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कहानी

शालिग्राम
शशिभूषण द्विवेदी


अब मैं शालिग्राम होता जा रहा था और पिता जो सचमुच शालिग्राम थे, उनके हाथ-पैर निकल आए थे।

यह एक झूठ था और कहते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते। लेकिन मुझे लगता है कि झूठ के हाथ-पैर, नाक-कान, मुँह कुछ भी नहीं होता। वह एक लोंदे की तरह होता है। सिर्फ पेट भरने के लिए। पिता भी कुछ ऐसे ही थे। वे जब भी पूजा पर बैठते बिल्कुल लोंदे की तरह लगते। ऐसे जैसे भगवान की मूर्ति के सामने कोई शालिग्राम रखा हो। वे बहुत पूजा-पाठी आदमी थे। ठीक सुबह चार बजे उठते और बिना दो घंटे पूजा-पाठ के मुँह में अन्न का दाना तक नहीं डालते। लेकिन यह सारा परिवर्तन उनके भीतर रिटायरमेंट के बाद आया था। रिटायरमेंट के पहले तक तो दफ्तर ही उनका मंदिर था और काम ही पूजा। दफ्तर में वे कड़क अफसर माने जाते थे। मजाल क्या कि उनकी नाक के नीचे कोई गड़बड़ हो जाए। अपनी इसी अक्खड़ता में वे बड़े-बड़े अफसरों को भी नहीं सेंटते थे। इसलिए लोग उनसे डरते भी बहुत थे। एक बार एक अफसर ने एक महिला सहकर्मी के साथ थोड़ी बदसलूकी क्या कर दी उन्होंने सरेआम उसे थप्पड़ मार दिया और छह महीनों के लिए सस्पेंड हो गए। इन छह महीनों का उपयोग उन्होंने अपने साथी कर्मचारियों को एकजुट करने में किया। और आखिरकार जब सस्पेंशन वापस हुआ तो फूल-मालाओं से लदे-फँदे वे वापस दफ्तर आए। तब से दफ्तर में उनका रुतबा और बढ़ गया। अब वे सुबह नौ बजे घर से दफ्तर के लिए निकलते थे और शाम पाँच बजे घर आते। उनके इस रूटीन में कभी-कभार ही बाधा आती जब कोई जरूरी काम सामने आ जाता। काम भी काम जैसा नहीं होता था। बस ऐसे ही किसी की टेलीफोन लाइन जोड़नी है या किसी का फोन डेड पड़ा है, उसे ठीक करवाना है। अजीब बात थी कि ये सारे काम एक लाइनमैन भी कर सकता था लेकिन पिता को उन पर भरोसा नहीं था। वे सब घूसखोर थे और पिता से ज्यादा कमाते थे। पिता उन सब पर खूब खीझते।

घर में भी पिता का वही हाल था। हर चीज करीने से रखी होनी चाहिए। वे नियमित डायरी लिखते थे। पचीस-तीस साल पुरानी हिसाब-किताब की डायरी भी उन्होंने बड़े करीने से सँभालकर रखी थी। क्या मजाल कि ऑफिस का कोई फालतू कागज या पुर्जी भी इधर से उधर हो जाए। उनकी यह आदत तो खैर आज भी बरकरार है। उनकी इन तीस-पैंतीस साल पुरानी डायरियों को देखकर आज भी कोई तत्कालीन समाजार्थिक स्थितियों का अनुमान लगा सकता है। शायद यह उनके छात्र जीवन की आदत थी। गरीबी थी और महीने भर का बजट बनाना जरूरी था। पिता की उन दिनों की डायरियों में दाल, चावल, नमक और घी का पूरा हिसाब-किताब मिलता है। यह अजीब है कि वे डायरियाँ उन्होंने आज भी सँभालकर रखी हैं जिनकी अब कोई जरूरत नहीं। वे आज भी मोरारजी देसाई की सरकार को याद करते हैं जिनके शासन में राशन सबसे सस्ता था।

ऐसी और भी तमाम बातें हैं जो उन्हें औरों से अलग बनाती हैं। इसके अलावा ऐसी भी तमाम बाते हैं जो उन्हें औरों की तरह ही बनाती हैं। मसलन दफ्तर का रौब-दाब घर में भी चलाना, बात-बेबात बच्चों और पत्नी की पिटाई करना, समय से नहाना-धोना आदि-आदि। वे हद दर्जे के कंजूस थे और पैसा दाँत से पकड़ते थे। बचपन में मुझे एक बार आइसक्रीम खाने की इच्छा हुई थी। मैंने माँ से इसके लिए जिद की लेकिन माँ ने इस पर कान नहीं दिया। चिढ़कर मैंने घर के मंदिर में रखे फुटकर सिक्के उठा लिए और आइसक्रीमवाले के पास जाकर एक आइसक्रीम या कहें कि मीठी बर्फ ले ली। पिता ने मुझे ऐसा करते हुए देख लिया था और खूब पीटा था। पिता की इस कंजूसी का मनोविज्ञान भी शायद उनकी बचपन की गरीबी से जुड़ा था। उनके बचपन की गरीबी के किस्से माँ हमें किसी प्रेरक कथा की तरह सुनाती थीं। जैसे कथा बाँचकर उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई की, दादा उनकी पढ़ाई के सख्त खिलाफ थे फिर भी उन्होंने बीएससी किया। कहा जाता है कि वे गाँव के पहले और अब तक बीएससी तक पढ़े-लिखे इनसान थे। माँ बतातीं कि बीएससी के लिए शहर जाने के लिए उनके पास ढंग के कपड़े भी नहीं थे। एक मुचड़ा-सा पाजामा और बुश्शर्ट बस। वो भी बेमेल रंगों की। शहर के तमाम शहराती विद्धार्थी उनकी इस वेशभूषा पर हँसते। लेकिन पिता को धुन थी पढ़ने की सो, उनकी हँसी और उपहास पर वे ध्यान ही न देते। उनके जीवन का रूटीन खाना बनाने, कॉलेज जाने, पढ़ने और रोज अपने कपड़े धोने तक सीमित था। कपड़े वे रोज इसलिए धोते थे क्योंकि उनके पास ले-देकर यही एक जोड़ी बुश्शर्ट और पाजामा था जिसे उन्हें रोज पहनना होता था। इन परिस्थितियों पढ़ाई-लिखाई कर उनके सरकारी नौकरी में आने की कथा हमें सिकंदर की विश्वविजय की कथा की तरह लगती थी क्योंकि वह हमें ऐसे ही सुनाई गई थी। बाद में जब वे सरकारी नौकरी में आए तो उनकी जिंदगी का एक ढर्रा बन गया था। जहाँ नौकरी में आने से पहले उनकी दुनिया सिर्फ पाठ्य-पुस्तकों तक सीमित थी वहीं अब वह सात घंटे बीस मिनट की नौकरी तक सिमट गई थी। अब उनकी पूरी दिनचर्या इन सात घंटे बीस मिनट के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटती थी। यह अलग बात है कि नौकरी उन्होंने हमेशा घड़ी देखकर सात घंटे बीस मिनट की ही की, कभी सात घंटे इक्कीस या उन्नीस मिनट नहीं होने दिए। इस तरह अपने इस कड़क रूटीन में उन्होंने पूरे पैंतीस साल गुजारे। और पहली बार इसमें व्यवधान तब आया जब वे रिटायर हुए।

रिटायरमेंट की यादें उन्हें आज भी रह-रहकर गुदगुदाती हैं। रिटायरमेंट के समय उन्हें फूल-मालाओं से लाद दिया गया था और उनकी, निष्ठा, कार्यकुशलता और ईमानदारी के कशीदे काढ़े गए थे। किसी ने उन्हें राजा हरिश्चंद्र की उपाधि दी तो किसी-किसी ने तो उन्हें साक्षात मर्यादा पुरुषोत्तम ही बता दिया। देखा जाए तो रिटायरमेंट की यह पार्टी ही शायद उनके जीवन की चरम उपलब्धि थी जो आज भी उन्हें जब-तब गुदगुदा जाती है और वे अनायास अकेले बड़बड़ाने लगते हैं कि बिना किसी दाग-धब्बे के नौकरी शान से गुजर गई। रिटायरमेंट के समय उनका जो ग्रुप फोटो खींचा गया था, उसे वे जब-तब देखते और झाड़-पोंछ कर यथास्थान रख देते।

अब तो खैर, इस ग्रुप फोटो में शामिल कई लोग काल-कवलित हो गए, कई ट्रांसफर होकर जहाँ-तहाँ चले गए। एक-दो लोग जो इस शहर में बचे रह गए हैं, उनसे भी पिता की मुलाकात कभी-कभार ही हो पाती। हाँ, जब कभी वे अपने किसी पुराने साथी से मिलकर आते जो उनके चेहरे की प्रफुल्लता देखते ही बनती। ऐसे में घर भर को सुनाकर वे माँ से कहते - 'अरे, सुनती हो, अपने सक्सेना साहब का बेटा इंजीनियर हो गया। अमेरिका जा रहा है आगे की पढ़ाई के लिए। अब शायद वहीं रहे।' सक्सेना साहब बता रहे थे।

माँ की स्मृति इधर कमजोर हो गई है। वे अपनी स्मृति पर जोर डालकर पूछती हैं, 'कौन सक्सेना साहब?' पिता थोड़ा उदास हो जाते हैं। फिर हँसकर कहते हैं - 'अरे वही सक्सेना साहब जो पहले अक्सर हमारे यहाँ आते थे खाने पर... ये देखो...' पिता अपना रिटायरमेंटवाला ग्रुप फोटो निकालकर उसमें सक्सेना साहब को खोजकर दिखाते हैं जो अब धुँधला गया है और जिसमें चित्र साफ नजर नहीं आते।

'अच्छा वे!' माँ अन्यमनस्क भाव से कहती हैं।

पिता फिर थोड़ा उदास हो जाते। फिर कहते - 'कभी मेरे बॉस थे लेकिन बॉस होने का रौब कभी नहीं डाला, हमेशा दोस्त की तरह व्यवहार किया। दफ्तर में सभी उनकी तारीफ करते थे। ...आजकल अपने बेटे की शादी के लिए लड़की ढूँढ़ रहे हैं। कह रहे थे कि लड़का अमेरिका जा रहा है, कहीं किसी गोरी मेम-वेम के चक्कर में पड़ गया तो सारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। मैंने कहा, मेरी भी वही हालत है। लड़की पढ़ी-लिखी है, परमानेंट नौकरी है मगर उसके लायक लड़का नहीं मिल रहा। चप्पलें घिस गईं लड़का ढूँढ़ने में... सोच रहा था कि अपनी शुभ्रा के लिए सक्सेना साहब के लड़के की बात चलाऊँ।'

'पागल हुए हो क्या? ब्राह्मण होकर कायस्थों में लड़की दोगे?' माँ की जुबान कैंची की तरह चलती है और जब चलती है तो पिता खामोश हो जाते हैं। वैसे, माँ लोंदा नहीं थीं। शादी के बाद जब से वे इस घर में आईं तभी से उनके हाथ-पाँव, नाक-कान, मुँह-आँख सब कुछ ठीक से काम कर रहे हैं। वे पूजा-पाठ भी नहीं करतीं, बल्कि अपने पूरे शरीर का भरपूर उपयोग करती हैं। हाँ, इधर उन्हें गठिया और अधकपारी की शिकायत ज्यादा रहने लगी है। फिर भी पूरा घर एक तरह से उन्हीं के बूते चल रहा है। पिता को घर से कभी कोई खास मतलब नहीं था। रिटायरमेंट से पहले वे पूरे शालिग्राम थे जिसे सिर्फ भोग लगाया जाता है। भोग लगाने के बाद वे एक लंबी डकार लेते। थोड़ा टहलते और फिर अपने बिस्तर पर चुपचाप जाकर लेट जाते। सुबह वे देर से उठते और उठकर नहा-धोकर चाय पीते हुए अखबार पढ़ते। इसके बाद तैयार होकर सीधे ऑफिस जाते। बीच-बीच में कभी-कभार वे हम बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के लिए डाँटते या मारते। इस बीच माँ की कैंची जैसी जुबान लगातार चलती रहती जिस पर पिता कान ही न देते।

हाँ, रिटायरमेंट के बाद उनके जीवन में, व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर आ गया था। रिटायरमेंट से पहले वे अपने हाथ से पानी तक लेकर नहीं पीते थे। साहबी रौब रुतबा था।

पर अब जब से रिटायर हुए हैं तब से अपना सारा काम खुद ही करते हैं। यहाँ तक कि अपने कपड़े भी खुद ही धोते हैं। जो पिता रिटायरमेंट तक किसी लोंदे की तरह लगते थे, अब अचानक उस लोंदे में हाथ-पैर निकल आए थे। अब वे हर सुबह नित्यकर्म के बाद सैर को जाते जहाँ उनके कुछ हमउम्र दोस्त भी बन गए थे। एक देशी झबरीला कुत्ता भी उनके मुँह लग गया था। वह कुत्ता पूरी सैर भर उनके साथ रहता। सैर से लौटकर वे क्यारियों को पानी देते और फूल-पत्तियों की छँटाई करते। नाश्ता भी अब वे पहले की तरह 'हैवी' नहीं लेते। एक कटोरी दलिया और बिना चीनी की चाय उनका नाश्ता था।

'इससे स्वास्थ्य ठीक रहता है' - वे अक्सर कहते। नाश्ता करते हुए वे नियमित अखबार पढ़ते। अखबार पढ़ने का उनका तरीका भी अजीबोगरीब था। वे अखबार के मास्टहेड से लेकर प्रिंट लाइन तक एक-एक शब्द ध्यान से पढ़ते। पढ़ते-पढ़ते वे बीच-बीच में माँ से बात भी करते रहते। रिटायरमेंट से पहले तक माँ से उनकी ज्यादातर बातचीत वेतन और महीने के खर्च को लेकर होती थी, लेकिन अब उनकी बातचीत कुछ इस तरह होने लगी थी -

पिता - 'जानती हो, शर्माजी की बेटी की शादी तय हो गई। बेचारे बड़े दिनों से परेशान थे।'

माँ - 'हाँ, मिसेज शर्मा बता रही थीं। तिलक में पूरे बारह तोला सोना चढ़ा।'

पिता - 'प्याज और गैस के दाम फिर बढ़नेवाले हैं।'

माँ - 'कौन कह रहा था?'

पिता - 'अरे, अखबार में लिखा है। सोना भी दिन पर दिन महँगा होता जा रहा है।'

फिर थोड़ी देर सोचकर कहते, 'आज तो दिव्यानंद जी का प्रवचन टीवी पर नहीं आएगा। भागवत पर बड़ा अच्छा बोलते हैं, तबीयत खुश हो जाती है।'

माँ कहतीं, 'मटर भी आज बीस रुपये किलो मिली। मौसमी सब्जियाँ भी इतनी महँगी हो गई हैं कि पूछो मत।'

पिता कहते, 'घुटने में दर्द हो रहा है। सोते समय थोड़ा चीता तेल मल देना।'

माँ कहतीं, 'शुभ्रा कह रही थी कि इस साल उसकी फीस भी बढ़ गई है।'

पिता कहते, 'छोटा भी आजकल घर में कम ही दिखता है। सारा दिन कहाँ रहता है, पता नहीं।' उनके चेहरे पर चिंता की रेखाएँ उभर आतीं। माँ अपने घुटने का दर्द दबाए रसोई में घुस जातीं। पिता अखबार पढ़ते हुए वहीं से चिल्लाते, 'देखो इस बार किसकी सरकार बनती है। इस सरकार ने तो नरक मचा रखा है। छोटा भी घर में कम ही रहता है। अखबार पढ़ो तो पता चले कि शहर में क्राइम कितना बढ़ गया है। जरा-जरा से बच्चे चोरी-डकैती करने लगे हैं।' वे अखबार के राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषणों की एक-एक लाइन बार-बार पढ़ते और स्वगत ही अपनी राय देते जाते। माँ उनकी बात का जवाब न देतीं। दरअसल, देश की सामाजिक और आर्थिक हालत पर पिता की चिंताएँ वाजिब होते हुए भी गैरवाजिब थीं क्योंकि अब वे खुद निरर्थक होते जा रहे थे। उन्हें अपने होने का मतलब तलाशना था जो वे तलाश नहीं पा रहे थे। इस तलाश के लिए उन्होंने धार्मिक साहित्य का सहारा लिया। स्थानीय लाइब्रेरी से रोज वे कोई-न-कोई धार्मिक किताब ईश्यू करा लाते और देर तक उसका पाठ करते। यह उनका नया नशा था जो उन्होंने जिंदगी में कभी नहीं किया था। इधर जब से टीवी पर धार्मिक चैनलों की बाढ़ आ गई तब से उनके लिए दिन काटना और भी आसान हो गया। किस समय किस चैनल पर कौन सा साधु-संन्यासी या महात्मा प्रवचन करनेवाला है, इसकी उन्हें पक्की जानकारी रहती। अब टीवी का रिमोट ज्यादातर उन्हीं के हाथों रहता। प्रवचन सुनते-सुनते वे इतने भाव विह्वल हो जाते कि रोने लगते।

एक बदलाव और आया था उनमें इन दिनों। वे कभी भी किसी के साथ बैठकर बतियाने लगते। इनमें धोबी, नाई और माली सब शामिल थे।कभी भीषण रौब-दाबवाले पिता का इस तरह धोबियों, नाइयों, मालियों से घुल-मिलकर बतियाना हमें बड़ा अजीब लगता। वे इन लोगों से भी अपनी बेटी शुभ्रा की शादी की बातें शेयर करते और उन्हें भी लड़का खोजने के अभियान में लगा देते। शुभ्रा दी की शादी के लिए उन्होंने अब अपने भगवान को भी पटाना शुरू कर दिया था और पूजा के समय भगवान से अपनी बेटी की शादी की भीख माँगा करते। रो-रोकर गुहार करते -

जऊ घर बार कुल होई अनूपा।

करिय विवाह सुता अनुरूपा।।

इसी साल शुभ्रा दी ने एमए किया था और अब प्राइवेट एमबीए कर रही थीं। लेकिन पता नहीं क्या था कि उसके लायक लड़का ही नहीं मिल रहा था और मिलता भी तो कोई-न-कोई अड़ंगा लग जाता। कभी कुंडली नहीं मिलती तो कभी दहेज का चक्कर फँस जाता। कभी मंगली तो कभी कालसर्प दोष। हालाँकि मेरा व्यक्तिगत रूप से इन सबमें कोई विश्वास नहीं था, लेकिन पिता मानते थे और उनके तर्क का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। जैसा कि मैंने पहले कहा कि झूठ के हाथ-पैर, नाक-कान कुछ नहीं होते उसी तरह पिता के इस कुंडली प्रेम के भी हाथ-पैर, नाक-कान कुछ नहीं था। फिर भी झूठ था और अपने ठोस रूप में था।

यह झूठ शुभ्रा दी को लेकर था। अपने कॉलेज के एक लड़के के साथ उनका अफेयर था जिसे वह हमेशा झुठलाया करती थीं। लेकिन सच के तो हाथ-पैर, मुँह-नाक सब कुछ होता है इसलिए यह सच छुप न सका और वह पैदल चलते-चलते घर तक आ गया। माँ की कैंची जैसी जुबान में जैसे और धार आ गई। लेकिन इस सच के आगे पिता हार गए थे और उस पूरे दिन उन्होंने न कुछ खाया न किसी से कुछ कहा। अब उनकी पहली चिंता शुभ्रा दी की शादी की थी। मैं शुभ्रा दी का हमराज था जो इस सच को जानता था और उनके झूठ में सहयोग देता था। झूठ हम सब बोलते थे सिवाय पिता के। पिता ने जीवन में कभी झूठ नहीं बोला था। वे सत्यनिष्ठा के कायल थे। उनके इस तरह राजा हरिश्चंद्र बनने के चक्कर में हम सब रंक बनते जा रहे थे। नौकरी में आने के बाद भी उनकी यह सत्यनिष्ठा बरकरार रही। जहाँ सब लोग घूसखोरी करते हुए अमीर हुए जा रहे थे, पिता अपनी ईमानदारी का डंका बजाते हुए गरीब के गरीब ही बने रहे। इस सबका असर घर पर तो पड़ना ही था। सो पड़ा। आए दिन घर में कलह होने लगी। एक हमारे घर को छोड़कर कॉलोनी में सबके घरों में रंगीन टीवी, फ्रिज, वीसीआर सब आ गए थे। पूरी कॉलोनी में एक हमारा घर ही सबसे अलग था, सबसे अजूबा। अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के कारण पिता की सीआर लगातार खराब होती रही। इस बात से पिता ही नहीं, घरवाले भी लगातार दुखी होते रहे। उधर पिता राजा हरिश्चंद्र बने हुए थे और हम रंक होते जा रहे थे। शुभ्रा दी ने तो जैसे-तैसे ट्यूशन वगैरह पढ़ाकर एमए कर लिया था लेकिन मेरी हालत बद से बदतर होती जा रही थी। घर की बदतर होती हालत से शुभ्रा दी भी वाकिफ थीं, लेकिन वे कुछ कर नहीं सकती थीं सिवाय कुछ ट्यूशन पढ़ाने के, जिससे कुछ खास बनना-बिगड़ना नहीं था। आखिर एक दिन घर की हालत से आजिज आकर वे अपने उस प्रेमी के साथ घर से भाग गईं जिसके बारे में सिर्फ मुझे पता था। पिता तब भी खामोश रहे। हालाँकि माँ की कैंची-जैसी जुबान लगातार चलती रही और पिता को उनकी अकर्मण्यता के लिए कोसती रहीं। हालाँकि यह भी बहुत बाद की बात है। यहाँ एक क्षेपक ही सही लेकिन पिता से जुड़ा एक किस्सा याद आता है जो शायद उन्हें खुद भी अपनी बेटी के प्रेम-प्रसंग के बारे में सुनकर याद आया हो और उस याद ने ही उन्हें खामोश कर दिया हो। या शायद उन्हें कुछ भी याद न आया हो और मैं यहाँ खामखा ही अटकलें लगा रहा होऊँ। जो भी हो, किस्सा दिलचस्प है और पिता के व्यक्तित्व की रुक्षता को देखते हुए हमें आज भी इस पर यकीन नहीं होता।

दरअसल किस्सा पिता के प्रेम-प्रसंग का है जिसकी कल्पना से ही हमें गुदगुदी होने लगती है और मन में शर्म की जगह हँसी का एक गुबार उठने लगता है। यों तो प्रेम में हर आदमी मूर्ख होता है लेकिन इस किस्से में पिता की मूर्खता एक शास्त्रीय किस्म की मूर्खता थी जो आज के दौर में एक विरल पवित्रता का अहसास कराती है। याद नहीं यह किस्सा मुझे किसने सुनाया था - चाचा ने, माँ ने या किसी और ने। पता नहीं। शायद किसी ने भी नहीं। हो सकता है कि माँ, चाचा आदि इसे लेकर आपस में कभी हँसी-ठिठोली कर रहे हों और चुपके से किसी वर्जित आख्यान की तरह मैंने इसे सुन लिया हो।

बहुत पुरानी बात है। पिता ने शहर में नई-नई टेलीफोन आपरेटरी की नौकरी ज्वाइन की थी। गाँव से शहर में वे अपनी मासूमियत या कहें कि गावदीपन भी साथ लेते आए थे। न ढंग से पहनने-ओढ़ने का शऊर न उठने-बैठने, बोलने-बतियाने का। ले-देकर श्रीराम चाचा से ही उनकी बातचीत थी जो धीरे-धीरे गहरी दोस्ती में बदल गई। इतनी गहरी दोस्ती कि श्रीराम चाचा हमारे सगे से भी सगे चाचा हो गए थे। श्रीराम चाचा बताते हैं कि उन दिनों पिता के साथ एक महिला भी टेलीफोन आपरेटरी करती थी। पूरे दफ्तर में एक वही महिला कर्मचारी थी और पूरे दफ्तर की रौनक। क्या तो नाम था उसका... गाडगिल या क्या... विधवा थी और अपने पति की जगह पर नौकरी पर आई थी। शादी के कुछ ही बरस बाद वह विधवा हुई थी सो चेहरे पर यौवन की चमक और देह में लोच अभी बाकी थी। उन दिनों छोटे कस्बों की कम ही महिलाएँ थीं जो बाहर नौकरी आदि करती थीं। ऐसी महिलाओं को अक्सर 'इजी गोइंग' या बहुत चालू समझ लिया जाता था। और मिसेज गाडगिल तो उस पर विधवा भी थीं। कस्बों में अकेली, विधवा या परित्यक्ता स्त्रियों के लिए स्थितियां तो खैर आज भी बहुत नहीं बदली हैं लेकिन तब तो और भी संगीन थीं।

तो विधवा होने के कारण मिसेज गाडगिल भी तब सबके लिए हँसी-ठिठोली और दिल बहलाव की चीज थीं। अक्सर उनके बारे में फुसफुसाते सुरों में अश्लील और 'रसभरी' बातें होतीं। उनकी नित नवीन प्रेम-लीलाओं के सच्चे-झूठे किस्से शहर की हवाओं में तैरते। हालाँकि इन किस्सों का कोई भी ठोस प्रमाण किसी के पास नहीं था लेकिन जाने क्यों मान लिया गया था कि ये सब सच हैं। बल्कि माना तो यहाँ तक जाता था कि सच्चाई इन किस्सों से भी ज्यादा संगीन है।

आज मैं सोचता हूँ कि क्या इन किस्सों की कोई भनक मिसेज गाडगिल को नहीं रही होगी? न रही हो, ऐसा तो हो नहीं सकता, लेकिन वे कर भी क्या सकती थीं सिवाय चुपचाप जहर का घूँट पीने के। लेकिन हाँ, ये भी सच है कि वे अकेली थीं और अकेलापन उन्हें काटता था। ऐसे में एक सच्चे साथी की उन्हें सचमुच जरूरत थी जिसके साथ वे अपना सुख-दुख बाँट सकें। पिता के गावदीपन और मासूमियत में शायद उन्हें ऐसे ही किसी साथी का अक्स नजर आया हो।

मैं कल्पना कर सकता हूँ कि शायद ऐसी ही कुछ परिस्थितियाँ रही होंगी जब शुरुआती जान-पहचान और दुआ-सलाम के बाद पिता और मिसेज गाडगिल निकट आते गए होंगे। यहाँ तक कि वे दफ्तर में साथ लंच भी करने लगे थे। मिसेज गाडगिल अक्सर पिता की पसंद का भोजन खुद अपने घर से बनाकर लाने लगी थीं। जब भी मौका मिलता वे देर तक हँसते-बतियाते, गप्पें लगाते। कौन जाने कि तब मिसेज गाडगिल और पिता के बीच एक-दूसरे के लिए वही आदिम कोमल भाव जागा हो जो युगों से स्त्री-पुरुष के बीच जागता रहा है।

चाचा के बताए किस्से के अनुसार मिसेज गाडगिल की सोहबत में पिता का वह गावदीपन भी धीरे-धीरे जाता रहा था जो अब तक उनके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा था। अब पहनने-ओढ़ने के मामले में भी उनमें एक नफासत आ गई थी। लद्धड़पने को छोड़ अब वे एक सभ्य शहरी होने लगे थे।

लेकिन पानी अब सिर से ऊपर जा रहा था और दफ्तर में पिता और मिसेज गाडगिल को लेकर अनाप-शनाप चर्चाएँ शुरू हो गई थीं। श्रीराम चाचा चूँकि हमारे पारिवारिक सदस्य जैसे थे इसलिए इन चर्चाओं से उनके कान खड़े होना स्वाभाविक था। चाचा ने इस मसले पर पहले माँ से बात की। माँ को इन बातों की रत्ती भर भनक नहीं थी इसलिए पहले वे बहुत रोई-झींकीं। फिर श्रीराम चाचा से ही मदद की गुहार की। श्रीराम चाचा ने भी माँ को भरोसा दिलाया कि वे पिता को समझाएँगे। एक दिन मौका देखकर श्रीराम चाचा ने पिता से बात की और उन्हें समझाया कि मिसेज गाडगिल भली औरत नहीं है और आप बाल-बच्चेदार आदमी हैं। ऐसी औरतों से दूर ही रहना चाहिए। श्रीराम चाचा की इस बात पर पिता को पहले तो बहुत गुस्सा आया और उन्होंने चाचा को बहुत खरी-खोटी सुनाई। दरअसल, श्रीराम चाचा की बात से पिता का विश्वास कहीं भीतर बहुत दरक गया था और वे कई दिनों तक परेशान से रहे थे। फिर पता नहीं अपनी मूर्खता या मासूमियत में एक दिन मौका पाकर उन्होंने मिसेज गाडगिल से ही सीधे पूछ लिया कि क्या वे भली औरत नहीं हैं? पिता की बात सुनकर पहले तो मिसेज गाडगिल हक्की-बक्की रह गईं। फिर जब समझ में आया तो उनका चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया। उनकी हालत देखकर पिता फिर गड़बड़ा गए और बोले कि ऐसा मैं नहीं कहता, श्रीराम ने कहा है। अब सिर्फ कल्पना ही की जा सकती कि इसके बाद पिता और मिसेज गाडगिल में क्या बात हुई होगी। शायद पिता ने मिसेज गाडगिल को समझाने की कोशिश की हो, उनसे माफी माँगी हो और मिसेज गाडगिल ने उनकी कोई बात न सुनी हो। हाँ, इतना जरूर पता चलता है कि इस घटना के बाद कई दिनों तक मिसेज गाडगिल दफ्तर नहीं आईं और जब आईं तब भी उन्होंने किसी से कुछ खास बात नहीं की। फिर कुछ ही दिनों में उन्होंने उस कस्बे से अपना ट्रांसफर भी करवा लिया और इस तरह पिता के जीवन की एकमात्र प्रेम-कहानी का त्रासद अंत हो गया।

पता नहीं शुभ्रा दी के प्रेम-प्रसंग के बारे में जब पिता ने सुना तो उन्हें मिसेज गाडगिल याद आई थीं या नहीं। ऐसा कोई प्रमाण तो मिलता नहीं। हाँ, जो दृश्य बना था उससे सिर्फ इतना पता चलता है कि शुभ्रा दी के बारे में सुनकर पिता खामोश हो गए थे और फिर कई दिनों तक खामोश बने रहे। ये अलग बात है कि श्रीराम चाचा और माँ आज भी पिता और मिसेज गाडगिल के उस किस्से के जिक्र भर से खूब हँसते हैं और पिता खिसिया के रह जाते हैं। हमारे लिए भी यह खासा दिलचस्प और गुदगुदानेवाला प्रसंग रहा है। हालाँकि खुलकर हमने कभी इस पर बात नहीं की।

खैर... उस साल मैं दसवीं कक्षा में था, साइंस साइड से। क्लास के सारे लड़के-लड़कियाँ प्रेक्टिकल में नंबर बढ़वाने के लिए लगातार ट्यूशन ले रहे थे, लेकिन मैं ट्यूशन नहीं ले सकता था क्योंकि घर की हालत ऐसी नहीं थी। स्कूल की पढ़ाई तो माशाअल्ला थी ही। अक्सर हम स्कूल बंक करते और शहर के एकमात्र सिनेमा हॉल 'सिब्बल सिनेमा' में मॉर्निंग शो देखने निकल जाते। इस सिनेमा हॉल में मॉर्निंग शो में आमतौर पर दक्षिण भारत की सी-ग्रेड फिल्में ही चलाई जाती थीं जिसमें बीच-बीच में ब्लू फिल्मों के कुछ सीन डाल दिए जाते। इन फिल्मों का हम छात्रों में बड़ा क्रेज था। इन फिल्मों को हम सिर्फ उन्हीं कुछेक सीन्स की वजह से देखने जाते थे। हालाँकि कभी-कभार स्कूल के हेडमास्टर छात्रों को पकड़ने के लिए वहाँ छापा मारते। कई लड़के पकड़े जाते और उनकी जमकर धुनाई होती। इन फिल्मों के लिए पैसे हम अक्सर शहर के सबसे बड़े मंदिर 'पंच मंदिर' से चुराया करते थे जो वहाँ चढ़ावे में चढ़ाए जाते थे। इसी तरह साथ के कुछ लड़के 'महकती कलियाँ' या 'उभरती जवानी' टाइप किताबें भी स्कूल में लाते और इंटरवल में एकांत में उनका बाकायदा पाठ किया जाता। स्त्री देह से पहला परिचय हमारा इन्हीं सब चीजों से हुआ था। सिनेमा हॉल में मार्निंग शो देखते हुए एक बार मैं भी पकड़ा गया था। हेडमास्टर साहब ने जो धुनाई की सो तो की ही, शिकायत घर तक पहुँच गई और मेरी जमकर कुटम्मस हुई। हालाँकि इसके बावजूद इन फिल्मों के प्रति हमारा क्रेज कम नहीं हुआ और हम नियमित इनके दर्शक बने रहे।

इधर पिता के रौब-दाब और ईमानदारी में भी कोई कमी नहीं आई। पिता स्टाफ यूनियन में भी सक्रिय थे और उन्हें 'गरम नेता' की उपाधि प्राप्त थी। जब-न-तब उनका किसी-न-किसी अफसर से पंगा होता ही रहता। उन्हें वाहवाही मिलती और वे फूलकर कुप्पा हो जाते बिल्कुल शालिग्राम की तरह गोलमटोल। वाहवाही का नशा उन पर इस कदर तारी था कि उन्हें अपने घर-परिवार और बच्चों तक की परवाह नहीं थी।

इधर मैं भी कुसंगति में पड़ता जा रहा था। नतीजा, हाईस्कूल में मैं ग्रेस मार्क्स लेकर पास हुआ। पिता को अपनी मार्कशीट दिखाना नहीं चाहता था, लेकिन जाने कैसे उन्हें वह मिल गई। पिता उस दिन बहुत नाराज हुए और छड़ी-जूता जो मिला, उसी से मेरी जमकर ठुकाई की।

लेकिन पिता की इस तानाशाही ने मुझे और भी ढीठ बना दिया था। अब मैं अपने दोस्तों के साथ खुलेआम सिगरेट पीने लगा था और ज्यादा-से-ज्यादा घर से बाहर रहने लगा था। मेरी कोशिश रहती कि ज्यादा-से-ज्यादा पिता से दूर रहू्ँ, उनके सामने आने से बचूँ।

मुझे याद है कि वह पिता के रिटायरमेंट का दिन था जिस दिन मैंने पहली बार शराब पी थी। मैं गहरे अवसाद में था। हाईस्कूल में मेरे नंबर इतने कम थे कि इंटर साइंस साइड में एडमिशन संभव नहीं था जबकि मेरा सपना साइंस साइड में जाने का ही था। हाईस्कूल से ही मुझे मेढ़कों की चीरफाड़ और प्याज की परतों को सूक्ष्मदर्शी से देखने में मजा आने लगा था। लेकिन अब मेरा वह सपना पूरी तरह चकनाचूर हो चुका था और इसके लिए मैं पूरी तरह अपने पिता को ही दोषी पाता था। पिता को, उनकी ईमानदारी और स्पष्टवादिता को। पिता उस दिन मुझे खलनायक की तरह नजर आ रहे थे जिन्होंने अपनी वाहवाही के चक्कर में मेरा जीवन बर्बाद कर दिया था।

उस दिन पिता फूल-मालाओं से लदे-फँदे और दुनिया भर के उपहार लेकर घर आए थे। पिता उस दिन बहुत खुश थे। दरअसल, यह उनकी मुक्ति का दिन था। अगले दिन से उनकी दिनचर्या पूरी तरह बदल जानेवाली थी। पिता की चिंताओं में फिलहाल बेटी शुभ्रा की शादी और कहीं भी कैसे भी करके मेरी नौकरी का जुगाड़ था। अगले दिन से उन्हें इन्हीं दोनों मोर्चों पर जुट जाना था। अगले दिन से ही अब तक शालिग्राम की तरह रहे पिता के हाथ-पैर निकलने थे और माँ की कैंची जैसी जुबान को काबू में आना था।

ठीक और ठीक उसी दिन मैंने जीवन में पहली बार शराब पी थी। पिता फूल-मालाओं से लदे हुए घर आए थे। उनके एक हाथ में मिठाई का एक डिब्बा था और दूसरे हाथ में एक झोला था जिसमें दुनियाभर के वे उपहार थे जो उन्हें उनके सहकर्मियों ने उदारता और प्रेम से दिए थे। उन्होंने मिठाई का डिब्बा और झोला माँ को पकड़ाया और सबको मिठाई खिलाने को कहा। पिता के कड़क स्वभाव के हम आदी थे सो चुपचाप मिठाई खा ली। माँ से उन्होंने शाम को खास खाने का इंतजाम करने को कहा था जिसमें उनकी प्रिय मटर-पनीर की सब्जी भी थी। लेकिन जब से मुझे पता चला कि पिता आज रिटायर हो गए हैं, मैं गहरे अवसाद में आ गया था। दरअसल, पिता के रिटायरमेंट से मेरी रही-सही उम्मीद भी अब खत्म हो चुकी थी। मैं बड़ी देर तक अपने कमरे में बिस्तर पर अकेले लेटा रहा। फिर अचानक जाने मुझे क्या हुआ कि मैं उठा और पिता के कमरे में चला आया। पिता उस समय बाथरूम में नहाने गए हुए थे। हैंगर में उनके कपड़े टँगे थे। मैंने जीवन में पहली बार पिता की जेब से पैसे चुराए थे और चुपके से घर से बाहर आ गया था। इसी पैसे से मैंने शराब पी थी। हालाँकि जानता था कि पिता को शराब से क्या, शराब की गंध तक से नफरत थी। मुझे याद है कि एक बार पिता के परिचित एक बैंक मैनेजर का इंजीनियर लड़का रात को शराब पीकर हमारे घर आया था रात गुजारने। उसने अपने पिता का हवाला दिया और उनके हाथ की लिखी चिट्ठी भी दिखाई थी। लेकिन पिता ने उसे घर के दरवाजे से ही दफा कर दिया था और देर तक बड़बड़ाते रहे थे। उनका मानना था कि शराब से बड़ा ऐब दुनिया में कोई नहीं। शराब पीकर नाली में पड़े लोगों के दृश्य अक्सर वे हमारे सामने खींचा करते। जब कभी वे ऐसा करते हमें भी शराब से नफरत होने लगती।

पिता के जो-जो अफसर शराब पीते थे, पिता के लिए वे दुनिया के सबसे घृणित प्राणी थे। लेकिन मजबूरी थी कि उन्हें ऐसे अफसरों की निजी शराब पार्टियों में कभी-कभार जाना ही पड़ता। ऐसे मौकों पर अक्सर उनके लिए फलों का जूस या टमाटर का सूप आता। पीकर बहकनेवाले अफसरों से उन्हें सख्त नफरत थी। 'अंडा-मांस-शराब' जैसे कुफ्र थे उनके लिए जिसका उन्होंने ताउम्र पालन किया।

बहरहाल, शराब लेने के लिए मुझसे बड़ी उम्र का एक लड़का गया था और हमने गोलचक्करवाले पार्क में छककर शराब पी थी। इतनी कि अब हमसे चला नहीं जा रहा था। बड़ी मुश्किल से लड़खड़ाते कदमों से रात ग्यारह बजे मैं घर पहुँचा था। सामने पिता थे। आज उनकी आँखों में क्रोध नहीं था, बल्कि एक अजीब दयनीय-सा आत्मग्लानि का भाव था। उनकी आँखों में शायद आँसू भी थे। वे मुझे अपने हाथों से पकड़कर बिस्तर तक ले गए। उधर माँ की जुबान कैंची की तरह चल रही थी और वे लगातार मेरी लानत-मलामत कर रही थीं। पिता ने मेरे लिए खुद अपने हाथ से खाना निकाला और अपने ही हाथों में मुझे जबरन खिलाया। इस सब चक्कर में उनके कपड़े भी गंदे हो चुके थे। खाना खिला चुकने के बाद उन्होंने एक गहरी, लंबी साँस ली और मुझे लिटाकर मेरे शरीर को कंबल से ओढ़ा दिया। मैं अर्द्धनिद्रा में था पर बगल के कमरे से आ रही धीमी-धीमी सिसकियों की आवाज सुन सकता था, लेकिन कुछ कर नहीं सकता था। हाँ, उधर शालिग्राम के अब हाथ-पाँव निकल आए थे।


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