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कहानी

आख़...थू
प्रेमनाथ दर

अनुवाद - शम्भु यादव


फ्लेवर पैदा करना आसान खेल नहीं। एक महिला भी नहीं कर सकती। वही कर सकता है जिसने मछली का सही तौर पर विश्लेषण किया हो। जिसने रातों को बैठकर अनुभव किया हो। जिसकी नाक अनुभवी हो ताकि वो एक-एक भाप की माप को सूँघे और पहचाने। दुर्गन्ध से फ्लेवर तक कई मोड़ होते हैं कई मंजिलें।

और उस दिन जब मेघ बरस रहा था और छुट्टी का दिन था मछुआरा एक बड़ा सिंघाड़ा बंगालियों से छुपाता हुआ मेरे पास ले आया। मछली का शरीर अकड़ा हुआ तांजा था। कनपटियों के नीचे मछली का खून अभी तक लाल था। मछली को देखकर ही मेरे मुँह में पानी आ गया। वह माल किसी और को कैसे देता।

कड़ाही में तेल कड़कड़ाने लगा। तेल के भँवर से लहरें उठने लगीं। कभी आँखों पर कभी कनपटियों और कभी मुँह के भीतर स्वाद को जलाने लगीं।

फिर जब मछली उबलने लगी, तेल की मारी हुई बास लहरों की तरह फ्लेबर बनकर निकलने लगी। और ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह गर्म-गर्म फ्लेबर बाहर पानी में नहीं जाएगा, घर के अन्दर की घूमता रहेगा, तो हमने जी भर के मछली खायी, वह मछली एक-एक साँस में बसी हुई थी जो हमने खायी। वही साँस, वही डकार वही गर्म-गर्म स्वाद। बैठक में एक मस्ती का वातावरण था, मुझे औरों का तो पता नहीं पर मैं स्वयं इस मस्ती के स्वागत में कहीं खोने लगा।

देखता क्या हँ कि हमारा दरवांजा मछली के मुँह की तरह खुल गया और उसी स्वाद की खोज में उसमें घुस गया। पर वहाँ मुँह नहीं एक दरवाजा था। मछली की खोपड़ी खुली थी। जीभ हिली और मैं दूसरी ओर जा निकला।

मुझे इस बात पर भी हैरानी नहीं हुई कि इस दरवांजे के पार एक अनदेखा बांजार गर्म था। वही अपने बांजारों की गहमा-गहमी और चमक, पर लूटमार नहीं थी। बांजार बड़ा सजा-सजाया था और लोगों के आवागमन में व्याकुलता नहीं थी। भीड़ थी लेकिन खलबली नहीं थी। जिसका चेहरा देखो, आध्यात्मिक चमक से ढँका हुआ था। भावनाओं में ठहराव और दृष्टि में एक तलाश थी। हर कदम एक निर्णय के साथ उठता। एक संगठित समाज का आवागमन था। जो जहाँ जी रहा है और पूरे विश्वास से जी रहा है।

देखा कि एक ऊँची दुकान के आगे एक लम्बी लाइन धीरज धरे खड़ी है। चूँकि मेरी आदत थी मैं भी उस लाइन की तरफ भागा, जाने क्या-क्या वस्तुएँ मिलती होंगी। ऊपर चीलें भी मँडरा रही थीं और उतर-उतर कर छीना-झपटी भी कर रही थीं। स्पष्टत: वहाँ मांस बिक रहा था। मांस की और भी कई दुकानें थीं मगर वहाँ चीलों का समूह क्यों नहीं था। वह दुकान साफ-सुथरी थी। इसके बीच में तीन बड़ी अलमारियाँ खड़ी थीं और शीशे के पीछे तीन लम्बे-लम्बे मांस के टुकड़े लटक रहे थे।

उस मांस की बनावट नई थी और इसका रंग न लाल था न सफेद, दोनों रंगों के बीच का था। सतह ऐसी समतल कि मुर्गे का हो, मोटा ऐसा कि जैसे बकरे का हो, मुलायम ऐसा कि जैसे मछली का हो। उसमें से छुरी जैसे हवा में से गुजरती थी।

'मंजे आएँगे आज, जवान है ये जवान' एक ग्राहक होठों पर जीभ फेरता हुआ दूसरे से कह रहा था।

शब्द 'जवान' मांस के लिए प्रयोग होते नहीं सुना था। मांस बड़े का हो, बूढ़े का हो, जवान का नहीं सुना था। केवल शब्द सुनकर ही मेरे मुँह में पानी आने लगा था। पर मांसाहारी कितना भी मांस का प्रेमी हो, नए मांस का नाम पहले सुनना चाहता है।

गर्दन लम्बी करके देखा कि पीछे सिर और पाये रखे पड़े थे। देखकर मेरा दिल धड़कने लगा। सिर और पाये थे तो ऍंधेरे में पर इनसान के किसी सम्बन्धी के दिखाई दे रहे थे। मेरे मुँह में आया हुआ पानी एक गन्दा स्वाद बन गया और पेट में चक्की-सी घूमने लगी। थूकना मैंने अच्छा नहीं समझा। समीप खड़े एक बूढ़े से मैंने पूछा-

''मियाँ ये कौन-सी नेमत है?''

''बड़ी नेमत भाई'', इतनी तेजी से बूढ़े ने कहा जैसे मेरे प्रश्न का पूरा जवाब दिया हो। मैंने फिर पूछा-

''कौन-सी नेमत मियाँ?''

''भाई बड़ी कह रहा हँ बड़ी'', उसके कथन में सूचना थी व्यंग्य नहीं, स्पष्ट था कि इस मांस का नाम बड़ी नेमत था जैसे हमारे यहाँ हलाल और महाप्रसाद के नाम थे। पर मैं तो इस मांस के जानवर का नाम पूछ रहा था। मैं इसी उलझन में खड़ा था कि एक बूढ़े भिक्षुक ने मेरे काँधे पर हाथ रखा और अलग ले जाकर कहा, ''क्या सोच रहे हो बेटा, आओ मैं बता दूँ। इस मांस का नाम है बड़ीर नेमत। प्रतिदिन बिकता है पर आज का मांस उत्तम है, जवान है, ये मांस कभी-कभी मिलता है क्योंकि जवानों का शिकार करना कठिन है। बूढ़े, बच्चे और मादा तो प्रतिदिन बिकते हैं। और सुनो, तुम भगवान का नाम खड़े होकर लेते हो या लेटकर?''

''हंजरत इस जानवर का नाम क्या है।''

''मैं सब कुछ बता दूँगा, तुम मेरे प्रश्न का उत्तर दो।''

''लेटने, खड़े होने का बन्धन नहीं है साहब।''

''बस! बस फिर ठीक है। तुम तीसरे प्रकार के मानव निकले, न इधर न उधर। सुनो अगर तुम लेटकर नाम लेनेवालों में से होते तो तुम फिर जवान थे।''भिक्षुक ने मेरे कन्धों पर हाथ फेरते हुए कहा, ''फिर आज इसी दुकान पर तीन की जगह चार मांस लटकते।''

मैं धप से सड़क पर बैठ गया। एक आँधी-सी चली और मुझे इस भिक्षुक के बाल कभी ठुड्डी पर लटकते कभी सिर पर उछलते दिखाई दिये। और एक ऍंधेरे में मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा कि स्वयं मुझे ही उलटा टाँग दिया गया है और मेरी पीली-पीली खाल उतार दी गयी है...पर मैं तो तीसरे प्रकार का मानव था, मेरी खाल क्यूँ उतरती? इस बात का ढाढस बाँधते हुए भिक्षुक ने मेरा हाथ थाम लिया।

''तुम लोग मछली के उस पार रहने वाले बनते बहुत हो, बड़ी नेमत को खाते नहीं, मियाँ चख के देख लो एक बार। मन मार-मार के क्यूँ बर्बाद कर रहे हो।''

''बाबा-बाबा'' मेरी घिघ्घी बँध गयी और पैर जो दौड़ना चाहते थे केवल हिलते रहे। ''बाबा-बाबामुझे मछली के पार धकेलो। बाबा मछली के पार...''

''हँ-इनसान जैसे नेमत को खाते नहीं...''

''आख्ख़ थू, बाबा थू-थू-थू...''

''थूकना तो देखिए इनका।''

''थू-थू-थूआख्ख़ थू...''

''इनसान से बूँद-बूँद चूस लेते हैं। बोटियाँ उतारते हैं। बोटियों को भूनते हैं, खाते नहीं।''

''थू-थू-थू-बाबा-थू ।क्या कहा ? भूनते हैं? थू ,हम? इनसान की बोटी को? थू-थू-थू बाबा, बाबा इनसान। प्राणिवर्ग में सबसे उत्तम, संसार की प्रगति की आख़री मंजिल इंसान ! वही जिसके आगे फरिश्तों ने सजदा किया था। जिसके रूप में अवतार आये। इंसान...इंसान...''

''हाँ-हाँ। यह भूनना भी क्या हुआ? थोड़ा देखिए तो...''

भिक्षुक ने हाथ लहराया और धरती की गाँठ खुल गयी और एक आत्मा भभक उठी, मैं अपना दामन मुँह और नाक में ठूँस कर कराहने लगा। भिक्षुक ने मेरी गर्दन पर अपना भारी हाथ रखा और मुझे आँखें खोलने पर मजबूर कर दिया। देखता क्या हँ कि गन्दा धुआँ उठ रहा है। धुएँ के नीचे एक नगर का आकार है, वही अपनी गलियाँ हैं। गली-गली में कूड़ा जल रहा है और कूड़े पर मांस के लोथड़े सड़ रहे हैं। धुआँ इनसे भी उठ रहा है। पर कूड़े में लोथड़े की तरह ये धुआँ भी अलग है। इसकी रंफ्तार भारी है। भभक में जो सड़े तीव्र नाखून हैं, धुएँ की यही अलग-अलग गहरी-गहरी लकीरें हैं।

''कूड़े में भून रहे हैं बड़ी नेमत को! देखो तो सही। खटोलों के परवाने और सड़े हुए बाण; गन्दी और गली हुई बोटियाँ, काली पूछें। इन्हीं की आग में भूनना चाहते हैं बड़ी नेमत को। और जब धुआँ उठता है, मुँह नाक में दामन ठूँसने लगते हैं। बदबू नहीं तो क्या ख़ुशबू उठती।''

आँखें फाड़-फाड़कर फिर देखा तो वही अपनी गलियाँ थीं, अपनी बस्तियाँ, मछली के उस पार की। वह लोथड़े नहीं अपने ही चेहरे थे। वही टाँगें, वही जाँघें।

भिक्षुक ने मेरी थूक मेरे ही अन्दर उतार दी। मेरे धड़कन दबा दी। और जब मैंने कुछ लाशों को बोरों, मेंजों, किताबों में जलते देखा जाने क्यूँ मैं उसका ध्यान इस अन्तर की ओर आकर्षित करवाना चाहता था। पर ऐसा न हुआ। मुझको उसने अनुभवहीन बना दिया। अब मैं या तो नीचे खाई में या इसकी आँखों में देख सकता था। भिक्षुक ने एक मोटा थूक निकाला और उसी खाई में फेंक कर कहा

''आख्ख़़ थू! इस अज्ञानता पर और इस गन्दगी पर। ये भभक कुछ और देर तक आती रही तो अपना वातावरण गन्दा हो जाएगा। जाने क्या-क्या बीमारियाँ फैलेंगी यहाँ'' उसने हाथ लहराया और वह खाई भर गयी।

उसने एक दरवाजा खोला और मुझे एक गर्म घर के अन्दर ले गया। उसके घर की दीवारों पर प्रकाश फिसल-सा रहा था और धरती ऐसी जैसे दूध से धोया गया हो। एक कोने में सुनहरी ईंटों की एक समाधि-सी थी। जिस पर कई दीये जल रहे थे। दीये की लौ एक जैसी थीं। लौ का रंग ंखून जैसा था जैसे कई छोटी-छोटी खून से लथपथ जीभें एक साथ निकल रही हों। दीयों के ऊपर चाँदी जैसे धातु के दायरे खड़े थे जिन पर इसी धातु के कई बड़े-बड़े हाँडे चढ़े हुए थे। हाँडियों में कुछ उबल रहा था। इनमें से भपकारे ऐसे निकलते थे जैसे इनके नीचे मनों ईंधन जल रहे हों। और हर भपकारे के साथ फ्लेबर की ऐसी लहर निकलती थी कि मेरे प्राण शरीर के शेष भाग को छोड़कर नाक से मस्तिष्क तक जो गली है उसमें आ बसे।

एकाएक इस कमरे के आगे एक और दरवांजा खुला जहाँ मूँछ समेत सर थे। दाढ़ी वाले चेहरे थे, छिली हुई जाँघ, अधछिले फुसफुसे पिंडे, फिरी हुईं पुतलियाँ, निकले हुए जीभ, बैठे हुए जबड़े, फेफड़े, दिल इत्यादि। ख़ुशबू थी या बदबूवहाँ वास से फ्लेबर तक न मोड़ दिखाई दिये न मंजिलेंमेरे प्राण नाक की उसी गली में फँसकर फुदकने लगे। निकली हुई जीभों ने मेरे कानों में जैसे चीख़ना प्रारम्भ किया और मैं अपने मुँह को मूँछों समेत दामन से लिपटाकर रोने लगा।

''बदबू कहाँ है जो मुँह को लपेटे हुए हो। देखते नहीं बड़ी नेमत मसाले में धोयी जा रही है। कितना अकड़ा हुआ वो मांस है। ताजा है। कनपटियों के नीचे देखो, खून अभी लाल है। मियाँ यहाँ तुम्हारी अधूरी सभ्यता, तुम्हारी नीम हकीम विज्ञान की फूहड़ विधियाँ नहीं हैं। बड़ी नेमत आग पर पकायी जाती है। मसाले के भाप में बड़ी नेमत और फिर बदबू?''

मेरे पैर में हिलने की शक्ति तो नहीं, मेरा सारा शरीर एक स्थान पर गड़े हुए कल की तरह खट-खट-खट-खट हिलने लगा। और मेरा सिर एक दीवानगी में अपने सीने में घुसने की कोशिश करने लगा। फिर जैसे सीना खुल गया और मैं अपने सीने में घुस भी गया। देखा कि वहाँ कई किताबें पड़ीं हैं। कई भाषाओं में। दायें से बायें, बायें से दायें कई प्रकार के अक्षरों की भरमार थी। पर जब मैंने पढ़ने की कोशिश की और उसमें लीन हो जाना चाहा अक्षर क्रमश: मिटते चले गये और इसी उदासी में अन्दर-ही-अन्दर मेरी चीख़ निकलती चली गयी। भिक्षुक बोलता गया

''और यह है वह मांस, अच्छी तरह सफाई की आवश्यकता है। इसकी बोटियाँ यूँ नहीं काटी जातीं। उसके लम्बाई में दो भाग किये जाते हैं। मुँह, नाभि औरये देखो दो हो गये। इसी लम्बाई में टुकड़े किये जाते हैं। ख़ुशबू में धोया जाएगा। फिर ये मांस मीठे रस में पकाया जाएगा। फिर इसकी वी चींज बनेगी जिसे जनशीरनी कहते हैं। बड़ी स्वादिष्ट होती है।''

खट-खट-खट-खट...

सारा शरीर मिश्रित होता गया, सिर कभी धड़ में, कभी बाहर होता रहा। ये देखकर मेरे मुँह में थूक जमा हो गया। जिसको मैं थूकना चाहता था पर वह थूक अन्दर चला गया। भिक्षुक ने फिर हाथ लहराया

देखता क्या हँ कि वही अपनी खलबली रेलमपेला, एक जलूस, जलूस क्या जैसे एक जलते हुए शहर का धुआँ फैलता जा रहा हो। वही दाढ़ियाँ, वही चोटियाँ, वही शलवार, वही धोतियाँ, पत्थर, ईंटें, भाले, बरछे और वही नारे और भीड़ के बीच में पाँच हल्की-हल्की, सफेद-सफेद झुकी-झुकी मूर्तियाँ, पर सूत का धागा न था। इनमें वह भी स्पष्ट थे जिनको मैंने कभी देखा न था। मेरा सिर पूरी तरह सीने से बाहर आ गया। मेरी गर्दन लम्बी हुई। और मैंने इस गर्म घर के भयानक दृश्य की तरफ से आँखें मोड़ीं और इन्हीं मूर्तियों को देखने लगा। कुछ अपने से लोगों को देखकर साहस बढ़ा। शरीर का खट-खट रुक गया। दिल में मानवीय भावनाएँ उभरने लगीं। अब मैं बोलना चाहता था कि देख यह है जनशीरनी का वो मसाला जिसने हमारे यहाँ उत्तम गानों को जन्म दिया। सवोत्तम साहित्य को सँवारा। कला के बड़े-बड़े माहिर पैदा किये। पर भीड़ में एक दराँती लहरायी और एक मूर्ति का सीना बिगड़ गया। मूर्ति गिरी और एक नारा ऊँचा हुआ और दूसरी मूर्तियों की टाँगों में ऐंठन होनी शुरू हुई और मेरी जगह वही खट-खट करने लगीं।

''तौबा-तौबा इतने फूहड़ तो हमारे बच्चे भी नहीं। यह वस्तु भला दराँती से उतारने की थी। देखो तो? जैसे चीलों ने नोंच खाया हो।''

मैंने भीड़ की ओर फिर देखा। मूर्तियाँ काले कोलाहल में ऐसे गुम हो गयीं जैसे गरजती टकराती घटाओं ने नन्हीं-नन्हीं बिजलियाँ निगल ली हों। भिक्षुक ने हाथ वापस लहराया

''और यह है शीरख्वार मांस। इसकी तो केवल बिरयानी बनती है। ये मांस आँच कम लेता है और समय भी कम''

''भिक्षुक-भिक्षुक!!'' मेरा सीना भी मानो बाहर आ गया था और बोल रहा था

''भिक्षुक तुझे क्या हुआ है। तू स्वयं मानव है तेरा भी मांस है। तेरे बच्चे होंगे। उनकी भी बिरयानी हो सकती। भिक्षुक...''

खट-खट-खट''भिक्षुक...भिक्षुक।''

''पर ये मांस तो अल्पसंख्यकों का है। हमारा मांस कैसे बन सकता है।''

''पर मछली के उस पार भिक्षुक...''

भिक्षुक ने फिर हाथ लहराया फिर वही कोलाहल धुएँ में से एक सूरमा निकल आया और एक पहलवान। दोनों ने एक बच्चे को दीवार के साथ फैलाया और मांस मलाई में एक लम्बी कील ठोंक दी। बच्चे का सीना गिरी हुई मलाई की तरह बिखर गया। और नारे फिर तीव्र हुए। किसी ने एक और की बोटियाँ उतार दीं और उनसे एक माँ की गोद भरी और किसी ने गिन-गिन के दर्जनों को आग में झोंक दिया। एक और आया और उसने बच्चे को तीन मंजिले से सड़क पर पटक दिया और बच्चा एक धब्बे की तरह बिखर गया।

''कितनी बिरयानी बर्बाद हो गयी! ये घाटा ये छीछालेदर।''

इसने हाथ वापस लहराया तो देखता क्या हँ कि सुनहरी समाधि पर कड़ाही में तेल कड़कड़ा रहा है। एक मूँछ समेत सर आँखें खोल धीरे-धीरे लाल हो रहा है। और तेल के भँवर में लहरें कभी आँखों में, कभी नाक में घुसकर भीतर के स्वाद को जला रही हैं।

''ये विधियाँ ये सुगढ़ता, कब आएगी इन लोगों को।''

खट-खट-खट-खट। ''ब-ब-बस कर भिक्षुक। त-त-ततुम अपनी विधियाँ'', भिक्षुक ने अब के ंकहंकहा लगाकर कहा

''भाई मैं कब कहता हँ कि तुम लोग अज्ञानी हो मैं तो कहता हँ कि बस एक ंकदम शेष है। बस तुम्हारा शिष्टाचार इतना ही, इस मंजिल की व्याख्या चाहता है। जिसकी तरफ तुम आते तो ंजरूर हो, पर झिझककर, सफाई से नहीं, तरींके से नहीं। और तुम जो ंकिस्मत से इधर आ गये हो तुम्हें तो इनसान बना के ही भेजेंगे।''

''आख्ख़़ थू-थू-थूभिक्षुकथू...''

''तुम्हें पवित्र बनाना है। जबरदस्ती खिलाएँगे। जानवर का मांस नहीं, गाय और सुअर का नहीं हम तुम्हें बड़ी नेमत खिलाएँगे।'' और उसने इस लाल-लाल,दहकते हुए सिर को एक मूँछ से पकड़कर कड़ाही में से निकाला।

मेरे पेट में चक्की ऐसी घूमी कि मेरा सारा शरीर हिला और मैं उछल पड़ा।

देखता क्या हँ कि बैठक में घर के लोग हँसकर लोट-पोट हो रहे हैं। और कमरे में वही मछली बसी हुई है। वह सब हँसते गये और मैं फ्लेवर से बाहर भागते हुए बारिश में सँभला।

मेरी पत्नी भी बाहर आ गयी। ''क्यूँ जी क्या बात है?''

''कुछ नहीं कुछ नहीं। मन उलटी-सा कर रहा है। उलटी आ रही है।''

''मन उलटी-सा कर रहा है तो थोड़ी-सी मछली चख लीजिए ना...कहो तो सिर ला दूँ।''


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