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उपन्यास

लफ़्टंट पिगसन की डायरी
बेढब बनारसी


सात - आठ दिन हुए, गुदड़ी बाजार की ओर चला गया था। वहाँ एक मोटी, जिल्द बँधी कॉपी एक दुकान पर मिली। दीमकों ने उसका जलपान भी किया था। देखने पर एक डायरी निकली। लेफ्टिनेंट पिगसन सन् 1921 में भारत आये थे। यह डायरी दो साल की है। अन्त के कुछ पृष्ठ नहीं हैं। डायरी कितनी मनोरंजक है, पढ़ने से पता चलेगा।

 

बम्बई का होटल

परसों तीन बजे मेरा जहाज बम्बई पहुँचा। जहाज से उतरकर एक टैक्सी पर मैं होटल पहुँचा। मेरे एक मित्र ने यहीं एक कमरा ठीक कर दिया था। कानपुर जाने के पहले मैंने बम्बई देख लेना उचित समझा। जिस होटल में ठहरा हूँ उसके जितने ब्वॉय हैं, सब बड़े लम्बे-लम्बे कोट पहने हैं। जान पड़ता है यहाँ कपड़ा बहुत सस्ता है और उनका पतलून पाँव से चिपका हुआ रहता है, शायद इसलिये कि छिपकली या चूहे भीतर घुस न जायें क्योंकि जिस कमरे में मैं सोता हूँ उसकी छत पर छिपकलियाँ कुश्ती लड़ा करती हैं। जिस दिन यहाँ आया उसके दूसरे दिन सवेरे चाय पी रहा था। दो छिपकलियाँ नेपोलियन और वेलिंगटन की भाँति लड़ने लगीं; और एक पट् से मेरी मेज पर गिरी। मैंने मैनेजर को उसी दम बुलाया और शिकायत की। उसने कुछ कहने के पहले मुझे बधाई दी कि चाय में नहीं गिरी और ठीक भी है। यदि वह चाय में गिरती तो उसे कौन रोक सकता था? इतना मैं कह सकता हूँ - छिपकली में समझ थी। गिरने के बाद उसने मेरी ओर देखा। अंग्रेजों का भय भारतवर्ष के मनुष्यों में ही नहीं, भारत की छिपकली भी अंग्रेजों से डरती है। मुझे देखते ही भागी। मक्खन और टोस्ट रखा था। उस ओर देखने का भी साहस नहीं हुआ। अब मुझे मालूम हुआ कि अंग्रेज लोग भारत पर कैसे शासन कर पाते हैं।

मैंने मैनेजर से कहा कि मुझे दूसरा कमरा दीजिये। मैनेजर ने कहा कि बदल देने में कोई हरज नहीं, परन्तु लोग क्या कहेंगे कि एक सैनिक अफसर छिपकली के भय से कमरा छोड़कर भाग रहा है। यह भारतवर्ष है। यहाँ तो आपको अजगर, कोबरा, गेहुँअन और करइत पग-पग पर मिलेंगे। प्रसन्नता की बात है कि आपका जीवन छिपकली के संग्राम से आरम्भ हुआ।

मैनेजर सेना से अवकाश प्राप्त कर चुका था। वह कई बड़ी लड़ाइयाँ लड़ चुका था। उसका भारतवर्ष में बड़ा अनुभव था, इसलिये मुझे चुप रह जाना पड़ा। मैं चाय पीकर बम्बई घूमने निकला। मेरे साथ एक गाइड था। उसकी अंग्रेजी शेक्सपियर से भी अच्छी थी। मैंने लड़कपन में स्कूल में शेक्सपियर का एक नाटक पढ़ा था। उससे भी सुन्दर अंग्रेजी मेरे गाइड की थी। बिना क्रिया के वाक्य बोलता था, जो बहुत सुन्दर लगते थे। उसने अंग्रेजों की बड़ी तारीफ की। अंग्रेजों से भारतवासी बहुत प्रसन्न हैं।

बम्बई नगर में कोई विशेष बात मैंने नहीं देखी। हाँ, यहाँ स्त्रियों को सड़क पर आते-जाते देखा। लन्दन में मेरे एक मित्र ने, जो भारत से लौटा था, कहा कि भारत में स्त्रियाँ कमरों में बन्द रहती हैं और त्योहारों के दिन कमरे से बाहर निकलती हैं। परन्तु यहाँ मैंने दूसरी ही बात देखी। स्त्रियाँ उसी प्रकार दुकानों पर सौदा खरीदती हैं जैसे लन्दन में। हाँ, एक नई बात यहाँ की स्त्रियों में मैंने देखी। यहाँ स्त्रियाँ स्कर्ट और जैकेट नहीं पहनतीं। रंग-बिरंगे बिना सिले कपड़ों को अपने शरीर पर लपेटे रहती हैं। वह किस प्रकार यह कपड़ा लपेटती हैं, मैं कह नहीं सकता, परन्तु देखने में बहुत आकर्षक जान पड़ता है। स्कर्ट इन कपड़ों के भीतर होता है।

मैं कार से उतरकर मैरीन ड्राइव पर टहल रहा था। चार स्त्रियाँ एक साथ जा रही थीं। चारों के कपड़े चार रंग के थे। मुझे उनका पहनावा बहुत भला लगा। मैंने गाइड से पूछा - 'इस कपड़े को क्या कहते हैं?' उसने कहा - 'सारी'।

मुझे दुःख हुआ। मैंने कहा - 'मैं यहाँ की रीति नहीं जानता, इसलिये यदि शिष्टता के विपरीत कोई बात हो तो क्षमा कीजियेगा।' उसने कहा - 'ऐसी तो कोई बात नहीं है।' मैंने कहा कि आपने तब खेद क्यों प्रकट किया। गाइड ने कहा - 'मैंने दुःख नहीं प्रकट किया। इस पहरावे का नाम सारी (साड़ी) है।'

मैंने गाइड से एक सारी खरीदने की इच्छा प्रकट की। बात यह थी कि मैं एक फोटो ऐसी लेना चाहता था जिसमें एक स्त्री सारी पहने हो। ऐसी स्त्री की फोटो मैं कैसे लेता; इसलिये मैंने सोचा कि एक खरीदकर किसी को पहनाकर उसकी फोटो ले लूँगा। गाइड मुझे एक कपड़े की दुकान पर ले गया। लन्दन की दुकान से किसी भी अवस्था में वह दुकान कम नहीं थी।

एक सारी आठ रुपये में मुझे मिली। कभी-कभी इंग्लैंड में मैं सुना करता था कि हिन्दुस्तान के लोग गरीब हैं। यद्यपि अधिकांश लोग यही कहते  थे कि यह गप है। हिन्दुस्तान के लोग बहुत धनी हैं और यहाँ के धन का इसलिये पता नहीं लगता क्योंकि यह अपना बैंक धरती के नीचे बनाते हैं। जहाँ स्त्रियाँ इतने महँगे कपड़े पहनती हैं वह देश कैसे गरीब हो सकता है?

दुकान पर एक और बात हुई। मेरे जाते ही सब लोगों ने और ग्राहकों को छोड़ दिया और मेरी ही ओर आकर्षित हुए। सम्भवतः मेरा रंग इसके लिये जिम्मेदार था। उस समय ऐसा जान पड़ा कि अकेला मैं ही एक ग्राहक हूँ। जो ग्राहक और थे, वह भी मेरी ओर देखते थे। मैं अपने को बहुत भाग्यशाली समझता हूँ कि इस देश में मेरा इतना आदर हो रहा है। लन्दन की सड़कों पर मैं प्रति दिन घंटों घूमता था, पर मेरी ओर किसी ने ताका भी नहीं और यहाँ लखपति दुकानदार मेरे लिये खड़े हो गये। मैंने तो समझा कि मेरा इतना आदर हो रहा है कि शायद मुझे एक सारी मुफ्त में मिल जाये। परन्तु ऐसा तो नहीं हुआ।

सारी लेकर जब मैं होटल में लौटा तब गाइड से मैंने कहा कि सारी आप पहन लीजिये। मैं एक चित्र खींचना चाहता हूँ। परन्तु उसने कहा कि मैं ऐसे तस्वीर नहीं खिंचवा सकता। तब मैंने कैमरा ठीक करके कहा कि अच्छा, मैं सारी पहनता हूँ और आप तस्वीर खींच लीजिये। फोटो बहुत आवश्यक थी, क्योंकि सारी मुझे बहुत पसन्द आयी और सारी पहने हुए महिला का चित्र मैं मिस स्पैरो को भेजना चाहता था। मैं उससे प्रेम करता हूँ।

मैं तो सारी पहनना जानता नहीं था। गाइड ने मुझे सारी पहनायी और मेरा चित्र लिया गया। मगर फोटो खराब हो गया क्योंकि सारी कुछ ऊपर उठ गयी और दोनों पाँवों का पतलून दिखायी देने लगा।

रेलगाड़ी में

तीन दिनों तक बम्बई रहने के बाद मैं कानपुर के लिये रवाना हुआ। बम्बई में कोई विशेष बात नहीं हुई। मैं जिस गाड़ी से चला उसका नाम बम्बई मेल है। काफी तेज है। रात का तो मुझे पता नहीं, परन्तु दिन में इतनी धूल गाड़ी में आती है कि शायद स्त्रियों को पाउडर लगाने की आवश्यकता न पड़े।

मुझे हल्की-हल्की नींद आ रही थी कि गाड़ी एकाएक खड़ी हो गयी और जोरों का शोर हुआ। जान पड़ा कि कहीं लड़ाई हो गयी है। यद्यपि गोली या तोप की गड़गड़ाहट नहीं सुनायी पड़ी, परन्तु कोलाहल ऐसा ही था। मैं अपने डब्बे के फाटक पर आ गया। देखा कि मुसाफिर लोग इस जोर से डब्बे की ओर चले जैसे क्षय के कीटाणु कमजोर फेफड़ों पर आक्रमण करते हैं।

ऐसे समय मुझे एक बात देखने में आयी जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। मैंने कभी भूत पर विश्वास नहीं किया। अनेक कहानियाँ भूतों की पढ़ी हैं, परन्तु उन्हें कभी मैंने सच नहीं समझा।

सवेरे का समय, कोई आठ बज रहे होंगे। दिन काफी चढ़ चुका था। भीड़ भी स्टेशन पर बहुत थी। मैं क्या देखता हूँ कि उसी भीड़ में से एक आदमी के बराबर कपड़े की मूर्ति प्लेटफार्म पर चल रही है। न हाथ है न पाँव। भारत के सम्बन्ध में अनेक कहानियाँ सुन रखी थीं। लन्दन की सड़क पर यदि ऐसी घटना हो तो तहलका मच जाये। परन्तु यहाँ तो किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। सम्भव है कि यह भूत मुझे ही दिखायी पड़ा हो और लोग उसे न देख रहे हों।

परन्तु उस समय की मेरी घबराहट का कोई अनुमान नहीं कर सकता जब मैंने देखा कि भूत मेरी ही ओर आ रहा है। फिर देखता हूँ कि एक आदमी भी उसके साथ आगे-आगे है। उस आदमी की बहुत लम्बी दाढ़ी थी। अवश्य ही वह जादूगर था और भूत को लिये टहल रहा था। परन्तु उसका साहस तो देखिये कि इतनी भीड़ में दिन-दहाड़े भूत को लिये घूम रहा है!

देखते-देखते वह जादूगर आगे-आगे, और भूत पीछे-पीछे मेरे डब्बे के दरवाजे के आगे पहुँच गये। मेरे रोंगटे खड़े हो गये। पसीने से कमीज भीग गयी, पाँव के दोनों घुटने आपस में टकराने लगे। मैंने आँखें मूँद लीं, मुँह गाड़ी में भीतर की ओर कर लिया और अन्दर से हैंडिल जोर से पकड़कर दरवाजे से सटकर खड़ा हो गया। एक मिनट भी न बीता होगा कि बाहर से किसी ने दरवाजे पर धक्का दिया। मेरे हृदय की गति रुकने लगी। आँख खोलने का साहस न हुआ। किसी दैवी शक्ति की प्रेरणा से हैंडिल को अधिक जोरों से पकड़ लिया।

दरवाजे पर फिर एक धक्का हुआ और इस बार अंग्रेजी में किसी ने कहा - 'कृपा कर हट जाइये और दरवाजा खोलिये।' पता नहीं अंग्रेजी में जादूगर ने कहा कि भूत ने। जान पड़ता है कि भारत में अंग्रेजी खूब प्रचलित है। जादूगर यदि बोला था तो उसकी भाषा बहुत शुद्ध थी। जादूगर ही था। उसे क्या! कोई भी भाषा बोल सकता था। परन्तु मैं दरवाजा खोलकर अपनी जान क्यों आफत में डालता?

इतने में गाड़ी ने सीटी दी। मैंने सोचा, जान बची। परन्तु भूत और उसके साथ जादूगर! जो न कर डाले।

फिर आवाज आयी - 'प्लीज' और जोर से दरवाजे पर उसने धक्का दिया और उसने कुछ कहा, पता नहीं कोई मन्त्र पढ़ा अथवा भूत से कुछ बात की। उस भूत ने पटरी पर पाँव रखा। मैं चिल्लाकर अपनी सीट पर गिर गया।

मैं कितनी देर बेहोश रहा, कह नहीं सकता। सम्भवतः बीस मिनट तक रहा हूँगा। गाड़ी सर्राटे के साथ चली जा रही थी। मुझे होश आ गया परन्तु आँखें खोलने का साहस नहीं होता था। पर बरबस आँख खुल गयी। उस समय उस जादूगर की करामात देखकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उस भूत को उसने स्त्री बना दिया। कपड़ा तो चारों ओर वैसा ही था। केवल चेहरा मुझे दिखायी दिया। परन्तु ज्यों ही मेरी और उसकी आँखें चार हुई; उसने तुरन्त अपना मुँह ढक लिया। केवल दो मिनट मैंने उसका चेहरा देखा। सचमुच वह चुड़ैल थी, जिसे जान पड़ता है इस जादूगर ने बाँध रखा था।

मैं सोचने लगा कि यह कैसा जादूगर है? इसे क्यों लिये जा रहा है? इसने यदि इसे बनाया है तो कपड़े से ढकने की क्या आवश्यकता थी? मैं अपनी सीट पर बैठ गया। इधर-उधर देखकर एक उपन्यास निकाला, पर पढ़ने में जी नहीं लगा।

थोड़ी देर बाद उसी ने मुझसे पूछा - 'आप कहाँ जायेंगे?' मैंने कहा - 'मैं कानपुर जाऊँगा।' मैं चुप रहा। मुझे पूछते भय लगता था। कहीं मुझे कुछ बना दे! सोचते-सोचते मुझमें कुछ साहस आया। मेरा पिस्तौल मेरे बक्स में था। वह गार्ड के डिब्बे में था। नहीं तो कोई कठिनाई न होती। फिर भी मैंने पूछने की हिम्मत की। पूछा - 'आप कहाँ जायेंगे?'

'लखनऊ।'

'यह आपके साथ क्या है?'

'क्या मतलब आपका?'

मैं कुछ घबरा-सा गया। बोला - 'क्षमा कीजियेगा। मेरा मतलब है, वह आपके साथ कौन है?'

मेरा प्रश्न सुनकर जान पड़ता था वह कुछ नाराज-सा हुआ। परन्तु वह बिगड़ा नहीं। गम्भीर मुद्रा में उसने उत्तर दिया - 'यह मेरी स्त्री है।'

मुझे सुनकर विश्वास नहीं हुआ। स्त्री है तो इस भाँति चोगे में लपेटने की क्या आवश्यकता थी? मुझे जानने की बड़ी उत्सुकता हुई। मैं अधिक जानना चाहता था। मैंने उसके बारे में पूछा तो पता चला कि वह लखनऊ में सरकारी नौकर - डिप्टी कलक्टर है। मेरी बार-बार इच्छा होती थी कि पूछूँ - आपने अपनी स्त्री को इस प्रकार क्यों रखा? एक कारण यह हो सकता था कि उसका चेहरा सुन्दर और अच्छा नहीं था और यह सरकारी नौकर अच्छे पद पर थे। लोग इनकी स्त्री को इस प्रकार देखेंगे तो इन्हें लज्जित होना पड़ेगा।

 

 

नशे की झोंक

गाड़ी अपनी गति से चली जा रही थी। डिप्टी से धीरे-धीरे बात भी आरम्भ हो गयी और उसी बात में पता चला कि उसके धर्म में लिखा है कि स्त्रियाँ इसी प्रकार कपड़ों से अपना शरीर ढककर बाहर निकला करें। ऐसे धर्म के सम्बन्ध में मुझे और जानकारी प्राप्त करने की आकांक्षा हुई और उनसे और भी बातें हुईं। धीरे-धीरे उनसे एक प्रकार की मित्रता भी हो गयी।

थोड़ी देर बाद एक स्टेशन आया और उन्हें प्यास लगी। उन्होंने किसी को पुकारा और स्वयं एक पुरानी केटली लेकर पानी के लिये दरवाजे पर खड़े हो गये। एक सरकारी नौकर वेतन तो काफी पाता ही होगा, फिर भी गिलास न लेकर केटली में पानी लेना मेरी समझ में नहीं आया। सम्भव है यह भी उनका धर्म हो। क्योंकि मैंने सुना है हिन्दुस्तान में धर्म ने विचित्र-विचित्र आज्ञायें दे रखी हैं। परन्तु इससे भी आश्चर्य की बात यह जान पड़ी कि इस देश में पानी दो प्रकार का होता है। कोई ऐसा देश नहीं जहाँ पानी दो तरह का हो। मैंने अभी दोनों को देखा नहीं था। मुझे ऐसा पता चला कि गाड़ी छूट चली, परन्तु वह खाली केटली लिये लौटे। मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि वह हिन्दू का पानी था। मैं मुसलमानी पानी पीता हूँ। जान पड़ा कि खाना भी ऐसा ही होता है।

तीन बजे मेरे जलपान का समय हो गया। स्टेशन आते ही मैंने जलपान के लिये होटलवाले को आज्ञा दी। उनके लिये मैंने जलपान मँगाया। उनकी श्रीमतीजी ने दूसरी ओर मुँह करके चाय पी, इस प्रकार जिससे मैं न देख पाऊँ। जलपान के बाद मैंने दो बोतल व्हिस्की लाने को कहा और दो गिलास।

जब मैंने उन्हें दिया तब उन्होंने जोरों से इन्कार कर दिया। बोले - 'मेरे तो धर्म में इसको देखना पाप है। आप भले आदमी हैं, इसलिये आपको अपने सामने पीने दिया, नहीं तो भला सामने कोई पी तो ले।' मैं पी रहा था। गाड़ी चली जा रही थी। उनकी स्त्री शौचालय में गयीं। ज्यों ही वह भीतर चली गयीं, डिप्टी साहब मुँह बनाकर बोले - 'क्षमा कीजिये। मैं उनके सामने नहीं पीता। अब पी सकता हूँ।' मैंने पूछा - 'अभी तो आप कह रहे थे कि धर्म के विरुद्ध है।' उन्होंने कहा - 'बात यह है कि अरब में तो जुरूर मना है और धर्म के विरुद्ध भी है। स्त्रियों के सामने पीना जरा ठीक नहीं। स्त्रियाँ डर जाती हैं। बात यह है कि हमारे यहाँ कहा गया है कि शराब में शैतान रहता है। इसलिये स्त्रियाँ यदि पियें या देख लें तो उनके ऊपर बुरा असर पड़ता है। हम लोग स्वतन्त्र आदमी हैं। इसलिये शैतान का कोई प्रभाव हमारे ऊपर पड़ नहीं सकता।'

मैंने दूसरे गिलास में उँड़ेलकर उन्हें दिया। उन्होंने जैसे ही मुँह लगाया, शौचालय के खुलने की आवाज आयी। झट से सारा गिलास मुँह के भीतर उँड़ेल लिया और हाथ में गिलास लेकर कहने लगे - 'देखिये विलायत में कैसे सुन्दर गिलास बनते हैं। यहाँ दो-एक स्थान पर बनते भी हैं पर उनमें सफाई नहीं। ऐसे गिलास में पानी पीने का मन करता है। कितना सुडौल, कितना साफ और बनावट देखिये। बिल्कुल ढोल के समान।'

एक घूँट में आधा गिलास व्हिस्की पीने का प्रभाव दस ही मिनट में उनके ऊपर आ गया। वह लगे गाने। क्या गा रहे थे, यह तो मैं नहीं समझ सका, परन्तु वह जोर-जोर से गाने और झूमने लगे। मेरा भी पाँव ताल देने लगा।

अब तो दूसरी बोतल भी खुली और मैंने एक गिलास में भरकर पीना आरम्भ किया। इस बार दूसरे गिलास में भरकर वह स्वयं पी गये। अबकी बार उन्होंने अपनी श्रीमती के कारण संकोच नहीं किया।

डिप्टी साहब गाना ठीक गा रहे थे या केवल चिल्ला रहे थे, कौन जाने! परन्तु मुझे पाँव चलाते-चलाते नाचने की धुन सवार हो गयी। मैं खड़ा हो गया और नाचने लगा। डिप्टी साहब हाथ से ताली बजाने लगे और जोर से गाने लगे।

मैं नाचने लगा। मगर अकेले नाचना ऐसा ही मालूम होता था जैसे मक्खन के बिना रोटी खाना। मैंने डिप्टी साहब को दोनों हाथों से पकड़ लिया। वह तो घबरा उठे और चिल्ला पड़े - 'खून! खून!!' - और अपनी स्त्री का चोगा पकड़ने के लिये उन्होंने हाथ बढ़ाया। डिप्टी साहब कमजोर थे। मैंने उन्हें सीने से चिपका लिया और लगा घूम-घूमकर वाल्ज (एक प्रकार का नाच) नाचने। पहले तो डिप्टी साहब घबराये, परन्तु मैंने उन्हें नहीं छोड़ा और आध घंटे तक हम लोग नाचते रहे। मुझे तो बड़ा आनन्द आया। केवल डिप्टी साहब की दाढ़ी साही के काँटे की भाँति मेरे मुख को रह-रहकर छेदती थी। जब मुझे विशेष कष्ट होने लगा तब बायें हाथ से मैंने उनकी दाढ़ी पकड़ ली और दाहिने हाथ से उनको हृदय से लगा घूमता था।

सैकड़ों बार जीवन में मैंने नाचा था। परन्तु पुरुष के साथ नाचने का जीवन में पहला अवसर था। वह आनन्द तो नहीं आया, परन्तु थोड़ा आनन्द तो जुरूर आया ही। यह नाच और भी चलता, परन्तु नाचते-नाचते पता नहीं किस वस्तु में उनका लम्बा कोट फँस गया और झटका लगा। जिस झटके के तीन परिणाम हुए। उनके लंबे कोट का आधा भाग सारे कोट से अलग हो गया जैसे अमरीका इंग्लैंड अलग हो गये थे। उनकी दाढ़ी के चौथाई बाल मेरे हाथ में आ गये और वह बर्थ पर गिरे और उन्हीं के पेट पर मैं भी। यह घटना देखकर कपड़े के अन्दर से उनकी स्त्री ऐसे चिल्लायी जैसे किसी कुतिया का किसी ने कान पकड़कर खींच लिया हो।

परन्तु हम दोनों तो उठ खड़े हो गये और हँसने लगे। डिप्टी साहब के कोट का - जिसका नाम उन्होंने 'शेरवानी' बताया - पीछे का चौथाई भाग फर्श से लिपटा हुआ था। उसकी उन्हें चिन्ता न थी। नौकर सामान लिये किसी दूसरे डब्बे में बैठा था। आगे बदल लेंगे। उन्हें चिन्ता अपनी एक चौथाई दाढ़ी की थी।

यह इत्तफाक था कि झटका कुछ इस प्रकार लगा कि बीच के एक चौथाई बाल टूट पड़े। उन्होंने कहा कि इस बीच के बाल के लिये क्या किया जाये। बाल अभी तक मेरे हाथ में ही थे। मैंने उन्हें देकर कहा - 'इससे काम चल सके तो लीजिये। इसीलिये मैंने इसे नहीं फेंका। ऐसे बहुत-से प्लास्टर हैं जिनसे यह फिर जमाये जा सकते हैं और कुछ तो काम दे ही सकते हैं। यदि कुल मुंडा देने में आपको आपत्ति है तो किसी प्रकार इसको वहीं चिपका लीजिये।'

जहाँ से बाल उखड़ गये थे वहाँ उन्हें पीड़ा होने लगी। इधर अब उनका ध्यान गया। यहाँ दवा क्या मिलती। एक बार मुझे घुटने में चोट लगी थी तब मैंने व्हिस्की मल दी थी। वह मेरे मित्र हो गये थे और मेरे साथ नाच में उन्हें यह कष्ट हुआ था इसलिये उनकी सहायता करना मेरे लिये आवश्यक था।

दोनों बोतलों में जो थोड़ी व्हिस्की रह गयी थी, हथेली पर उँड़ेलकर मैंने उनकी दाढ़ी में, जहाँ से बाल उखड़ गये थे, मल दी। मलते ही वह उछलकर लगे नाचने। परन्तु इस बार वह अकेले। तब तक कानपुर स्टेशन आ गया।

 

मौलवी साहब

कानपुर में मुझे एक बँगले में रहने के लिये स्थान मिला। उस बँगले के आधे भाग में दूसरा अफसर रहता था। चौबीस अफसर अंग्रेज थे और अट्ठाइस हिन्दुस्तानी। उन लोगों के लिये अलग बँगले बने थे। अंग्रेजी सिपाही यहाँ कम थे; केवल तीन सौ के लगभग और अट्ठाइस सौ हिन्दुस्तानी सिपाही थे।

यहाँ आने पर मुझे कई पुस्तकें पढ़ने को मिलीं जिनमें क्लाइव की जीवनी थी, सेना के नियम के सम्बन्ध में एक पुस्तक थी, भारत का इतिहास था। मेरे अफसर थे उस समय कर्नल शूमेकर। उन्होंने मुझसे थोड़ी-सी यहाँ की भाषा सीखने के लिये कहा।

उन्होंने कहा - 'यद्यपि यह आवश्यक नहीं है, लेकिन तुम नये आदमी हो। यहाँ बहुत दिनों तक रहना होगा। सीख लोगे तो बहुत से कामों में आसानी होगी।' वह तीस साल तक भारत के अनेक भागों में रह चुके थे और बहुत अनुभवी थे। उन्होंने कहा - 'यहाँ कई भाषायें बोली जाती हैं, सब तो तुम सीख नहीं सकते। दो मुख्य भाषायें हैं जो इस प्रान्त में बोली जाती हैं - एक को कहते हैं हिन्दी, दूसरी को कहते हैं उर्दू; और एक इन दोनों के बीच की भाषा है हिन्दुस्तानी।'

मैंने कहा - 'मैं तो जानता नहीं। जो आप कहें, मैं सीख लूँ। मैं जब से इस देश में आया हूँ, यह मुझे बहुत मनोरंजक स्थान लग रहा है। इसलिये यहाँ की भाषा अवश्य सीखूँगा और जो तीन भाषायें आपने बतायी हैं, उनका अन्तर भी बता दें, तो मैं भी कुछ राय दे सकूँ।

कर्नल साहब थोड़ी देर तक आँख मूँदकर कुछ सोचते रहे, फिर बोले - 'मैं तुम्हें समझा दूँ - उर्दू भाषा महिलाओं की अलकें हैं। जैसे यह बड़े नाज से पाली जाती हैं। बढ़िया-बढ़िया तेल और सेण्ट लगते हैं, कपोलों पर झूलती है और आगे नहीं पीछे की ओर इन्हें खींचते हैं, वैसी ही उर्दू भाषा है। टेढ़ी-मेढ़ी लिखी जाती है, बड़े नाज से दरबारों में इसकी कदर होती है, श्रृंगार से इसका साहित्य ओतप्रोत है।

'और हिन्दी पुरुषों की दाढ़ी है। सीधे उगती है, मूँड़ते चलिये परन्तु बढ़ती जायेगी।'

मैंने पूछा - 'मेरी समझ में कुछ ठीक तो नहीं आया। यह हिन्दुस्तानी क्या है?' उन्होंने कहा - 'यह हिन्दी पर उर्दू की कलम लगायी गयी है जो अभी उगी नहीं है, अंकुरित हुई है।'

मैंने पूछा - 'तो आपकी क्या राय है? मैं कौन-सी भाषा आरम्भ करूँ और कौन पढ़ायेगा?'

कर्नल साहब ने कहा - 'तुम उर्दू सीखो। यहाँ जो और अफसरों को पढ़ाता है, वही तुम्हें भी पढ़ा देगा।'

सप्ताह में तीन दिन के लिये पच्चीस रुपये मासिक पर पढ़ाने के लिये कर्नल साहब ने अध्यापक ठीक कर दिया। कर्नल साहब ने मुझे यह भी बता दिया कि यहाँ पर अध्यापकों को किस भाँति सलाम किया जाता है। कैसे उनका आदर किया जाता है। उन्होंने कहा कि उन्हें 'मौलवी साहब' कहा जाता है।

मैं कानपुर के सम्बन्ध में कुछ लिखना चाहता था, किन्तु पहले दिन जो मौलवी साहब से बातचीत हुई वह मनोरंजक है। इसलिये उसे पहले लिख डालता हूँ।

सोमवार का दिन था। सन्ध्या समय मौलवी साहब आये। मैं हॉकी मैच खेलकर लौटा था और सोडा-बर्फ पी रहा था। मौलवी साहब बहुत लम्बा कोट, वही रेल के डिप्टी साहब की भाँति पहने हुए थे। दाढ़ी भी वैसी ही थी। जान पड़ता है कि कोट जितना लम्बा होता है, उसी के अनुपात में दाढ़ी भी लम्बी रखनी पड़ती है। दाढ़ी का रंग लाल था जैसे कनस्तर पर लगा हुआ मोरचा। वह जब आये तब मुँह में कुछ चबा रहे थे, जिससे उनके दाँत, जीभ और होंठ लाल हो रहे थे। उनका पतलून विचित्र ढंग का था जो उनके पतले पाँव के बाहर झूल रहा था। पाँव में मोजे नहीं थे और जूता न पंप था, न ऑक्सफोर्ड? विचित्र ढंग का था। टोपी लम्बी और लाल थी और टोपी के ऊपर एक काली पूँछ भी थी।

उन्हें देखते ही मैं खड़ा हो गया और कर्नल साहब की बात भूल गया और कह बैठा - 'मौलवी साहब, गुड ईवनिंग' पर उन्होंने बुरा नहीं माना। मुस्कराते हुए बैठ गये और जेब से एक पुलिन्दा निकाला। मौलवी साहब अंग्रेजी जानते थे। उन्होंने उस पुलिन्दे में से सर्टिफिकेट दिखाना आरम्भ किया। फिर लगे अपनी आत्मकथा कहने।

उन्होंने कहा - 'मैं खास शाहजहाँ के घराने का हूँ। यदि थोड़ा झगड़ा न होता तो शाह आलम के स्थान पर मेरे नाना के ससुर के साढ़ू के दादा ही भारत के सम्राट होते और आज मैं इस देश का शासक होता। मैंने सैकड़ों कमांडर-इन-चीफों को पढ़ाया, जनरलों और कप्तानों की तो गिनती नहीं। जो और मौलवी साल-भर में पढ़ाते हैं, मैं एक सप्ताह में पढ़ा देता हूँ। बड़े लाट यदि मेरे सब सर्टिफिकेट देख लें तो फिर छोड़ें नहीं। इसी डर से मैंने उन्हें दिखाया नहीं; उनसे मिलता भी नहीं।

'पहासू के नवाब मुझे देखते हैं तो घंटों खड़े रहते हैं। मैंने कई बार कहा कि आप ऐसा न करें, पाँव दुखने लगेंगे, किन्तु उन्होंने नहीं माना।'

मैंने पूछा - 'आप पढ़ाई कब से आरम्भ करेंगे? आप ऐसे योग्य अध्यापक से तो मैं बहुत उर्दू सीख लूँगा।'

मौलवी साहब ने कहा - 'पढ़ाने की बात क्या है, लोग पढ़ते नहीं। तीन-चार महीने पढ़कर छोड़ देते हैं। आप एक साल पढ़ लें। फिर देखें। लोग समझ नहीं सकेंगे कि आप विलायत के रहनेवाले हैं; यही समझेंगे कि आप ईरान से आये हैं।'

मैंने कहा - 'कोई किताब?'

मौलवी साहब बोले - 'किताब की कोई जुरूरत नहीं है मगर रख लें तो अच्छा ही है। यों न भी रखें तो कोई बात नहीं है। मैं काफी हूँ। मगर किताब रहेगी तो बेहतर होगा। किताब बिना काम चल सकता है - मगर आप ले ही लें तो ठीक होगा।'

मैंने कहा - 'आप एक बात ठीक बताइये।'

वह बोले - 'ठीक! तो क्या कीजियेगा लेकर। अच्छा ले ही लीजिये। दो रुपये दे दीजिये, मैं कल लेता आऊँगा।' मैंने उन्हें दो रुपये किताब के लिये दिये। उस दिन मौलवी साहब ने अपना आत्मचरित ही सुनाया; जिससे पता चला कि वह शाही वंश के हैं। अब यों ही पढ़ाकर पेट पालते हैं। चलते समय मेरी मेज पर से सिगरेट की डिबिया उठाते हुए बोले - 'मैं एक इसमें से ले लूँ?'

मैंने कहा - 'आप सब ले जाइये।' इस पर वह बहुत प्रसन्न हुए और मेरी बड़ी प्रशंसा की।

 

बाजार की सैर

मौलवी साहब मुझे पढ़ाने आने लगे। उन्होंने कैसे-कैसे पढ़ाया, मैं आगे लिखूँगा। आज जो विशेष बात हुई उसके सम्बन्ध में लिख देना आवश्यक समझता हूँ। सवेरे परेड के पश्चात् मैंने कर्नल साहब से कहा कि मैं नगर देखना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि सेना के लोगों को यों नगर में जाने की आज्ञा नहीं है। मैंने पूछा - 'इसका कोई कारण है?' कर्नल साहब ने कहा - 'यहाँ नगरों में देखने योग्य कुछ होता नहीं। यहाँ के नगर तो निर्धन हैं ही, बहुत खराब भी हैं।

'यहाँ के नगरों के नाम से ही पता चलता है कि उनमें कितनी निर्धनता है। देखा - कान-पुअर, मिर्जा-पुअर, गाजी-पुअर, लायल-पुअर, फतेह-पुअर, हमीर-पुअर, फीरोज-पुअर। यह सब नगर बहुत गरीब हैं और कुछ नगर इतने हीन हैं कि उनके नाम भी वैसे ही रख दिये गये हैं, जिनसे लोग जान लें कि यह खराब हैं। जैसे अलाहा-बैड, जलाला-बैड, सिकन्दरा-बैड, हैदरा-बैड इत्यादि। इसलिये इन नगरों में देखने योग्य है ही क्या? कानपुर में एक ही वस्तु देखने योग्य है। वह है 'मेमोरियल वेल।' मैंने पूछा - 'यह क्या है? किसकी स्मृति में है?' कर्नल साहब ने कहा - 'वह हमारे त्याग, बलिदान, महत्ता, वीरता और विशालता का प्रतीक है। उससे मालूम होता है कि हम लोग संसार पर शासन करने योग्य हैं।'

मैंने कहा - 'क्या वहाँ कोई युद्ध हुआ था?' कर्नल साहब ने कहा - 'नहीं, उसमें बहुत-से अंग्रेज काटकर फेंक दिये गये थे।' मैंने पूछा - 'क्यों?'

कर्नल ने कहा - 'बहुत-से हिन्दोस्तानी अंग्रेजी राज्य के विरोध में लड़ने को तैयार हो गये थे। उन्हीं का यह काम था।'

मैंने कहा - 'लड़ाई में तो यह होता ही है कि फिर उसे एक मेमोरियल का स्वरूप देने की क्या आवश्यकता थी?' कर्नल ने कुछ अप्रसन्नता से कहा - 'ऐसे विचारों को प्रकट करने से तुम निकाल दिये जाओगे। हम लोग भारत में शासन करने आये हैं। किसी प्रकार का उदार विचार प्रकट करने से भारतवासी उद्दंड हो जायेंगे। फिर हम यहाँ शासन नहीं कर पायेंगे और भारत में हमारा शासन नहीं होगा तो यह सेना नहीं रहेगी। फिर हम-तुम कहाँ रहेंगे? इसलिये इतनी बातें याद रखना, भारतवासियों से कभी मिलना-जुलना मत। किसी प्रकार का उदार-विचार प्रकट मत करना।'

मुझे यह बातें अच्छी नहीं लगीं; परन्तु मैं अपने अफसर के विरुद्ध कुछ कहना नहीं चाहता था। मैंने तो भारत के बारे में सभी कुछ जानने का निश्चय किया था। फिर भी मैंने इस पर विवाद उठाना ठीक नहीं समझा। अच्छा मेमोरियल देख आऊँ, फिर उधर से सिनेमा देखता आऊँगा।

आज पहले-पहल नगर देखने का अवसर मिला। पहले सीधे मेमोरियल कुएँ की ओर गया। कुआँ तो दिखायी नहीं दिया। एक वस्तु घिरी हुई और बन्द दिखायी दी और उस पर सारी घटना लिखी हुई थी। मेरी समझ में नहीं आया कि इसकी क्या आवश्यकता थी। समुद्र में इतने जहाज डूब गये, वहाँ कोई मेमोरियल क्यों नहीं बना?

मैं इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानता। इसलिये इस कुएँवाली घटना पर कुछ नहीं लिख सकता। पर कोई विशेष मनोरंजन यहाँ नहीं हुआ। ताँगेवाले से मैंने शहर में चलने के लिये कहा। कानपुर निर्धन नगर नहीं है। मुझे गलत बताया गया कि यहाँ धन नहीं है। एक बात अवश्य यहाँ देखने में आयी, एक सड़क पर मैंने देखा कि यहाँ मोची बहुत हैं और चमड़े की दुकानें चारों ओर हैं। मुझे यदि नामकरण करना होता तो इस नगर का नाम कानपुर न रखकर मोचीनगर रखता। पता नहीं यहाँ के सभी नगरों में इतने मोची हैं या नहीं? कम-से-कम बम्बई में मुझे इतने मोची नहीं मिले। मौलवी साहब से पूछूँगा कि इतने मोची कानपुर में ही क्यों एकत्र कर दिये गये हैं?

यों ही कौतूहलवश एक दुकान के भीतर मैं चला गया कि देखूँ किस प्रकार का सामान यह लोग बनाते हैं। वहाँ कुछ तो सूटकेस इत्यादि थे; इनमें कोई विचित्रता नहीं थी। कुछ जूते बिल्कुल विलायती जूतों की भाँति थे। बड़ी अच्छी नकल इन लोगों ने कर रखी थी। कुछ रोमन और पुरानी चप्पलें भी थीं। इनके अतिरिक्त कुछ और जूते थे जो ठीक भारतीय जूते कहे जा सकते हैं। इनमें कुछ ऐसे थे जो ऊपर बढ़िया मखमल के बने थे जिन पर बड़ी सुन्दरता से रेशम अथवा सोने का काम किया हुआ था।

इन जूतों में फीते न थे, न बाँधने का तस्मा था। जान पड़ता है पम्प जूतों को देखकर उनका भारतीयकरण किया गया है। सबसे अच्छी बात इनमें यह है कि यदि झगड़ा हो तो आसानी से यह उतारे जा सकते हैं। फीता खोलने की देर नहीं लग सकती। हल्के भी होते हैं जिससे स्त्रियाँ और बालिकायें भी इसे सुगमता से चला सकती हैं। एक बात और। इतने भारी भी यह नहीं होते कि चोट अधिक लग सके। इसलिये यदि आवश्यकता पड़े तो यह काम भी इससे लिया जा सकता है और विशेष कष्ट भी इससे नहीं होगा। विलायत में ऐसे जूतों की बहुत आवश्यकता है। पार्लियामेंट में विवाद के अवसर पर जब कभी मार-पीट हो जाती है तब पहले तो जल्दी जूते खुलते नहीं और यदि खुलकर कहीं बैठ जाते हैं तो मरहम-पट्टी की आवश्यकता पड़ती है।

घरेलू झगड़ों में कभी-कभी चोट-चपेट के कारण अदालत तक जाना पड़ता है। ऐसे ही जूते वहाँ रहें तो कितनी ही समस्यायें सुगमता से सुलझ जायें। मैंने अपने नाप का एक जोड़ा तो खरीद लिया और एक जोड़ा और सुन्दर देखकर विलायत भेजने के लिये ले लिया। वहाँ मेरी मित्र मिस बुलेट को बहुत पसन्द आयेगा।

सन्ध्या हो चली थी, इसलिये मैंने ताँगेवाले से एक अच्छे सिनेमाघर में ले जाने के लिये कहा। उसने मुझे एक विशाल भवन के सामने लाकर ताँगा खड़ा कर दिया। ताँगेवाले ने कहा - 'फाइव रुपीज।' मुझसे लोगों ने यहाँ बताया था कि हिन्दुस्तानी लोग प्रत्येक चीज का दाम दूना माँगते हैं। इसलिये मैंने ढाई रुपये उसके हवाले किये और ढाई रुपये का एक टिकट खरीदा और सिनेमा हाल के भीतर प्रवेश किया।

 

सिनेमा में

सिनेमा घर के भीतर प्रवेश करने पर मैं क्या देखता हूँ कि एक भी सफेद रंगवाला वहाँ नहीं है और दूसरी बात जो देखी उससे पता चलता था कि सम्भवतः चुप रहने पर दफा 144 लगी हई है। जितने पुरुष हैं वह बात कर रहे हैं, जितनी महिलायें हैं वह बहस कर रही हैं, और जितने बच्चे हैं वह रो रहे हैं और जितने लड़के हैं वह लड़ रहे हैं। चाय, सोडा, मूँगफली बेचनेवाले पैरों पर से चढ़ते हुए और जोर-जोर से चिल्लाते हुए चल रहे थे। साढ़े छः का समय आरम्भ होने का था और सात बज रहे थे।

पहले मैंने समझा था कि अंग्रेजी सिनेमाघर होगा और कोई अंग्रेजी खेल होगा; किन्तु ताँगेवाले ने जहाँ मुझे पहुँचा दिया था वह हिन्दुस्तानी सिनेमाघर था। हैंडबिल में अंग्रेजी में छपा था खेल का नाम 'तूफान'। अभिनेताओं को तो मैं जानता नहीं था। चुपचाप बैठा। सोचा, कोई भला आदमी पास में बैठेगा तो उससे कुछ पूछूँगा। इतने में एक चायवाला मेरे सामने ही आकर खड़ा हो गया। बोला - 'साहब चाय?' उसके कुरते में एक ही आस्तीन थी, सामने का बटन कब से नहीं था, कह नहीं सकता, और माथे पर से पसीने की बूँदें ओस के कण के समान झलक रही थीं। जितनी तेज उसकी आवाज थी उतनी ही बढ़िया यदि चाय भी होती तब तो बात ही क्या!

इतना अवश्य था कि यदि मैं उसकी चाय पी लेता तो लिप्टन या ब्रुकबाण्ड की चाय के साथ भारतीय चायवाले के पसीने का भी स्वाद मुझे मिल जाता। मैं अभी इस नवीन स्वाद के लिये तैयार न था।

सवा सात बजे खेल आरम्भ हुआ। इस सिनेमा हाल की पहली विशेषता यह थी कि जब कोई गाना आरम्भ होता था तब इधर से कोई न कोई शिशु भी अलाप में साथ देता था। मेरी समझ में गाना तो आता नहीं था, परन्तु स्वर बड़ा मधुर था। सबसे सुन्दर वस्तु जो मुझे इस खेल में जान पड़ी वह नृत्य था। कभी-कभी नर्तकियाँ ऐसी सफाई से घूमती थीं जैसे उनकी कमरों में कमानी लगी हो और मशीन द्वारा घूम रही हों। इन नर्तकियों के कपड़े तो ऐसे मूल्यवान थे कि सम्भवतः विलायत की महारानी को सपनों में भी कभी दिखायी न दिये होंगे।

मेरी समझ में खेल तो बहुत कम आया। यहाँ भारत में एक विचित्रता देखने में आयी। खेल में एक दृश्य था कि एक आदमी बहुत सख्त बीमार था। डॉक्टर आया, देखकर उसने कुछ चिन्ता-सी प्रकट की। उसके चले जाने के पश्चात् इसकी स्त्री अथवा प्रेमिका, जो भी रही हो, गाने लगी। पता नहीं शायद डॉक्टर ने उसे गाने के लिये कहा था। शायद वह रोग गाने से ही अच्छा होता हो।

भारत रहस्यपूर्ण देश है, इन्हीं बातों से पता चलता है कि इस खेल में एक घंटे संवाद हुआ होगा तो एक घंटे संगीत हुआ होगा। संगीत की कला कैसी थी मैं कह नहीं सकता। स्वर मधुर अवश्य थे।

एक दृश्य में एक व्यक्ति घोड़े पर सवार था। वह हिन्दुस्तानी धोती पहने था। शायद यहाँ घोड़े पर सवार होने के समय ब्रीचेज नहीं पहनी जाती और घोड़े के दौड़ने के समय उसकी धोती खिसककर धीरे-धीरे कमर की ओर चली जा रही थी।

खेल की कथा के सम्बन्ध में मैं जानना चाहता था। इसलिये मैंने साहस करके बगल में बैठे एक सज्जन से कहा कि मैं यहाँ की भाषा नहीं जानता। मैं जानना चाहता हूँ कि कथा क्या है। उन्होंने बड़ी शालीनता से कथा का सारांश बताया। उस कथा के सहारे खेल समझने की चेष्टा करता रहा। यदि यह वास्तविक जीवन का चित्र है और साधारणतया लोगों का जीवन ऐसा ही होता है जैसा खेल में दिखाया गया है तो यही मानना पड़ेगा कि इस देश के माता-पिता बहुत ही क्रूर होते हैं। वह कभी अपने पुत्र तथा पुत्री को अपने मन के अनुसार विवाह नहीं करने देना चाहते। पसन्द वह स्वयं करते हैं और उनकी राय नहीं लेते। यदि हर घर में ऐसा होता है तब हर घर में सदा दुखान्तपूर्ण नाटक होता है। फिर आश्चर्य इस बात का है, इतने विवाह हो कैसे जाते हैं!

यदि प्रत्येक पुत्र व पुत्री पिता से विद्रोह करती है, जैसा कि नाटक में दिखाया गया, तो घरों में शान्ति कैसे रहती है? और यदि यह केवल कल्पना थी तब तो लेखक ने भारत के प्रति अन्याय किया।

परन्तु मैं इस विषय पर राय देने का अधिकारी नहीं हूँ, क्योंकि सारा खेल मैं कल्पना के सहारे समझने की चेष्टा करता रहा।

जिस कुर्सी पर मैं बैठा था उसमें खटमलों का एक उपनिवेश था। सब कुर्सियों में था या नहीं मैं कह नहीं सकता। यदि सब कुर्सियों में था तो यहाँ के सिनेमा देखने वालों के सन्तोष की प्रशंसा करना आवश्यक है। मैं कह नहीं सकता कि यह पाले गये हैं कि अपने से कुर्सियों में आकर बस गये हैं। यह मैंने सुना है कि भारतवासी लोग कीट-पतंग, पशु-पक्षी के प्रति बड़ा स्नेह रखते हैं। ऐसी अवस्था में यदि यह पाले गये हों तो आश्चर्य नहीं।

जब बीच में अवकाश हुआ तो मैं बाहर निकल आया। देखता क्या हूँ कि धीरे-धीरे मेरे चारों ओर लोग एकत्र हो रहे हैं। मैं समझ न पाया कि बात क्या है। अपने कपड़ों की ओर मैंने देखा कि कोई विचित्रता तो नहीं है। किसी ने मुझसे कुछ कहा भी नहीं। मैंने यों ही प्रश्न कर दिया -'क्या चाहिये? कुछ लोग खिसक गये और दूसरे लोग अब कुछ दूर खड़े हो गये। वह मुझे एकटक देख रहे थे।

यहाँ के लोगों ने सम्भवतः गोरे सैनिकों को नहीं देखा था, इसलिये बड़ी उत्सुकता से वह मुझे देख रहे थे। मुझे शरारत सूझी तो मैंने जोर से 'हूँ' कर दिया। उसी आवाज से सब लोगों ने भागना आरम्भ कर दिया। मुझे बड़ी हँसी आयी और जोर-जोर से हँसने लगा। मेरी हँसी शायद बहुत पसन्द आयी इसलिये लोगों ने तालियाँ पीटीं जैसे किसी व्याख्यान में बहुत सुन्दर बात कही गयी हो। फिर घंटी बजी, परन्तु मेरा मन खेल में लग नहीं रहा था, इसलिये बैठक में चला आया।

 

बाइसिकिल और बेयरा

मैं अब साधारण हिन्दुस्तानी समझ लेता हूँ और छोटे-छोटे वाक्य बोल भी लेता हूँ। हिन्दुस्तानी सीख लेने से एक लाभ यह हो गया कि नौकरों से काम लेना तो सरल हो गया, एक और बात है, मैं पहले नहीं जानता था कि यहाँ नौकरों को गाली देना आवश्यक है।

परसों मैंने बेयरा को मैसर्स 'लूटर्स एंड को.' के यहाँ कुछ सामान के लिये भेजा। वह तीन घंटे के बाद लौटा। मैंने पूछा - 'इस समय क्यों आये?' उसने कहा - 'देर हो गयी।' मैंने पूछा - 'क्यों देर हो गयी?' वह बोला - 'बाइसिकिल टूट गयी।' मैंने पूछा - 'बाइसिकिल कैसे टूट गयी?' वह बोला - 'साहब - एक साहब मोटर चलाते थे। उन्होंने जान-बूझकर मेरी बाइसिकिल से लड़ा दी। मैंने बहुत हटाने की चेष्टा की, परन्तु जिस ओर मैं साइकिल ले जाता था उसी ओर वह मोटर लाते थे। मैंने समझा इनका मतलब यह है कि मैं चाहे जहाँ भी जाऊँ - मुझे दबाने के लिये इन्होंने कसम खा ली है। इसलिये मैंने साइकिल छोड़ दी और अपनी जान बचा ली। साइकिल तो हुजूर, बन सकती है या नई आ सकती है। मैं मर जाता तो आपकी खिदमत कौन करता? बस, यही लालच था कि आपकी खिदमत कुछ दिन और करूँ, नहीं तो जिंदगी से कोई और लगाव नहीं है। खुदा हुजूर को सलामत रखे, मैं बाल-बाल बच गया। साइकिल तो जरा-सी टूट गयी।' मैंने पूछा - 'क्या टूटा है?' बोला - 'जरा-सा पहिया टूट गया है।' 'देखूँ।' वह दो पहिये उठा लाया या यह कहना चाहिये कि वह वस्तुतः वह उठा लाया जो पहले पहिये थे। उसमें एक इस समय षट्कोण के रूप में था और दूसरा मानो गोरखधंधे को कोई खेल हो। मैंने पूछा - 'यह जरा-सा टूटा है?' वह बोला - 'हुजूर, मैंने ऐसी बाइसिकिल देखी है जो मोटर से दबकर बिल्कुल चकनाचूर हो गयी है। जिसकी एक-एक तीली सौ-सौ सूई के टुकड़ों में बदल गयी है। और हुजूर, देखिये, आपके लिये जो बोतलें ला रहा था वह सब सही-सलामत हैं। खुदा की रहमत देखिये। खुदा आप पर बहुत मेहरबान है। आप बहुत जल्दी जनरल हो जायेंगे।'

बाइसिकिल सरकारी थी इसलिये उसकी सूचना कर्नल साहब को देनी आवश्यक थी। मैंने जाकर कर्नल साहब को सब हाल बताया। उन्होंने पूछा कि तुमने क्या किया। मैं बोला - 'मैं क्या करता? मैं तो बाइसिकिल बनाना नहीं जानता।' कर्नल ने कहा - 'यह नहीं, बेयरा को क्या किया?'

मैं तो जानता नहीं था कि क्या करना होता है। कर्नल ने कहा - 'देखो, यदि तुम्हें यहाँ अपनी जान नहीं देनी है, तो दो बातें याद रखो। नौकरों को जब कुछ कहो तो गालियाँ देकर। और वह कुछ गलती करें तो दस-बीस गालियाँ दो। और अगर उससे भी बड़ी गलती करें तो ठोकर लगानी चाहिये। एक, दो या तीन। उस समय जितनी तुममें शक्ति हो उसके अनुसार।'

मैंने कहा - 'मुझे तो गालियाँ आती नहीं। आप बतायें तो जरा मैं नोट कर लूँ!' और मैंने पेंसिल और नोटबुक सँभाली।

कर्नल शूमेकर ने कहा - 'हाँ, इसका जानना बहुत आवश्यक है। लिख लो, देखो - आरम्भ करो 'पाजी' से; फिर कहो - 'गधा; फिर सूअर, और फिर सूअर का बच्चा। इसके बीच-बीच डैम, ब्लडी, इत्यादि कहने से रोब और बढ़ जायेगा। और भी गालियाँ हैं, मगर वह लफ्टंट के लिये नहीं हैं। उन्हें कप्तान और कर्नल ही दे सकते हैं।'

मैंने दो दिनों में उन गालियों को याद कर लिया। मैंने इन्हें रट लिया।

 

जूते का उपहार

हमारे कर्नल साहब अपनी स्त्री को बहुत मानते थे। उनके कहने पर बड़े से बड़ा त्याग करने के लिये वह तैयार हो जाते। यहाँ तक कि यदि वह कह देतीं तो वह नौकरों को गाली देना भी बन्द कर देते। क्लब के एक सदस्य ने मुझे बताया कि एक बार उनके कह देने से एक रात उन्होंने एक ही बोतल व्हिस्की पी थी। उस घटना को इस पलटन में लोग ऐतिहासिक घटना मानते हैं।

आज उनकी स्त्री की सालगिरह थी। मुझे भी कुछ भेजना ही होगा और विशेषतः इसीलिये कि आज कर्नल साहब ने सभी अफसरों को भोजन के लिये आमंत्रित भी किया था। मैं सोचने लगा -क्या उपहार भेजूँ। मुझे पता भी नहीं था कि उनकी रुचि कैसी है। उन्हें देखा तो कई बार था, परन्तु इस निष्कर्ष पर न पहुँच सका कि कौन-सी चीज उन्हें पसन्द आयेगी। बहुत देर तक सोचने पर मैंने निश्चय किया, क्यों न एक जोड़ा जूता कानपुर का, जैसा मैंने दुकान पर देखा था, भेजूँ।

मैं उसी दुकान पर गया और एक जोड़ा जूता लगभग उन्हीं के नाप का, जिस पर सोने के बेल-बूटे बने हुए थे, खरीद लाया। और अपने बेयरा के हाथों अपने नाम का कार्ड लगाकर भेज दिया। सन्ध्या को जब मैं भोजन के लिये पहुँचा, और भी कितने ही अफसर पहुँच गये थे। ज्योंही मैं पहुँचा श्रीमती शूमेकर ने बड़े तपाक से मेरा स्वागत किया। उठ कर मेरे निकट चली आयीं। पाँच मिनट तक मेरा हाथ हिलाती रहीं और धन्यवाद की झड़ी लगाती हुई बोलीं - 'बेटा, (वह सब युवक अफसरों को बेटा कहकर पुकारती थीं) मैं सत्ताईस सालों से भारतवर्ष में हूँ। किसी ने ऐसी सुन्दर कलापूर्ण वस्तु मुझे उपहार में न दी। आध घंटे तक तो मैंने इसे छाती से लगाये रखा। यदि यह तीस साल पहले मिला होता तो इसी को विवाह के अवसर पर पहनती। कर्नल तक ने कभी मुझे ऐसा उपहार न दिया।'

मुझे गर्व का नशा चढ़ गया। मैंने कहा - 'यह वस्तु ही ऐसी है। शाहजहाँ की विख्यात बेगम मुमताजमहल ने जो जूते पहने थे, उसी का चित्र अवध के बहुत बड़े ताल्लुकेदार राजा बिडालेश्वरसिंह के यहाँ था, उसी को दिखाकर मैंने बनवाया। चित्र के अनुसार तो क्या बना? हाँ, कुछ है।' मिसेज शूमेकर ने कहा - 'तुमने क्यों इतना व्यय किया? यह तो अनुचित है।'

मैंने कहा - 'दूसरी वर्षगाँठ पर मैं न जाने कहाँ रहूँ। जीवन की एक अभिलाषा मैंने पूर्ण कर दी।'

वह जूते का जोड़ा सब लोगों को दिखाया गया। सब लोगों ने 'वाह-वाह' की। कैप्टन बफैलो की स्त्री बगल में बैठी थीं। उन्होंने कहा कि 'मुझे तो सपने में भी यह खयाल नहीं था कि हिन्दुस्तान में ऐसी कारीगरी होती होगी। मैं जब यहाँ आयी तब समझती थी कि यहाँ काठ के जूते पहने जाते हैं। फिर जो जूते देखे वह सब यूरोप की नकल थे। हाँ, यहाँ के पुलिस कान्स्टेबुल जो जूते पहनते हैं, वह भारतीय जान पड़ते हैं।''

कैप्टन बफैलो ने कहा - 'यह हिन्दुस्तान की कारीगरी हो ही नहीं सकती। इसकी शक्ल देखो। इटली के गांडोला से ठीक मिलती है। जान पड़ता है कि ताजमहल बनाने के लिये जो इटली से राजगीर आया था, उसी ने यह नमूना मुमताज बेगम के लिये बनवाया होगा। इसका मूल यूरोप ही है। यहाँ ऐसी वस्तु कहाँ?'

कर्नल साहब ने कहा - 'नहीं, यहाँ कारीगर तो बहुत अच्छे-अच्छे हैं। देखिये, लाल इमली का कारखाना यहीं के लोगों ने बनाया। मगर इस जूते के बारे में कह नहीं सकता। लफ्टंट रोड, आपकी क्या राय है?'

लफ्टंट रोड हमारी सेना के इंजीनियर थे और पुरातत्त्व के बड़े विद्वान थे। उन्होंने कहा - 'एक बात जो विशेष ध्यान देने योग्य है वह है इसकी नोक। आप लोगों ने ध्यान दिया होगा तो देखा होगा कि इसकी शक्ल स्कैंडिनेविया प्रायद्वीप की-सी है। यह अनुकृति यों ही नहीं हो गयी है। यह बिल्कुल यूरोप की कारीगरी है। यह तो मैं अपने पुरातत्त्व के अध्ययन के बल पर कह सकता हूँ। यह जूता मुझे मिल जाये तो अध्ययन करके रायल एशियाटिक सोसायटी के पत्र में लेख लिखूँ।'

परन्तु मिसेज शूमेकर ने देना मंजूर न किया। उन्होंने कहा कि जब तक मैं यहाँ हूँ, इसे अपने से अलग नहीं कर सकती और यदि यह इतने महत्व की वस्तु है तो इंग्लैंड लौटने पर इसे इंडिया आफिस को प्रदान कर दूँगी। यह उसी जगह रखने की वस्तु है।

इस विवाद से इतना लाभ मुझे हुआ कि भूख तेज हो गयी है और मैंने ड्योढ़ा खाया। मछली तो मैंने तीन प्लेट खायी।

 

पिगसन का पदक

भोजन के बाद शराब का दौर चला। हाथ में शराब का गिलास था और मुँह में हमारे वही जूता था। उसी की बातचीत चल रही थी। मैं सपने में भी नहीं समझता था कि जूता इतनी महत्ता पा जायेगा। इंडिया आफिस में भेजने तक ही बात न रही। कैप्टन रोड ने कहा कि इसी ढंग के जूते यदि विलायत में बनवाये जायें तो बड़ा अच्छा व्यवसाय चल सकता है। कर्नल साहब, आप पेंशन लेने के बाद क्यों नहीं इसका रोजगार करने का प्रबन्ध करते? कर्नल साहब ने समझा कि हमारे नाम के कारण कैप्टन रोड हमारा उपहास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाँ, हम बनायेंगे पर चलेंगे तो आप ही के ऊपर। इस पर जोरों का कहकहा लगा। कर्नल साहब की श्रीमती के तालू में शराब चढ़ गयी और वह उठकर लगीं कमरे में नाचने।

भोजनोपरान्त हम लोग दूसरे कमरे में चले गये और वहाँ सिगार पीने लगे। वहाँ मिसेज शूमेकर नहीं थीं। लफ्टंट बफैलो ने मुझे एक ओर ले जाकर कहा - 'कहो, कहाँ से वह जूता बनवाकर लाये? मुझे बता दो। मैं भी एक जोड़ा चाहता हूँ।' मैंने पूछा - 'क्या करोगे?' बोला -'कमिश्नर साहब की लड़की मिस बटर को तुमने देखा है?' मैंने कहा - 'देखा है।' उसने कहा - 'मेरी उससे बड़ी घनिष्ठता है। मैं एक जोड़ा उसे उपहार में देना चाहता हूँ। परन्तु यदि मूल्य अधिक हुआ तब तो कठिन है। क्योंकि इस महीने में तीन सौ रुपये का शराब का एक बिल चुकाना है। रुपये बचेंगे नहीं।'

मैंने कहा - 'एक काम करो। सच्चे काम का जूता तो उतने दामों में नहीं मिल सकता। हाँ, झूठे काम का वैसा ही जूता, ठीक वैसा ही, मिल जायेगा। हाँ, कुछ दिनों में उसका रंग काला हो जायेगा।' जिस कंपनी से मैंने जूते लिये थे, उस कम्पनी का नाम बता दिया।

एक बजे रात को मैं अपने बँगले पर लौटा। अपनी विजय पर बहुत प्रसन्न था। मैंने सपने में भी आशा नहीं की थी कि दो जूते इतनी सफलता प्रदान करेंगे। मुझे इस बात का तो विश्वास ही हो गया कि कर्नल साहब अवश्य ही मेरी प्रशंसा करेंगे और मैं समय से पहले ही कैप्टन हो जाऊँ तो आश्चर्य नहीं। दो बजे मैं सोया।

परन्तु कुछ तो शराब का नशा, कुछ जूते का ध्यान; जान पड़ता है नींद ठीक नहीं आयी क्योंकि मैं लगा सपना देखने।

देखता हूँ कि मैं जल्दी-जल्दी उन्नति करता जा रहा हूँ और मैंने देखा कि मैं भारत का वायसरॉय बना दिया गया। शिमला के वायसरॉय भवन में मैं रहता हूँ। परन्तु मैं उस जूते को अभी नहीं भूला - मेरी सिफारिश पर ब्रिटिश सरकार ने एक नया पदक बनवाया है जिसमें दो जूते अगल-बगल में रखे हैं। इस सोने के पदक का नाम पिगसन पदक रखा गया है और उस भारतीय को दिया जायेगा जिसने सरकार की सदा सहायता की है और सरकार का विश्वासपात्र रहा है। मैं यह भी देख रहा हूँ कि पिगसन पदक के लिये बड़े-बड़े राजा-महाराजा और राजनीतिक कार्यकर्ता लालायित हैं।

वायसरॉय-भवन में दीवारों पर मैंने सुनहले जूतों के चित्र बनवा दिये हैं और सरकारी मोनोग्राम को बदलकर मैंने दो सुनहले जूतों का चित्र बनवा दिया है। मैंने विशेष आज्ञा देकर चाय का सेट बनवाया जिसमें पियाले की शक्ल जूते की तरह है।

मेरी देखा-देखी जितने रजवाड़े हैं, उन्होंने भी मेरी नकल आरम्भ कर दी है और मेरे आनन्द की सीमा न रही जब सकलडीहा के महाराज ने मेरी दावत की, तब दावत के कमरे में चारों ओर रंग-बिरंगे जूतों से सजावट की गयी थी। मैंने उन्हें इक्कीस तोपों की सलामी का अधिकार दे दिया और अपना सिक्का ढालने की अनुमति दे दी। हाँ, एक शर्त थी कि सिक्के की एक ओर जूते का चित्र अवश्य रहे।

केन्द्रीय धारासभाओं का संयुक्त अधिवेशन हो रहा है और मैं भाषण पढ़ रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि भारत को स्वराज्य दिलाने को मेरा पूरा प्रयत्न होगा। विलायत की सरकार आप लोगों के देश का शासन आपके ही हाथों में देने के लिये निश्चय कर चुकी है। आप लोग उसकी नीयत पर सन्देह न करें। आप हमारे साथ सहयोग करें। हम अपने शासन-काल में निम्नलिखित विशेष काम करना चाहते हैं। यदि आपकी सहायता मिलती रही तो मेरे जाते-जाते स्वराज्य मिल जायेगा।

पहली बात तो यह है कि जूते के व्यवसाय को जितना प्रोत्साहन मिलना चाहिये, नहीं मिल रहा है। स्वराज्य-प्राप्ति में कितनी बड़ी बाधा है। भारतीय जूते या तो देशी हैं जो आज भी वैसे ही बनते हैं जैसे मेगास्थनीज ने वर्णन किया है या विलायत की नकल है। नकल से स्वराज्य नहीं मिलता, आप जानते हैं।

यद्यपि भारतीय कला बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँच गयी है और अब उसमें सुधार के लिये कम स्थान है, फिर भी यदि स्वराज्य लेना है तो भारतीय जूतों में उन्नति करनी ही होगी। उसी पर आपका भविष्य निर्भर है।

गाँव-गाँव में, नगर-नगर में, प्रत्येक पाठशाला में, कालेज में, विश्व-विद्यालय में इसकी शिक्षा आवश्यक है और इसकी उन्नति अपेक्षित है। आप मेरे इस सन्देश को देश के कोने-कोने में पहुँचाने की दया करें।

म्युनिसिपल बोर्ड और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्यों को इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिये क्योंकि स्वराज्य की पहली सीढ़ी यही है।

तालियों की गड़गड़ाहट से सारा भवन गूँजने लगा। मैं और आगे बोलने जा रहा था कि देखता हूँ कि आँखें खुली हैं, वही बैरक बँगला है, वही कमरा है, बेयरा ट्रे लिये खड़ा है, कह रहा है - 'हजूर, चाय।'

 

दंगा

क्लब से आकर मैं भोजन कर रहा था। एकाएक फोन की घंटी बजने लगी। कर्नल साहब बोल रहे थे। बनारस में हिन्दू-मुसलमानों में दंगा हो गया था। चालीस गोरे सिपाहियों के साथ मुझे तुरन्त बनारस जाने की आज्ञा हुई। किसी प्रकार भोजन समाप्त कर एक कार पर मैं और मेरा अरदली और दो लारियों पर चालीस गोरे सिपाही एक बजे रात को कानपुर चल दिये।

(यहाँ कुछ फ्रेंच में लिखा है जिसका अनुवाद मैं नहीं कर सका। कुछ- कुछ गाली-सी है। - लेखक)

जनवरी का महीना था। अपने को ओवरकोट में लपेट रखा था और बीच-बीच में बोतल से ही थोड़ी-थोड़ी ब्रांडी के घूँट ले लेता था। कर्नल साहब पर बड़ी झुँझलाहट आ रही थी। मुझे ही क्यों भेजा? मैं बिल्कुल नया आदमी। कभी न बनारस देखा न उसके सम्बन्ध में कुछ जानता था। ऐसी जगह मुझे भेजने से क्या लाभ? यह भी नहीं बताया कि मुझे करना क्या होगा।

हम लोग ग्यारह बजे दिन को बनारस पहुँचे। बैरक में सब लोग ठहरे और मैं कलक्टर साहब के बँगले पर पहुँचा। कार्ड भेजा। अन्दर बुलाया गया। मैंने देखा कि कलक्टर साहब का चेहरा नार्वे के कागज के समान सफेद था। आँखों से जान पड़ता कि कई दिनों से सोये नहीं हैं। मेरा अभिवादन करने में ऐसे शब्द निकल रहे थे मानो वे रो रहे हों।

मैंने तो पहले समझा कि इनकी इतनी दयनीय दशा है कि सब प्राणी यहाँ के गत हो गये हैं।

फिर उन्होंने कहा - 'कल दस बजे यहाँ हिन्दू-मुसलमानों में दंगा हो गया।'

मैंने पूछा - 'क्यों?'

'यहाँ एक कब्र है...'

'एक ही कब्र है इतने बड़े शहर में...'

'नहीं। आप पहले पूरी बात तो सुन लीजिये... एक कब्र है, उसी के पास एक हिन्दू का मकान है, उस मकान में एक नीम का पेड़ है...'

मैंने कहा - 'मैं सफर से आ रहा हूँ, इसी काम के लिये आया हूँ। सब ठीक समझ लेने दीजिये। - यहाँ एक कब्र है उसमें एक मकान है...'

'उसमें नहीं, उसके पास।' कलक्टर साहब ने मुझे ठीक किया।

'हाँ, हाँ, उसके पास; देखिये कार से सफर करने से जाड़े की रात में दिमाग का खून जम जाता है और कुछ का कुछ समझ में आने लगता है। - और उसमें एक पेड़ है। किस चीज का पेड़ आपने बताया?'

'नीम का।'

'तब?'

'उस नीम की पत्ती उस कब्र पर गिर पड़ी।'

'पत्ती तो नीचे गिरेगी, ऊपर तो जा नहीं सकती।'

'मगर कब्र पर जो गिरी।'

'तो कहाँ गिरनी चाहिये थी?'

'कहीं गिरती, पर कब्र पर गिरी, इससे मुसलमानों के हृदय पर धक्का लगा।'

'पत्ती गिरने से धक्का लगा तो कहीं पेड़ गिर जाता तब क्या होता?'

'सुनिये, उसी समय मुसलमानों ने कहा कि पेड़ काट डाला जाये, हिन्दुओं ने कहा कि कब्र खोद डाली जाये।'

'तो इसके लिये तो साधारण दो-तीन मजदूरों की आवश्यकता थी। चालीस गोरे और मुझे बुलाने की कोई बात मेरी समझ में नहीं आयी।'

'वह बात नहीं है। हमें तो दोनों की रक्षा करनी है।'

'तो उसी के लिये हम लोग आये हैं?'

'नहीं, वहाँ तो हमने पहरा बिठा दिया है; ये लोग लड़ गये हैं।'

'तो लड़ने दीजिये, दूसरों की लड़ाई से हमें क्या काम?'

'हमें तो शान्ति करनी है।'

'लड़-भिड़कर स्वयं ही शान्त हो जायेंगे। जब यूरोप में सौ वर्ष की लड़ाई शान्त हो गयी, तीस वर्षीय युद्ध समाप्त हो गया, तब इनकी लड़ाई कितनी देर तक चल सकती है?'

'परन्तु हमें तो शासन करना है, शान्ति रखनी है। शान्तिप्रिय नागरिकों की रक्षा करनी है।'

'तो हम लोगों को इस सम्बन्ध में क्या करना है?'

'पहला काम तो यह है कि आप अपने सैनिकों सहित नगर के चारों ओर चक्कर लगाइये।'

'इससे क्या होगा?' मैंने पूछा, क्योंकि चक्कर लगाने से आज तक कोई दंगा बन्द होते मैंने नहीं सुना था।

कलक्टर साहब ने कहा - 'इससे आंतक फैलेगा और लोग डर जायेंगे और घर से बाहर नहीं निकलेंगे।'

मुझे तो आज्ञा पालन करनी थी। बाहर आया। सबको आज्ञा दी। हमारे साथ एक देशी डिप्टी कलक्टर भी कर दिया गया। हम लोग सैनिकों को लिये एक-दो-तीन करते घूमने लगे।

पहली बार मैंने बनारस देखा। परन्तु इसके बारे में मैं आगे लिखूँगा। इस समय मैंने देखा कि सड़कें बिल्कुल खाली हैं। घर सब बन्द हैं। कोई दिखायी नहीं पड़ता है। हम लोगों को कोई देखता है तो किसी गली में भाग जाता है, जैसे कोई शेर या चीते को देख ले।

मेरी समझ में नहीं आया कि दंगा कहाँ हो रहा है। मैं देखना चाहता था कि हिन्दू-मुसलमान कैसे लड़ते हैं। केवल मुँह से गालियाँ देते हैं कि मुक्केबाजी करते हैं, कि लाठियों से लड़ते हैं। क्योंकि यहाँ तो हथियार कानून लागू है। किसी के पास बंदूक या तलवार तो होगी नहीं। किसी के पास चोरी से होगी तो वह भी एकाध। मैं तो सेना विभाग का आदमी हूँ। मुझे इस प्रकार के युद्ध की प्रणाली पर विश्वास नहीं।

मैंने बहुत सोचा, परन्तु समझ में नहीं आया कि कब्र पर पत्ती गिरने से लड़ाई क्यों आरम्भ हो गयी। मुर्दे को चोट भी नहीं लग सकती। कानपुर लौटूँगा तक मौलवी साहब से पूछूँगा कि क्या बात है। कोई और वस्तु हो तो निरादर या अपमान भी हो। नीम की पत्ती से क्यों मुसलमान लोग बिगड़ें?

सन्ध्या समय जब नगर के चारों ओर घूम चुके तब हम लोगों को छुट्टी मिली। सब सैनिक बैरक में गये। मैं कलक्टर साहब के बँगले पर गया। मैंने कहा - 'मुझे तो कोई कहीं दिखायी नहीं दिया।'

वह बोले - 'यही तो ब्रिटिश शासन का रौब है। हिंदोस्तानी लोग हम लोगों से बहुत डरते हैं।' बैरक से लौट आया और सोचने लगा कि भारतवासी क्यों अंग्रेजों से डरते हैं। काली चीज देखकर भय लगता है। हम लोग भारतवासियों से डरें तो स्वाभाविक है, परन्तु सफेद चीज से डर लगना! हम लोगों का भारतवासियों से डरना एक बात थी।

मैं सोचने लगा कि सचमुच बात क्या है जिससे हम लोगों से हिदुस्तानवाले डरते हैं; वीर तो ये लोग बड़े होते हैं। यहाँ के सैनिकों की वीरता की धाक यूरोप में जम चुकी है, बुद्धि में भी यहाँ के लोग किसी प्रकार कम नहीं, क्योंकि बहुधा हिन्दुस्तानियों के नाम सुनता हूँ, जिनके ज्ञान-विज्ञान की प्रशंसा यूरोप के विद्वान भी करते हैं। यहाँ के रहनेवाले अंग्रेजी भी अच्छी बोलते हैं। असेम्बली के भाषण छपा करते हैं, अंग्रेजी बिल्कुल व्याकरण से शुद्ध होती है। इतना ही नहीं, आई.सी.एस. की परीक्षा भी पास कर लेते हैं, बढ़िया सूट भी पहनते हैं; सुनते हैं बहुत-से लोग मेज पर खाते भी हैं; फिर भी हम लोगों से डरते हैं, बात क्या है?

मैंने मनोविज्ञान तो कभी पढ़ा नहीं, इसलिये बहुत सोचने पर भी कोई बात ठीक मन में नहीं आयी। एक बात केवल समझ में आयी कि ईश्वर जब हिन्दुस्तान में रहनेवालों को पैदा करता है, तब जान पड़ता है भय का कोई डोज मिला देता है क्योंकि तीन-चार महीने मुझे यहाँ आये हो गये, मैंने देखा कि सभी लोग यहाँ डरते हैं। हिन्दू मुसलमानों से डरते हैं। मुसलमान हिन्दुओं से; मारे डर के ये लोग स्त्रियों को घर के बाहर नहीं निकालते; सुनता हूँ - मारे डर के रुपयेवाले रुपया बैंक में नहीं रखते, पृथ्वी के नीचे गाड़कर रखते है। गाँववाले पुलिस के अफसर-थानेदार से डरते हैं, नगरवाले कलक्टर से डरते हैं, मूँछवाले बेमूँछवालों से डरते हैं, स्त्रियाँ पुरुषों से डरती हैं, पुरुष स्त्रियों से डरते हैं। मैंने तो जो देखा और सुना वह यही कि यहाँ के लोगों का मूलमन्त्र डर ही डर है। जीवित लोगों से ही नहीं मुर्दों से भी ये लोग डरते हैं, भूत से ये लोग डरते हैं, पिशाच से ये लोग डरते हैं। तब हम लोगों से डरते हैं तो कोई आश्चर्य नहीं।

 

बनारस में पिगसन

दूसरे दिन सवेरे मुझे आज्ञा मिली कि आप लोग अपनी बैरक में रहें। जब आवश्यकता होगी, बुला लिये जायेंगे। हम लोग दिन-भर बैठे रहे। सन्ध्या समय मैंने एक कारपोरल से कहा कि मैं बाहर जा रहा हूँ। अब रात में तो कोई सूचना आने की सम्भावना नहीं है।

निकट के होटल से एक गाइड मैंने बुलवाया और उससे पूछा कि यहाँ कौन-कौन-सी वस्तुयें देखने योग्य हैं। मैं देखना चाहता हूँ। ठीक नहीं कब यहाँ से कानपुर लौट जाना हो। गाइड ने कहा कि यहाँ विश्वनाथजी का स्वर्णमन्दिर, बन्दरोंवाला मन्दिर, औरंगजेब की मस्जिद, घाट, विश्वविद्यालय और सारनाथ देखने के योग्य हैं।

मैंने कहा - 'अच्छा, आज नगर देख लूँ और कल जितना हो सकेगा देखूँगा।' मैं उसे लेकर कार पर बैठा, और नगर की ओर चला। राह में वह मुझे विशेष स्थानों पर बताता जाता था कि यह कौन-सा स्थान है, इसका क्या महत्व है। एक जगह बड़ा पत्थर का भवन मिला जिसके लिये उसने बताया कि यह क्वींस कॉलेज है। मैंने यह पूछा कि क्या यहाँ रानियाँ पढ़ती हैं, या रानियों ने बनवाया है? उसने कहा - 'नहीं, यह महारानी विक्टोरिया के नाम पर बना है।'

मुझे कुछ अविश्वास-सा हुआ। मैंने कहा - 'यहाँ के लोग भला किसी दूसरे देश की रानी के नाम पर क्यों भवन बनायेंगे? इंग्लैंड में तो कोई भवन जर्मनी या रूस के राजा या रानी के नाम पर नहीं है।' वह बोला - 'यहाँ का यही नियम है। बात यह है कि भारतवासी बहुत ही विनम्र तथा त्यागी होते हैं। वह सोचते हैं कि अपने देश में अपने यहाँ के लोगों की ख्याति उचित नहीं है। हम लोग सब काम दूसरों के लिये करते हैं। देखिये, एक अस्पताल मिलेगा। वह भी बादशाह सलामत के नाम पर है। यहाँ सड़कें भी आप देखेंगे कि आपके ही देशवासियों के नाम पर हैं।'

मैंने कहा कि यह भावना तो बड़ी ऊँची है और तभी शायद तुमने अपना देश भी हम लोगों को दे दिया। वह बोला - 'हाँ, है ही। देखिये, हम लोगों ने लड़ने को सिपाही भेजे। यह आप ही लोगों की सहायता के लिये। हम लोग इस प्रकार दूसरों के लिये ही जीते हैं।'

तब तक हम लोग नगर के बीच पहुँच गये, और उससे पता चला कि इसे चौक कहते हैं। मैंने कहा - 'क्यों न कार कहीं खड़ी कर दी जाये और हम लोग पैदल टहलकर देखें।' कुछ-कुछ दुकानें खुली हुई थीं। लोग शीघ्रता से इधर से उधर चले जा रहे थे। गाइड ने बताया कि भय के कारण कुछ दुकानें बन्द हैं। आज शान्ति है, इसलिये इतनी खुल गयी हैं।

एक बात और देखने में आयी जिससे पता चला कि इस देश में मनुष्यों से अधिक स्वतन्त्रता पशुओं में है। मैंने देखा कि एक बैल बड़ी निर्भीकता से मेरी पतलून का अपने सींग से चुम्बन करता हुआ चला गया। उसने इस बात की परवाह नहीं की कि मैं इकतीसवीं ब्रिटिश रेजिमेंट का लफ्टंट हूँ। मैं कुछ डर-सा गया और देखा कि उसी के पीछे एक और उससे डबल बैल चला आ रहा है, मस्ती से झूमता। गाइड ने कहा कि डर की कोई बात नहीं है। यहाँ के साँड़ किसी को हानि नहीं पहुँचाते। महात्मा बुद्ध ने पहले-पहल काशी के ही निकट सारनाथ में अहिंसा का प्रचार किया था, इसीलिये काशी के साँड़ आज तक बौद्ध धर्म का पालन करते हैं।

धर्म का यह प्रभाव देखकर मुझे बड़ी श्रद्धा हुई। हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे की खोपड़ी तोड़ते हैं और बैल अहिंसा का पालन करते हैं। भारत विचित्र देश है, इसमें सन्देह नहीं। बुद्ध भगवान का प्रभाव भारत में बैलों पर ही पड़ा, इसका दुःख हआ।

गाइड ने बताया कि साधारण स्थिति में यहाँ बड़ी चहल-पहल रहती है, परन्तु दंगे के कारण कुछ है नहीं। फिर एक गली में जाकर उसने बताया कि यहाँ पहले विश्वनाथजी का मन्दिर था। मुसलमानों ने आक्रमण किया तो यहाँ के देवता कुएँ में कूद पड़े। वह जो बैल लाल पत्थर का आप देखते हैं, पहले अस्ली बैल था। एक मुसलमान सिपाही का अँगरखा छू गया, तभी यह पत्थर हो गया। हर एकादशी को यह रोता है। मैंने पूछा कि तुम्हारे देवता तो बड़े डरपोक हैं जो कुएँ में कूद पड़े। उसने बताया कि यह बात नहीं है। देवता स्वयं नहीं कूदे। पुजारी उन्हें लेकर स्वयं कूद पड़ा क्योंकि उसे डर था कि यदि कहीं इनकी दृष्टि मुसलमानों पर गयी और इन्हें क्रोध आ गया तो सारा संसार भस्म हो जायेगा। तब क्या होगा? पुजारी देवताओं को लेकर फिर निकल आया। फिर नये मन्दिर को बाहर से उसने दिखाया। मैं भीतर जाना चाहता था, परन्तु पता लगा कि इसमें केवल हिन्दू ही जा सकते हैं और वह भी सब हिन्दू नहीं। मैंने पूछा - 'ऐसा क्यों?' गाइड ने कहा कि बात यह है कि भगवान का दर्शन सबको नहीं मिलता। जब बहुत तप करके हिन्दू जाति में मनुष्य जन्म लेता है, तभी वह भगवान शंकर का दर्शन कर सकता है।

मैंने पूछा कि यह कैसे हो सकता है कि मनुष्यों में सबसे श्रेष्ठ हिन्दू है। उसने कहा - 'सबसे श्रेष्ठ वही है जिसे न दुःख में दुःख है न सुख में सुख है।

'देखिये, हिन्दू जाति को किसी प्रकार का दुःख नहीं है। इसका मान करो तो भी, अपमान करो तो भी, यह बुरा नहीं मानती। आप चाहें तो इसका उदाहरण अभी देख सकते हैं। किसी हिन्दू को एक लात मारिये। वह आपको देखकर सलाम करके हट जायेगा। तपस्या की चरम सीमा पर पहुँचने पर मनुष्य की ऐसी मनोवृत्ति हो जाती है।'

फिर आगे चले तो सुनसान-सा दिखायी दे रहा था। कुछ दूर आगे चले तो एक नदी दिखायी दी। उसने कहा कि यह गंगाजी हैं जिसे हिन्दू लोग माता कहते हैं।

दस बज रहे होंगे। रात का समय था। सन्नाटा छा रहा था। पानी धीरे-धीरे बह रहा था। हम लोग किनारे पहुँचे। देखता हूँ कि किनारे एक हट्टा-कट्टा आदमी रात में बिलकुल नंगा, केवल कमर में एक कपड़ा लपेटे पत्थर पर लगातार उछल-कूद कर रहा है। कई मिनट तक मैं देखता रहा। उसका कूदना बन्द नहीं हुआ। मैंने गाइड से पूछा कि यह यहाँ रात में क्या कर रहा है। वह बोला - 'यह कसरत कर रहा है।'

मैंने कहा - 'बहुत गरीब होगा। शायद इसका घर नहीं है।' गाइड ने समझाया कि ऐसी बात नहीं है। गंगा के सामने कसरत करने से दूना बल होता है। एक-दो नहीं, ऐसे अनेक कसरत करनेवाले आप इसी घाट पर देखेंगे। इतनी खुली जगह है तो इसका उपयोग करना चाहिये। यह भी गाइड ने बताया कि यहाँ सवेरे चहल-पहल रहती है। इसलिये कल सवेरे आप आइये। मैं रात में ग्यारह बजे बैरक लौटा। चारों ओर सन्नाटा था। कहीं कोई दिखायी नहीं देता था।

गाइड ने बताया कि देखिये, चारों ओर सन्नाटा है। सब लोग घरों में सोये हैं। इसीलिये दंगे जाड़े में ही होते हैं। गर्मी में यहाँ बहुत से लोग सड़क पर सोते हैं, इसलिये दंगे नहीं होते। नहीं तो कितने आदमियों के सिर उड़ जायेंगे। दंगेवाले भी समझ-बूझकर सब काम करते हैं।

 

काशी के घाट

आज सवेरे ही गाइड मेरी बैरक में पहुँचा। मैं चाय पी रहा था। बोला - 'चलिये, आज घाट की सैर आपको करा दूँ।' मैंने कहा - 'इतने तड़के वहाँ कौन होगा, सर्दी से मुँह में चाय जमी जा रही है।' वह बोला - 'इसी समय तो वहाँ लोग स्नान करने जाते हैं। यही तो वहाँ चलने का समय है।'

मैं भी किसी प्रकार तैयार हुआ। परन्तु सर्दी में इसी समय चलना मुझे ऐसा जान पड़ा मानो फाँसी के तख्ते पर जा रहा हूँ। सावन की झड़ी के समान बमों की वर्षा हो रही हो, उसके बीच मैं खड़ा हो सकता हूँ, नंगे बदन नागफनी की झाड़ी में लोट सकता हूँ और पागल हाथी की सूँड़ में चिकोटी काट सकता हूँ किन्तु जाड़े में सवेरे उठना तो एक सपना है और जाड़े में नहाना तो भले आदमियों का काम ही नहीं है।

मोटर कार पर मैं चला - आगे गाइड बैठा था। काशी में देखा - सभी सवेरे ही उठते हैं। पहले तो यहाँ के मेहतर भी बहुत तड़के उठते हैं और सोचते हैं कि जब हम उठते हैं तब सड़कों को भी जगा देना चाहिये और दोनों हाथों में झाड़ू लेकर सड़कों पर ऐसा चलाते हैं जैसे क्रूसेड के युद्ध में मुसलमान सिपाही तलवार भाँजते थे।

मैंने एकाएक देखा कि मेरी मोटर कार बादलों में से चल रही है परन्तु शीघ्र ही पता चला कि यह बादल नहीं बनारस, जिसे हिन्दू लोग काशी कहते हैं और जो उनका पवित्र नगर माना जाता है यह बादल उसी पवित्र नगरी की पवित्र रज है। काशी की म्यूनिसपैलिटी इसके लिये बधाई की पात्र है क्योंकि मेरे ऐसे विदेशी व्यक्तियों को यह पवित्र मिट्टी कैसे मिलती?

घाट के किनारे पहुँचा तो कई नाववाले सामने आये और उन्होंने मुझे सलाम किया मानो मेरा-उनका दस-पन्द्रह साल पुराना परिचय हो। यद्यपि मैं हिन्दुस्तानी जानता था, फिर भी बातचीत गाइड ही करता रहा। तीन रुपये पर एक छोटी-सी नौका मिली। ऊपर के भाग पर दो कुर्सियाँ रख दी गयीं। कुर्सियाँ बेंत की बनी थीं और पीछे उसी बेंत का ही ऊँचा, लम्बा तकिया बना था। मेरी बगल में गाइड बैठा।

पूरब में सूरज निकलने लगा था। मैं अपने फौजी ओवरकोट में लिपटा हुआ था। देखा कि अनेक लोग पानी में झम्-झम् कूद रहे हैं। यदि मेरे हाथ में होता तो मैं इन्हें विक्टोरिया क्रास अवश्य देता। यह स्नान नहीं, वीरता और साहस का परिचय था। पुरुषों से अधिक स्त्रियाँ स्नान कर रही थीं। ऐसी वीर महिलायें हैं, तब न इनकी संतान बेल्जियम और फ्रांस के मैदान में अपनी छाती से गोली रोकती है।

मैंने घाटों पर इतने रंग की साड़ियाँ देखीं कि उनका वर्णन किया जाये तो एक अलग से डायरी उसी की बन जाये। गाइड प्रत्येक घाट के सम्बन्ध में कुछ न कुछ बताता जा रहा था किन्तु मैं तो घाट के नहानेवालों की ओर अधिक आकर्षित था।

एक घाट की ओर दिखाकर बताया गया कि यहाँ केवल मुसलमान स्नान करते हैं। जान पड़ता है, गंगा का जल मुसलमानों को पवित्र नहीं कर सकता, परन्तु वह गंगाजल को अपवित्र कर सकते हैं।

एक स्थान पर मुर्दे जल रहे थे। बड़ी-बड़ी लपटें निकल रही थीं। मेरी समझ में मुर्दा जला देने में एक बड़ी हानि हो जाती है। कब्र में उनका शरीर खाद का काम दे सकता है। जान पड़ता है मुसलमानों और अंग्रेजों के नेता कृषि-विज्ञान के बड़े पंडित थे, इसलिये उन्होंने अपने मुर्दे पृथ्वी के नीचे रख देने की व्यवस्था कर दी जिसमें धरती बराबर उपजाऊ बनती रहे। जिस धरती के अन्न से शरीर बना है, उसी धरती को फिर यह शरीर दे देना भी ठीक ही है।

गंगा के दूसरे तट पर विशाल बालू की बेला है। बड़ी दूर तक रेती फैली हुई है। मैंने देखा कि अनेक लोग मिट्टी का एक पात्र हाथ में लिये उधर जा रहे हैं। मैंने पूछा - 'यह लोग कहाँ जा रहे हैं?' उसने बड़ी काव्यमय भाषा में उनका वर्णन किया और बोला कि काशी का वास्तविक स्वरूप यही है। इतनी बातों से काशी जानी जाती है - संस्कृत विद्या के भंडार से, लोगों की मस्ती से, सड़क पर तीन-तीन फुट के गड्ढों से और प्रातःकाल गंगा पार के इस दृश्य से। और बातें तो सभी नगरों में मिलेंगी परन्तु यह यहाँ की विशेषता है।

आज की चहल-पहल से जान पड़ता था कि दंगे का आतंक अब नगर में नहीं रहा। आठ बजे के लगभग मैं नौका से उतरा और विश्वनाथ के मन्दिर की ओर चला। अनेक व्यक्ति चिथड़ों से सुसज्जित मेरे पीछे-पीछे चलने लगे। उनकी सब बातें तो मैं नहीं समझ सका; इतना जान गया कि वह भिखमंगे हैं। गाइड ने बताया कि इनमें प्रत्येक भिखमंगा लखपति है। इसलिये मैंने कुछ दिया नहीं; यद्यपि मेरा मन कुछ देने का अवश्य था।

काशी में भिखमंगों की भी संख्या उतनी ही है जितनी इस देश में नेताओं की।

विश्वनाथजी की गली में पैठा। मैंने समझा कि थरमापिली के दर्रे की यह नकल की गयी है। साँड़ वहाँ इतनी स्वतन्त्रता से घूम रहे थे जैसे पुरानी खाट में खटमल घूमते हैं। परन्तु खटमल छोटा जन्तु होने पर भी बड़े-बड़ों के रक्त चूस लेता है और यह इतने विशालकाय, पर देखा कि छोटे-छोटे बालक भी इनकी पीठ सहलाते चले जा रहे हैं!

फिर मैंने विश्वनाथजी का भव्य कलश देखा जो स्वर्ण से मंडित था। भारतवासी विचित्र बुद्धि के होते हैं। इतना सोना इम्पीरियल बैंक में न रखकर मन्दिर के कलश में लगा दिया! सवेरे जब सूर्य की किरण उस पर पड़ने लगी तक ऐसा मेरा मन लालच से लुभा गया कि सच कहता हूँ जी हुआ कि इसे खुरच कर ले चलूँ।

मैंने मन्दिर के भीतर देखने की इच्छा प्रकट की, किन्तु पता चला कि भीतर कोई जा नहीं सकता। हिन्दुओं ने ऐसा क्यों किया? सम्भव है, कोई षड्यंत्र इसके भीतर यह लोग रचते हों। परन्तु गाइड से पता लगा कि केवल धार्मिक भावनाओं के कारण उसमें कोई अहिन्दू नहीं जा सकता। उसके बाद एक स्थान में गाइड ले गया जहाँ मिठाइयों की दुकानें लगातार पंक्तियों में थीं।

यहाँ जान पड़ा कि काशी की मक्खियाँ और स्थानों की मक्खियों से भिन्न हैं। क्योंकि यह मिठाइयों और खाने के पदार्थों पर वह बड़ी स्वतन्त्रता से आक्रमण कर रही हैं। यदि इनसे कोई रोग उत्पन्न होने का भय होता तो लोग उन पर बैठने न देते। मेरी इच्छा हुई कि इनके कुछ अंडे विलायत भेज दूँ, कि वहाँ ऐसी ही मक्खियाँ रहें। खाने में धुएँ का भी पर्याप्त भाग रहता है। और सारी मिठाइयाँ धुएँ से इतनी स्नात हो जाती हैं कि वह जर्मप्रूफ हो जाती हैं।

हम लोगों को विशेष चेतावनी रहती है कि किसी स्थान का भोजन न किया जाये जो बैरक से बाहर हो। बाहर केवल अंग्रेजी होटलों में ही हम लोग खा-पी सकते हैं। किन्तु मेरी इच्छा कुछ भारतीय मिठाइयाँ खाने की हुई। एक दुकान पर जो और दुकानों से अधिक स्वच्छ थी, हम लोग गये और गाइड से कहा कि कुछ काशी की मिठाइयों का यदि स्वाद मिल जाये तो मैं उसकी स्मृति अपने साथ ले जाऊँगा।

 

सारनाथ की सैर

मुझे तो भारतीय मिठाइयों के नाम भी नहीं ज्ञात थे, कानपुर में कभी खाने का अवसर नहीं मिला था। मैंने सोचा फिर वहाँ खाने के लिये अवसर मिले या नहीं। गाइड से कहा कि जो दो-तीन सबसे बढ़िया मिठाइयाँ हों, उन्हें ले लीजिये।

उन्होंने एक मिठाई ली जिसका नाम उन्होंने जलेबी बताया। यह कुछ गोल-गोल मकड़ी के जाले के समान होती है और रंग सुनहला होता है। इसमें रस भरा रहता है और खाने में बहुत मीठी होती है। इसे दाँतों से दबाने और तोड़ने में बहुत अच्छा लगता है। मैं इसे इंग्लैंड भेजना चाहता था, किन्तु पता लगा कि यह केवल एक दिन तक रह सकती है, फिर खराब हो जाती है। इसे सवेरे लोग खाते हैं।

दूसरी मिठाई सफेद गेंद के समान गोल थी। कुछ-कुछ अंडे से यह मिलती-जुलती थी। ज्योंही मैंने आधा काटा, इसमें से रस की एक मीठी धारा बह निकली जो मेरी टाई पर से होती हुई कोट पर और कोट से उतरती हुई पतलून पर बह चली। पता चला कि मैंने इसके खाने में भूल की। यह कुल की कुल मुँह में रख ली जाती है और फिर दोनों होठ बन्द करके दाँतों से दबायी जाती है, तब रस कोट और पतलून को तर नहीं करता, रस सीधे गले के भीतर पहुँच जाता है। इसका नाम भी बड़ा उपयुक्त है। इसे रस का गोला कहते हैं। इसे खाने के बाद मैं दूसरी मिठाई नहीं खा सका।

वहाँ सोडा नहीं मिल सका, न लेमनेड। सुना है कि भारतवर्ष में मिठाइयाँ खाकर या भोजन करके लोग सादा पानी पीते हैं। मैंने कहा कि मैं भी यही करूँ। दुकानदार ने एक विचित्र गिलास निकाला। यह मिट्टी का बना था, छोटा, गोल और नाटा। उसमें पानी भरकर मुझे उसने दे दिया। पीने के बाद एक नौकर ने उस गिलास को फेंक दिया।

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने उससे एक मोल लेना चाहा कि इस नये प्रकार के गिलास को अपने पास रखूँ। किन्तु उसने बिना पैसे ही मुझे एक उपहारस्वरूप भेंट कर दिया। उसे मैं अब तक अपनी आलमारी में रखे हुए हूँ। इंग्लैंड ले जाऊँगा।

मिठाइयाँ यहाँ सस्ती होती हैं। दुकानदारों को मैंने कपड़े पहने नहीं देखा। केवल कमर में एक कपड़ा लपेटे रहते हैं जिसे धोती कहते हैं। इससे जान पड़ता है कि यह लोग सभ्यता की सीढ़ी के बहुत नीचे के डंडे पर हैं।

एक मिठाई की दुकान पर मैंने देखा कि एक आदमी बड़े-बड़े घुँघराले बाल रखे हुए बेलन से आटे की गोल-गोल गेंद बनाकर बेल रहा है और फिर एक कड़ाही में उसे डालता है। कड़ाही में घी खौल रहा था। वह झूम-झूमकर बेलना बेल रहा था। उसके श्यामल मुख पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं जैसे नीलाम्बर नक्षत्र में कभी-कभी तारे आकाश से टूटकर गिरते हैं वैसे ही पसीने की बूँदें नीचे गिरती थीं जो उसी आटे की गेंद में विलीन हो जाती थीं। पूछने पर पता चला कि यह दो प्रकार की होती हैं। एक का नाम पूरी है जिसका अर्थ है कि इसमें किसी प्रकार की कमी नहीं है। इसे खा लेने से फिर भूख में किसी प्रकार की कमी नहीं रह जाती। दूसरी को कचौरी कहते हैं। इसके भीतर एक तह आटे के अतिरिक्त पिसी हुई दाल की रहती है। पहले इसका नाम चकोरी था। शब्दशास्त्र के नियम के अनुसार वर्ण इधर से उधर हो जाते हैं। इसीसे चकोरी से कचोरी हो गया। चकोरी भारत में एक चिड़िया होती है जो अंगारों का भक्षण करती है। कचौरी खानेवाले भी अग्नि के समान गर्म रहते हैं, कभी ठण्डे नहीं होते। गर्मागर्म कचौरी खाने का भारत में वही आनन्द है जो यूरोप में नया उपनिवेश बनाने का।

वहाँ से मैं चला। गाइड मुझे एक ऐसी गली में ले गया जहाँ बरतन बिकते हैं। वहाँ सब दुकानदार मुझे बुलाने लगे, किन्तु मुझे कुछ मोल नहीं लेना था, केवल देखना था। इसलिये शीघ्रता से इसे समाप्त कर दिया। यह गली बहुत पतली है और इसके भीतर कोई सवारी नहीं जाती। पैदल ही चलना पड़ता है। इसमें सड़क भी नहीं है। केवल पत्थर बिछे हैं। ईसा के दो-तीन हजार वर्ष पहले की यह जान पड़ती है।

यहाँ से हमारी कार सारनाथ को चली। मैंने राह में सारनाथ का इतिहास जान लेना उचित समझा। इसलिये गाइड से पूछा कि यह सारनाथ क्या है और इसे क्यों लोग देखने जाते हैं। उसने बताया कि किसी काल में वहाँ एक नगर था। काशी के शासक बाबा विश्वनाथ के साले यहीं रहते हैं, इसलिये इसका नाम सारनाथ है। कुछ लोगों के अनुसार वहाँ महात्मा बुद्ध, एक बड़े महान व्यक्ति, आये थे, इसलिये यह विख्यात है।

मैंने पूछा - 'यह नगर कब था और क्यों खंडहर हो गया और यह बुद्ध महात्मा कौन सज्जन थे?' वह बोला - 'यह नगर कब था, इसका पता तो मुझे नहीं है क्योंकि यह बहुत पुराना है। मेरे दादा ने भी ऐसा ही इसे देखा था और वह कहते थे कि मैंने भी अपने दादा से इसके सम्बन्ध में ऐसा ही सुना है। चार-पाँच सौ साल पुराना तो यह अवश्य ही होगा। नगर खंडहर क्यों हो गया, इसका कारण इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि घोर बरसात हुई हो किसी समय। बुद्ध महात्मा एक राजा थे। यह बुध के दिन पैदा हुए थे, इसलिये इनका नाम बुद्ध पड़ गया। इनके भाई ने इनका राज छीनकर इन्हें घर से निकाल दिया। यह जंगल में बेहोश पड़े थे। इन्हें एक स्त्री ने हलवा खिला दिया और यह जी गये। तब इन्हें बड़ा दुःख हुआ और यह सारनाथ आये। वहाँ उन्होंने उचित समझा कि कोई धर्म चलाया जाये क्योंकि धर्म चलाने में बड़ा सुख और आदर है। बहुत-से चेले मिल जाते हैं और राजा लोग भी आदर करते हैं।'

इनके धर्म में विशेषता है। वह यह है कि कितनी ही लात आप खाते चलिये, कुछ किसी से कहिये मत। कोई आपको गाली दे दे तो कहिये - ठीक किया। कोई आपकी स्त्री को उठा ले जाये तो कहिये - बड़ा अच्छा किया। कोई आपको पीट दे तो कहिये - आप बड़े योग्य हैं। अब मेरी समझ में आया कि मुसलमानों ने कैसे यहाँ शासन किया होगा और किस प्रकार अंग्रेज लोग शासन कर रहे हैं। एक बात और उसने बतायी कि यह लोग मनुष्य क्या किसी जीव को नहीं मारते। मान लीजिये, यह लोग खाते रहें और थाली में कुत्ता आकर खाने लगे तो उसे हटायेंगे नहीं। सब जीवों पर दया करते हैं। यह सोये रहें और चील इनकी नाक नोच ले जाये, यह बोल नहीं सकते।

इतनी देर में हम लोग सारनाथ पहुँच गये। एक ऊँचा-सा ढूहा दिखायी पड़ा जिस पर एक टूटी-सी अठकोनी मीनार थी। उसने बताया कि हिन्दुओं के सबसे बड़े देवता रामचन्द्र थे। उनकी स्त्री सीता थीं। राम ने सीता को निकाल दिया। तब वह यहीं आकर रहती थीं और उसी में भोजन पकाया करती थीं। चावल जो वह धोकर फेंक देती थीं वह अब भी कहीं मिट्टी में दिखायी देता है। एक-एक चावल हजारों रुपयों का होता है। अमरीका के लोग यहाँ से मोल ले जाते हैं और वह जो ईंटों का बड़ा-सा स्तूप दिखायी देता है, वह भी विचित्र है। एक अहीर उसी पर गाय लेकर चढ़ जाता था और एक बरतन में दूध दुहकर ऊपर-ऊपर कूदकर दूध लिये सीता की रसोई में जाता था। वह इसलिये कि सीताजी के लिये दूध धरती से छू न जाये और प्रशंसा की बात तो यह है कि न यह दूध छलकता था, न पृथ्वी पर गिरता था।

और खंडहर देखे। उसने बताया कि यह जो खंडहर है, वहाँ जब घर थे तब उन्हें विहार कहते थे। उनमें रहनेवाले यहाँ से पूरब चले गये। उन्होंने एक प्रान्त बसा लिया जिसे 'बिहार' कहते हैं। यहाँ लोगों के न रहने के कारण यह अब खंडहर हो गये।

यहाँ कुछ साधु भी दिखायी दिये। वह पीले रंग के थे और विचित्र प्रकार का कपड़ा पहने हुए थे। चेहरे से जान पड़ता था कि इन्हें कंबल या पांडु रोग हो गया है। मैंने गाइड से पूछा कि यह सब के सब इतने अस्वस्थ क्यों हैं। उसने कहा कि यह लोग अस्वस्थ नहीं हैं। इनका रंग ही ऐसा है। यह कम खाते हैं और ऐसी वस्तुएँ खाते हैं कि रक्त की कमी रहे। यह लोग मांस कोई दे दे, तब खा लेते हैं मगर अपने हाथों नहीं मारते क्योंकि इनके धर्मप्रवर्तक की यही शिक्षा है।

वहीं एक अजायबघर था। जहाँ बहुत-सी मूर्तियाँ रखी थीं। गाइड ने बताया कि सब मूर्तियाँ यहीं से खोदकर निकाली गयी हैं। जान पड़ता है कि पुराने समय में भारतवसियों को कोई काम नहीं था, इसीलिये बैठे-बैठे दिन-भर इतनी बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ गढ़ा करते थे। मेरे विचार से जब यूनानी लोगों की सभ्यता नष्ट होने लगी तब वहाँ के मूर्तिकार भाग कर यहाँ चले आये। वहाँ भी मूर्तियाँ बहुत बनती थीं और वह लोग यहाँ आकर मूर्तियाँ गढ़ने लगे, क्योंकि अब भी मूर्तियाँ बनाना सीखने के लिये यहाँ से लोग इटली, इंग्लैंड आदि देशों में जाते हैं। तब उस काल में कैसे बना सके होंगे? मैंने पूछा - 'सीताजी यहाँ भोजन बनाती थीं, उनकी कोई मूर्ति यहाँ नहीं दिखायी देती।' गाइड ने कहा कि वह पर्दे में रहती थीं। इसलिये उनका कोई चित्र अथवा उनकी मूर्ति नहीं बन सकी और पीछे बहुत दुःख के मारे वह पृथ्वी के भीतर चली गयी। उनकी कोई मूर्ति इस देश में नहीं है।

दो बज गये। मुझे अब भूख और प्यास दोनों लग रही थीं। वहाँ न कुछ खाने का सामान था न पीने का। इसलिये मैं और कहीं आज देखने न जा सका। कार पर तुरन्त अपनी बैरक में लौट आया।

 

काशी की कारामात

अब मुझे बनारस में कुछ आवश्यक देखना रह नहीं गया था। इसलिये कलक्टर साहब से मिलकर मैंने यह जानना चाहा कि हम साथियों के साथ लौट जायें तो कोई हरज तो न होगा।

कलक्टर साहब के यहाँ जिस समय मैं पहुँचा, एक सभा हो रही थी, जिसमें अनेक लोग गत दंगे के सम्बन्ध में कुछ परामर्श कर रहे थे। मैंने कार्ड देकर उनसे मिलना चाहा। वह स्वयं बाहर चले आये और बोले कि मैंने कानपुर तार दे दिया है। अब आप लोग जा सकते हैं।

सवेरे जाना था, इसलिये मैंने सोचा कि सन्ध्या को और घूम लूँ। इस समय मैंने सोचा कि अकेले ही घूमूँ। एक ताँगा मँगवाया और चौक के लिये चल पड़ा। आज चौक में बड़ी भीड़ थी और बड़ी चहल-पहल भी थी।

मैं नगर के सम्बन्ध में कुछ जानता नहीं था। बोली समझ भी लेता था, बोल भी सकता था। अधिक अच्छी तरह घूमने के विचार से मैंने ताँगेवाले को छोड़ दिया और चौक में पैदल घूमने लगा। थोड़ी दूर गया था कि एक स्थान पर बड़ी भीड़ देखी। मैं निकट गया। मुझे देखकर लोग हटकर दूसरी ओर उसी भीड़ में जाकर खड़े हो गये। एक आदमी एक साँप लिये हुए था। उसी के कारण इतनी भीड़ थी। मुझे देखते ही एक कान्स्टेबल आकर भीड़ हटाने लगा।

मैं यहाँ से आगे चल पड़ा और जेब में हाथ डाला तो हाथ जेब के नीचे निकल आया और सिगरेट केस गायब था। किसी ने बड़ी सफाई से जेब कतर दी थी। वह बाहरी जेब थी। उसमें पैसे तो नहीं थे, किन्तु सिगरेट-क