयी...सच्चे पादशाह, जब तक मैं भी अपना वक्त पूरा करके तुम्हारे पास न आ पहुंचूं, मेरी अमानत संभालकर रखना!...

''वक्त तो पूरा हो चुका है।'' लोभसिंह ने सिर उठाकर अपने आपसे पूछा है...''फिर मैं अभी तक यहाँ क्या किए जा रहा हूं?'' अपनी सफेद दाढ़ी पर बेचैनी से हाथ फेरते हुए वह सोच रहा है कि वह निकल तो पड़े, पर वाहेगुरु को ढूँढ़ेगा कहाँ? इतने सालों में धर्मकौर भी उसकी तरह बुड्डी-खुड्डी हो चुकी होगी, पर जब वह मरी थी तो बुखार की गर्मी से उसके मुंह पर कितना रूप चढ़ आया था। वह उसका हाथ पकड़े पहरों उसके पलंग पर बैठा रहता था, मानो कुछ भी हो जाए, वह उसे जाने से रोके रखेगा।

''घबरा नई, जस्सी के भापे, मैं जाऊँगी नई।''

वह उसका हौंसला बंधाने लगती।

''डर नई, मैं नई जाऊंगी। मुझे मालूम है मैं चली गयी तो तू मर जाएगा।''

धर्मकौर के जाने के बाद वाकई यही हुआ, मगर उससे भी बुरा यह हुआ कि लोभसिंह को मरकर भी जाने कब तक सांस लिये जाना था। सारी दुनिया वही थी और वह वैसे ही यहाँ-वहाँ टैक्सी उड़ाए फिरता था और वैसे ही खाता-पीता हँस-हँसकर बोलता था, मगर अपनी धर्मकौर के बगैर एक 'जी' नहीं रहा था। धर्मकौर के जाने का समय आ पहुंचा तो उसने और मजबूती से उसका हाथ पकड़ लिया, मगर उसका हाथ उसके हाथ में पड़ा रह गया और वह न मालूम कहाँ चली गयी। पहले तो वह बहुत-से-बहुत यहाँ चविंडे से अपने मैके कोटली लोहाराँ तक जाती थी और इस दौरान वह उसे बिलानागा हर दूसरे दिन चिट्ठी लिखता थाडाकखाना कोटली लोहाराँ, तहसील वजीराबाद, जिल्ला गुजराँवाला, सरदारनी धर्मकौर मार्फत सरदार रनजीतसिंह घोड़ों वाले को मिले, मगर अब वह उसे कहाँ चिट्ठी भेजे?

मगर इस वक्त तो वह अपने फंजलदीने को चिट्ठी लिख रहा है

आपकी खरीयत नेक मतलूब!

'आप' ने उसे फिर गुदगुदाया हैदोस्त इतना करीबी हो तो आप-बाप क्या?मगर वह मानो अपनी ही प्राइमरी स्कूल की चौथी क्लास में बड़े अदब से बैठा होअपनी पंजाबी में दिल भरके फटकार-फटकार कर मुहब्बत कर लो, पर उर्दू में खत लिखो तो जिसे लिखो उसे हमेशा 'आप' कहकर मुंखातिब करो उसे खास दिल्लीवालों का खयाल आने लगा है, जो गाली-गालौज पर भी उतर आते हैं तो कुछ इस तरहआपकी मां की, बहन कीउसके मुंह से ठाह-ठाह कहकहा फूट पड़ा है।

जसवन्त सिंह अपनी बीवी को छोड़कर दौड़ के आ गया है कि भापे को क्या हो गया है। जब से वह टैक्सी चलाना छोड़कर घर बैठ गया है, आप-ही-आप कभी हंसने लगता है और कभी रोने। उसने अपने बाप को मशवरा दिया है कि ड्राइवर के साथ वह भी टैक्सी में चला जाएा करे, नहीं तो अकेले बैठ-बैठ के पागल हो जाएगा। लोभसिंह ने सदा की तरह अपने बेटे को समझाया कि मेरी इतनी ही फिक्र है तो जल्दी से मुझे पोता क्यों नहीं ला देते।

''तुम सचमुच पागल हो गये हो भापे !'' उसने अपने आप से पूछा है कि पोते क्या बांजारों में बिकते हैं, जो आदमी टैक्सी में बैठकर उन्हें झटपट खरीद लाये। पोतों के लिए मेहनत करनी पड़ती है।

''ते फिर मेहनत कर पुतरा!''

पहलू के कमरे में जसवन्त सिंह की बीवी दबे-दबे हंसी है और जसवन्त भी मुस्करा-मुस्करा कर सिर हिलाते हुए वापस चला गया है।

लोभसिंह को फंजलदीन की किसी चिट्ठी का खयाल आ गया है, जिसमें उसने लिखा था कि उसके कुल मिलाकर पन्द्रह पोते और दोहते हैं और पाँच पोतियां और दोहतियां यानी मेरा हेडमास्टर शेर एक से बीस हो चुका है। अगर वह कहीं आसपास होता तो दो-एक को उनकी पैदायश पर ही माँग कर अपने घर ले आता और उन्हें अपने हाथों से नहला-धुलाकर उनकी कँघी-पट्टी किया करतानहीं, यह कैसे हो सकता है कि अपना फंजलदीन मेरी न मानता? न मानता तो मैं उन्हें ंजबर्दस्ती ले आतावे तेरे हैं फंजलदीने, तो मेरे नहीं? अपनी किताब ध्यान से पढ़ हेडमास्टर! इसमें साफ हुकम दिया गया है कि सारे यारों-मित्रों को साथ बाँटकर खाओ। कड़ाह प्रसाद सारी संगत के लिए होता है, पर उसका अल्लाह उसे शादकाम रखे और मेरा वाहेगुरु मुझे। वो भला मेरा कहा क्यों टालता?

लोभसिंह ने अपने लोभ और लालसा से बेबस होकर अपनी टैक्सी को फंजलदीन के घर के सामने जा खड़ा किया है। और हॉर्न की पौं-पौं से उसके सारे पोते-पोतियाँ और दोहते-दोहतियों को इकट्ठा करके गाड़ी में लादकर दिल्ली उड़ा लाया हैयह देखो, कुतुब साहब की लाट! वह लाट साहब का दफ्तरयह लालकिला ! हाँ भई, सबों को एक-एक कुल्फी दे दोह-हा-ह आओ ! बच के ! ध्यान से! लोभसिंह बैठे-बैठे बच्चों को घुमा-घुमाकर थक गया है और खुशी से हाँफते हुए फिर यहाँ अपने कमरे में आन पड़ा है।


यहाँ खरीयत है


हाँ, खरीयत है। खरीयत तो है!

ख-खी-खी-ह-हा!

उसे पहलू के कमरे से अपने बेटे और बहू की गुत्थमगुत्था सुनाई दी है और उसने बड़े संतोखे से अपने-आपसे सवाल किया है, और कैसी खरीयत होती है?मैंने तो सात-आठ बरस पहले उस वक्त भी फंजलदीन को खरीयत ही की खबर दी थी, जब सारा खेल चौपट होकर रह गया था। मेरे बड़े बेटे जसविन्दर सिंह को टैक्सी की दुर्घटना में परलोक सिधारे पूरा एक मास भी न गुजरा था। इस बार तो मैं ऐसा बेघर हुआ था कि दिलोदिमाग में भी रहने की जगह न रही थी, मगर इतनी दूर से अपने यार को कोई सुख नहीं पहुँचा सकता तो उसे दुखी भी क्यों करूँ या फिर ऐसी-वैसी खबर पहुँचाए बगैर कोई चारा ही न रहे तो दुख की पिटारी को धीरे-धीरे खोलना चाहिए ताकि पहले काले नाग की सिर्फ दुम ही नंजर आये।

जसविन्दर सिंह आपके बेटे का नाम है?

हाँ, क्यों?

कल वही टैक्सी लेकर आगरा गया था?

क्यों, क्या हुआ?

कल! कल उसकी टैक्सी एक मोटरसाइकिल से टकरायी और मोटरसाइकिल वाले ने दुर्घटना होते ही दम तोड़ दिया।

मेरा बेटा निर्दोष है जी! वो बड़ा जिम्मेदार ड्राइवर है।

हाँ, मगर इस बीच पीछे से उसकी टैक्सी पर एक तेज रंफ्तार ट्रक आया और...

और अब काले नाग ने फन फैला लिया, मगर इतनी देर में लोभसिंह की हिम्मत तन चुकी थी।

दुर्घटना के हफ्ताभर बाद ही जसविन्दर की शादी होनेवाली थी। लोभसिंह ने टैक्सी ड्राइवरों की यूनियन के हर मेम्बर को दावत दे रखी थी। पब्लिक ट्रासंपोर्ट के कमिश्नर साहब ने अपनी कुर्सी से उठकर उससे हाथ मिलाया था और उसे यकीन दिलया था कि वह उसके बेटे की शादी में जरूर आएंगे। घर में पहली शादी थी और उसने तय कर रखा था कि खूब धूमधाम से होगी और उस दिन वह शराब के दो घूँट भी पी लेगा, जिसे उसने एक बार छोड़कर कभी न छूने की कसम खा रखी थीवाहेगुरु अपना ही आदमी है और जनता है कि इतने बडे मौके पर इतनी छोटी-सी चूक भी न हो तो फिर जीना किसलिए। उसे भी पास बैठाकर कहेगाले भाई ले, आज तू भी दो बूँद चख लेनहीं?नहीं मेरे पादशाह, ले ले, मेरी खातिर ले ले!

लोभसिंह के कानों में बाजे बज रहे हैं और उसने देखा है कि बाजेवालों के पीछे जसविन्दर अपनी पगड़ी पर मोतिए और गुलाब से महकता हुआ सुनहरा सेहरा बाँधे घोड़ी पर बड़ी सज-धज से बैठा है और जरा आगे वह आप 'दो घोड़ों' की 'शलवार-कमीज' पहने और धारीदार केसरी पगड़ी को सिर पर लहरों की तरह जमाए भंगड़ा करने के अन्दाज में चल रहा है और बार-बार मुड़कर बरातियों पर केवड़ा छिड़क रहा है। बारातियों के मुंह बत्तियों की तरह जगमगा रहे हैं और कहकहे पटाखों की तरह छूट रहे हैं और और यह क्या ? सारी-की-सारी बारात अचानक जमीन की सतह से ऊपर उठने लगी हैऔर बाजे-गाने समेत बदस्तूर चाँद-तारों की तरफ उठती जा रही हैऔर सिर्फ लोभसिंह और उसका छोटा बेटा जसवन्त सिंह यहाँ जमीन की सतह पर रह गये हैं और दीवानवार चिल्ला रहे है वीर जी ! जसविन्दर। विन्दरे ओए! ठहर जा पुतरा ! और फिर वह बेबस हाकर हथेलियाँ मलने लगा है और उसकी पगड़ी ढीली होकर कन्धों पर ढलक आयी है और वह राहगीरों को बता रहा हैबड़ा नेक पुत्तर है जी, रज के नेक! अपनी मरी हुई मां का आशीर्वाद लेने ऊपर चला गया है जी!...

लोभसिंह हौले-हौले रो रहा है।

''की होएया भापे?'' इस दफा जसवन्त ने अपने कमरे से आवांज लगायी है।

''कुछ नहीं।''

लोभसिंह ने उठकर तौलिया गीला करके मुंह साफ किया है और फिर अपने पलँग पर आ बैठा है।

यहाँ खरीयत है

कहाँ खरीयत है?मगर वाहेगुरु का हुक्म खरीयत समझकर ही कबूल करना पड़ता है''सब ठीक है पुतरा!'' वह अपने बेटे के इत्मीनान के लिए आवांज खोलकर बोला है। ''आराम करो।''

उसने अपनी चिट्ठी फिर हाथ में ले ली है और लिखने लगा हैसूरते अहवाल यह है के वक्त काटे नहीं कटता। दिन-रात चुपचाप पड़ा रहता हूं और सिर्फ वही घड़ियां काम की लगती हैं जब जरा आँख लग जाती है और अपने चविंडे जा पहुँचता हूं .

लोभसिंह को पचपन-साठ साल के फासले से अपनी मां की आवांज सुनाई दी है लोभेया !-लोभेया !...

''हां, बेबे!'' वही बेबे का लोभेया-सा बना बूढ़ा लोभसिंह बेइख्तियार पुकार उठा है।

''जा, पुत्तर, देख! दरवाजे पै खड़ा फंजला बुला रया ई।''

क्या जिन्दगी थी। सारे काम जिन्दगी ने आप ही संभाल रखे थे और हमारा काम बस यही था कि जी-जीकर बड़े होते चले जाएं।

लोभसिंह ठंडी सांस भरकर फिर लिखने लगा है

क्या यह नहीं हो सकता कि आप चविंडे की मिट्टी से जेबें भरके एक बार मुझसे मिलने चले आएं? वीजा न बने तो चोरी-चोरी आ जाएं। बड़े लोगों की लड़ाइयों से हमारा क्या लेना-देना, हम छोटे लोगों को तो सिर्फ गले मिलने के लिए मिलना है। इस पर किसी को क्या एतराज होगा? आप चुपके से आ जाएं, बाकी सब मेरा पुत्तर जसवन्त सिंह संभाल लेगा।

लोभसिंह के कानों में अपने बेटे और बहू की ठठोल खुसर-फुसुर पड़ने लगी है और वह मुस्कुराकर मानो अपने खिलखिलाते पोते से खेलने लगा हैऔर भाई केसरसिंगा।ओ गुलाबसिंह!ओ माँ का मोतबरसिंगा! और माँ का मोतबरसिंगा भी किलकारियाँ मार-मारकर उसे बराबर जवाब दिये जा रहा हैमगर वह है कहाँ?लोभसिंह ने दिलगीर-सा होकर फिर अपनी चिट्ठी पकड़ ली है।

बाकी सूरत अहवाल यह है के मैं बहुत अकेला पड़ गया हँू। चन्द माह पहले जब मैंने अपना पैंसठवाँ साल पूरा कर लिया तो जसवन्त सिंह ने मुझे टैक्सी चलाने से रोककर घर बैठा दिया। पहले तो मैंने चाहा था कि थप्पड़ मारकर समझाऊँ, टैक्सी मेरी, मैं अपना, बीच में तू कौन? पर सच तो यही है कि टैक्सी चलाना अब मेरे बस का नहीं रहा। अब तो मैं सिर्फ खयाली घोड़े दौड़ा सकता हँू। हेडमास्टरी होती तो तुम्हारी तरह (उसने 'तुम्हारी' काटकर 'आपकी' लिखा है।) ंगलत उम्र लिखाकर दस-एक साल और निकाल देता। पर बहुत हो लिया। आप भी पेन्शन लेकर अपने घर के बच्चों की ही जमात लगाना शुरू कर दें! पेंशन के बाद घर से बाहरी भी मास्टरी करते फिरेंगे तो चार-छह माह में ही पागलखाने में डाल दिया जाएँगे।

''ह-हा-ह!'' लोभसिंह ने कलम चलाना रोक लिया है।

एक दफा एक खुशपोश बूढ़े पागल ने उसकी टैक्सी में बैठकर बड़े रोब से उसे हुकम दिया, ''चलो।''

''किधर?''

''पीछे!''

लोभसिंह अपनी हँसी ने रोक सका। ''टैक्सी तो सिर्फ आगे ही जा सकती है।''

''मगर मुझे अपने पीछे जाना है।''

''तो श्रीमान्, फिर गाड़ी में बैठने की क्या ंजरूरत है? अपने मन में ही पाँव-पाँव उतर जाइए।''

लोभसिंह आज जैसे आप ही अपनी टैक्सी में आ बैठा है।

''कहाँ?''

''चविंडे?''

''चविंडे?'' वह अपने-आपको पागल समझकर हँसने लगा है। ''उधर तो इक ही रास्ता ए, आकाशों आकाश, सो, फांख्ता बनकर उड़ जाओ सरदाराँ।''

क्यों?क्यों?स्वर्गीय वरयामसिंह इसकी धर्मकौर का भाई भी था और वे दोनों यारबाश भी! भाई इससे पूछा करता कि चविंडे से लुट-पुटकर निकले थे, वहाँ क्यों जाना चाहते हो?

''क्योंकि चविंडे मेरी पनाहगाह है भाई!''

चविंडे की याद में जब लोभसिंह की जान गले में आन अटकती तो वह सबकुछ छोड़छाड़ के भाई वरयामसिंह के पास सहारनपुर जा पहुँचता, जहाँ पाकिस्तान से निकलने के बाद भाई आबाद हो गया था।

भाई छूटते ही पूछता, ''क्यों लोभेया, चविंडे जाने के लिए आये हो?''

वह उसे जवाब देता कि बोतल खोलो, बातें चविंडे पहुँचकर करेंगे। लोभसिंह किसी कारण भाई के पास जा न पाता तो उसे बड़ी लम्बी चिट्ठी लिखने बैठ जाता।

भाई वरयामसिंह, सतसिरी अकाल। यहाँ खरीयत है। आपकी खरीयत नेक मतलूब। सूरते अहवाल यह है कि जल्दी से बोतल का काक खोलिए, हमें एकदम चविंडे पहुँचना है...

आजकल भी लोभसिंह अकसर भाई वरयामसिंह को चिट्ठी लिखने की ख्वाहिश से बेकाबू होने लगता है, मगर मरे हुओं को किस पते पर चिट्ठी लिखी जाए? अगर वो जिन्दा होता तो लोभसिंह अपनी चिट्ठी पहुँचाने सहारनपुर तक पैदल चलकर भी कूचा दिलवरा में दाएँ तरफ चौथे मकान की डयोढ़ी में जा पहुँचता, मगर मरे हुओं को वाहेगुरु ने मालूम किस पते पर जा बैठाता है। फिर भी एक बार अपनी रौ में अनजान-सा होकर उसने स्वर्गीय भाई को ंखत लिख भेजा, जो वापस आ गया या फिर शायद यह है कि अपने सही पते पर आ पहुँचा, क्योंकि किसी की मौत के बाद जब हम उससे मुखातिब होते हैं तो उसकी तरफ से भी हम ही को अपनी बात सुननी होती है। मरनेवाला तो मर गया, पर उसे जीने के लिए हम तो जिन्दा हैं।

लोभसिंह ऊँघने लगा है और ऊँघते हुए ंख्वाब में घूम-फिर रहा है और घूमते-फिरते रास्ता खोकर ख्वाब ही ंख्वाब में ंख्वाह से बाहर निकल आया हैयहाँयह चविण्डे का प्राइमरी स्कूल है। स्कूल के सामने यह कच्चा रास्ता सीधा उसके घर जाता है। वो वहाँ उसके घर की चौखट पर धर्मकौर खड़ी उसका इन्तजार कर रही है। अपनी बीमारी में भी वह उसी तरह हर रोज उसकी वापसी पर यहीं खड़ी होती हैवह उसे जी भरकर देखने के लिए रुक गया है और उसे लग रहा है कि मेरी जनानी सरसों के जर्द फूलों की तरह सोना-सोना बिखरी पड़ी है। इस पर एक टक नंजर बाँधे वो अचानक उछल पड़ा है कि मैं लोभी यहाँ उसे ललचाई आँखों से तके जा रहा हँू और वो वहाँ बुखार से धुआँ-धुआँ सुलग रही हैवह लपककर उसकी तरफ हो लेता है पर आधे फासले पर ही क्या देखता है कि वह मुस्कराते-मुस्कराते ंजमीन पर ढेर हो गयी हैधरमो!जसवन्त-जस्सी!...

जसवन्त अपने कमरे में तेंज-तेंज आया है।

''की होएआ भापे?''

''कुछ नहीं!''


लोभसिंह अपनी भीतरी हड़बोंग पर ंकाबू पा रहा है।

''सो जाओ भापे!'' जसवन्त ने अपने बाप से कहा है और इधर-उधर नंजर दौड़ते हुए उसकी अधूरी चिट्ठी देखकर यूँ ही पूछ बैठा है, ''चिट्ठी लिख रए हो?''

लोभसिंह ने तौलिए से मुँह पोंछकर जवाब दिया है, ''हाँ, तेरे चविंडे वाले चाचे नूँ।''

''तुसी ते पागल हो गये ओ भापे!''

जसवन्त ने अपने बाप पर तरस खाते हुए उसे याद दिलाया कि चविंडे के चाचे को मरे-मुके तो उमराँ बीत चुकी हैं।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में जोगिन्दर पाल की रचनाएँ