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आलोचना

आधुनिक हिंदी कविता : युगीन संदर्भ
अरुण होता

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मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964 ई.) ने खड़ीबोली की उँगली पकड़कर उसे चलना सिखाया, बड़ा किया और काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' में जिस खड़ी बोली के स्वरूप को निश्चित करने का प्रयास किया था, उसे मैथिलीशरण ने जन-मन में विराजमान कराने का स्तुत्य प्रयत्न किया। अपने काव्यों में खड़ी बोली को परिनिष्ठित रूप प्रदान किया। हिंदी काव्य-जगत में लंबी अवधि से चली आ रही काव्य-भाषा संबंधी ऊहापोह को समाप्त किया। भारत-भारती, स्वदेश-संगीत, वैतालिक, किसान, अजित हिंदू, पत्रावली, राजा-प्रजा, झंकार, मंगलघट, नहुष, शकुंतला, तिलोत्तमा, चंद्रहास, पंचवटी, साकेत, जयद्रथ-वध, त्रिपथगा, वकसंहार, वन-वैभव, सैरंध्री, द्वापर, जयभारत, यशोधरा, कुणाल, अनघ, सिद्धराज, विष्णुप्रिया, काबा और कर्बला, गुरुकुल, रंग में भंग, विकट भट, अर्जन और विसर्जन काव्य ग्रंथों से यह सिद्ध हो गया कि काव्य की भाषा होने में खड़ी बोली में तमाम सामर्थ्य मौजूद हैं। खड़ी बोली को काव्योपम भाषा सिद्ध करने में मैथिलीशरण की महती भूमिका रही है।

मैथिलीशरण गुप्त महावीर द्विवेदी की 'निर्मिति' थे। इसे गुप्तजी ने मुक्तकंठ से स्वीकार भी किया है -

'करते तुलसीदास भी, जैसे मानस-नाद?-
महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं प्रसाद।'

सन 1905 में 'सरस्वती' में गुप्तजी की पहली कविता 'हेमंत' प्रकाशित हुई। इसके पश्चात कवि के तीस से अधिक काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए। परंतु उनकी कीर्ति के आधारस्तंभ ग्रंथ भारत भारती, जयद्रथ वध, पंचवटी, द्वापर, यशोधरा, साकेत आदि हैं। इन ग्रंथों ने गुप्तजी को हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्र में सर्वप्रिय बनाया। भक्तिकालीन कवि तुलसी की तरह गुप्तजी को महत्व मिला। निराला ने गुप्तजी को 'सुकवि' कहा है तो दिनकर ने 'पुनरुत्थान के कवि' और प्रभाकर श्रोत्रिय ने 'नव शास्त्रीय अथवा नव आभिजात्यवादी युग' के कवि के रूप में जानना चाहा है। हालाँकि कुछ आलोचक उन्हें हिंदू राष्ट्रवाद के गायक कवि, 'नेहरू-युग के सरकारी कवि गुप्त', 'अभिधा का कवि' कहकर गुप्तजी की महानता को कमतर आँकने का प्रयास करते हैं।

गुप्तजी का सृजनकाल एक लंबी अवधि का युग रहा है - सन 1905 से 1960 ई. तक। इस लंबी अवधि में राजनीतिक क्षेत्र में अनेक बदलाव आए। सामाजिक जगत में तमाम परिवर्तन हुए। इन परिवर्तनों की प्रतिक्रिया काव्य में भी हुई। बंधन की पीड़ा, मुक्ति के लिए लंबा संघर्ष, स्वतंत्रता प्राप्ति, स्वप्न भंग, निराशा की हार्दिक अनुभूतियाँ काव्य जगत में व्यक्त होती रहीं। विसंगतियाँ उत्पन्न हुईं। जन-जीवन में असंतोष व्याप्त रहा - आंतरिक और बाह्य रूपों में। जिस आजादी की उद्दाम कामना की गई थी उसने युग को अभिशप्त बना दिया। स्वतंत्रता की प्राप्ति के पूर्व तथा पश्चात की स्थिति में कोई अंतर नहीं आया। बस जॉन की जगह गोविंद आ गया।

गुप्तजी की रचना-प्रक्रिया के युग में छायावाद, प्रगतिवाद, नई कविता जैसे काव्य आंदोलनों ने रचनाकारों को प्रभावित किया। आदर्शवाद, गांधीवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद आदि विचारधाराओं ने रचनाकारों को आकृष्ट किया। पर गुप्तजी अपने विचारों से हटे नहीं। नए विचारों एवं परिवर्तनों से वे सदा असंपृक्त रहे। परंतु ऐसा न समझा जाए कि गुप्तजी इन साहित्यिक एवं सामाजिक परिवर्तनों से अनभिज्ञ थे। वे अपने चुने हुए मार्ग पर अचल रहे। यदा-कदा समकालीन विचारधारा से संबंधित रचनाएँ मिल जाती हैं परंतु अपनी आस्थाओं और निष्ठाओं को सँजोए रखने में उन्होंने कोई कसर नहीं होने दी।

गुप्तजी ने अपनी कविताओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति और विश्वास को नव प्रकाश से मंडित किया। अंधविश्वास के बहिष्कार हेतु आग्रह किया। पारस्परिक कलह को त्यागकर उससे पीड़ित स्वदेश को एकता का संदेश दिया। देशभक्ति की भावना को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। 'जयद्रथ वध' शीर्षक काव्य इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। एतद्पूर्व रचे गए 'शकुंतला', 'तिलोत्तमा' आदि में पुनरावृत्ति अवश्य है। परंतु प्राचीन कथानक पर विरचित परवर्ती काव्यों - 'साकेत', 'यशोधरा' आदि में नवीनता का सुंदर समन्वय करने में गुप्तजी को अभूतपूर्व सफलता मिली है। भारतीय संस्कृति ने प्राचीन आदर्शों और आधुनिक कालीन नवीन विचारधाराओं के बीच सुंदर सामंजस्य 'साकेत' महाकाव्य में परिलक्षित होता है। भारत के दिव्य तथा भव्य अतीत गौरव के पुजारी गुप्तजी ने भारतीयों के मन में जमी निराशा को दूर करना चाहा। इसलिए अपने ग्रंथों में प्राचीन आदर्शों को आधुनिक विचारों से संपन्न किया। 'साकेत' में वे अपने कवि-कर्तव्य को भूल नहीं सके हैं। उन्होंने युग के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए युगीन भावनाओं को अभिव्यक्त किया है।

प्राचीन भारत के साथ राजतंत्र का अभिन्न संबंध रहा है। कवि का राजनीतिक शासन व्यवस्था के प्रति समर्थन मिलता है 'पंचवटी' में। परंतु 'साकेत' तक आते-आते गुप्तजी ने राजतंत्र की स्वैराचारिता का विरोध किया है तथा प्रजातंत्र का समर्थन करते हुए कहा है -

'राजा हम ने राम। तुम्हीं को है चुना
करो न तुम यों हाय। लोकमत अनसुना
जाओ, यदि जा सको रौंद हम को यहाँ
यों कह पथ में लेट गए बहुजन वहाँ ।' (साकेत, पृ. 89)

शासक लोकमत की उपेक्षा नहीं कर सकता। उसे निर्वाचित करने वाली जनता की इच्छा को पूरा करना उसका दायित्व बनता है। बहुजन की भावना का सम्मान करना शासक का कर्तव्य है। पौराणिक कथा का चित्रण इस रूप में प्रस्तुत है कि कवि का युगबोध साकार हो उठा है गांधी जी का सविनय अवज्ञा आंदोलन - 'माना यह कह रहा हो जाओ, यदि जा सको रौंद हम को यहाँ।'

स्पष्ट है कि कवि ने प्राचीन को प्रेरणादायिनी शक्ति के रूप में स्वीकार किया है। उसे नए युग के अनुरूप बनाने का प्रयास किया है। इस प्रयास में उन्होंने मानव मूल्यों की पुनर्स्थापना को लक्ष्य बनाया। अतीत और वर्तमान का सुभग समन्वय स्थापित करना चाहा। कवि ने देखा कि अपने समय में मानव मूल्यों का क्षरण हो रहा है। स्वार्थ-लिप्सा के भँवर में मनुष्य फँसता जा रहा है। सूक्ष्मता, मानवीयता, दया, प्रेम, करुणा आदि गुण इतिहास के पन्नों में ही शोभा पाने लगते हैं तो कवि प्राण व्यथित हो ऐसी प्रतिकूल स्थिति पर विचार करने के लिए आग्रह करता है -

'हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी?
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।' (भारत-भारती)

भारतेंदु ने आग्रह किया था 'आवहु सब मिलि रोवहु भारत भाई।' परंतु अब रोने मात्र से समस्या का समाधान संभव नहीं था। रोने के बाद सँभलना है और शांत मस्तिष्क से समस्याओं पर विचार करना आवश्यक है। क्या हो गए हैं वर्तमान है तो उससे भी युगद्रष्टा की बड़ी चिंता है क्या होंगे। भारत-भारती के प्रणेता की आशंकाएँ आज के लिए भी कितनी प्रासंगिक हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं से संपन्न आज का व्यक्ति केवल व्यक्ति बनकर ही रह गया है। वह मनुष्य नहीं बन पाया है। उसे मनुष्य बनने की कोई इच्छा भी नहीं है। गुप्तजी की यही दूरदर्शिता थी। इसलिए उन्होंने अतीत से प्रेरणा लेते हुए वर्तमान समस्याओं पर चिंतन-मनन करते हुए भविष्य को सुखद-सुंदर बनाने का आह्वान स्वर सुनाया है। यह स्वर धीमा नहीं है, बल्कि प्रबल आस्था का सूचक है। तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उस स्वर में धीमापन न आना कवि के दृढ़-संकल्प का परिचायक है। यहाँ गुप्त जी अपने समकालीन रचनाकारों से अनन्य सिद्ध होते हैं। गिरकर भी सँभलना और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ फिर से सुखद अतीत को वर्तमान में अवतरित करना कवि गुप्त की काव्य-संवेदना में उभर कर आता है। तभी तो उनके 'जय भारत' में नहुष की उद्घोषणा सुनाई पड़ती है - 'फिर उठूँगा और बढ़कर रहूँगा मैं, नर हूँ, पुरुष हूँ, चढ़ता रहूँगा मैं।' गुप्त जी की इस दृढ़ आस्था ने राम के बहाने मानव की ईश्वरता को चित्रित किया है। 'साकेत' की कथा तो परंपरानुसार है। उसकी घटनाएँ भी मूलकथा के आधार पर चलती हैं परंतु कवि की व्याख्या युगानुकूल है। कवि की दृष्टि में नवीनता आई। उन्होंने युगीन माँग के अनुरूप राम का चित्रण किया। साम्राज्यवादी शक्ति की दासता से मुक्ति प्रदान करने के लिए किसी भगवान से बढ़कर युग-पुरुष की आवश्यकता थी। परम नैष्ठिक वैष्णव होते हुए भी गुप्तजी ने युग-पुरुष राम के मुँह से कहलवाया है -

'सुख-शांति हेतु मैं क्रांति मचाने आया
विश्वासी का विश्वास बचाने आया।
मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं
जो विवश, विफल, बलहीन, दीन, शापित हैं।' ( साकेत, अष्टम सर्ग)

युग-पुरुष का यहाँ आगमन हुआ है न कि आविर्भाव। स्वयं दुख-कष्ट झेलकर लोगों को सुख पहुँचाने तथा 'मनुष्यत्व का नाट्य खेलने' आगमन हुआ है। लाचार, विवश, निर्बल, दीन-हीन, असहायों के लिए युग-पुरुष के रूप में राम को चित्रित किया गया है। वह निर्माता है न कि विध्वंसक। वह जोड़ने में विश्वास करता है न कि तोड़ने में या बाँटने में। स्वर्ग और कहीं नहीं बल्कि इस धराधाम में मौजूद है, इसलिए कवि का कथन है -

'नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया'

गुप्तजी के इस विचार को आगे चलकर दिनकर जी ने स्वर्ग को नकारा है और पृथ्वी को सर्वसंपन्न बताया है -

'ऊपर सब कुछ शून्य शून्य है
कुछ भी नहीं गगन में
धर्मराज, जो कुछ है वह
इस मिट्टी में जीवन में।' (कुरुक्षेत्र, छठा सर्ग)

गुप्तजी की रचनाओं में उनके भीतर के 'स्व' से अधिक युग को महत्व दिया गया है। समय का प्रभाव कहीं इतना गहरा था कि उससे मुख मोड़ना किसी भी जागरूक कलाकार के लिए असंभव था। पुनः जब सारे देश में स्वतंत्रता के मुक्त आकाश में श्वास लेने की बात चल रही हो। ऐसी स्थिति में उस देश का कवि जो युग और समाज का स्रष्टा होता है, यदि परिस्थितियों से मुख मोड़कर प्रेम और विरह के गाने गाए - तो वह अशोभन ही नहीं, समाज और साहित्य के लिए अभिशाप है। कोई भी साहित्य समाज की उपेक्षा करके नहीं जी सकता।'1

कवि गुप्तजी ने समाज और राष्ट्र की कभी उपेक्षा नहीं की। उनके समय में एक ओर बाबू राजेंद्र प्रसाद जी का नारा था कि परतंत्र भारत में राजद्रोह पाप नहीं, पुण्य-कार्य होता है। इसे कवि ने मिथकीय कथा के सहारे प्रस्तुति करते हुए कहा है -

'वह प्रलोभन हो किसी के हेतु
तो उचित है क्रांति का ही केतु।
दूर हो ममता, विषमता, मोह
आज मेरा धर्म राजद्रोह।'

यह प्रसंग है भरत के ननिहाल से वापस आने का और कथन है शत्रुघ्न का परंतु गुप्तजी ने उसे समयोचित प्रस्तुत किया है।

गुप्त जी राष्ट्र कवि के रूप में तो ख्यात हैं परंतु वे जातीय कवि भी हैं। हिंदी जाति के सबसे बड़े आख्याता हैं। समूची हिंदी भाषी जनता की मनोवृत्ति के ज्ञाता कवि ने किसानी सभ्यता का सुदंर चित्र अंकित किया है। कृषक ही सच्चा राज्य करते हैं। वे राज्य के लिए अन्न उत्पन्न करते हैं। अन्न ही जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इस दृष्टि से किसान ही सबसे अधिक धनी कहलाने योग्य हैं। राजा अपनी पत्नियों का सच्चा प्रेम पाने में असमर्थ होते हैं। परंतु किसानों में सच्चा दांपत्य भाव होता है। वे अपनी पत्नियों के साथ आनंदपूर्वक अपने खेतों पर घूमते रहते हैं। संसार को ऐश्वर्य मंडित करते हैं। परंतु शासक वर्ग को वृथा दंभ होता है कि वे राजा हैं। राज्य के लिए आपस में संघर्ष एवं युद्ध करते रहते हैं। राज्य को ही सर्वस्व समझ लेते हैं। उचित-अनुचित पर ध्यान नहीं देते। उर्मिला कहती है - 'हम राज्य लिए मरते हैं।' (साकेत, नवम सर्ग)

किसानों के कवि गुप्तजी ने राजाओं की तुलना में किसानों को ही सर्वाधिक महत्व प्रदान किया है। किसान धनी हैं, दानी भी हैं। उनमें इतने गुण होते हैं कि यदि वे अपने जीवन पर गर्व भी करें तो अनुचित नहीं होगा। उनका जीवन हर्षपूर्ण एवं चिंताहीन होता है। कृषक-जीवन की महत्ता का वर्णन करती हुई उर्मिला कहती भी है कि यदि हम लोग भी कहीं किसान होते तो हममें भी कृषकों-जैसी त्याग भावना और सहिष्णुता होती और फिर इन सुखों का भोग नहीं कर पाते। अर्थात भोग से उत्पन्न कष्ट न सहने पड़ते। वे अन्नदाता हैं। हमारे दुख दूर करते हैं। वास्तव में उनके जीवन का अनुकरण-अनुसरण करना उचित है। परंतु हम राज्य की प्राप्ति के लिए उचित-अनुचित के ज्ञान से शून्य होते हैं - 'उन्हीं अन्नदाताओं के सुख आज दुख हरते हैं।' (साकेत, नवम सर्ग)

गुप्तजी की इस भावना को अयोध्या-राज्य में घटित होने वाली घटनाओं का संकेत मात्र नहीं है। उनके रचनाकाल में किसानों के प्रति युगपुरुषों की संवेदना भी प्रकट होती है। गांधीजी जैसे युगनायकों ने इस तथ्य को भली-भाँति हृदयंगम किया था कि भारतीय अर्थनीति का मेरुदंड किसान ही है। देश की संपन्नता लहलहाती फसल पर निर्भर करती है। देश की सुख-समृद्धि का आधार किसान वर्ग है। उनके जीवन में हर क्षण उल्लास भरा रहे और वे बारह महीनों में तेरह त्योहार मनाएँ तो देश की आर्थिक, सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था सुखद हो सकती है। इस तरह से प्राचीन कथानकों अथवा मिथकीय घटनाओं के आधार पर कवि गुप्तजी ने अपने युग की बात कही है। अर्थात पौराणिक संदर्भों को युगीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। उनकी रचनाओं में स्वाधीनता-संग्राम की पद-ध्वनि ही सुनाई नहीं पड़ती बल्कि स्वतंत्रता को बचाए रखने के उपायों की भी खोज मिलती है। क्योंकि 'साकेत' 'यशोधरा' जैसे काव्यों में कवि की सबसे बड़ी समस्या जीवन है। उस जीवन की सार्थकता के लिए आवश्यक है मानवीयता। डॉ. नगेद्र के शब्दों में - 'हमारी सबसे बड़ी समस्या जीवन है और उससे परे अध्यात्म या धर्म इस युग में कोई अर्थ नहीं रखती। 'साकेत' की धार्मिक पृष्ठभूमि का ठीक यही स्वरूप है। उसमें भुक्ति और मुक्ति का सामंजस्य है, भावुकता और बुद्धि (इड़ा) का।'2

राजधर्म में त्याग और लोकसेवा की भावना का प्राधान्य था। आज राजनीति ने राजधर्म का स्थान ले लिया है। इसमें भोग और स्व-सेवा को महत्व दिया गया। राजनीति कलुषित हो गई। स्वार्थ को ही परमार्थ समझा जाने लगा। राजनीति एक दूधारू गाय साबित हो गई है। गुप्त जी ने शत्रुघ्न से कहलवाया भी है -

राज्य को यदि हम बना लें भोग
तो बनेगा वह प्रजा का रोग।
(साकेत, सातवाँ सर्ग, पृ. 104)

आगे चलकर कवि ने कैकेयी को प्रतीक मानकर कहा है-

अनुज, उस राजत्व का हो अंत
हंत! जिस पर कैकेयी के अंत (साकेत, सातवाँ सर्ग, पृ. 105)

आज हमारे साँसद, विधायक, मंत्री रूपी राजाओं ने राज को भोग बना लिया है। फलतः चारों ओर अराजकता छाने लगी है। जनता के अधिकारों के रक्षक रक्षाकवच बनकर नहीं आते। वे भक्षक बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में कवि क्रांति को उचित मानता है - 'निज रक्षा का अधिकार रहे जन जन को।' परतंत्र भारत में प्राचीन संस्कृति को अक्षय बनाये रखने का कार्य गुप्तजी ने किया है। इस संदर्भ में डॉ. नगेंद्र ने कहा है - 'क्रांति के इस युग में प्राचीन संस्कृति के गौरव को अक्षय रखने का सबसे बड़ा दायित्व कवियों पर है और इस दायित्व को जिस कवि ने जितना पूरा किया उतना ही वह कवि भारतीय है। 'साकेत' का कवि ऐसा ही सर्वद्रष्टा भारतीय कवि है। उसकी सारग्राहिणी कवि-दृष्टि ने अपूर्व क्षमता के साथ संस्कृति के मूल तत्वों को पहचान कर उनकी प्रतिष्ठा की है। साथ ही स्वस्थ विदेशी प्रभावों का भी भारतीय आदर्शों से समन्वय किया है।'3

द्विवेदी युगीन कविता पर सबसे बड़ा आरोप है उसका इतिवृत्तात्मक होना। इस आधार पर गुप्तजी के काव्यों को भी इतिवृत्तात्मक कह दिया जाता है क्योंकि महावीर प्रसाद द्विवेदी की सतत प्रेरणा से गुप्तजी ने अनके काव्य लिखे हैं। इसका कदापि यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि गुप्तजी में कवि-प्रतिभा का अभाव था। गुप्तजी बड़े कवि हैं, महान कवि हैं। पुराणों, मिथकों से अपने कथानक चुनने का यह मतलब नहीं कि इतिवृत्तात्मक कथन प्रस्तुत किए गए हैं। मूल बात तो यह है कि गुप्तजी ने अतीत के सुखद-सुभग आदर्श निचोड़कर ध्वस्त मूल्यों को फिर से पुनर्स्थापित करना चाहा है। उन्होंने इस प्रस्थापना में वर्तमान की आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया है। प्रभाकर श्रोत्रिय के शब्दों में -

'यह भ्रांत धारणा है कि मैथिलीशरण गुप्त और उनका युग इतिवृत्तात्मक है। वास्तव में यह नवशास्त्रीय अथवा नवअभिजात्यवादी युग है और गुप्तजी उसके अन्यतम कवि हैं। इतिवृत्तात्मकता शास्त्रीयता का एक लक्षण मात्र है। इसे युग का पर्याय मान लेने से खड़ी बोली हिंदी काव्य के सुसंगत और ऊर्ध्व विकास को अनिवार्य सरणि अनदेखी रह गई है।'4

राष्ट्रकवि की द्रौपदी, उर्मिला, कैकेयी, यशोधरा, विष्णुप्रिया, सत्यभामा आदि स्त्रियाँ परंपरा से आगत हैं परंतु नई दृष्टि से पुनर्सृजित नारी चरित्र हैं। कवि ने आँख मूँदकर उक्त नारी पात्रों की पुनरावृत्ति नहीं की है। कवि के रचनाकाल में भारतीय नारी की शोचनीय दशा थी। उसकी असहनीय दुरवस्था से कवि प्राण व्यथित हो उठता है। सवाल यह उठता है कि नारी की ऐसी दशा का उत्तरदायित्व किस पर है? कवि ने इस पर विचार करते हुए कहा है :

ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे,
अपना किया अपराध उनके शीश पर हैं धर रहे। (भारत-भारती)

'भारत-भारती' में इस बात का भी जिक्र है कि पुरुषों ने नारियों की उपेक्षा ही नहीं की बल्कि नारियों को अशिक्षित, अपाहिज एवं पंगु बनाने में भी बड़ी भूमिका अदा की - 'हा! क्या करें वे, जबकि उनको मूर्ख रखते हैं हमीं।' नारी के प्रति समाज की दृष्टि में गुप्तजी की रचना के साथ परिवर्तन दिखाई पड़ता है। अन्यथा एतद्पूर्व नारी केवल कामिनी के रूप में चित्रित थी। वह पुरुष की काम-पिपासा को तृप्त करने वाली साधन मात्र थी। गुप्तजी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी की संस्थापित मान्यताओं को अपने ढंग से काव्य जगत में उतारा था। द्विवेदी जी ने कहा था - 'यमुना किनारे केलि-कौतूहल का अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबंध लिखने की आवश्यकता है और न स्वकीयाओं के गतागत पहेली बुझाने की।'5 उक्त प्रेरणा बिंदु को पाथेय बनाते हुए गुप्तजी ने नारी पात्रों का चित्रण प्रस्तुत किया है। उन्होंने युगों से उपेक्षित नारी को दुख की स्थिति से उबारकर उसके स्वस्थ विकास की कामना की है। उन्हें ज्ञात है कि नारी दुखी रही है चाहे पत्नी हो, प्रेयसी हो या माता। हालाँकि नारी का त्याग, ममत्व, स्नेह, प्रेम सब कुछ अप्रतिम रहा है, अपरिमित भी। यह प्रेम और त्याग केवल अपने पति, पुत्र या प्रियतम के लिए नहीं बल्कि समाज, देश और मानवता के लिए भी समर्पित है। इस समर्पण के प्रतिदान में उसे कुछ नहीं बल्कि समाज, देश और मानवता के लिए भी समर्पित है। इस समर्पण के प्रतिदान में उसे कुछ नहीं चाहिए परंतु वह अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को चोट पहुँचते देखकर आहत होती है। उसे यह कदापि स्वीकार नहीं कि उसका व्यक्तित्व विघटित हो। नारी-विमर्श के दौर में गुप्तजी की यशोधरा कहीं पीछे पड़ती नहीं दिखाई पड़ती है। पति चाहे जहाँ जायें, जो करें पर गृह-त्याग करने के पहले पत्नी की सहमति प्राप्त कर लेनी चाहिए थी। कम से कम उसे कहकर जाते -

'सिद्धि हेतु स्वामी गए, यह गौरव की बात,
पर, चोरी-चोरी गए, यही बड़ा व्याघात,
सखि! वे मुझसे कहकर जाते
कह तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?'

'साकेत' की उर्मिला को आत्म-सम्मान का बोध है। चित्रकूट में लक्ष्मण और उर्मिला का एकांत मिलन हुआ था। उस समय लक्ष्मण कुछ और ही सोच रहे थे, प्रकृतिस्थ न थे। तभी उर्मिला कहती है - 'मैं बाँध न लूँगी तुम्हें, तजो भय भारी।' यशोधरा की भाँति उर्मिला भी प्रिय के व्रत में विघ्न न डाले बल्कि उनके निकट होकर भी उनसे दूर बनी रहे, उसकी व्यथा बनी रहे - 'प्रिय के व्रत में विघ्न न डालूँ रहूँ निकट भी दूर।' उर्मिला हो या यशोधरा अथवा विष्णुप्रिया सभी अपार कष्ट सहन करती हैं। ये पत्नियाँ गुप्तजी के नारी-विमर्श का उदाहरण बनती हैं। रेडिकल फेमिनिज्म भले ही गुप्त जी की रचनाओं में न हो परंतु उनकी नारी आदर्श भूमिका में खरी उतरती है। उसमें पुरुष के अन्याय के विरुद्ध विद्रोह की चेतना भले न हो परंतु नारी-उत्थान में उसकी भूमिका अवश्य है, गुप्तजी की युगीन समस्याओं, स्थितियों और सीमाओं को यदि ध्यान दिया जाए तो, 'सखि वे मुझसे कहकर जाते' की व्यंजना युगांतरकारी सिद्ध हो जाती है। स्त्री-उत्पीड़न को कविवर ने मौन-वाणी प्रदान की है। वास्तव में नवजागरणकालीन इस प्रवृत्ति को गुप्तजी ने सबसे पहले रेखांकित किया है। आचार्य शुक्ल के शब्दों में - 'गुप्तजी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है - कालानुसरण की क्षमता।' इस क्षमता के कारण अज्ञेय जी उन्हें अपना काव्यगुरु घोषित करते हैं और हिंदी भाषी जनता के प्रतिनिधि कवि के रूप में जानना चाहते हैं।

गुप्तजी ने आदर्श नारी की कल्पना क्यों की? इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य हो सकता है? प्राचीन मूल्यों एवं आदर्शों से बँधी नारी को आधुनिकीकरण की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? स्वस्थ दांपत्य जीवन, पारस्परिक सौहार्द्र एवं विश्वास सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन का स्वस्थ आधार होता है। कवि ने नारी-संवेदन, नारी-अस्मिता के प्रसंगों से नारी की शक्ति को पहचानने की परंपरा शुरू की। नारी शक्ति के बिना पराधीन भारत का मुक्ति संग्राम सफल नहीं हो सकती है। इसे मैथिलीशरण गुप्त भली-भाँति समझते थे। संघर्ष हेतु शक्ति चाहिए और यह शक्ति आकाश से नहीं टपकती बल्कि नारी में विद्यमान होती है। इसलिए कवि ने प्रिया के चरणों में प्रियतम को गिराने में भी कोई संकोच नहीं किया। 'साकेत' में गुप्तजी ने ऐसी ही एक योजना निर्मित की है -

'गिर पड़े दौड़ सौमित्र प्रिया पगतल में
वह भीग उठी प्रिय चरण धरे दृग जल में।'

गुप्तजी ने पत्नी, माता, सास, बहू आदि के रूप में नारी का चित्रण किया है। परंतु उनका सर्वाधिक मन रमा है नारी के पत्नी एवं माता रूप के चित्रण में। वह परिवार की धुरी है, वह लोक में देने आती है न कि लेने - 'नारी लेने नहीं, लोक में देने ही आती है।' माता एवं पत्नी दोनों रूपों में वह देती है। वह पुरुष की शक्ति है, वह पुत्र का आँचल है। 'यशोधरा' में कुछ नारी-शक्ति का महिमा-गान करते हैं - 'मुझको बचाया मातृभूमि ने ही खीर से।' यशोधरा का कथन है - 'मुझको बहुत उन्होंने माना - फिर भी क्या पूरा पहचाना। मैंने मुख्य उसी को जाना - जो वे मन में लाते।' नारी के प्रति गुप्तजी की दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए राममूर्ति त्रिपाठी ने कहा है - 'मानव हृदय में करुणा विश्वात्मा का ही एक अंश है और नारी मानो उसी की मूर्त प्रतिमा है, बाल्मीकि काव्य का यही करुणा मूल है और गुप्त जी ने उसी करुणा के मूर्त रूप गृहस्थाश्रम की धुरी नारी के चित्र उर्मिला, यशोधरा, नयिनी, विष्णुप्रिया तथा मघ-माँ के रूप में चित्रित किया है।'6

गुप्त जी की नारी-दृष्टि में पुनरुत्थानवादी विचार का प्रभाव लक्षित होता है परंतु वह पुनरुत्थानवादी विचार तक सीमित नहीं है। गुप्तजी की नारी अनुराग एवं त्याग से परिपूर्ण है, कर्तव्यबोध से पूर्ण है। जड़-चेतन के प्रति समान रूप से उसकी संवेदना व्याप्त है। परंतु वह अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक है। वह अपने अधिकारों के लिए लड़ भी सकती है - 'स्वत्वों की भिक्षा कैसी ?' (साकेत) गुप्तजी ने पत्नी को अर्धांगिनी एवं संगिनी के रूप में भी चित्रित किया है, अर्धांगिनी रूप में अधिकार एवं कर्तव्य का समान रूप रहता है। इसलिए यशोधरा पति की सिद्धियों का कुछ अंश दावा करती है - 'उसमें मेरा भी कुछ होगा।' सीता स्वयं को राम की अर्धांगिनी कहकर अपना अधिकार जाहिर करती है राम को साथ ले चलने को बाध्य करती है। राम विवश हो जाते हैं इस तर्क के सामने कि माता-पिता के आदेश का पूर्ण पालन अर्धांगिनी के बिना अधूरा है।

यशोधरा और उर्मिला की स्थिति लगभग एक सी है। राज प्रासाद में रहकर भी संन्यासिनी जीवन व्यतीत करती है। दोनों विरहिणी हैं। यशोधरा के पति बिना कहे सिद्धि प्राप्ति हेतु चले गए तो लक्ष्मण भातृ-सेवा के लिए वनवासी हुए। फलतः दोनों पत्नियों को पति-प्रेम से वंचित होना पड़ा। विरह के दावानल में तिल-तिल दग्ध होना पड़ा। दोनों ने विरह को झेला, वीरता पूर्वक सहन किया। यशोधरा घर रहकर सिद्धार्थ की सफलता हेतु प्रार्थना करती रही। अपने आत्मीय स्वजनों को समझाती रही -

'उनकी सफलता मनाओ तात, मन से
सिद्धि लाभ करके वे लौटें शीघ्र वन से।'

ठीक उसी प्रकार जब उर्मिला को लगता है कि लक्ष्मण बिना अवधि पूर्ण किए लौट आए हैं तो वह चौंक पड़ती है और कहती है -

'भूल अवधि-सुध प्रिय से कहती जगती हुई कभी आओ
किंतु कभी सोती सी उठती वह चौंक बोलकर जाओ।'

वास्तव में 'आओ' और 'जाओ' का यह संघर्ष, आदर्श एवं कामना का भी है। आदर्श का प्रभाव है 'जाओ' तथा भावातिरेक का 'आओ', व्यष्टि एवं समष्टि के इस द्वंद्व को कवि ने स्वाभाविक ढंग से चित्रित किया है।

यशोधरा एवं उर्मिला का दृढ़-संकल्प देखते ही बनता है। तथागत के सार्थक प्रत्यावर्तन होने पर यशोधरा उनके पास नहीं जाती। तथागत आते हैं यशोधरा के पास। यशोधरा ने उसी स्थान पर पड़े रहना उचित समझा था जहाँ पति उसे छोड़कर चले गए थे - 'गोपा वहीं है, छोड़कर उसको गए थे वे जहाँ।' बुद्ध को गोपा के संकल्प के सामने स्वीकार करना पड़ा।

'मानिनी! मान तजो, लो रही तुम्हारी बान।' (यशोधरा)

नारी-स्वाभिमान का ऐसा अपूर्व निदर्शन 'साकेत' की उर्मिला में भी लक्षित होता है, उसमें यशोधरा की भाँति कहीं भी हीन-भावना नहीं है। उसे दया दंड से भी भारी प्रतीत होती है। वह कहती है -

दयिता क्या मुझे आर्त जान के,
घर दिया तुम्हें भेज आप ही,
यह हुआ मुझे और ताप ही।
                                     (साकेत)

'साकेत' में सीता का कथन भी इस संदर्भ में स्मरणीय है जिसमें शिष्टाचार के साथ नारी-स्वाभिमान व्यंजित है -

जो गौरव लेकर स्वामी
होते हो काननगामी,
उसमें अर्द्ध भाव मेरा
करो न आज त्याग मेरा।
                                   (साकेत)

'विष्णुप्रिया' में गुप्तजी ने विवश, पीड़ित, अत्याचारित विष्णुप्रिया के बहाने नारी के प्रति सहानुभूति प्रकट की है। साथ ही, भावी संकेत भी प्रदान किया है कि नारी जागरण में बाधक तत्वों के विरुद्ध सन्निकट है। विधृता के पति कृष्ण के रास में सम्मिलित होने के लिए विधृता को अनुमति प्रदान नहीं करते तो कवि ने 'द्वापर' में अपनी नारी-दृष्टि का परिचय दिया है जिसे दिनकर जी ने बड़े ही नवीन एवं कुछ दूर तक, विद्रोही भी कहा है। विधृता की आत्मा अपने पति को फटकार लगाते हुए कहती है -

अविश्वास, हाँ अविश्वास ही नारी के प्रति नर का,
नर के तो सौ दोष क्षमा हैं, स्वामी है वह घर का
उपजा किंतु, अविश्वासी नर हाय, तुझी से नारी
जाया होकर भी जननी है तू ही पाप-पिटारी।
जाती हूँ, जाती हूँ मैं और नहीं रुक सकती,
इस अन्याय समक्ष मरु मैं, कभी नहीं झुक सकती।
                                                      (द्वापर)

गुप्त जी की नारी कायर नहीं है। डरपोक भी नहीं है। उसने अपने क्षत्राणी रूप का परिचय दिया है। आवश्यकता पड़ने पर युद्ध-क्षेत्र में सहर्ष चलने के लिए कटिबद्ध दिखाई पड़ती है। वह कहती है - 'पुरुष वेष में साथ चलूँगी मैं भी प्यारे।' उर्मिला को भी गुप्तजी ने केवल प्रेम की प्रतिमूर्ति, विरहार्णव, पतिव्रता नारी के रूप में ही नहीं दिखाया है बल्कि उसे क्षत्राणी रूप में भी चित्रित किया है, सुयोग को वह अपने हाथ से गँवाना नहीं जानती। उसे जब रणांगन में अवतीर्ण होने का मौका मिलता है वह कहती है - 'वीरों पर यह योग भला क्यों खोऊँगी मैं।'

गुप्तजी ने माता के रूप में नारी के वात्सल्यमयी तथा तेजस्वी दोनों पक्षों को प्रस्तुत किया है। यशोधरा ने पति की अनुपस्थिति में अपने पुत्र को संस्कार दिया, समुचित शिक्षा दी। विरह एवं कर्तव्य के द्वंद्व में रहने के बावजूद मातृत्व की परीक्षा में उसे सफलता हासिल होती है। पति विहीन पत्नी के लिए पुत्र ही सर्वस्व होता है। यशोधरा के लिए राहुल, कैकेयी के लिए भरत ऐसे ही दृष्टांत हैं। मैथिलीशरण ने कैकेयी चरित्र का पुनर्सृजन किया है। अपनी अद्भुत मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। कलंकित कैकेयी चरित्र को कवि ने आदरणीया माता के रूप में चित्रित किया है। 'साकेत' के अष्टम सर्ग में माता कैकेयी की आत्मग्लानि है। मातृत्व की पराकाष्ठा है। अपने किए कुकर्म की स्वीकारोक्ति से उसका चरित्र कुंद हो उठा है। वह तमाम दोष अपने सिर पर धारण कर लेते हुए कहती है -

'क्या कर सकती थी, मरी मंथरा दासी
मेरा ही मन रह न सका निज विश्वासी'

वह मातृत्व के सामने सब कुछ फीका मानती है। मातृत्व खोना नहीं चाहती है। यही उसका गर्व है, दंभ नहीं। परंतु कैकेयी का स्वाभिमान दृष्टव्य है। गुप्त जी के रचना काल में उक्त नारी-स्वाभिमान की अत्यंत आवश्यकता थी। गुप्त जी ने कैकेयी से कहलवाया है -

'सह सकती हूँ चिर नरक, सुनें सुविचारी
पर मुझे स्वर्ग की दया दंड से भारी'

मातृत्व के प्रति गुप्त जी की अगाध श्रद्धा थी। उन्होंने कैकेयी में उस मातृत्व की खोज की। गांधी युग में रचित इस काव्य में एक ओर मातृ-शक्ति की प्रतिष्ठा है तो दूसरी ओर पाप से घृणा हो, पापी से नहीं विचार की स्थापना की है।

जयसिंह की माँ मीनल दे हो अथवा कौशल्या, कैकेयी हो या विधृता, उर्मिला हो या विष्णुप्रिया, यशोधरा हो या माताभूमि ये सभी नारी पात्र गतिशील हैं, युगानुकूल हैं, स्टेटिक नहीं, इस संदर्भ में गुप्त साहित्य के समर्थ अध्येता एवं प्रसिद्ध आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा भी है - 'आज से कई आध-पौन शती पहले गुप्तजी ने बिना स्त्री-आंदोलन का तमाशा खड़ा किए, बिना किसी शोर के अपने युग-चरित्र के अनुरूप स्त्री-सशक्तिकरण की दिशा का जो ऐतिहासिक योगदान दिया, वह उनके विभिन्न काव्यों की अंतर्वस्तु और छोटे-छोटे चरित्रों में किसी आग और विकलता को देखने पर पता चलता है, कुछ प्रसंग और चरित्र तो ऐसे हैं जो स्वयं उनके अंतर्विरोधों का प्रतिकार करते हैं। वह लेखक के निरंतर आत्ममंथन और गतिशीलता का प्रमाण भी है, जो गुप्तजी के किसी अतीत पोषी स्थिरीकरण का स्वयं ही प्रत्याख्यान करता है।'7

गुप्तजी ने अपने युग को कभी नहीं भुलाया। वर्तमान की उपेक्षा नहीं की। अपने सपनों और सुखों को देखकर देश को न भूलना उनके अंदर तथा बाहर का व्यक्ति था। सच्चा कलाकार अपने जीवनानुभवों और साधनों के बीच ऐक्य स्थापित करता है। गुप्तजी ने भी अपने संस्कार एवं आदर्श मानव के सपनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने का स्तुत्य प्रयास किया है। संभवतः इसलिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है - 'गुप्त जी वास्तव में सामंजस्यवादी कवि हैं, प्रतिक्रिया का प्रदर्शन करने वाले अथवा मद में झूमने वाले कवि नहीं, सब प्रकार की उच्चता से प्रभावित होने वाला हृदय उन्हें प्राप्त है। प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह, दोनों इनमें हैं।'8

भारतीय जनता और संस्कृति के आत्म-संघर्ष की अभिव्यक्ति को गुप्तजी ने अपने अर्धशताब्दी से अधिक रचना काल में वाणी दी है। यह अभिव्यक्ति सदा ही नया अर्थ प्राप्त करती है। समयानुकूल, युगानुकूल संदर्भ के साथ प्रकट होती है। गुप्तजी के रचना-संसार में युगीन समस्याएँ, मर्यादाएँ, शंकाएँ बार-बार उमड़ती घुमड़ती हैं। उन्होंने अपने युग की युगीन समस्याओं, उलझनों, शंकाओं, सवालों से पीछा छुड़ाना नहीं चाहा। वे उनसे उलझे रहे। उनका मंथन करते रहे और अपने ढंग से निराकरण के उपाय भी सोचते रहे।

पराधीन भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद एवं सामंतवाद से भारतीय जनता का संघर्ष था। निहत्थे भारतीयों के लिए अस्त्र-शस्त्रों की आवश्यकता थी। मैथिलीशरण ने भारतीयों को प्राचीन मूल्यों की रक्षा एवं नए मूल्यों के धारण हेतु आग्रह किया। पराजित मनोवृत्ति को त्यागकर प्राचीन संस्कृति एवं इतिहास से शिक्षा ग्रहण करने के लिए आह्वान किया। गुप्तजी ने इसके माध्यम से भारतीयों को साम्राज्यवादी शक्ति से लड़ने का साहस जुटाया। गुप्तजी के काव्य-मूल्य धारदार औजार सिद्ध होने में सहायक हुए। साहित्य, इतिहास, कला, दर्शन, शास्त्र पुराण आदि में अंतर्निहित शक्ति को पहचानने के लिए कवि का काव्य-जगत प्रबल सहायक सिद्ध हुआ। इस पहचान ने सांप्रदायिकता को, उसके विषैले वातावरण को लोगों के सामने उजागर किया। सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा देने वालों के मुखौटे उघाड़ दिये। हिंदू-मुस्लिम एकता की भावना मजबूत हुई। कवि ने सांप्रदायिकता की भावना को त्यागने के लिए 'गुरुकुल' में आगाह किया-

'हिंदू मुसलमान दोनों अब छोड़ें वह विग्रह की नीति
प्रकट की गई है, यह केवल अपने वीरों के प्रति प्रीति।'

गुप्तजी को वैष्णव कवि मात्र सिद्ध करने के लिए जुटे आलोचकों को 'काबा और कर्बला' की निम्न पंक्तियाँ क्यों दिखाई नहीं पड़तीं-

'बैरी हो वा बंधु, विचारो तुम विवेक से
एक ईश के अखिल जीवन आत्मीय एक से'

राम, कृष्ण, बुद्ध, मुहम्मद की कथा को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए कवि ने सांप्रदायिक सौहार्द्र एवं सद्भाव का निदर्शन प्रस्तुत किया है। उन्होंने संपूर्ण निष्ठा के साथ अपने कवि-कर्म का निर्वाह किया है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों का सहारा लेते हुए युगीन अत्याचार एवं अन्याय का विरोध किया है। उस अन्याय के प्रतिकार के लिए उन्होंने प्रयास किया है। उन्होंने अपनी सारस्वत साधना से युग को साकार किया। उससे भी बढ़कर युग का प्रवर्तन किया। नर रूपी नारायण की खोज की। कृष्णदत्त पालीवाल के शब्दों में - 'राम, कृष्ण और मुहम्मद की प्रेरणा एकाकार होकर समग्र भारतीय संस्कृति को झंकृत कर देती है। हिंदुत्व का आतंक समाप्त हो जाता है और कवि, मानव मात्र की करुणा-वंदना का गायक बन जाता है... कला के उदात्त क्षणों में वे हिंदू कवि नहीं रह जाते, विश्व राग के मानवतावादी कवि बनते जाते हैं।'9

गुप्तजी की रचनाओं में उनका युग जीवित है। उन्होंने अपने युग की तमाम घटनाओं का साक्षात्कार किया है। उन्होंने घटनाओं का आत्म-साक्षात्कार किया और समाज से जीवित प्रतीक प्राप्त किए। यही कारण है कि उनके काव्यों में लोक-मंगल तथा लोक-जागरण दोनों विद्यमान हैं। युगीन विसंगतियों को नैतिक और आदर्श के गुणों के अंतर्गत समाहित करते हुए समाज के यथार्थ चित्र उकेरे गए हैं। राष्ट्रीय जागरण, सांस्कृतिक जागृति, राजनीतिक सचेतनशीलता आदि को उन्होंने अपने काव्य-सृजन में महत्वपूर्ण स्थान दिया। उक्त गहन कार्य को संपन्न करने के लिए कवि ने कथा-शैली अपनाई। अपनी भाषा की सहजता एवं संप्रेषणीयता के चलते उनके काव्य जन-मन के कंठहार बन गए। गृहिणियों से लेकर विद्वज्जनों तक गुप्तजी के काव्य-रसिक हो गए। सहज शब्दों में बड़ी बात कह देना कवि की सबसे बड़ी विशेषता थी। इसलिए गुप्तजी हिंदी साहित्य के लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध कवि हैं। 'भारत भारती' ने जो लोकप्रियता और प्रसिद्धि प्राप्त की उसमें उत्तरोत्तर विकास होता गया। खड़ी बोली के लाखों पाठक निर्मित हुए। संभवतः इसी कारण से गुप्तजी को आधुनिक हिंदी कविता के संस्कारक और निर्माता कहा जाता है। कथा-साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद का जो स्थान है खड़ी बोली काव्य में मैथिलीशरण गुप्त को वही स्थान प्राप्त है।

गुप्तजी मानव मूल्य के कवि हैं। उनके मानव-मूल्य में सांस्कृतिक, नैतिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक मूल्य समाहित हैं। मानवतावादी दृष्टि सर्वोपरि होने के कारण उनकी रचनाएँ भारतीय जनता की कंठहार बनीं। उनकी रचनाओं ने मानव चेतना का संस्कार किया। प्रेम, भाईचारा एवं मैत्री का प्रचार किया। मनुष्य मात्र को जागरण का संदेश देते हुए उनके काव्यों ने मनुष्य जाति को नई दिशा दी। उन्होंने एकता में शक्ति की चेतना को अभिव्यक्त किया। इसलिए कभी अज्ञेय जी ने इन्हें संवेदना से अधिक मानव मूल्य का कवि माना था। गुप्त जी ने मनुष्य में ईश्वरता का बोध कराया। मानव-भूमि पर स्वर्ग लोक को प्रतिष्ठित करना चाहा। उन्होंने लोक में परलोक को उतारने का प्रयास किया। एक बात और, अनास्था के इस अंधकार युग में, अविश्वास के काले वातावरण में, हिंसा के खूनी परिवेश में, कृत्रिमता के पाखंड समय में गुप्तजी की रचनाएँ आस्था, विश्वास, अहिंसा का मंत्रपाठ कराती हैं। हमें उज्जीवित करती हैं, आस्थावान बनाती हैं-

'बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा
है किंतु आशा भी कि होगी दीप्ति फिर प्राची दिशा।'
                                                         (भारत-भारती)

संदर्भ

1. सिंह त्रिभुवन, हिंदी कविता की स्वच्छंद धारा, पृ. 48

2. डॉ. नगेंद्र, साकेत : एक अध्ययन, पृ. 127

3. डॉ. नगेंद्र, साकेत : एक अध्ययन, पृ.73

4. श्रोत्रिय प्रभाकर, कवि परंपरा - तुलसी से त्रिलोचन, पृ. 51

5. श्रीवास्तव डॉ. दयानंद ,निबंधकार बालमुकुंद गुप्त, पृ. 157

6. त्रिपाठी राममूर्ति, नवजागरण भारतेंदु और गुप्त जी, पृ. 127

7. श्रोत्रिय प्रभाकर, राष्ट्रकवि का स्त्री -विमर्श, पृ.119

8. शुक्ल रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 138

9. पालीवाल कृष्णदत्त, मैथिलीशरण गुप्त, प्रासंगिकता के अंतःसूत्र, पृ. 38


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