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कोश

वर्धा हिंदी शब्दकोश

संपादन - राम प्रकाश सक्सेना

अनुक्रम

अनुक्रम भूमिका     आगे

वर्धा हिंदी शब्दकोश
 

प्रधान संपादक
    राम प्रकाश सक्सेना

सहायक संपादक
    शोभा पालीवाल

तकनीकी सहयोग
    जगदीप सिंह दांगी
 

सन् : 2013
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
 

संपादक मंडल
    निर्मला जैन
    गंगा प्रसाद विमल
    उमाशंकर उपाध्याय
    कुसुम बाँठिया
    नरेंद्र व्यास

 

विशेष सहयोग

• अखिलेश कुमार

• अनवर अहमद सिद्दीकी

• अनामिका

• अनिल कुमार दुबे

• अनिल कुमार पांडे

• अनिल कुमार राय

• अनुपमा

• अमरेंद्र कुमार शर्मा

• अर्चना त्रिपाठी

• अविचल गौतम

• अशोक कुमार

• अशोक नाथ त्रिपाठी

• आशुतोष कुमार

• एच. ए. हुनगुंद

• करुणा उमरे

• कुणाल

• कृष्ण कुमार सिंह

• गिरीश पांडे

• गिरीश प्रमोद राव कठाणे

• चंदन सिंह

• ठाकुर दास

• त्रिभुवन नाथ शुक्ल

• देवराज

• धनजी प्रसाद

• धीरेंद्र राय

• धूपनाथ प्रसाद

• नितिन रामटेके

• नीरज भारद्वाज

• नेहा

• परिमल प्रियदर्शी

• पीतांबर ठाकवानी

• पुरंदरदास

• प्रवीण कुमार पांडेय

• प्रशांत खत्री

• प्रीति सागर

• बीर पाल सिंह यादव

• बृजेश कुमार यादव

• भरत कुमार

• मधुप्रिया पाठक

• मनोज कुमार पांडेय

• मोहिनी मुरारका

• राम शरण जोशी

• रामानुज अस्थाना

• रूपेश कुमार सिंह

• ललित कुमार शुक्ल

• विजय कुमार कौल

• वी. रा. जगन्नाथन

• शंभु गुप्त

• शशिभूषण सिंह

• शाहिद पठान

• शिल्पा

• श्रीनारायण सिंह

• संजय कुमार

• सपना तिवारी

• सलाम अमित्रा देवी

• साधना सक्सेना

• सुधीर जिंदे

• सुबच्चन पांडेय

• सुरेश शर्मा

• सूरज प्रसाद पालीवाल

• सोनू जेसवानी

• सौरभ कुमार

• हनुमान प्रसाद शुक्ल

• हरप्रीत कौर

• हिमांशु रंजन

• हिमांशु वाजपेयी


प्राक्कथन

आधुनिक अर्थों में जिसे आज हम हिंदी कहते हैं उस खड़ी बोली का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। इसलिए स्वाभाविक ही है कि इस भाषा में शब्दकोश निर्माण का पहला गंभीर प्रयास भी उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में नागरी प्रचारिणी सभा बनारस द्वारा हुआ और फिर बाद में ज्ञानमंडल बनारस और हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग जैसे सांस्थानिक तथा फादर कामिल बुल्के, हरदेव बाहरी और डॉक्टर रघुबीर जैसे व्यक्तिगत प्रयासों से अच्छे शब्दकोश बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में बनाए गए। इन शब्दकोशों को यदि ध्यान से देखें तो दो महत्वपूर्ण प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। सबसे पहले तो हमारा ध्यान शुरुआती शब्दकोशों पर ब्रजभाषा और संस्कृत के प्रभाव पर जाता है। नागरी प्रचारिणी सभा के शब्दकोश में ब्रजभाषा के शब्दों की भरमार है और उनमें से अधिकांश अब साहित्य या बोलचाल की भाषा में प्रयोग नहीं होते हैं। यह बहुत स्वाभाविक भी था क्योंकि तब तक भारतेंदु समेत बहुत से लोग यही मानते थे कि खड़ी बोली में कविता नहीं लिखी जा सकती और उसके लिए ब्रजभाषा ही सर्वथा उपयुक्त है। यही वह समय था जब देवनागरी लिपि का प्रयोग अदालतों में प्रारंभ हुआ। इसका एक दिलचस्प नतीजा यह निकला कि नागरी लिपि में लिखी खड़ी बोली हिंदुओं की हिंदी और फारसी लिपि में लिखी खड़ी बोली मुसलमानों की उर्दू बन गयी। प्रारंभिक शब्दकोशों के निर्माण में संस्कृत को लेकर विशेष आग्रह इसी कारण दिखाई देता है। खड़ी बोली से हिंदी बनने की प्रक्रिया काफ़ी हद तक समावेशी थी। इस भाषा की शब्द संपदा में संस्कृत, फारसी और अरबी के तत्सम शब्दों के अलावा बड़ी संख्या में अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका, बज्जिका, मारवाड़ी जैसी बोलियों के शब्द जुड़े। इसके बावजूद तत्कालीन समाज में बढ़ रही सांप्रदायिक चेतना के कारण बड़ी संख्या में भाषाविदों और रचनाकारों द्वारा प्रयास किया गया कि खड़ी बोली हिंदी संस्कृतनिष्ठ बने और जहाँ तक संभव हो उसमें अरबी और फारसी के शब्द कम से कम इस्तेमाल किए जाएँ। स्वाभाविक था कि ऐसी कोई भी भाषा जो जनता के प्रयोगों से दूर हो अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकती और यहाँ भी यही हुआ। छायावाद के समाप्त होते-होते और प्रगतिशील आंदोलन के मजबूत होने के फलस्वरूप साहित्य और बोलचाल की भाषा में फ़र्क धीरे-धीरे खत्म होता गया और आज सही अर्थों में एक समावेशी हिंदी प्रयोग में आने लगी है जिसमें हिंदी प्रदेशों में प्रचलित बोलियों के साथ साथ अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली, फ्रेंच और इन सब से अधिक अँग्रेज़ी के शब्दों की भरमार है। वर्धा हिंदी शब्दकोश की बुनियादी अवधारणा के पीछे यही सोच काम कर रही है कि हमारे समय की समावेशी हिंदी के अधिकतम प्रचलित शब्द इस कोश में स्थान पा सकें।

हिंदी शब्दकोशों की दूसरी सीमा एक संस्करणीय होना है। शुरुआती दौर के सभी शब्दकोश बेहद परिश्रम, लगन और निष्ठा से तैयार किए गए थे। पर सही अर्थों में बाद में किसी के भी संशोधित/परिवर्धित नए संस्करण नहीं आए, महज़ पुनरावृत्तियाँ होती गईं। इसके बरक्स हम अँग्रेज़ी का उदाहरण लें जहाँ ऑक्सफ़ोर्ड या कैंब्रिज विश्वविद्यालयों के शब्दकोश हर दो तीन साल बाद संशोधित/परिवर्धित होते रहते हैं और उनके नए संस्करण अखबारों की सुर्खी बनते हैं। हर बार हमें यह सूचना दी जाती है कि अमुक-अमुक भाषाओं के कितने नए शब्द अँग्रेज़ी भाषा के अंग बन कर इस शब्दकोश में आ गए हैं या कितने शब्द प्रचलन के बाहर हो गए हैं। वर्धा हिंदी शब्दकोश परियोजना के पीछे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की यह सोच काम कर रही है कि हिंदी में भी ऐसा शब्दकोश बने जो नियमित अंतराल पर संशोधित/परिवर्धित होता रहे और जिसका हर संस्करण अपने समय की भाषा में हो रहे परिवर्तनों को पकड़ने का नए सिरे से प्रयास करे। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए शब्दकोश परियोजना के तहत विश्वविद्यालय में एक स्थायी सचिवालय बनाने का प्रयास चल रहा है और आशा है कि शीघ्र ही यह काम करना शुरू कर देगा। हर प्रयास की अपनी सीमा होती है और हर प्रयास में ही बेहतरी की संभावनाएँ भी छिपी रहती हैं। समय की कमी ने वर्धा हिंदी शब्दकोश के पहले संस्करण को पूरी तरह से हमारी अपेक्षाओं के अनुकूल नहीं बनने दिया है, फिर भी आप पाएँगे कि यह इस समय उपलब्ध दूसरे शब्दकोशों से कई अर्थों में भिन्न और बेहतर है। अगला संस्करण अधिक वैज्ञानिक, त्रुटिहीन, उपयोगी और समावेशी बन सके - इसका हम तो प्रयास करेंगे ही पर यह तभी संभव हो सकेगा जब वृहत्तर हिंदी समाज हमें इस कोश की कमियों और सीमाओं से समय समय पर अवगत कराता रहे।

विभूति नारायण राय
कुलपति
  म. गां. अं. हि. वि. वि, वर्धा

 

 

भूमिका

विज्ञान एवं तकनीकी के इस युग में हिंदी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की वाहिनी बनने की दिशा में अग्रसर है। विश्व के देशों में हिंदी भाषा का शिक्षण औपचारिक एवं अनौपचारिक स्तर पर चल रहा है। भारत के बाहर तैंतीस देशों में हिंदी विश्वविद्यालयीन स्तर पर पढ़ाई जा रही है। हिंदी का महत्व इतना बढ़ गया है कि विभिन्न देशों के नागरिक भारत व अपनी सरकारों द्वारा प्रदत्त छात्रवृत्ति पर हिंदी पढ़ने के लिये भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में आ रहे हैं। कंप्यूटर तथा इंटरनेट के क्षेत्र में इंग्लिश के वर्चस्व को भी अपनी हिंदी चुनौती दे रही है। आज इसके बोलने वालों और पढ़ने-लिखने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। बढ़ते भारतीय बाज़ार के कारण वैश्विक धरातल पर हिंदी का महत्व एवं प्रचार-प्रसार बढ़ा है। विदेशी इस लिये भी हिंदी में अधिक रुचि ले रहे हैं कि हिंदी उन्हें इस बाज़ार में घुसपैठ के अवसर प्रदान करने में सक्षम है। हिंदी का अध्ययन करने वाले ऐसे विदेशी अध्येताओं के लिए अच्छे शब्दकोशों की बहुत अधिक आवश्यकता है।

हिंदी में कोशों की परंपरा 19वीं शताब्दी से आरंभ हो गई थी। 20वीं शताब्दी के अंत तक कई शब्दकोश बाज़ार में आ गए। कई कमियाँ होते हुए भी डॉ. कामिल बुल्के का 'अँग्रेज़ी-हिंदी कोश' अच्छा माना जाता है। संप्रति कोश विज्ञान और कोश निर्माण विज्ञान बहुत विकसित हो चुके हैं। वैज्ञानिकता की कसौटी पर हिंदी का एकाध कोश ही शत-प्रतिशत खरा उतरेगा।

भारत में मानक हिंदी के जो मौखिक रूप हैं, अब तक प्रकाशित कोश इन सबका प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते। इससे विदेशियों को हिंदी का ज्ञान होते हुए भी हिंदी का वार्तालाप समझ में नहीं आ पाता। उदाहरणस्वरूप- 'आप मेरे घर मंडे को आइए'। रूस, जापान, चीन आदि देशों में जिन्होंने हिंदी सीखी है, वे 'सोमवार' से तो परिचित हैं लेकिन 'मंडे' से नहीं। इसका निदान एक ही है। हिंदी में ऐसे शब्दकोश बनाए जाएँ जो उन शब्दों को भी समेटें, जो मौखिक रूप में तो बहुत प्रचलित हैं, पर लिखित साहित्य में बहुत ही कम इस्तेमाल होते हैं। यह शब्दकोश इस कमी को अवश्य पूरा करेगा।

अभी तक हिंदी में जितने भी शब्दकोश हैं, वे वर्णक्रम में नहीं हैं। यह कथन आश्चर्यचकित अवश्य करता है। लेकिन हिंदी समाज को यह चिंतित इसलिए नहीं करता, क्योंकि हिंदी समाज बहुत कम हिंदी शब्दकोशों का प्रयोग करता है। इंग्लिश शब्दकोश तो हर शिक्षित परिवार में मिल जाएगा, लेकिन कई हिंदी अध्यापकों के घर में भी हिंदी शब्दकोश नहीं मिलेगा। एक सर्वेक्षण से पता चला है कि कई हिंदी प्रोफ़ेसर यह बताने में असमर्थ रहे कि हिंदी का 'ज्ञान' शब्द 'ज' वर्ण में मिलेगा।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का यह स्वप्न था कि ऑक्सफ़ोर्ड या कैंब्रिज डिक्शनरी के समान हिंदी में भी कोश बने, जो हर दो साल के बाद अद्यतन होता जाए। पूर्णतया स्वस्थ न होने पर भी उनके आग्रह के कारण मैं इस कार्य में पूरी तरह मिशन के रूप में जुड़ गया। इस तरह के नए काम में समस्याएँ आना स्वाभाविक हैं। समय सीमा तथा अन्य कारणों से मैं एक आदर्श कोश तो नहीं बना सका। लेकिन यह मैं विश्वास से कह सकता हूँ कि यह कुछ मामलों में भावी कोशकारों के लिए एक मॉडल अवश्य सिद्ध होगा। साथ ही, यहाँ कुछ निर्देश भी दिए गए हैं, जो भावी कोशकारों के लिए मील का पत्थर सिद्ध होंगे। विश्वास है कि इस कोश का अगला संस्करण दोषमुक्त होगा।

मेरी व्यक्तिगत इच्छा तो यह थी कि पूरा कोश वैज्ञानिक ढंग से बनाया जाए और वर्णक्रम में हो। समय और संस्थागत सीमाओं के चलते मैं कितना सफल हो सका इसका फैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ।

अधिकतर पाठकों को हिंदी के वर्णक्रम का पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इस कारण उन्हें शब्दों को ढूँढ़ने में अकसर परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए यहाँ यह बताना समीचीन होगा कि इस शब्दकोश में वर्णों का क्रम किस प्रकार रखा गया है-

अँ अं अः अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ऑ ओ औ

क क्ष (क्+ष) ख ग घ ङ च छ ज ज्ञ (ज्+ञ) झ ञ ट ठ

ड ड़ ढ ढ़ ण त त्र (त्+र) थ द ध न प फ ब भ म य र ल व

श ष स ह

इस क्रम से यह भ्रम उत्पन्न हो सकता है कि 'क' के बाद 'क्ष' आता है। ऐसा नहीं है। 'क्ष' 'क्+ष' का संयुक्त वर्ण है। इसलिए 'क्ष' 'क' वर्ण के अंतर्गत 'क्+ष' के क्रम में ही आएगा। 'त्र' 'त्+र' का संयुक्त वर्ण है। इसलिए 'त्र' 'त' वर्ण के अंतर्गत 'त्+र' के क्रम में आएगा। 'ज्ञ' 'ज्+ञ' का संयुक्त वर्ण है। इसलिए 'ज्ञ' 'ज' वर्ण के अंतर्गत 'ज्+ञ' के क्रम में ही आएगा। संस्कृत में 'ज्ञ' 'ज्+ञ' का संयुक्त वर्ण था। आधुनिक हिंदी में 'ज्ञ' का उच्चारण [ग्+य] होता है। हम हिंदी में संस्कृत परंपरा का पालन मात्र कर रहे हैं। इसको वैज्ञानिकता के आधार पर न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है। मेरा सुझाव है कि 'ज्ञ' को अलग वर्ण मानकर 'ह' के बाद स्थान देना अधिक वैज्ञानिक होता। अगर हिंदी भाषी हिंदी को स्वतंत्र भाषा मानकर हिंदी लेखन व्यवस्था और व्याकरण की व्याख्या करें, तो हिंदी को विश्व मंच पर स्थापित करने में ज़्यादा सुविधा होगी।

एक वर्ण के साथ विशेषक चिह्नों का क्रम इस प्रकार दिया गया है :

कँ कं क: क का कि की कु कू कृ के कै कॉ को कौ क्

सभी कोशों में अनुस्वार के बाद चंद्रबिंदु है और 'आ' के बाद 'ऑ' है जबकि यूनीकोड में विशेषक चिह्नों के क्रम में चंद्रबिंदु अनुस्वार के पहले आता है और 'ऑ' 'ऐ' के बाद आता है। हमने यूनीकोड के क्रम का पालन किया है। कई शब्दकोशों में मूल शब्द के साथ ही व्युत्पादक शब्दों को दिया जाता है। इससे पाठकों, विशेषकर नए हिंदी सीखने वाले व्यक्ति को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उनकी सुविधा के लिए इस शब्दकोश में व्युत्पादक शब्दों को मूल शब्द के साथ न देकर अलग प्रविष्टियों के रूप में दिया गया है, जैसे-

अमर

अमरकंटक

अमरकोश

अमरता

अमरत्व

इंग्लिश की क्रियाएँ हिंदी में क्रिया रूप में प्रयुक्त नहीं हो सकतीं। इनको क्रिया रूप में इस्तेमाल करने के लिए इनके साथ 'करना' क्रिया जोड़नी पड़ती है, जैसे- मिक्स करना, ज्वाइन करना, जंप करना, बॉलिंग करना, शॉपिंग करना, चेकिंग करना, पैकिंग करना आदि। इसलिए हिंदी में इंग्लिश की इन क्रियाओं को संज्ञा माना गया है।

प्रविष्टियों में निम्नलिखित क्रमानुसार सूचनाएँ दी गई हैं: 1. शीर्ष शब्द 2. व्युत्पत्ति 3. व्याकरणिक कोटि 4. अर्थ। उदाहरणार्थ- आग्रह (सं.) [सं-पु.] अनुरोध; निवेदन।

उसके बाद जहाँ ज़रूरी समझा गया यह क्रम रखा गया- लाक्षणिक अर्थ, आदि तथा अंत में मुहावरा। एक से अधिक प्रकार के शब्दवर्ग होने पर एक वर्ग पूर्ण हो जाने पर पूर्ण विराम (।) का प्रयोग किया गया है, जैसे- शीर्ष शब्द (व्यु.) [व्या.] 1. [संज्ञा] अर्थ। [विशेषण] अर्थ।

एक प्रकार के एक से अधिक अर्थ सेमीकोलन (;) से अलगाए गए हैं, जैसे- वर्जन (सं.) [सं-पु.] 1. त्याग; छोड़ना 2. निषेध; मनाही।

अर्थ प्रकार (Meaning Type) अलग होने पर संख्यांकन (Numbering) किया गया है, जैसे- लोकवार्ता (सं.) [सं-स्त्री.] 1. जनश्रुति 2. बातचीत।

शब्दों के एक से अधिक अर्थ होने पर पहले सबसे अधिक प्रचलित अर्थ, फिर कम प्रचलित अर्थ का क्रम है। अथवा नए और पुराने अर्थ अलग-अलग होने पर पहले नया/आधुनिक अर्थ, फिर पुराना अर्थ दिया गया है। सभी अर्थ पूरे होने पर पूर्ण विराम (।) का प्रयोग किया गया है। आवश्यकतानुसार प्रयोग दिए गए हैं। इस शब्दकोश में प्रचलित मुहावरे ही दिए गए हैं। क्रियाओं की प्रविष्टि 'धातु+ना' के रूप में दी गई है। क्रिया के प्रेरणार्थक एवं द्वितीय प्रेरणार्थक दोनों रूपों को प्रविष्टि के रूप में रखा गया है। किंतु इन दोनों रूपों को सकर्मक क्रिया [क्रि-स.] के रूप में लिखा गया है।

कोई शब्द विभिन्न विषयों के संदर्भ में अलग-अलग अर्थ दे सकता है। इस शब्दकोश में ऐसे शब्द का अर्थ देते समय वह अर्थ जिस विषय या अनुशासन से संबंधित है, उसका उल्लेख अर्थ के पूर्व कोष्ठक () में कर दिया गया है।

उदाहरणार्थ-

पंचकर्म (सं.) [सं-पु.] 1. (न्यायशास्त्र) पाँच प्रकार के कर्म- उत्कक्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण और गमन 2. (आयुर्वेद) चिकित्सा के अंतर्गत पाँच क्रियाएँ- वमन, विरेचन, नस्य, निरूह और अनुवासन।

अधिकतर हिंदी शब्दकोशों में जाति के संदर्भ में 'निम्न' या 'नीची' शब्दों का प्रयोग किया गया है। साथ ही, उनमें स्त्री विरोधी मानसिकता भी प्रकट होती है। हमारा प्रयत्न रहा है कि ऐसा न हो पाए। साथ ही, शब्द के अर्थ की प्रामाणिकता पर भी कोई आँच न आने पाए। उसी प्रकार वैज्ञानिक अर्थों को पहले दिया गया है और प्रचलित अर्थों को बाद में। देखिए 'ग्रह' जैसे शब्दों के अर्थ।

भाषा में कुछ ऐसे शब्द होते हैं जो उच्चारण व वर्तनी की दृष्टि से समान होते हैं। लेकिन अर्थ की दृष्टि से भिन्न होते हैं, उन्हें समनामी शब्द (Homonyms) कहा जाता है। ऐसे शब्दों को देते समय व्युत्पत्ति के क्रम में हिंदी शब्द को पहले और अन्य भाषा के शब्द को बाद में 1, 2, 3 प्रविष्टि के रूप में दिया गया है, जैसे -

1. आम (हिं.)

2. आम (फ़ा.)

इंग्लिश शब्दों को हिंदी में कैसे लिखा जाए, इस संबंध में हिंदी क्षेत्र में अराजकता है। इस शब्दकोश में पहली बार इस बारे में वैज्ञानिकता बरती गई है। (क) इंग्लिश शब्दों को इंग्लिश मानक उच्चारण के निकटतम एवं हिंदी वर्तनी व्यवस्था के अनुरूप लिखा गया है। फिर भी हिंदी में बहुप्रचलित वर्तनी को यथावत रखा गया है, जैसे- 'कारपोरेशन'। (ख) वर्गीय नासिक्य व्यंजन के लिए अनुस्वार का प्रयोग किया गया है। लेकिन इंग्लिश शब्दों की वर्तनी में कुछ अपवाद हैं। यदि वर्गीय नासिक्य व्यंजन के पूर्व 'ऑ' है तो अनुस्वार लगाने पर 'चंद्रबिंदु' का भ्रम देगा। इस भ्रम को दूर करने के लिए 'ऑ' स्वर के बाद अनुस्वार न लिखकर नासिक्य व्यंजन ही लिखा गया है,

जैसे- कॉन्ट्रैक्ट, कॉम्पिटीशन। (ग) हिंदी वर्तनी व्यवस्था में 'ट्' वर्ग के पूर्व 'न्' नहीं आता। लेकिन इंग्लिश शब्दों में 'ट्' के पूर्व 'न्' का प्रयोग किया गया है, जैसे- कॉन्ट्रैक्ट।

यद्यपि इंग्लिश में डबल व्यंजन लिखा जाता है, जैसे- Happy (हैप्पी), लेकिन उच्चरित एक ही होता है। अधिकतर हिंदी भाषी अज्ञानता के कारण वर्तनी उच्चारण (Spelling pronunciation) से प्रभावित होकर हिंदी में द्वित्व व्यंजन लिखते भी हैं और उच्चरित भी करते हैं। अख़बारों और टीवी में 'हैप्पी बर्थ डे' ही मिलता है। यही कारण है कि 'वेंज़डे' के लिए 'वेडनसडे' लिखा जा रहा है। इसलिए शब्दों को यथासंभव सही उच्चारण के अनुसार लिखना हमारा उद्देश्य है। यही वजह है कि हमने इंग्लिश शब्दों को देवनागरी में लिखते समय वर्तनी उच्चारण का सहारा नहीं लिया है, बल्कि शुद्ध उच्चारण का सहारा लिया है। फिर भी इस नियम का अक्षरशः पालन नहीं हो पाया। इंग्लिश के कई शब्द हिंदी में ऐसे हैं जिनकी वर्तनी और उच्चारण रूढ़ हो चुके हैं, जो इंग्लिश उच्चारण से काफ़ी भिन्न हैं। चूँकि ऐसे शब्दों को छेड़ना ठीक नहीं है, इसलिए हिंदी में प्रचलित रूपों को ही मानक मान लिया है, जैसे- इंग्लिश में 'ग्लूकोस' है, जबकि हिंदी में 'ग्लूकोज़' मानक हो गया है। इंग्लिश 'Table' आदि में अंतिम 'ल्' आक्षरिक होता है इसलिए 'ब्' और 'ल्' के बीच कोई स्वर नहीं है। हिंदी में इसके बीच 'इ' और 'उ' स्वर डालने की परंपरा रही है, यथा- टेबुल, टेबिल। लेकिन आजकल इनके बीच 'अ' जोड़ने की परंपरा चल पड़ी है। हमने भी इसी को मानक माना है।

इंग्लिश और हिंदी में 'ए' और 'ऐ' दोनों ध्वनियाँ हैं। इंग्लिश 'ऐ' हिंदी 'ऐ' से ज़्यादा विवृत है। अज्ञानता के कारण हिंदी में इंग्लिश 'ऐ' को भी 'ए' द्वारा लिखने की प्रवृत्ति बन गई है, जैसे- 'ऐक्शन' और 'ऐक्सिडेंट' को 'एक्शन' और 'एक्सीडेंट' लिखा जाना। लेकिन हमने इसको 'ऐक्शन' या 'ऐक्सिडेंट' ही लिखा है। इसी तरह इंग्लिश में 'gh' लिखा तो जाता है लेकिन इसका उच्चारण [ग्] होता है। प्रचलन में 'घ' भले ही लिखा जाता हो लेकिन हमने 'ग' लिखा है। जैसे 'Ghost Writer' को हमने 'गोस्ट राइटर' लिखा है।

हिंदी की यह प्रवृत्ति है कि शब्दांत 'अ' (लिखित 'अ') बोला नहीं जाता, यथा- बात = [बात्]। तत्सम वर्तनी में अभी भी कुछ शब्दों में शब्दांत में 'हल' चिह्न लगाने की प्रवृत्ति है। इस शब्दकोश में एकरूपता की दृष्टि से कुछ अपवादों को छोड़कर शब्दांत हल चिह्न नहीं लगाया गया है, यथा- पश्चात (तत्सम रूप- पश्चात् )। इस शब्दकोश में प्रथम को ही प्रविष्टि के रूप में दिया गया है।

सामासिक शब्द, जैसे- किशोर न्यायालय, लक्ष्मण रेखा, कुटीर उद्योग आदि शीर्ष शब्द हैं। ऐसी स्थिति में इन्हें शीर्ष शब्द के रूप में तभी रखा गया है जब दोनों के मिलने से तीसरा अर्थ निकले या उनका एक साथ प्रयोग होता हो, जैसे- 'उच्च न्यायालय' तथा 'आदिकाल' जैसे शब्द दिए गए हैं जबकि 'भारतीय न्यायालय' तथा 'प्राचीन काल' जैसे शब्द नहीं दिए गए हैं। नए संदर्भों में कई शब्दों के अर्थ बदल गए हैं। इस शब्दकोश में नए संदर्भों के नए अर्थों को दिया गया है। सभी जाति या उपजाति सूचक शब्दों को केवल एक जाति के रूप में लिखा गया है। उच्च या निम्न जैसी भिन्नता नहीं दी गई है।

कुछ तत्सम शब्दों के उच्चारण काफ़ी बदल गए हैं, जैसे- 'चिह्न' और 'ब्रह्म'। हम लिखते तो संस्कृत की भाँति ही हैं लेकिन बोलते [चिन्ह] और [ब्रम्ह] हैं। हिंदी में ये रूप मानक तो नहीं माने गए हैं फिर भी धड़ल्ले से लिखे जा रहे हैं। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए 'चिह्न', 'ब्रह्म' को मानक वर्तनी माना है। इसलिए ये पूर्ण प्रविष्टि के रूप में दिए गए हैं। 'चिन्ह' तथा 'ब्रम्ह' को भी प्रविष्टि के रूप में इस प्रकार दिया गया है-

चिन्ह (सं.) [सं-पु.] हिंदी में उच्चारणानुसार बहुप्रचलित वर्तनी, दे. चिह्न।

ब्रम्ह (सं.) [सं-पु.] हिंदी में उच्चारणानुसार बहुप्रचलित वर्तनी, दे. ब्रह्म।

इंग्लिश शब्दों में आवश्यकतानुसार 'ऑ' वर्ण का प्रयोग किया गया है। आदिवर्णिक शब्द (Acronyms) भाषा के अंग बन गए हैं। अतः उन्हें बिना डॉट के प्रविष्टि के रूप में दिया गया है, जैसे - भाजपा, सपा, युनेस्को, नासा आदि।

बहुप्रचलित संक्षिप्त रूपों (Abbreviations) को परिशिष्ट में डॉट के साथ दिया गया है।

व्युत्पत्ति में भाषा का नाम संक्षिप्ति में दिया गया है। अगर शब्द अरबी और फ़ारसी दोनों का है तो व्युत्पत्ति अरबी ही दी गई है, क्योंकि ऐसे शब्द फ़ारसी ने अरबी से ही लिए हैं। तत्सम और तद्भव दोनों रूपों की व्युत्पत्ति संस्कृत दी गई है। यदि शब्द हिंदी के हैं तो उनकी व्युत्पत्ति नहीं दी गई है। लेकिन यदि शब्द दो भाषाओं के योग से बने हैं, जैसे- दादागिरी = दादा (हिं.) + गिरी (फ़ा.) तो ऐसे शब्दों को इस शब्दकोश में इस प्रकार दिया गया है- दादागिरी [हिं.+फ़ा.]

अन्य शब्दकोशों की तुलना में हमारे शब्दकोश में व्याकरणिक कोटि में कुछ नयापन मिलेगा। जो शब्द अभी तक हिंदी में 'अव्यय' लिखे जाते थे, उनको हमने कई विभागों में बाँट दिया है, जैसे- क्रियाविशेषण, निपात, परसर्ग, पूर्वप्रत्यय, परप्रत्यय आदि।

जब हम किसी अन्य भाषा से कोई शब्द लेते हैं तो वे दो प्रकार के होते हैं। एक वे जिनके पर्याय हमारी भाषा में पहले से ही मौजूद हैं। दूसरे वे शब्द जिनका पर्याय हिंदी में मौजूद नहीं है। दूसरे प्रकार के शब्दों में हिंदी की प्रवृत्ति यह रही है कि हम उनका लिंग वही मानने लगे जो हमारी भाषा में प्रचलित शब्द का था। उदाहरणार्थ, हमने हिंदी में 'टेबल' उधार लिया है, जबकि हिंदी में इसके लिए 'मेज़' शब्द पहले से मौजूद था। हिंदी में 'मेज़' स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होता था। इसीलिए हम 'टेबल' को भी हिंदी में स्त्रीलिंग में प्रयोग करने लगे। कुछ समय से हम इंग्लिश शब्दों को थोक के भाव से उधार लेने लगे हैं। आजकल यह एक अघोषित नियम बन गया है कि इंग्लिश के आगत शब्द यदि ईकारांत नहीं हैं तो पुल्लिंग में ही इस्तेमाल किया जाए। इस नियम के अनुसार आजकल 'टेबल' पुल्लिंग में प्रयुक्त होता है। यही स्थिति 'शर्ट' की भी है। 'शर्ट' के लिए हिंदी में 'कमीज़' शब्द था और 'कमीज़' हिंदी में स्त्रीलिंग थी और 'शर्ट' भी स्त्रीलिंग बोला जाता था। आजकल 'शर्ट' को पुल्लिंग में ही प्रयुक्त किया जाता है। लेकिन कुछ लोग 'शर्ट' को स्त्रीलिंग के रूप में भी प्रयुक्त करते हैं।

हिंदी में यदि विशेषण आकारांत नहीं हैं तो दोनों लिंगों में विशेषण समान रहता है, जैसे- सुंदर पुरुष, सुंदर स्त्री। पुरानी हिंदी में सुंदर पुरुष, सुंदरी स्त्री का प्रयोग प्रचलन में था। आजकल यह प्रयोग लुप्त हो गया है। हिंदी में कुछ शब्दों के पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में अलग-अलग रूप प्रचलित थे, जैसे-

पुल्लिंग                              स्त्रीलिंग

शिक्षक                               शिक्षिका

प्राध्यापक                            प्राध्यापिका

मंत्री                                मंत्राणी

डॉक्टर                              डॉक्टरनी

अध्यक्ष                              अध्यक्षा

संपादक                              संपादिका

आजकल दोनों के लिए पहला रूप ही चलता है।

कुछ समय पूर्व तक महिला डॉक्टर के लिए 'डॉक्टरनी' का प्रयोग होता था। आजकल दोनों के लिए 'डॉक्टर' शब्द का ही प्रयोग होता है और 'डॉक्टरनी' का प्रयोग 'डॉक्टर की पत्नी' के लिए सीमित हो गया है।

हिंदी में कुछ वर्षों पहले बहुवचन सर्वनाम (प्रथम पुरुषवाचक) 'हम' का प्रयोग स्त्रीलिंग में भी होता था, जैसे- हम जाती हैं। आजकल यह प्रयोग लुप्त हो गया है। आजकल युवावर्ग में एक नई प्रवृत्ति विकसित हो रही है कि 'आप' (स्त्रीलिंग) के साथ पुल्लिंग का प्रयोग हो रहा है, जैसे- 'आप कब आईं?' की जगह 'आप कब आए?'।

प्रविष्टि के रूप में सदैव ही शब्द का एकवचन रूप लिखा जाता है। लेकिन कुछ शब्द प्रविष्टि के रूप में तभी बहुवचन में लिखे जाते हैं जब उनका अर्थ भिन्न रूप में प्रचलित हो जाता है, जैसे- आदाब। यह 'अदब' का बहुवचन है। चूँकि 'आदाब' स्वतंत्र रूप से 'अभिवादन, नमस्कार' के अर्थ में इस्तेमाल हो रहा है और अदब 'साहित्य, कला, शिष्टता, आदर, तमीज़' के अर्थ में प्रयुक्त हो रहा है। इसलिए आदाब की नई प्रविष्टि दी गई है।

इंग्लिश से आगत शब्दों में भी इसी नियम का पालन किया गया है। प्रचलन में कुछ ऐसे शब्द भी आ गए हैं जो दोनों वचनों में प्रयोग होते हैं, जैसे- 'फ़ुट' और 'फ़ीट'। हमने 'फ़ुट' को ही प्रविष्टि में दिया है। आगत शब्दों में बहुवचन बनाने के लिए हम अपने प्रत्ययों का प्रयोग करते हैं, जैसे- 'बस' से 'बसें' बनता है, 'बसेज़' नहीं। लेकिन हिंदी में विशेषतया अख़बारों में इंग्लिश शब्दों के बहुवचन भी धड़ल्ले से प्रयुक्त हो रहे हैं, जैसे- 'क्रेडिट कार्ड्स', 'कस्टमर्स'। अख़बारों से एक उदाहरण देखिए- ''अपने वी आई पी कस्टमर्स के लिए ये कार्ड्स डिज़ाइन किए गए हैं।'' अभी तो संक्रमण काल है। यह भविष्य ही बता पाएगा की हिंदी में ऐसे रूप मान्य हो पाएँगे या नहीं।

हिंदी में कुछ शब्दों की दो-दो वर्तनियाँ प्रचलित हैं। इसका कारण यह है कि बोलचाल का रूप लिखित रूप से भिन्न हो गया है और आजकल उच्चरित रूप भी लिखा जाने लगा है। हिंदी में कुछ शब्द ऐसे हैं जहाँ दो समान महाप्राणों का इस्तेमाल हुआ है, जैसे- 'भाभी' और 'फूफा'। हिंदी में इनको 'भाबी' और 'फूपा' भी बोला जाने लगा है लेकिन मानक वर्तनी में अभी भी 'भाभी' और 'फूफा' चल रहा है। यही समस्या 'चाभी' के साथ है। 'चाभी' भी 'चाबी' लिखा जाने लगा है।

इंग्लिश उच्चारण [केअर] है। लेकिन हिंदी की वर्तनी व्यवस्था के अनुसार 'ए' के बाद का 'अ', 'य' लिखा जाता है, जैसे- शेयर, मेयर आदि। कुछ हिंदी शब्दों में 'र' और 'ड़' का अंतर पाया जाता है, जैसे- घबड़ाना : घबराना, रबर : रबड़, पूरी : पूड़ी, कंकड़ : कंकर। दो वर्तनियों के अन्य उदाहरण ये हैं- निबौरी : निबोली, सँभालना : सम्हालना। हिंदी में पारंपरिक वर्तनी में 'त्यौहार' लिखा जा रहा है जबकि इसका उच्चारण [त्योहार] हो गया है। इसी प्रकार 'न्यौता, न्योता' जैसे शब्दों के दोनों रूप चल रहे हैं।

अध्येताओं की सुविधा के लिए कोशकारों का कर्तव्य है कि वे किसी शब्द के एक रूप को मानक रूप चुने और दूसरे शब्द के अर्थ में 'देखें' लिख दें। वैसे यह काम केंद्रीय हिंदी निदेशालय जैसी संस्था ही कर सकती है। यह निर्णय आवृत्ति के आधार पर लिया जा सकता है। हमारे पास यह सुविधा नहीं है, इसलिए हमारा चयन यादृच्छिक है।

हिंदी में इस कथन (हिंदी में जैसा लिखा जाता है, वैसा पढ़ा जाता है) का इतना प्रचार हो चुका है कि लोग इसको ही सच मानने लगे हैं। ऐसा शत-प्रतिशत सही नहीं है। यह हिंदी भाषियों के लिए भले ही कोई समस्या नहीं है, लेकिन विदेशियों के लिए बहुत बड़ी समस्या है। उपर्युक्त कथन के कारण अधिकतर हिंदी कोशों में न तो शब्दों का उच्चारण लिखा जाता है और न ही उच्चारण के संकेत दिए जाते हैं। विदेशी प्रयोक्ता की सुविधा के लिए यहाँ उच्चारण के कुछ नियम दिए जा रहे हैं।

लिखित अंतिम 'अ' का उच्चारण तभी होता है जब अंत में दो व्यंजन हों, जैसे- कर्म, कष्ट आदि। अधिकतर स्थितियों में अक्षरांत 'अ' अनुच्चरित रहता है। संस्कृत में अक्षरांत में 'अ' उच्चरित होता है। यदि संस्कृत के किसी शब्द में अंत में अ न बोला जाए तो 'हल' चिह्न लगाना ज़रूरी है, जैसे- पश्चात्। हिंदी वर्तनी व्यवस्था में इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप 'हल' चिह्न लगाएँ या नहीं, जैसे- 'पश्चात्-पश्चात'। उच्चारण में दोनों ही समान रूप में व्यंजनांत बोले जाते हैं। इसी दृष्टि से इस कोश में शब्दांत में 'हल' चिह्न नहीं लगाया गया है।

'ह' के पूर्व 'अ' का उच्चारण ह्रस्व 'ऐ' हो जाता है, जैसे- 'कहना'। हिंदी में ह्रस्व 'ऐ' लिखने की कोई व्यवस्था नहीं है। 'य' और 'व' के पूर्व का व्यंजन उच्चारण में द्वित्व हो जाता है, जैसे- विन्यास [विन्-न्यास], विश्वास [विश्-श्वास]। 'संवाद' जैसे शब्दों में 'व' के पूर्व अनुस्वार का उच्चारण दंत्योष्ठ्य [म्] होता है जो हिंदी में नहीं लिखा जा सकता। यदि पूर्वप्रत्यय के बाद शब्द आए तो बाद का शब्द अपने ढंग से उच्चारित होता है, जैसे - 'बेलगाम' का उच्चारण बे-लगाम है, न कि बेल-गाम।

हिंदी मे शब्दांत अनुस्वार म् बोला जाता है, जैसे- अहं, स्वयं। अन्य स्थानों पर अनुस्वार का उच्चारण इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पूर्व कौन-सा व्यंजन है। इसलिए उसे वर्गीय नासिक्य व्यंजन कहा जाता है। विसर्ग का उच्चारण [ह] की तरह होता है।

'ऐ' के तीन उच्चारण हैं। पहले प्रकार का उच्चारण 'है' आदि शब्दों में मूल स्वर की तरह होता है। दूसरे प्रकार का उच्चारण संध्यक्षर के रूप में [अइ] होता है जब यह 'य' के पूर्व आता है, जैसे- भैया, नैया तैयार, सैयद आदि। तीसरा उच्चारण [अय्] होता है जो अकसर तत्सम शब्दों में आता है, जैसे- ऐतिहासिक।

'औ' के भी तीन उच्चारण हैं। पहले प्रकार का उच्चारण 'और' आदि शब्दों में मूल स्वर की तरह होता है। दूसरे प्रकार का उच्चारण कौवा/कौआ आदि शब्दों में संध्यक्षर की तरह [अउ] होता है। तीसरा उच्चारण [अव्] है, जो प्रायः तत्सम शब्दों में आता है, जैसे- गौरव, सौरभ आदि।

बहन/बहिन शब्द में 'ह' के पूर्व 'अ' का उच्चारण [ह्रस्व 'ऐ'] है और 'ह' के बाद 'अ' का उच्चारण [ह्रस्व 'ए'] है।

हिंदी में 'लुहार' और 'लोहार' दोनों रूप चल रहे हैं। लेकिन उच्चारण में [ह्रस्व 'ओ'] बोला जाता है जो कि देवनागरी में नहीं लिखा जा सकता।

अंत में, इस कोश के जो प्रेरणास्रोत रहे हैं, जिनके तगादों की मार ने इस प्रथम प्रयास को अंजाम तक पहुँचाया, ऐसे कुलपति श्री विभूति नारायण राय के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। अपनी पत्नी-सह-प्रेमिका डॉ. साधना सक्सेना का अहसान तो मैं आजीवन नहीं भूल सकता, जिन्होंने अपनी गंभीर बीमारी के दौरान भी कोश कार्य में मेरी सक्रिय मदद की।

रामप्रकाश सक्सेना
प्रधान संपादक



संकेत सूची

व्युत्पत्ति संबंधी

(अ.) अरबी

(इं.) इंग्लिश

(इता.) इतालियन

(इब.) इबरानी

(गु.) गुजराती

(ग्री.) ग्रीक

(ची.) चीनी

(ज.) जर्मन

(जा.) जापानी

(त.) तमिष (तमिल)

(तु.) तुर्की

(प.) पश्तो

(पं.) पंजाबी

(पु.) पुर्तगाली

(फ़ा.) फ़ारसी

(फ़्रें.) फ़्रेंच

(बं.) बंगला (बंगाली)

(ब.) बर्मी

(म.) मलयालम

(रू.) रूसी

(लै.) लैटिन

(सं.) संस्कृत

(स्वे.) स्वेडिश

 

संयुक्त रूप

(सं.+फ़ा.) संस्कृत + फ़ारसी

(सं.+अ.) संस्कृत + अरबी

(हिं.+तु.) हिंदी + तुर्की

(हिं.+फ़ा.) हिंदी + फ़ारसी

(हिं.+इं.) हिंदी + इंग्लिश

(इं.+हिं.) इंग्लिश + हिंदी

(इं.+फ़ा.) इंग्लिश + फ़ारसी

(इं.+सं.) इंग्लिश + संस्कृत

(तु.+सं.) तुर्की + संस्कृत

(तु.+हिं.) तुर्की + हिंदी

(तु.+फ़ा.) तुर्की + फ़ारसी

(पु.+हिं.) पुर्तगाली + हिंदी

(पु.+फ़ा.) पुर्तगाली + फ़ारसी

(पु.+सं.) पुर्तगाली + संस्कृत

(फ़ा.+सं.) फ़ारसी + संस्कृत

(फ़ा.+हिं.) फ़ारसी + हिंदी

(अ.+फ़ा.) अरबी + फ़ारसी

 

शाब्दिक कोटि संबंधी

[सं-पु.] संज्ञा पुल्लिंग

[सं-स्त्री.] संज्ञा स्त्रीलिंग

[सर्व.] सर्वनाम

[वि.] विशेषण

[क्रि-स.] क्रिया सकर्मक

[क्रि-अ.] क्रिया अकर्मक

[अव्य.] अव्यय

[क्रि.वि.] क्रिया विशेषण

[पूर्वप्रत्य.] पूर्वप्रत्यय

[परप्रत्य.] परप्रत्यय

[क्रि-सहा.] क्रिया सहायक

[मु.] मुहावरा

[यो.] योजक

[नि.] निपात

[पर.] परसर्ग

[लोको.] लोकोक्ति

 

अर्थ संबंधी

{अ-अ.} अप्रचलित अर्थ

{अशि.} अशिष्ट अर्थ

{ला-अ.} लाक्षणिक अर्थ

{व्यं-अ.} व्यंग्यात्मक अर्थ

{शा-अ.} शाब्दिक अर्थ


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