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निबंध

अतिथि
रामविलास शर्मा


अतिथि से मेरा मतलब उन लोगों से नहीं है, जो बिना तिथि बताये आपके भोजन में शरीक होने के लिए आ जाते हैं। इस तरह का आतिथ्य अब चाय-पानी तक रह गया है; खासकर, इस महँगाई के जमाने में लोग भोजन के लिए पूछते हुए सवाल को मन में दोहरा लेते हैं। अगर आपका जजमान जिसके यहाँ आप अतिथि, यानी मान न मान मैं तेरा मेहमान बने हैं - दम साधकर घबराहट में एक ही साँस में आपसे भोजन के लिए पूछे तो आप उसके शब्दों का उत्तर उनकी ध्वनि में पढ़कर तुरंत ही नहीं दे देंगे। यदि मीठी-मीठी बातें करके वह आपसे भोजन के लिए ऐसे आग्रह करे जैसे वह आपकी बाट ही जोह रहा था और आपके बिना उसका भोजन विष-तुल्य हो जायगा, तो आप निश्चय जानिये कि उसने कोई भारी दाँव सोच रखा है। आप लेखक हों और मेहमाननवाज प्रकाशक हो तो समझ लीजिए कि दालदा की पूड़ियाँ और कद्दू की तरकारी खिलाकर वह आपसे मुफ्त लेख लिखाना चाहता है। इस काल के अतिथि-सत्कार से ब्राह्मण सावधान!

मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अतिथि से मेरा मतलब उन लोगों से नहीं है। मेरा मतलब उन लोगों से है जो 'तिथि' की बात दूर, 'घड़ी', 'पल', 'घंटा', 'पहर' का भी ध्यान न रखे हुए एकदम अयाचित आ धमकते हैं। इन सभी शब्दों में 'अ' लगाने से इनका नामकरण हो सकता है, लेकिन जब तक 'अच्छी हिंदी' के लेखक इस ओर अपना उत्तरदायित्व नहीं निबाहते, तब तक मैं उन्हें अतिथि ही कहता हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ कि शब्द पर न जाकर आप मेरा मतलब समझ लें।

आप सोचिये, चौबीस घंटों में ऐसा कौन सा घंटा या मिनट है, जब कभी-न-कभी किसी अतिथि ने आकर आपका काम न रोक दिया हो। वे लोग धन्य हैं, जिन्हें बारह से चार तक कम-से-कम रात के समय इन मेहमानों से नजात मिली हो।

कालेज का अध्यापक अगर लेखक भी हो, तो उसके लिए अतिथि की आवाज यमदूत के संदेश से कम भयावह नहीं होती। सवेरे चाय पीकर या स्वस्थ मन के हुए तो दूध-बादाम पीकर आप कॉलेज की किताबें लेकर बैठे। दस मिनट के बाद जब आपकी तन्मयता बढ़ रही थी, तभी आ गये अतिथि जी। कहेंगे - 'आप शायद काम कर रहे थे; मैं थोड़ी ही देर बैठूँगा।' अब आप यह तो कहने से रहे - 'नहीं; थोड़ी देर भी न बैठिये।' अरब के तंबू में पहले ऊँट की गर्दन आयी, फिर क्रमशः दस बज गये और आपकी उदासीनता, अँगड़ाइयाँ, इधर-उधर देखना, खामोश रहना - वह सभी कुछ व्यर्थ करते रहे। आखिर वे आपकी परेशानी का पूरा मजा लेकर उठे। आपका समय नष्ट करने के लिए खेद प्रकट किया और अंत में चलने ही लगे कि उन्हें वह असली काम याद आ गया जिसके लिए वह आये थे। आप जल्दी से निपटाने के फिराक में कमरे से बाहर निकले; लेकिन वह सीढ़ी पर एक पैर रखकर फिर जम गये। खैर; दस मिनट के बाद उन्होंने नमस्ते भी किया, लेकिन आपको घूमकर चलने का मौका न देकर उन्होंने अपना 'पुनश्च' फिर आरंभ कर दिया। यहाँ एक-एक क्षण कल्प हो रहा है, यह किसी को क्या मालूम?

भोजन के उपरांत अखबार पढ़ते-पढ़ते कहीं आप झपकी लेने लगे, तो अतिथि की आवाज ब्रह्मांड पर सोंटे की तरह ऐसे गिरती है कि स्वप्न-सत्य सब एक हो जाता है। टारपिडो लगने से जैसे जहाज का मल्लाह चौंक उठता है, वैसे ही कुछ क्षण को तो हृदय-वीणा के तार ऐसे झनझना उठते हैं जैसे उसकी तुंबी पर पत्थर पड़े हों।

सौभाग्य से नींद पूरी करके, हाथ-मुँह धोकर, प्रसन्नचित्त आप बहुत दिनों के पत्रों का जवाब लिखने बैठे, तभी यह सोचकर कि यह आपका फुर्सत का समय होगा, अतिथि जी पुनः आ पधारे। कहीं कॉलेज की छुट्टियाँ हुईं, तब तो अतिथि को छूट ही मिल जाती है। आपने बड़ी शिष्टता बरतते हुए किसी काम का जिक्र किया, तो बस वह बरस पड़े - अजी, अब भी तुम्हें काम है? अब तो छुट्टियाँ हैं, तुम्हें फुरसत ही फुरसत है। और फिर जमे तो बेहोश होकर अंगद का पैर बनकर रह गये।

रात में आप बहुत निश्चिंत होकर लेख लिखने बैठे! कुछ देर तक कागज खराब करने के बाद जब सुरूर आया, तभी आपके फालतू समय में हिस्सा बटाने के लिए पुनः अतिथि जी आ धमके। क्या करें बेचारे। दिन में आपके मिलने का ठीक नहीं रहता। रात में खुद अपने काम का नुकसान करके आपको कृतार्थ करने आये हैं। उन्हें क्या मालूम उनके कारण हिंदी का भंडार कितने रत्नों से वंचित रह जाता है। कितने ही महाग्रंथों की रचना का विचार इन महापुरुषों का ध्यान आते ही तज देना पड़ता है। कम से कम कवि होने का विचार तो छोड़ ही देना पड़ा क्योंकि इन कविता के दुश्मनों का कोई ठिकाना नहीं, कब कल्पना लोक में वनमानुष बनकर कूद न पड़ें। संपादक चिट्ठी लिखते हैं, फिर तार भेजते हैं, पत्रों का उत्तर न पानेवाले गालियाँ लिखकर भेजते हैं। समय पर भोजन-स्नान के बदले, आलोचक बनने से अभिशापस्वरूप, निठल्ले कवियों से कविता और उन्हीं के मुँह उसकी प्रशंसा सुननी पड़ती है। लेकिन इस दर्द को कोई क्या समझे?

अगर इस लेख को मैं अपने कमरे में टाँग दूँ तो क्या आप समझते हैं, उनकी स्थिरता में - अथवा जड़ता में - कोई अंतर आ जायगा? वे इस लेख की प्रशंसा करने के बहाने ही जम जायँगे और फिर तो दस-पाँच मिनट में उठनेवाले कोई और ही होंगे!


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हिंदी समय में रामविलास शर्मा की रचनाएँ