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कविता

वे जो कुँवारियाँ हैं
सेरजिओ बदिल्ला

अनुवाद - रति सक्सेना


वे कुँवारियाँ, जो हमें उल्काओं वाले आसमान के नीचे
नींद की सवारी में खलल डालती हैं

खून पीने वालों जैसी संलग्न हैं
प्रौढ़ता को बढ़ते हुए खजुराहो के मंदिर में
जब कि मैं अजीब बुखार में पसीने से भीग रहा था
वह गर्मी की रात थी और आग से भस्म
जंगल में ब्रह्मांड मिल गया था
दीवार पर चमकता पानी और मच्छर
झाड़ियों के पीछे से एक भूखे शेर की घबरा देने वाली गुरगुराहट
वे अक्षत योनियाँ, जो हमारी नींद में खलल डालती हैं
एक चक्रवाती अंधड़ रिक्त और जलहीन
बिल्कुल एक आवारा आत्मा जैसा

 


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