डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कहानी

अपने आँगन से दूर
ख़दीजा मस्तूर

अनुवाद - शम्भु यादव


लाहौर आकर तीन-चार दिन मामू के साथ उनकी सरकारी कोठे में गुजारने पडे . वह भी इस तरह कि आलिया सारा दिन एक छोटे-से कमरे में बन्द पड़ी रहती। वह हर वंक्त यह सोचती रहती कि इस उदास माहौल में किस तरह जिन्दगी गुजारेगी। हाँ, अम्मा बहुत खुश थी। भाई और अँग्रेंज भावज के साथ रहने की बड़ी पुरानी इच्छा अब पूरी हुई थी। उन्होंने जिन्दगी भर साथ रहने के प्रोग्राम बना लिए थे, और आलिया से नारांज थीं कि वह सबसे अलग-अलग पड़ी रहती है। और कुछ नहीं तो अपनी भाभी से फर-फर अँग्रेंजी बोलने का अभ्यास ही कर ले मगर उसने तो इन चार दिनों में सिर्फ बड़ी चाची और बड़े चाचा को कई-कई संफों खत लिखे थे।

पाँचवें दिन मामू ने एक छोटी-सी कोठी का ताला तुड़वा कर अम्मा को उनके घर जाने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने अम्मा को चलते-चलते समझाया कि अँग्रेंज औरतें अपनी माँ के साथ भी रहना पसन्द नहीं करतीं।

अम्मा ने आलिया से ये बातें छुपानी चाहीं मगर जब वह अपने नए घर जा रही थी तो मामी ने टूटी-फूटी उर्दू में समझा ही दिया कि सबका अलग-अलग रहना ठीक होता है।

कोठी में एक-एक चीज अपनी जगह पर मौजूद थी। खाने की मेज पर बर्तन करीने से लगे हुए थे और बर्तनों की नक्काशी को धूल ने छुपा दिया था। ऐसा महसूस होता था कि बस अभी पर्दे के पीछे से निकलकर कोई आएगा और खाने के लिए बैठ जाएगा। बावर्चीखाने में पीतल के बर्तन अलमारी में लगे थे और कुछ बर्तन फर्श पर लुढक़े पड़े थे। और ड्राइंगरूम के कालीन और सोफे सब पर धूल विराजमान थी और गुलदान में लगे हुए फूल झड़कर मेंज पर बिखरे हुए थे। सिर्फ काली-काली सूखी शांखें अब तक गुलदान में ठुँसी हुई थीं। सोने के कमरे में बिस्तरों पर पलंगपोश बिछे हुए थे और सिरहाने तिपाई पर रखा हुआ लैम्प औंधा पड़ा था। इस कमरे के साथ छोटे-से कमरे में आतिशदान पर कृष्ण महाराज की मूर्ति रखी थी। माला के फूल झड़कर आसपास बिखरे पड़े थे और गले में सिर्फ पीला डोरा लटका रह गया था।

''भई, इसे तो यहाँ से हटाओ। बाहर बच्चों को दे दो, खेलेंगे।'' जब से अम्मा यहाँ आयी थीं, उन्होंने कई बार कहा था।

आलिया ने अम्मा को कोई जवाब नहीं दिया। मूर्ति कई दिन तक यों ही रखी रही। फिर जब इस कमरे को इस्तेमाल किये बगैर अम्मा का गुजारा नामुमकिन हो गया तो आलिया ने मूर्ति को अपने बकसे में छुपा दिया।

दिन बड़ी बोरियत से गुजर रहे थे। बैठे-बैठे उकता गयी थी। उसके खतों के जवाब भी न आते थे।

शामें बड़ी मुश्किल से कटतीं। सहायता-कमेटियाँ घर-घर चक्कर लगाती फिरतीं। अपने शरणार्थी भाइयों की मदद करो। काफिले आ रहे हैं, मदद करो और अम्मा बड़ी दीन बनकर बतातीं कि हम तो ख़ुद शरणार्थी हैं। लोग चले जाते मगर आलिया का जी चाहता अम्मा की आँखों में धूल झोंककर सब कुछ उन्हें दे दे।

मामू और उनकी बेगम कभी-कभी शाम को आ निकलते तो आलिया की समझ में न आता कि वह कौन-से चुहिया के बिल में जा छुपे। अम्मा बौखला जातीं और उनकी समझ में न आता कि अपनी भाभी को किसके सर-आँखों पर बिठा दें।

चन्द दिन तक खामोश बैठे रहने के बाद उसने एक हाई स्कूल में नौकरी की अर्जी दे दी, जो जल्दी ही मंजूर हो गयी और नौकरी ने उसे बहुत-सी परेशानियों और दुखों से बचा लिया।

एक दिन मामू अकेले आये तो उन्होंने बताया कि कोठी अम्मा के नाम एलाट करा दी है। अब उसे किसी भी सूरत में छोड़ना नहीं। फिर उन्होंने फर्नीचर बगैरा की कुछ रसीदें दीं कि अगर कोई पूछे तो ये दिखा देना कि हमने यहाँ आकर सब कुछ खरीदा है।

अम्मा अपने भाई के कारनामों पर खुश होती रहीं, ''भाई हो तो ऐसा हो। मेरे आराम के लिए उसने क्या नहीं किया!''

आलिया चुपचाप सब कुछ सुनती रही। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है, किसी का हक कौन उड़ाए लिये जा रहा है, ये रसीदें कहाँ से आ गयीं? यह कोठी उसकी किस तरह हो गयी? मगर आलिया यह सब कुछ किससे पूछती? अम्मा सिर्फ अम्मा थीं, उसकी तनंख्वाह मिलने और कोठी की मालिक बनने के बाद पहले की ही तरह गर्वीली और आत्मतुष्ट।

वंक्त घिसट-खिसटकर गुजर रहा था। स्कूल से आकर वह परेशान फिरा करती। आसपास की कोठियों में भी किसी से मिलना-जुलना न था। जाने कहाँ से लोग आकर बस रहे थे।

अम्मा को इतनी फुर्सत ही न मिलती कि इसकी तरफ भी देख लेतीं। सारा दिन कोठी की देखभाल में गुंजर जाता। दस रुपये महीने पर रखी हुई बाई अगर किसी चींज को जरा जोर से रख देती तो अम्मा का कलेजा दुख जाता, ''ये इतनी-इतनी महँगी चींजें खरीदी हैं और तुम आपे में नहीं रहतीं। जरा होश से काम लिया करो!''

बहुत दिन नहीं गुजरे थे कि मामू करांची तब्दील हो गये। जब वह विदा हो रहे थे तो अम्मा का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। उनकी भाभी इस बेकरारी को देखकर मुसकराती हैं, ''हमारा टो बचा लोग बी बहोट डूर-डूर चला जाटा है मगर कोई नहीं रोटा।''

आलिया को उनके चले जाने का न सदमा हुआ, न खुशी। चले गये तो चले गये। उसका उन लोगों से वास्ता ही क्या था ? यहाँ आने के बाद मामू ने कई बार कहा भी था कि आलिया अपने बाप की तरह दिल से उन्हें नापसन्द करती है।

वह यह सब सुनकर हँस दी थी। उस वक्त उसे अब्बा कितनी शिद्दत से याद आते थे! मगर अब तो वह उनकी कब्र तक को दूसरे मुल्क में छोड़ आयी थी। वहाँ से नाता टूट गया था। किसी ने उसके खत का जवाब तक न दिया था।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में ख़दीजा मस्तूर की रचनाएँ