डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

अन्य

हम और हमारे पड़ोसी राष्ट्र
प्रो. मुचकुंद दुबे


माननीय कुलपति महोदय श्री विभूति नारायण राय, इस मंच पर उपस्थित गण्यमान्य लोग एवं इस सभा में शरीक मित्रो, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस को मनाने में आपके साथ शामिल होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। इस अवसर पर यहाँ मुझे आमंत्रित कर आदरणीय कुलपति जी ने मेरे ऊपर अपार कृपा की है और अतीव गौरव प्रदान किया है। इसके लिए मैं उनका बहुत आभारी हूँ। यह विश्वविद्यालय अपने आप में एक अनूठी संस्था है। इसका उद्देश्य है हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी को सभी संभव साधनों से समृद्ध और सबल बनाना, जिससे यह विश्व रंगमंच पर अपना उचित स्थान ग्रहण कर सके। यह उद्देश्य सारे हिंदी प्रेमियों - जिसमें मैं अपने को शामिल करता हूँ - की अभिलाषा के अनुकूल है। इसके अलावा मुझे यह जानकर भी बहुत खुशी हो रही है कि यहाँ के पाठ्यक्रम, अध्यापन शैली एवं जीवन-यापन में गांधीजी के विचारों से प्रेरणा ली जाती है। वर्धा-नगरी का गांधीजी की कर्मभूमि के रूप में प्रत्येक भारतीय के हृदय में स्थान है। यह शहर हमारे स्वतंत्रता-संग्राम के बलिदान से, एवं उसके अरमानों से जुड़ा है। इसका मैंने अब तक नाम ही सुना था। पर आज यहाँ आकर मुझे जितनी प्रसन्नता हो रही है, उसका मैं अनुमान भी नहीं लगा सकता।

मैं अपने इस व्याख्यान के द्वारा भारत की विदेश नीति के एक अहम पहलू पर प्रकाश डालना चाहता हूँ। और वह है - अपने पड़ोसी राष्ट्रों से अपने संबंध किस तरह निभाए जाएँ। प्रत्येक राष्ट्र अपनी विदेश नीति के प्रतिपादन एवं संचालन में पड़ोसी देशों के साथ के संबंधों को उच्चतम प्राथमिकता प्रदान करता है। इसका मुख्य कारण यह है कि दुनिया के अन्य राष्ट्र हमें अपने पड़ोसियों की निगाहों से ही देखते हैं। विश्व रंगमंच पर हमारी प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि पड़ोसी राष्ट्रों से अच्छे संबंध निभाने पर निर्भर करती है। पड़ोसियों के साथ प्रतिकूल संबंध विश्व राजनीति में वांछित रोल अदा करने में सबसे बड़ी बाधा साबित हो सकती है। मसलन, मेरी समझ से जब तक पाकिस्तान के साथ के हमारे रिश्तों में तल्खी बनी रहेगी, तब तक कोई भी भारतीय संयुक्त राष्ट्र संघ का महासचिव नहीं हो सकता। इसके अलावा यू.एन. सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने के मार्ग में भी सबसे बड़ी बाधा है, पाकिस्तान के साथ का हमारा प्रतिकूल संबंध।

पड़ोसियों के साथ के हमारे संबंध का प्रत्यक्ष असर हमारी सुरक्षा पर पड़ता है। इसमें सामरिक और गैर-सामरिक, दोनों प्रकार की सुरक्षा शामिल है। चीन और पाकिस्तान से हमारी सुरक्षा को प्रत्यक्ष सामरिक खतरा है, जबकि अन्य सभी पड़ोसी राष्ट्रों से हम गैर-सामरिक खतरे के साये में हैं। इन गैर-सामरिक खतरों में शामिल हैं : इन देशों के आंतरिक जातीय कलह के भारत तक फैलने की संभावना, वहाँ से बड़े पैमाने पर अवैध प्रवसन का खतरा और उनके द्वारा भारत में आतंक फैलाने वाले तत्वों को पनाह देना। यह कई सूत्रों से प्रमाणित हो चुका है कि पाकिस्तान, नियंत्रण रेखा एवं अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन कर भारत में दहशत फैलाने के कार्य में आतंकवादियों की मदद कर रहा है। इसके लिए पाकिस्तान की सरकार ने उन्हें अपनी संस्थाएँ एवं प्रशिक्षण केंद्र चलाने की अनुमति दी है। यह पाकिस्तान की जम्मू और कश्मीर में विद्रोह भड़काने एवं भारत की राजनीतिक स्थिति को अस्थिर बनाए रखने की रणनीति का एक अविभाज्य अंग है। बंगलादेश ने कई सालों से असम संयुक्त मुक्ति मोर्चा एवं अन्य गिरोहों को भारत में दहशत फैलाने के लिए अपने सीमावर्ती इलाकों में प्रश्रय दे रखा है और प्रशिक्षण केंद्र चलाने की इजाजत दी है। इस प्रकार, हमारे इस पड़ोसी राष्ट्र ने भारत के उत्तर-पूर्वी इलाके में अस्थिरता बनाए रखने में मदद की है। बंगलादेश से भारत की सुरक्षा के लिए दूसरा गैर-सामरिक खतरा है - वहाँ के नागरिकों का बड़े पैमाने पर भारत में गैर-कानूनी प्रवसन। इससे भारत के सीमावर्ती इलाकों में कानून-व्यवस्था की समस्या जटिल हो गई है और वहाँ के बाशिंदों का आर्थिक और सामाजिक बोझ गुरुतर हो गया है। बंगलादेश और श्रीलंका, दोनों पड़ोसियों से भारत ने जातीय हिंसा एवं अल्पसंख्यकों पर हुए जुल्म से त्रस्त शरणार्थियों के प्रवेश की समस्या का सामना किया है। बंगलादेश से चकमा (बौद्ध) एवं हिंदू शरणार्थी और श्रीलंका से तमिल शरणार्थी भारत में आते रहे हैं।

नेपाल के असहयोग के कारण भारत और नेपाल से होकर बहनेवाली किसी भी नदी के पानी के उपयोग के लिए बाँध बनाना संभव नहीं हो पाया है। इसके चलते भारत को अपार क्षति हो रही है। नदियों में गाद भर रहा है जिससे भारत के मैदानी इलाकों में आनेवाले बाढ़ों की संख्या और तीव्रता में काफी वृद्धि हुई है। इसके चलते जान-माल की अपार क्षति हो रही है। नेपाल के असहयोग के कारण इन नदियों की बेशुमार जलविद्युत क्षमता का दोहन नहीं हो पा रहा है और न ही सूखाग्रस्त गंगा-सिंचित भारतीय भूमि में सिंचाई के लिए इन नदियों के पानी का प्रयोग हो पा रहा है।

पड़ोसी राष्ट्र आर्थिक मामलों में हमारे स्वाभाविक सहयोगी हैं। इसका कारण है : भौगोलिक समीपता, सामान्य भाषाएँ, धर्म एवं खान-पान की प्रणाली और उपनिवेशकाल से चली आ रही सामान्य संस्थागत एवं भौतिक संरचना। इन साधनों से सेवाओं एवं वस्तुओं के आदान-प्रदान में होने वाले खर्चों में कमी होती है जिससे दक्षिण एशिया के बाहर के देशों की अपेक्षा भारत को तुलनात्मक फायदा होता है। 1977 में श्रीलंका और 1982 में बंगलादेश द्वारा व्यापारिक उदारीकरण नीति के अपनाने के बाद भारत के लिए इन देशों के बाजारों में ये फायदे बड़े पैमाने पर प्रतिफलित हुए। भारत इन देशों को सर्वाधिक निर्यात करने वाले राष्ट्र के रूप में उभर कर आया है। बंगलादेश के बाजार में निर्यात करनेवालों में हम अपना पहला स्थान 2005-06 तक बनाए रख पाए। उस साल चीन ने हमें दूसरे स्थान पर ढकेल दिया और अबतक स्थिति यथावत है। श्रीलंका के बाजार में साल 2000 में भारत-श्रीलंका मुक्त बाजार संधि के अमल में आने के बाद भारत ने पहला स्थान बना लिया, जो स्थिति अब तक कायम है।

1982-83 में बंगलादेश को हमारा निर्यात 43.33 मिलियन डॉलर का था। 2008-09 में यह बढ़कर 3.5 बिलियन डॉलर के बराबर हो गया। ताजातरीन आँकड़ों के मुताबिक यह अंक बढ़कर करीब 4.5 बिलियन डॉलर हो गया है। भारत से बंगलादेश का गैर-कानूनी यानी तस्करी-आयात उतना ही है जितना कानूनी आयात। अगर हम इन दोनों रकमों को जोड़ दें तो भारत का बंगलादेश को जाने वाला कुल निर्यात करीब 9 से 10 बिलियन डॉलर का है। यह रकम और भी बड़ी हो जाएगी अगर हम इसमें बंगलादेश को जानेवाली सेवाओं से होनेवाली आमदनी को जोड़ दें। सेवाओं से आमदनी उन बंगलादेशियों से होती है जो शिक्षा प्राप्त करने या डॉक्टरी इलाज के लिए भारत आते हैं। इस श्रेणी में आनेवालों की संख्या काफी बड़ी है।

भारत-पाकिस्तान के बीच का व्यापार दशकों से नियंत्रित और सीमित रहा है। पाकिस्तान भारत को एम.एफ.एन. (मोस्ट फेवर्ड नेशन) की सुविधा नहीं देता है। इसका मतलब है, यह देश हमें अन्य देशों की तुलना में समानता से व्यापार करने नहीं देता। हम पाकिस्तान को उन्हीं सामानों का निर्यात कर सकते हैं जो पाकिस्तान द्वारा बनाई गई भारत से आनेवाले सामानों की सूची में शामिल हैं। इस प्रतिबंध के बावजूद, 2007-08 में पाकिस्तान को भारत का निर्यात करीब 2 बिलियन डॉलर था, जबकि 2001-02 में इस देश को भेजा जाने वाला हमारा निर्यात केवल 144 मिलियन डॉलर था। इससे संकेत मिलता है कि हमारे निर्यात में पिछले कुछ वर्षों से काफी वृद्धि हो रही है। अनुमान लगाया गया है कि सिंगापुर और दुबई से होकर पाकिस्तान को भेजा गया हमारा अवैध निर्यात 1 और 2 बिलियन डॉलर के दरमियान है। यह भी अनुमान लगाया गया है कि यदि पाकिस्तान भारत के साथ एमएफएन के आधार पर व्यापार करना शुरू कर दे तो दोनों देशों के बीच का कुल व्यापार 5 साल के अंदर बढ़कर 10 बिलियन डॉलर एवं 10 साल के अंदर 25 बिलियन डॉलर पहुँच जाएगा।

इन आँकड़ों से पता चलता है कि आर्थिक एवं व्यापारिक दृष्टि से पड़ोसी राष्ट्र हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं और उनके साथ के हमारे संबंधों के सामान्य एवं प्रगाढ़ होने से हम और हमारे पड़ोसी राष्ट्रों की प्रगति एवं सुख-समृद्धि में कितनी वृद्धि हो सकती है।

भारत जैसे अनेकवादी समाज के लिए पड़ोसी राष्ट्रों के साथ अच्छा संबंध निभाना और भी आवश्यक हो जाता है। पड़ोसी राष्ट्रों में होने वाली घटनाओं का अपने अनेकवादी समाज को एकबद्ध रखने की हमारी क्षमता पर बहुत बड़ा असर पड़ता है। मसलन, यदि बंगलादेश या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का बड़े पैमाने पर हनन या उनके साथ अत्याचार के कांड हों तो उसके प्रतिक्रियास्वरूप भारत में सांप्रदायिक दंगे भड़क सकते हैं जिससे हमारे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसका उलटा होना भी उतना ही सही है। अगर भारत में अल्पसंख्यकों की जान-माल पर आघात होता है, तो हमारे पड़ोसी राष्ट्रों की अपने अनेकवादी समाज की रक्षा करने की क्षमता कमजोर हो जाएगी। इसके चलते उन देशों के अल्पसंख्यक - बौद्ध, हिंदू, ईसाई - तबाह हो जाएँगे।

पड़ोसियों से संबंध बनाए रखने की समस्याएँ

( क) राष्ट्रीय पहचान का संकट

पड़ोसी राष्ट्रों से संबंध निभाने में भारत को कुछ विशिष्ट समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उनमें सबसे प्रमुख है राष्ट्रीय-पहचान की समस्या। हमारे सभी पड़ोसी राष्ट्र हमारे रूबरू राष्ट्रीय पहचान के संकट का अनुभव करते हैं। वह प्रत्येक वस्तु, गुण या तत्व जिसे वे अपना बनाना चाहते हैं या जिसके साथ वे तादात्म्य स्थापित करना चाहते हैं, उन्हें भूतपूर्व भारतीय उपमहादेश से थाती के रूप में मिला है। यह चाहे वह उनका इतिहास हो या उनकी भाषा, उनका धर्म, कला, रहन-सहन, रीति-रिवाज, किंवदंतियाँ या लोकवार्ता। अपने राष्ट्रीय आत्म-पहचान को अभिव्यक्त करने या दावेदार बनने के लिए वे जिस दिशा में भी मुड़ते हैं वहाँ वे भारत की लंबी गहरी छाया सतत विद्यमान पाते हैं। इस कारण वे अपने को भारत से भिन्न साबित करने के लिए तरह-तरह के अजीब साधनों एवं उपायों का सहारा लेते हैं। विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में वे इतिहास को विकृत करते हैं, मान्य तथ्यों एवं आँकड़ों को तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं। भारतीय उपमहादेश के विश्वविख्यात और पहचान-प्राप्त भोजन, पोशाक, संगीत एवं नाट्य शैली को पाकिस्तानी, बंगलादेशी, नेपाली आदि पुकारना शुरू कर देते हैं। इसी वजह से भारत से पुस्तक, कैसेट, वीडियो एवं अन्य सांस्कृतिक सामग्रियों के आयात पर भी वे प्रतिबंध लगा देते हैं और भारतीय सांस्कृतिक प्रतिनिधियों या मंडलों को अपने यहाँ आने से रोक देते हैं। उन्हें भय है कि यदि वे ऐसा प्रतिबंध या नियंत्रण बनाए न रखें तो उनकी राष्ट्रीय आत्म-पहचान बनाने की चेष्टा विफल हो जाएगी। इसके बावजूद इन देशों के लोगों की एक दूसरे के नजदीक आने की इतनी उत्कट अभिलाषा है कि जब कभी राजनीतिक संबंधों में सुधार होता है, सांस्कृतिक आदान-प्रदान की शुरुआत हो जाती है।

राष्ट्रीय आत्म-पहचान के संकट से उत्पन्न होनेवाली समस्या का सामना भारत प्रत्येक पड़ोसी राष्ट्र से करता है। परंतु, पाकिस्तान के साथ यह समस्या तीव्रतर रूप धारण कर लेती है। इसका कारण यह है कि इस पड़ोसी के साथ राष्ट्रीय आत्म-पहचान की समस्या के अलावा ''एक-धर्म-एक-राष्ट्र'' के सिद्धांत (टू नेशन थ्योरी) की समस्या जुड़ जाती है। पाकिस्तान-निर्माण में अग्रणी मुहम्मद अली जिन्ना एवं अन्य नेताओं ने दलील दी थी कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं जो साथ नहीं रह सकते। इसलिए इन दोनों धर्मानुयायियों के लिए दो अलग-अलग राष्ट्रों का निर्माण होना चाहिए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के गाँधी, नेहरू एवं मौलाना आजाद जैसे नेताओं ने इस तर्क को नहीं माना। अंततः, ''एक-धर्म-एक-राष्ट्र'' के सिद्धांत के आधार पर पाकिस्तान बना, जबकि नया भारत धर्मनिरपेक्षता के आधार पर गठित हुआ। यदि इतना ही होता तो कोई विपत्ति नहीं होती। परंतु, दुर्भाग्यवश पाकिस्तान ने धर्मनिरपेक्ष भारत को अपने ''टू नेशन थ्योरी'' पर आधारित अस्तित्व पर सबसे बड़ा, मूलभूत और दायमी खतरा समझा। इसलिए इसके शासक वर्गों ने भारत के साथ अनवरत शत्रुता की नीति अपनाई। इन्होंने न केवल अन्य पड़ोसियों की तरह भारत से एक पृथक पहचान बनाने की चेष्टा की, बल्कि भारत के प्रतिकूल पहचान बनाने में संलग्न हो गए। इन्होंने न केवल भारत उपमहादेशीय इतिहास, संस्कृति आदि को विकृत करना शुरू कर दिया, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्षता के ऊपर खुल्लमखुल्ला प्रहार करना भी शुरू कर दिया। ये भारत को एक हिंदू राष्ट्र एवं भारतीय धर्मनिरपेक्षता को एक ढोंग के रूप में चित्रित करने में लग गए। इसका कारण यह था कि यदि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में खरा उतरा तो पाकिस्तान की ''टू नेशन थ्योरी'' की धज्जी उड़ जाती और इसके ऊपर आधारित पाकिस्तानी राज्य वहाँ की ही जनता की नजर में खोखला दीखने लगता। 1971 में बंगलादेश के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक कारणों से पाकिस्तान से अलग होने के कारण ''एक-धर्म-एक-राष्ट्र'' के सिद्धांत पर गहरा आघात पहुँचा। परंतु, पाकिस्तान इस नीति पर अभी भी अडिग है और इसका परिणाम भारत को अभी भी भोगना पड़ रहा है।

कश्मीर पर पाकिस्तान का दावा इसी ''एक-धर्म-एक-राष्ट्र'' के सिद्धांत पर टिका है। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने उच्चतम स्तर पर, कश्मीर को भारत-विभाजन का एक अपूर्ण एजेंडा करार दिया है। उनका मानना है कि एक राज्य के रूप में पाकिस्तान तब तक पूर्ण नहीं होगा जब तक मुस्लिम-बहुल कश्मीर इसका एक हिस्सा नहीं बन जाता। पाकिस्तान के इस तर्क का परिणाम भारत के अन्य मुसलमानों के लिए एवं स्वतः पाकिस्तान के लिए भी भयावह हो सकता है।

''एक-धर्म-एक-राष्ट्र'' के पाकिस्तानी सिद्धांत का दूसरा दुष्परिणाम है, पाकिस्तानी हुक्मरानों द्वारा भारतीय मुसलमानों की स्थिति को लेकर भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करना। जब कभी पाकिस्तान की निगाह में भारतीय मुसलमानों पर जुल्म होता है या उनके मानवाधिकार का हनन होता है तो पाकिस्तान न केवल द्विपक्षीय स्तर पर भारत सरकार के समक्ष यह मामला उठाता है बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इसे उछालता है। इसके द्वारा यह न केवल अपने लोकमत का तुष्टीकरण करता है, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्षता की नीति का भी उपहास उड़ाता है।

पाकिस्तान परवाह नहीं करता कि इसकी इस नीति से भारतीय मुसलमानों के हितों की कितनी क्षति होती है क्योंकि पाकिस्तानी हस्तक्षेप की प्रक्रिया में वे राष्ट्रीय जीवन की मूल धारा से विमुख हो जाते हैं।

दुनिया में बहुत ऐसे राज्य हैं जिन्होंने धर्म के आधार पर अपने को संगठित किया है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि वे अन्य सिद्धांतों के आधार पर संगठित दीगर राष्ट्रों से शत्रुतापूर्ण व्यवहार करें। ''एक-धर्म-एक-राष्ट्र'' के सिद्धांत की अनुसरण-प्रक्रिया में पाकिस्तानी शासकों ने जान-बूझकर अपने देश में उग्र एवं कट्टर धार्मिक गिरोहों को पाला-पोसा है, समर्थन किया है और भारत के खिलाफ उपद्रव मचाने एवं साजिश रचने में उनका इस्तेमाल किया है। परिणामस्वरूप, इन गिरोहों की शाखा-प्रशाखा एवं प्रभाव पाकिस्तान की सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में व्यापक रूप से फैल गया है। अब तो ये पाकिस्तानी राष्ट्र को ही निगलने पर आमादा हो गए हैं।

( ख) छोटे राष्ट्र एवं बड़े राष्ट्र की स्वाभाविक बर्ताव-प्रणाली

पड़ोसी राष्ट्रों से संबंध निभाने में भारत जिस एक अन्य अनूठी समस्या का सामना करता है उसे कहा जा सकता है : छोटे-राष्ट्र, बड़े-राष्ट्र की स्वाभाविक बर्ताव-प्रणाली (बिग नेबर, स्मॉल नेबर सिंड्रोम)। यह लक्षण भारत एवं उसके पड़ोसी राष्ट्रों, दोनों पक्षों के नीति-निर्धारण में प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसके कारण, अपने पड़ोसियों से समीप आने के लिए की गई भारत की सभी पहलकदमियों को ये राष्ट्र संदेह की निगाह से देखते हैं। इनमें वे केवल नकारात्मक पक्ष ढूँढ़ते हैं और जान-बूझकर उनको तूल देते हैं। अपने देश में प्राकृतिक कारणों से भी जो संकट आता है, उसे वे भारत की साजिश मानते हैं। मसलन, बंगलादेश में नदी तटवर्ती इलाकों में जो भी आर्थिक या सामाजिक संकट घटता है, उसकी जिम्मेदारी भारत के मत्थे मढ़ी जाती है। कहा जाता है कि फरक्का बैरेज के पास पानी निकालने से नदियों के पानी में खारापन के बढ़ने के कारण ऐसी स्थिति आई है। बंगलादेश और भारत की सीमा के आर-पार जो तस्करी होती है, उसे बंगलादेश के अखबार भारत द्वारा बंगलादेश की संपत्ति को लूटने का इरादा समझते हैं। बंगलादेश में बाढ़ के प्रकोप का कारण माना जाता है - भारत द्वारा दोनों देशों के बीच बहने वाली नदियों के ऊपरी भाग में जानबूझकर पानी छोड़ना। नेपाली अखबार अपने देश में मुद्रा-स्फीति को भारतीय मुद्रा-स्फीति का परिणाम समझते हैं अथवा भारत द्वारा अत्यावश्यक सामग्रियों की पूर्ति को रोक देने का परिणाम। दूसरी ओर, इस लक्षण का उलटा परिणाम यह है कि भारत छोटे पड़ोसी राष्ट्रों की परवाह नहीं करता एवं उनकी समस्याओं, अरमानों एवं अपेक्षाओं पर ध्यान नहीं देता। भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं में पाकिस्तान के अलावा अन्य पड़ोसी राष्ट्रों को अहमियत नहीं दी जाती। भारत सरकार के कुछ उच्च-स्तरीय नीति-निर्माताओं ने छोटे पड़ोसी राष्ट्रों के साथ भद्र तिरस्कार (बिनाइन नेग्लेक्ट) की नीति अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने यह नहीं सोचा कि ये पड़ोसी राष्ट्र ऐसी नीति को अपमानजनक मानेंगे। छोटे राष्ट्रों के साथ के संबंधों में ठहराव या अल्पकालीन विराम का भी परिणाम प्रतिकूल होता है। पड़ोसी राष्ट्र इस तरह की हमारी नीति में उनके खिलाफ तरह-तरह की साजिश ढूँढ़ने लगते हैं। जब संबंध गतिहीन हो जाते हैं तो सालों के परिश्रम से निर्मित सहयोग के तंत्र बिखरने लगते हैं। इसका एक बहुत बुरा परिणाम होता है, इन देशों में भारत-विरोधी शक्तियों का आगे आना और भारत-समर्थक शक्तियों का पीछे हटना।

छोटे-राष्ट्र-बड़े-राष्ट्र के लक्षण के चलते छोटे पड़ोसी राष्ट्र हमारे साथ किसी बड़ी परियोजना में शामिल नहीं होना चाहते हैं। उनको यह भय होता है कि इसके चलते भारत के ऊपर उनकी निर्भरता में वृद्धि होगी और परिणामस्वरूप, उनकी सार्वभौमिकता पर खतरा मँडराने लगेगा। बंगलादेश का भारत को प्राकृतिक गैस बेचने से झिझकना या अपने भू-भाग से होकर भारत की व्यापार सामग्रियों के लिए पारगमन की सुविधा प्रदान न करने का मुख्य कारण यही भय है। शायद यही कारण है कि विगत 6 दशकों से नेपाल ने दोनों देशों से होकर बहनेवाली नदियों के पानी को प्रयोग में लाने के लिए किसी वृहत परियोजना के लिए अपनी स्वीकृति नहीं दी है। और यही कारण है कि पाकिस्तान ने भारत से मशीनों आदि अवकरणों के सस्ते आयात पर आधारित प्रतियोगी औद्योगिक ढाँचा खड़ा करने के बदले दक्षिण एशिया के बाहर के देशों से अधिक कीमत पर किए गए आयात के आधार पर औद्योगिक विकास किया है जो विश्व प्रतिस्पर्द्धा में खरा नहीं उतर सकता।

भारत के प्रति इन देशों के शासक वर्गों एवं आम जनता के कुछ तबकों में ऐसा भय और आशंका है कि वहाँ की सरकारें अपने को भारत-समर्थक घोषित करने से झिझकती हैं। 1999 के बंगलादेश के आम चुनाव में बंगलादेशी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वी अवामी लीग एवं उसके नेता शेख हसीना को भारत-समर्थक के रूप में दर्शाना शेख हसीना की हार का एक मुख्य कारण साबित हुआ। 1990 में नेपाल का प्रमुख राजनैतिक दल, नेपाली कांग्रेस लोकप्रियता की चोटी पर पहुँच गया था, क्योंकि इसने नेपाल में प्रजातांत्रिक प्रणाली के पुनर्स्थापन में प्रमुख रोल अदा किया था। परंतु, इसके परवर्ती वर्षों में इसकी लोकप्रियता में काफी ह्रास हुआ। इसका एक कारण था इसकी भारत-समर्थक छवि। यही कारण है कि भारत-समर्थक प्रमुख राजनैतिक दल और व्यक्ति भारत की प्रशंसा अपने घर के ड्रॉइंग रूम में बैठकर करना पसंद करते हैं, आम सभा में या खुलेआम बयानों से नहीं। इसके चलते जब पड़ोसी देशों में हमारे अनुकूल सरकार सत्ता में आती है, उस समय भी हमारे आपस के संबंध वांछित या उच्चतम स्तर छू नहीं पाते।

हम जिस प्रकार से पड़ोसी राष्ट्रों के साथ अपना संबंध निभाते हैं, उसमें भी अनेक खामियाँ हैं। पड़ोसियों से बर्ताव करने में हम प्रायः पूरी सावधानी नहीं बरतते। उनके प्रतिनिधियों का हम यथोचित सत्कार नहीं करते। उनके साथ सौदा तय करने में हम अल्पकालीन लाभ-हानि पर ज्यादा जोर देते हैं। मध्यवर्ती एवं दीर्घकालीन संभावनाओं की उपेक्षा करते हैं। महाकाली परियोजना पर समझौता करने के दरमियान 1990 में हमने बाँध के नीचे उपलब्ध पानी के प्रयोग के लिए नेपाल द्वारा की गई रॉयल्टी की माँग को ठुकरा दिया था, यह कहकर कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हमारी ऐसी कोई जवाबदेही नहीं है। ऐसा कर हम कानूनी धरातल पर तो सही खड़े रहे, लेकिन हम यह भूल गए कि यदि हम रॉयल्टी देकर इस परियोजना के लिए नेपाल की सहमति प्राप्त कर लेते तो भारत को पनबिजली, सिंचाई के पानी आदि के रूप में अरबों डॉलर का लाभ होता और वह लाभ सालों-सालों तक मिलता रहता। इसी प्रकार, हम भारतीय बाजार में बंगलादेश के उनके निर्यातों के निर्बाध और एकतरफा प्रवेश की माँग को सालों तक ठुकराते रहे, इस भय से कि इससे भारत के कुछ घरेलू उद्योगों पर बुरा असर पड़ेगा। पर हम यह भूल गए कि बंगलादेश के निर्यात के बढ़ने से उसकी भारत से आयात करने की क्षमता में वृद्धि होगी, क्योंकि बंगलादेश के बाजार में भारत अन्य देशों से प्रतिस्पर्द्धा में अग्रणी है।

( ग) पड़ोसियों को भारत से खतरे का डर

एक उभरती विश्व-शक्ति के रूप में, भारत के लिए जरूरी है कि यह अपनी सामरिक क्षमता को बढ़ाए जिससे दक्षिण एशिया के बाहर के देशों से इसकी सुरक्षा पर आँच न आए और यह अपने विश्वव्यापी रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति कर पाए। दुर्भाग्यवश, भारत के इस प्रकार के कार्य या पहल से पड़ोसी राष्ट्र अपने ऊपर ही खतरे का एहसास करने लगते हैं। जब हम बड़े पैमाने पर अस्त्र-शस्त्र खरीदते हैं या परमाणु अस्त्रों का परीक्षण करते हैं या अपनी नौसेना का विस्तार करते हैं तो पड़ोसी राष्ट्र इसे अपने ही ऊपर खतरा समझते हैं। इसके चलते वे स्वयं अस्त्र-शस्त्र एकत्र करने में जुट जाते हैं एवं बाहरी शक्तियों के साथ साँठ-गाँठ करने लगते हैं। भारत के प्रति इस प्रकार की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान अत्यंत व्यस्त रहा है। दोनों देशों के अत्यधिक शस्त्रीकरण का यह एक मुख्य कारण बन गया है। और इसके चलते ही दक्षिण एशिया में परमाणु अस्त्रों की समस्या खड़ी हुई है।

पड़ोसी राष्ट्र यह समझने की चेष्टा नहीं करते कि दक्षिण एशिया के इतर क्षेत्रों या देशों में भारत को अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करनी है और इन देशों से इसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। अपने आर्थिक विकास-दर को उच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए हमें बाहर से कच्चे माल एवं ऊर्जा का आयात करना है; अपने व्यापार के लिए हमें समुद्री मार्ग खुले रखने हैं, हमें अपने समुद्र तट की रक्षा करनी है, हमें चीन से आने वाले सुरक्षा-संकट का मुकाबला करना है, हमें द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं बहुपक्षीय संधि-वार्ताओं में अपनी सौदा करने की ताकत को बढ़ाना है। हमारे पड़ोसियों को समझना चाहिए कि भारत की शक्ति दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रह सकती और अपनी वैश्विक रणनीति के कार्यान्वयन के लिए हम जो कदम उठाते हैं उससे उनकी सुरक्षा को खतरे में डालने का हमारा कोई इरादा नहीं है।

( घ) आंतरिक स्थिति का महत्व

हमारे देश के अंदर क्या हो रहा है, इसका भी पड़ोसी राष्ट्रों की हमारे प्रति धारणा और रुख पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। यह बात दक्षिण एशिया के बाहर के देशों के लिए भी सही है। पर हमारी आंतरिक स्थिति का पड़ोसी राष्ट्रों पर ज्यादा असर होता है। भारत की आजादी के ठीक बाद के कुछ वर्षों में भारत की सरकार स्थिर और सुदृढ़ थी, इसका नेतृत्व प्रभावशाली था और यह मजबूत प्रजातांत्रिक संस्थाओं के निर्माण में सफल हुआ था। भारत ने विकास की अपनी एक अलग रणनीति बनाई थी जिसका अनेक अन्य विकासशील देशों ने अनुसरण किया था। इसकी अंतरराष्ट्रीय महत्ता इसकी आर्थिक एवं सामरिक शक्ति से कहीं ऊँची थी। इन तत्वों ने हमारे प्रति पड़ोसी राष्ट्रों के रुख को बहुत प्रभावित किया था। हम उनकी ईर्ष्या और प्रशंसा दोनों के पात्र थे। इसकी अभिव्यक्ति कभी खुलेआम होती थी और कभी चुपके-चुपके निजी वार्तालाप में।

1960 के दशक के मध्यकाल से, जब पाकिस्तान से हमारी लड़ाई हुई, यह परिस्थिति बहुत हद तक बदल गई। अगले दो दशकों में हमारी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का ह्रास हुआ और हमारी प्रजातांत्रिक संस्थाओं का अनवरत पतन। इस अवधि में भारत सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति, शासन की गुणवत्ता एवं नैतिक गरिमा के लिहाज से दक्षिण एशिया एवं विश्व के अन्य विकासशील देशों की सामान्य न्यून श्रेणी में आ गया। केवल पड़ोसी राष्ट्रों ने ही नहीं, अपितु दुनिया ने हमें एक ऐसे लड़खड़ाते देश के रूप में देखना शुरू कर दिया जो आजादी के बाद जगाई गई अपेक्षाओं पर खरा उतर नहीं पाया और जो अपने संविधान के सामाजिक अनुबंध का भी पालन नहीं कर पाया। 1975 में आपातकालीन स्थिति की घोषणा के बाद ऐसा लगा कि भारतीय प्रजातंत्र ही तिरोहित होने वाला है। इस बीच अनेक अन्य विकासशील देश हमसे आगे निकल गए। पड़ोसियों में श्रीलंका सामाजिक एवं आर्थिक उपलब्धि के मापदंड पर हमसे कई पायदान ऊपर पहुँच गया। हमारे कई पड़ोसी देशों में भी प्रजातंत्र पुनर्जीवित हुआ, यद्यपि यह अब तक दोषपूर्ण और चार दिन की चाँदनी की तरह दिखाई पड़ता है। हमारा प्रजातंत्र अभी भी पड़ोस में सर्वश्रेष्ठ है, पर हम जानते हैं कि यह कितना दूषित हो गया है।

1990 के दशक के प्रारंभ से भारत में केंद्रीय सरकारें कमजोर एवं अस्थिर रही हैं। सरकारी नेताओं ने अपने शासनकाल का अधिक समय अपने राजनीतिक जीवन को बचाने और बढ़ाने में व्यय किया है। पड़ोसी राष्ट्रों के साथ के द्विपाक्षिक मसलों को हल करने एवं उनके संबंधों में दीर्घकालीन सुधार लाने के लिए न तो उनके पास समय था, न साहस और न दूरदर्शिता। एकमात्र अपवाद था 1996 के दिसंबर में बंगलादेश के साथ गंगा के पानी के बँटवारे की संधि पर हस्ताक्षर होना। यह तीन कारणों के अपूर्व मेल से संभव हो पाया। पहला, बंगलादेश में शेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग सरकार का सत्ता में आना; तत्कालीन विदेश मंत्री श्री इंद्र कुमार गुजराल की चेष्टा, प्रतिबद्धता एवं प्रबुद्ध विचारधारा और श्री ज्योति बसु के नेतृत्व में तत्कालीन पश्चिम बंगाल की सरकार का सक्रिय सहयोग।

1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने और तत्पश्चात सांप्रदायिक शक्तियों के उत्थान के बाद, एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भारत की छवि बहुत धूमिल हो गई है। तबसे पड़ोसी राष्ट्रों के साथ के कई मसलों को सांप्रदायिक चश्मे से देखा जा रहा है। उदाहरणस्वरूप, भारतीय जनता पार्टी का यह विचार कि बंगलादेश से गैरकानूनी ढंग से भारत में आने वाले हिंदू, शरणार्थी हैं और मुसलमान गैरकानूनी आप्रवासी। पाकिस्तान के साथ वार्ता शुरू करने या उनके साथ के द्विपक्षीय समस्याओं के समाधान के बारे में भी इस राजनीतिक दल ने कट्टर और अनुचित रवैया अपनाया है। धर्मनिरपेक्षता, हमारी विदेश नीति का, खासकर पड़ोसियों के प्रति, एक अमूल्य रत्न (यूएसपी) है। इसे खोना एक बहुत बड़ी क्षति होगी।

( ङ) पड़ोसी देशों से अन्य समस्याएँ

पहला, भारत से खतरे के एहसास के कारण पड़ोसी राष्ट्र, भारत के साथ के द्विपक्षीय मसलों को बहुपक्षीय बनाने की चेष्टा करते हैं। गंगा के पानी के बँटवारे के लिए की गई संधि-वार्ता में बंगलादेश ने हमेशा नेपाल को शामिल करना चाहा, बावजूद इसके कि इसके चलते समस्या के समाधान में और भी विलंब हो जाता और यह अत्यंत कठिन समस्या और भी जटिल हो जाती।

दूसरा, हमारे पड़ोसी राष्ट्र हमारे साथ के द्विपक्षीय मामलों में एवं दक्षिण एशियाई पारस्परिक सहयोग प्रक्रिया में बाहर की शक्तियों को लाने में उतावले रहते हैं। ये शक्तियाँ हैं - प्रमुख विकासशील देश, जैसे अमेरिका, जापान, जर्मनी एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, विशेषकर विश्व बैंक और एशियन विकास बैंक। ये इन्हें या तो मध्यस्थ या सलाहकार के रूप में लाना चाहते हैं।

भारत ने अब तक पड़ोसी देशों के इन प्रयासों को सफल होने नहीं दिया है, क्योंकि इन देशों या संस्थाओं के मध्यस्थ या सलाहकार के रोल को निष्पक्ष रूप में अदा करने की बहुत कम संभावना है। बाहर की बड़ी शक्तियों का दक्षिण एशिया में अपना-अपना स्वार्थ निहित है। और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ अमूमन बड़ी शक्तियों के इशारे से काम करती हैं। इसके अलावा, इन बड़े देशों एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के परामर्शों के भारत के हितों के खिलाफ होने की अधिक संभावना है। इसका कारण है छोटे एवं कमजोर राष्ट्रों से सहज सहानुभूति। इसके अतिरिक्त भारत की स्वायत्त विदेश नीति के चलते बड़े राष्ट्र इससे खार खाए रहते हैं। फिर भी, हमें समझना चाहिए कि पड़ोसी राष्ट्र हमारा प्रस्ताव, सुझाव या तर्क आसानी से नहीं मान लेंगे। तीसरे पक्ष से इनके पुष्टिकरण की इनकी सहज प्रवृत्ति होगी। इसलिए विशेष परिस्थितियों में बाहर की शक्तियों या संस्थाओं से सलाह लेने के उनके सुझाव को मान लेना चाहिए। पर हम उनकी मध्यस्थता स्वीकार नहीं कर सकते, अगर हम इसके लिए कानूनन बाध्य न हों।

तीसरा, हमारे पड़ोसी देशों में हमारे खिलाफ गुट बनाने की प्रवृत्ति है, ताकि हमसे वे ऐसे लाभ उठा सकें जो द्विपक्षीय आधार पर संभव नहीं है। बंगलादेश के राष्ट्रपति जियायुर रहमान ने साल 1980 में दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संस्था (सार्क) बनाने के लिए जो पहल की थी, उसके पीछे बहुत हद तक यही मकसद था। हमारे पड़ोसी राष्ट्रों का यह विश्वास है कि सार्क मंच द्वारा वे भारत पर संयुक्त दबाव डालकर, बिना मूल्य चुकाए, रियायत हासिल कर सकते हैं। इन्होंने सार्क संस्था का इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कई बार इस्तेमाल किया है। परंतु, भारतीय प्रतिनिधियों की जागरूकता के कारण इन्हें इस प्रयास में बहुत सीमित सफलता मिल सकी है, यद्यपि भारत ने इनके इस चाल की वजह से कई बार सार्क मंच में संकट की स्थिति का सामना किया है।

चौथा और आखिरी, हमारे पड़ोसी देशों ने सरकारी प्रचार मशीनरी एवं मीडिया के द्वारा भारत को एक प्रभुता-आकांक्षी (हेगीमोन) देश के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया है। इसमें इनके शैक्षिक एवं बौद्धिक समुदाय के एक बड़े तबके ने साथ दिया है। इस कार्य में ये पाश्चात्य देशों एवं चीन के विद्वानों एवं चिंतक मंडलियों से प्रेरणा लेते रहे हैं। चीन ने तो सरकारी स्तर पर भी कई बार भारत को एक प्रभुता-आकांक्षी राष्ट्र की संज्ञा दी है। लेकिन, भारत का इस रूप में चित्रण तथ्य पर आधारित नहीं है। यह मिथ्या, भ्रामक एवं अन्य स्वार्थों की सिद्धि के हेतु है।

पड़ोसी एवं पाश्चात्य देशों के पत्रकारों एवं विद्वानों के लेखों में इस अभियोग की पुष्टि के लिए जो दृष्टांत दिए गए हैं, उनमें शामिल हैं : 1989-90 में नेपाल के खिलाफ नाकेबंदी; 1987-90 में श्रीलंका में भारतीय शांति सेना को तैनात करना; और 1988 में मालदीव में नौसेना भेजकर लुटेरों को भगाना।

इन तीनों परिस्थितियों में भारत की कार्यवाहियाँ सही, आवश्यक और अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक थीं। भारत ने 1989-90 में भारत-नेपाल सीमा पर कोई नाकेबंदी नहीं लगाई थी। उस समय भारत-नेपाल व्यापार यथावत चलता रहा। भारत से नेपाल को भेजी जानेवाली अत्यावश्यक सामग्रियों की पूर्ति में कोई कोताही नहीं की गई। भारत ने नेपाल की कुछ कार्यवाहियों पर नाराजगी दिखाने के लिए कुछ सीमा-चौकियों को बंद कर दिया था, जबकि अधिकांश बड़ी-बड़ी और चालू चौकियाँ खुली रहीं। श्रीलंका में भारतीय शांति सेना श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति के अनुरोध पर एवं एक द्विपक्षीय संधि के तहत भेजी गई थी। यह जोखिम भरा कदम भारत ने श्रीलंका की एकता एवं अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिए उठाया था। मालदीव में भी भारतीय नौसेना के जहाज मालदीव के राष्ट्रपति के अनुरोध पर भेजे गए थे। यह काम समुद्री लुटेरों को भगाने के लिए किया गया था, किसी लोकप्रिय जन-आंदोलन को कुचलने के लिए नहीं।

नीति-निर्देश

( क) मनोवैज्ञानिक तत्वों के प्रति संवेदनशीलता

अब तक के विश्लेषण से जाहिर है कि पड़ोसी देशों से संबंध निभाने में हम विशेष प्रकार की समस्याओं का सामना करते हैं। इसके समाधान के उपाय भी विशिष्ट और अलग प्रकार के होने चाहिए। पड़ोसियों के साथ संबंध बढ़ाने में हमें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और कुछ मूलभूत चीजों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पहला यह कि पड़ोसियों से संपर्क में मनोवैज्ञानिक तत्वों का वस्तुगत तत्वों से ज्यादा महत्व है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हम पड़ोसियों की धारणाओं एवं भावनाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहें। हमें उनसे हर तरह से समानता से बर्ताव करना चाहिए और उनको सम्मान देना चाहिए। उनके प्रस्तावों पर विचार करने के लिए और उनकी प्रतिक्रियाओं को समझने के लिए हमें हमेशा अपने को उनके स्थान पर रखकर सोचना चाहिए। हमें कभी भी उनका तिरस्कार नहीं करना चाहिए और न तो उन्हें तिरस्कृत अनुभव करने का मौका देना चाहिए। स्पष्टतः, उनके साथ के बर्ताव में 'भद्र तिरस्कार' का प्रश्न ही नहीं उठता। क्योंकि हमारा तिरस्कार कितना भी भद्र क्यों न हो, उसे वे अपना अपमान समझेंगे।

हिंदुस्तान से रूबरू होने में, पड़ोसी देश अपनी राष्ट्रीय-पहचान एवं सार्वभौमिकता के प्रति विशेष सजग हो जाते हैं। जब कभी उन्हें मौका मिलता है, वे अपने को अलग दिखाने का प्रयास करते हैं एवं अपनी सार्वभौमिकता की दुहाई देते हैं। हमें इनकी इन भावनाओं के प्रदर्शन पर रोष जाहिर नहीं करना चाहिए। यह समझना चाहिए कि यह स्वाभाविक है और इसके भीतर भारत के प्रति कोई शत्रुता भाव छिपा नहीं है। हमें कभी भी कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए या कोई ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए जिससे इनकी इन भावनाओं पर ठेस पहुँचे। हमें अपने पड़ोसियों के साथ की सामान्यताओं पर उनके समक्ष न तो अधिक जोर देना चाहिए और न बढ़ा-चढ़ाकर कहना चाहिए।

निस्संदेह, उनकी सार्वभौमिकता का सम्मान करने का यह मतलब नहीं कि उनके साथ संबंध निभाने में हम अपने हितों की रक्षा न करें। पर हमें अपने हितों की परिभाषा ठीक और प्रबुद्ध रूप में करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमने कुछ कार्य अल्पकालीन आवेश में आकर या घरेलू राजनीतिक लाभ उठाने के लिए किए हैं, जिससे हमारे पड़ोसी क्षुब्ध हुए हैं।

मसलन, 1987 में श्रीलंका की तमिल आबादी वाले इलाकों में हमने हवाई जहाज से खाद्यान्न गिराने का जो काम किया, उसे टाला जा सकता था। श्रीलंका की सरकार एवं वहाँ की जनता ने इसे अपने देश की सार्वभौमिकता पर प्रत्यक्ष प्रहार समझा। यह घटना दशकों से श्रीलंकाइयों में भारत के प्रति रोष का कारण बनी हुई है।

( ख) संलाप में विराम न हो

पड़ोसी राष्ट्रों से हमारा द्विपक्षीय संलाप हर स्तर पर नियमित रूप से चलते रहना चाहिए। किसी भी हालत में पारस्परिक संलाप के रुकने या संलापों के बीच बड़े अंतराल के लिए हमें जिम्मेवार नहीं होना चाहिए। दो-दो बार सार्क शिखर सम्मेलन भारत के आग्रह पर स्थगित हुआ है जिससे सार्क के अन्य सदस्य राष्ट्रों ने बड़ी नाराजगी और क्षोभ प्रकट किया है। द्विपक्षीय स्तर पर भारत-पाकिस्तान संयुक्त संलाप (इंडिया-पाकिस्तान कंपोजिट डायलॉग) भारत की जिद के कारण निलंबित रहा है। 9 नवंबर, 2008 में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की सहायता से, वहाँ के आततायियों द्वारा मुंबई में हुई हिंसा की वारदात के बाद यह संलाप प्रायः निष्क्रिय रहा है। वारदात के कारण क्षुब्ध लोकमत के तुष्टीकरण के लिए संलाप को कुछ दिन तक स्थगित रखने की राजनीतिक बाध्यता थी। लेकिन, उनको तब से इतने सालों तक रोके रखना दोनों देशों में से किसी के हित में नहीं है। निष्क्रिय रहने के लाख बहाने होते हैं। किंतु, साहसिक और दूरदर्शी नेता हमेशा सक्रिय प्रयास का अवसर ढूँढ़ते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री, श्री नरसिंह राव ने अपने पूरे पाँच साल के दरमियान बंगलादेश की सरकारी यात्रा नहीं की। इसका उन्होंने निजी तौर पर जो कारण बताया वह कुछ ऐसा था : यदि वे जाएँगे तो बंगलादेशी फरक्का के पास गंगा नदी के पानी के बँटवारे का मामला उठाएँगे। चूँकि इस समस्या का उनके पास कोई समाधान नहीं है, इसलिए वे यात्रा के दौरान परेशानी में पड़ जाएँगे। इसलिए, यात्रा को स्थगित रखना ही वांछित होगा।' श्री नरसिंह राव का यह तर्क बड़ा ही कमजोर और लचर था। अपने पड़ोसियों के साथ तो हमेशा ही कठिन और कभी-कभी असाध्य प्रतीत होने वाली समस्याओं पर भी संघर्ष करना पड़ता है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम उनके साथ शिखर-स्तर पर कोई संपर्क ही न रखें। अमूमन, जिन मसलों का निम्न स्तर की बातचीत से हल नहीं होता, उनका हल ढूँढ़ने के लिए उन्हें शिखर-स्तर पर उठाया जाता है। अगर हल नहीं भी हो तो शिखर वार्ता से अविश्वास और गलतफहमी दूर होती है और भविष्य में समस्या समाधान का मार्ग प्रशस्त होता है। शिखर-स्तर वार्ता से इनकार करना एक धृष्ट आचरण माना जाता है।

पड़ोसी देशों के साथ के संबंध अनिश्चित काल के लिए निष्प्राण अवस्था में नहीं रखे जा सकते। अगर इनमें बीच-बीच में ऊर्जा और नए जीवन का संचार नहीं किया जाय तो इनमें द्रुत गति से ह्रास होने की संभावना होती है। दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में पड़ोसियों के साथ के संबंधों में लंबी गतिहीनता एवं उनके साथ के संलाप में बार-बार विराम भारत के हित में नहीं है। विवादास्पद मसलों पर उच्च स्तर पर विचार-विमर्श नहीं चलते रहने से पड़ोसी राष्ट्र हमारे इरादों पर संदेह करने लगते हैं और इनके बारे में तरह-तरह की कल्पना करना शुरू कर देते हैं। उन्हें भय होने लगता है कि भारत कहीं उनके खिलाफ साजिश तो नहीं कर रहा है। इस डर से कभी-कभी वे ऐसा कदम उठाते हैं जो दोनों देशों के हित में नहीं है और जिससे विवादास्पद मामले और भी जटिल हो जाते हैं। पड़ोसियों से तनाव बने रहने एवं उनके साथ सक्रिय संपर्क की अनुपस्थिति में उनके लोग हमसे विमुख हो जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में संलाप के पुनरारंभ के बाद पूर्व स्थिति में पहुँचने में बहुत समय लग सकता है।

भारत को पड़ोसियों के साथ के संबंधों को हमेशा दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। इसमें गतिरोध आने से या इनके अचानक बिगड़ जाने से हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। पड़ोसियों के साथ के संबंधों पर बीच-बीच में सदमा पहुँचना और उनका प्रतिकूल होना अवश्यंभावी है। आवश्यकता है वर्तमान के तुमुल कोलाहल में मूलभूत उद्देश्यों को न भूलना। और ये उद्देश्य हैं - सतत विश्वास पुनर्स्थापित करना और इसे बनाए रखना, संदेह दूर करना और सहयोग के नए आयाम ढूँढ़ना।

( ग) द्विपक्षीय समस्याओं के समाधान को स्थगित नहीं रखना चाहिए

भारत की विदेश-नीति के कर्णधारों में जो एक दुखद प्रवृत्ति पाई जाती है, वह है पड़ोसियों के साथ द्विपक्षीय समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने के बदले उन्हें धीमी आँच पर उबलते छोड़ देना। उपमहादेश का वृहत्तम राष्ट्र होने के कारण अल्पकाल में यथास्थिति भारत के पक्ष में जाती है। इसके चलते भारत के नीति-निर्माता समस्याओं के शीघ्रतम समाधान के लिए कोई उत्साह नहीं दिखाते। और जब ये समस्याएँ भीषण रूप धारण कर लेती हैं तो उनपर कोई पैबंद लगा देने या कोई अल्पकालिक समाधान ढूँढ़ने की चेष्टा करते हैं या किसी प्रकार इनका प्रबंधन करते हैं। अनुभव यह बताता है कि यदि किसी द्विपक्षीय समस्या के समाधान को लंबे अरसे तक स्थगित रखा जाता है तो कालांतर में वह पहले से अधिक पेचीदा हो जाता है। इसके अलावा, द्विपक्षीय समस्याओं के बने रहने से दोनों राष्ट्रों को अमूमन भारी कीमत चुकानी पड़ती है। जटिल समस्याओं को बनाए रखने का आत्मसंतोष, नेतृत्व की अदूरदर्शिता और जोखिम उठाने में साहस और सूझ के अभाव का परिचायक है। यह आत्मसंतोष अवांछित है और आगे चलकर घोर विवाद का कारण बन सकता है। इसलिए हमारे लिए यह लाजिम है कि पड़ोसी देश के साथ द्विपक्षीय समस्याओं के समाधान का मौका सतत तलाशते रहें और जब कोई मौका सामने आए तो उसको किसी भी हालत में न गँवाएँ। ऐसा हमने फरक्का के पास गंगा नदी के पानी के बँटवारे के मामले को सुलझाने के लिए किया। इसके चलते भारत और बंगलादेश के बीच चले आ रहे तनाव के एक मुख्य कारण को रास्ते से हटाने में सफलता मिली।

पड़ोसी राष्ट्रों की प्रवृत्ति रही है, द्विपक्षीय समस्याओं के समाधान की जवाबदेही भारत पर डालना। निस्संदेह बड़ा पड़ोसी होने की हैसियत से समस्याओं के समाधान के लिए भारत को पहल करनी चाहिए और इसके लिए होने वाली संधि-वार्ता में एक हद तक उदारता भी दिखानी चाहिए। किंतु, यह व्यवहार पूर्णतया एकतरफा नहीं हो सकता है। अधिकांश मामलों में, पड़ोसियों द्वारा भारत की बाध्यताओं एवं अनिवार्यताओं की उपेक्षा करने से और अपने रुख में आवश्यक परिवर्तन नहीं करने से समस्या का कभी भी समाधान नहीं हो सकता।

( घ) दीर्घकालीन लाभ के लिए अल्पकालीन त्याग

पड़ोसियों से संबंध-निर्वाह में भारत को दीर्घकालीन लाभ के लिए अल्प या मध्यकालीन त्याग करना चाहिए। पड़ोसी राष्ट्रों में समृद्धि और स्थिरता बहाल करने के लिए भारत को सजग एवं योजनाबद्ध रूप में काम करना चाहिए, और इसके लिए आवश्यक पूँजी निवेश करना चाहिए। इस संबंध में स्वतंत्र विचारकों और विशेषज्ञों ने बीच-बीच में बहुमूल्य सुझाव दिए हैं। उनमें से एक रहा है भारतीय बाजार में न्यूनतम विकसित एवं छोटे पड़ोसी देशों के निर्यात को एकतरफा शुल्क एवं कोटा-मुक्त कर देना। भूटान और नेपाल को यह सुविधा पहले से ही प्राप्त है। श्रीलंका के साथ भी हम साल 2000 में मुक्त व्यापार संधि कर चुके हैं। अतः जब हम एकतरफा छूट की बात करते हैं तो केवल बंगलादेश के निर्यात की बात करते हैं। पाकिस्तान तो हमें एमएफएन सुविधा भी नहीं दे रहा है। इसलिए भारतीय बाजार में उसे एकतरफा मुक्त व्यापार की सुविधा देने का प्रश्न ही नहीं उठता। मगर यदि पाकिस्तान भारत को एमएफएन सुविधा देता है तो हम उसके साथ भी मुक्त व्यापार संधि करने के लिए वार्तालाप कर सकते हैं। और उस प्रक्रिया में हम उसे कुछ समय के लिए एकतरफा सुविधा भी दे सकते हैं। इसकी आर्थिक न्यायसंगतता है और आने वाले सालों में दोनों देशों को इससे दूरगामी आर्थिक लाभ मिल सकता है। साथ-ही-साथ इसका सकारात्मक राजनीतिक परिणाम भी हो सकता है।

एक दूसरा सुझाव है, सार्क देशों का एक वृहत विकास-कोष बनाना। इसके लिए कम-से-कम 5 बिलियन डॉलर का पूँजी-निवेश आवश्यक है। इस कोष से सार्क के न्यूनतम विकसित राष्ट्रों, जैसे बंगलादेश, नेपाल और भूटान की मानव-संपदा एवं भौतिक संरचना के विकास के लिए पूँजी निवेश किया जाएगा। अगर सार्क के अंतर्गत ऐसे कोष का निर्माण नहीं भी हो, तो भारत द्विपक्षीय स्तर पर ऐसे कोष की स्थापना कर सकता है। नेपाल और बंगलादेश के लिए ऐसी धनराशि उपलब्ध कराना भारत के लिए बहुत ही फायदेमंद होगा।

उदाहरणस्वरूप, अगर बंगलादेश ने भारत को अपने भू-भाग से होकर पारगमन की सुविधा दी तो भारत को इससे अपार लाभ होगा। सबसे बड़ा लाभ होगा देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों को भारतीय मूलधारा में शामिल करने का अवसर मिलना। परंतु यह लाभ हम तब तक नहीं उठा सकते जब तक बंगलादेश की भौतिक संरचना को चार-पाँच गुना उन्नत नहीं किया जाए। और इसके लिए बड़े पैमाने पर पूँजी निवेश करना होगा - कम-से-कम 10 बिलियन डॉलर। यह कोई बहुत बड़ी रकम नहीं है। अपने देश में भौतिक संरचना के विकास के लिए सरकार ने अपने पाँच वर्षों में खर्च के लिए 150 बिलियन डॉलर का अनुमान लगाया है। क्या हम इसमें से बंगलादेश की संरचना में विकास के लिए 10 बिलियन डॉलर खर्च नहीं कर सकते, जबकि पारगमन की सुविधा प्राप्त करने के बाद उनकी संरचना हमारी संरचना के तुल्य हो जाएगी।

अगर सार्क के मुल्कों के बीच का व्यापार मुक्त हुआ तो न्यूनतम विकसित सदस्य निर्यात-पूर्ति के अभाव में इससे समान लाभ नहीं उठा पाएँगे। वे ऐसा तभी कर पाएँगे जब उनके निर्यात-उत्पादन की क्षमता में वृद्धि हो। इसके लिए पूँजी लगाने की आवश्यकता है।

इसी वजह से 1996 में सार्क के एक प्रख्यात व्यक्ति समूह ने न्यूनतम विकसित राष्ट्रों के लिए एक विकास कोष के निर्माण की सिफारिश की थी। यदि यह कोष बन पाता, तो इसमें 70-75 प्रतिशत लागत भारत को करना पड़ता, क्योंकि ऐसे कोषों में योगदान आर्थिक क्षमता के आधार पर होता है। दुर्भाग्यवश न तो सार्क देशों के बीच सही मायने में मुक्त बाजार बन पाया है और न ही ऐसे कोष का निर्माण हो सका है।

( ङ) गैर-पारस्परिकता (नन-रेसिप्रॉसिटी) का महत्व :

कम-से-कम अल्प और मध्यकाल में, भारत को अपने पड़ोसियों से सौदा करने या संबंध निभाने में पारस्परिकता की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यह पूर्व विदेश मंत्री श्री इंद्र कुमार गुजराल के नाम से प्रख्यात गुजराल-सिद्धांत का महत्वपूर्ण तत्व था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, जिसमें विश्व व्यापार संस्था (डब्ल्यूटीओ) भी शामिल है, न्यूनतम विकसित देशों के निर्यात के लिए शुल्क एवं कोटा-मुक्त प्रवेश प्रदान करना स्वीकार कर लिया गया है। हम यह जिक्र कर चुके हैं कि किस प्रकार बंगलादेश की निर्यात-क्षमता की वृद्धि से इस देश को भेजे जाने वाले हमारे निर्यात में वृद्धि होगी। बंगलादेश के साथ एकतरफा मुक्त व्यापार के बारे में बीस साल से अधिक समय से चर्चा हो रही थी। अंततः, साल 2011 में भारत ने बंगलादेश से आने वाले कपड़ों को प्रतिबंधित तालिका (निगेटिव लिस्ट) से हटाकर एक प्रकार की एकतरफा मुक्त बाजार की सुविधा प्रदान कर दी।

अपने पड़ोसियों के साथ के सांस्कृतिक संबंधों में भी भारत को गैर-पारस्परिकता की नीति अपनानी चाहिए। राष्ट्रीय-पहचान को बनाने और बचाने एवं अपनी सांस्कृतिक सामग्रियों के आयात से संरक्षण के लिए हमारे पड़ोसी राष्ट्र भारत के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान को या तो बंद या न्यूनतम स्तर पर रखना पसंद करते हैं। खासकर, वह नहीं चाहते कि भारत से इन देशों में फिल्म, रेकार्ड, वीडियो आदि का आयात हो या वहाँ से सांस्कृतिक जत्थे उनके देशों में आएँ। इसकी प्रतिक्रिया में कई बार हमारे विदेश-नीति संचालकों ने उन देशों की सांस्कृतिक सामग्रियों के आयात और उनके संगीत एवं नाट्य दलों के भारत में आने पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह अदूरदर्शिता और हानिकारक नीति है। इससे उन देशों के सांस्कृतिक समाज में जो धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक कलाकार या उनके समूह हैं उनकी स्थिति कमजोर और दयनीय हो जाती है। और उन देशों के सांस्कृतिक क्षेत्र में धार्मिक कट्टरपंथियों, अंधविश्वासियों एवं भ्रमजाल फैलाने वालों का वर्चस्व बढ़ जाता है। इससे इन देशों का भारत के साथ सांस्कृतिक अलगाव बढ़ जाता है जिसके राजनीतिक दुष्परिणाम भी होते हैं। इन देशों के सांस्कृतिक जगत में अनेक धर्मनिरपेक्ष, मानवतावादी और प्रगतिशील हस्तियाँ और दल हैं जो अपनी प्रतिभा के विकास और प्रेरणा के लिए भारत की ओर देखते हैं। इसलिए, पड़ोसी राष्ट्रों की नीति को दरकिनार कर, ऐसे लोगों का भारत में आगमन और कला-प्रदर्शन निर्बाध गति से चलते रहना चाहिए।

( च) जन-साधारण के बीच संपर्क

हरेक परिस्थिति में भारत को अपने पड़ोसी राष्ट्रों के साथ जन-साधारण स्तर पर संपर्क बनाए रखना चाहिए। द्विपक्षीय राजनीतिक संबंधों के चढ़ाव-उतार का इन संपर्कों पर असर नहीं पड़ना चाहिए। भारत तुलनात्मक दृष्टि से एक खुला समाज है। इसलिए हमें पड़ोसी राष्ट्रों से आने वाले लोगों एवं विचारों से डरने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि जन-साधारण के स्तर पर संपर्क बनाए रखने से हमें इन देशों के समाज को एक अनेकवादी, धर्मनिरपेक्ष एवं प्रगतिशील दिशा की ओर प्रेरित करने का मौका मिलता रहेगा।

भारत और पड़ोसी देशों के बीच, लोगों और विचारों के और कभी-कभी सामग्रियों एवं सेवाओं की भी, दोतरफा अबाध प्रवाह में एक बहुत बड़ी बाधा रही है - हमारी और पड़ोसी देशों, दोनों की सुरक्षा-चिंता। प्रतिकूल द्विपक्षीय संबंधों के संदर्भ में यह कुछ हद तक स्वाभाविक है। पर क्या हम अपने पड़ोसी राष्ट्रों से आनेवाले सुरक्षा खतरों को बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं देख या सोच रहे हैं? ये खतरे ऐसे नहीं हैं कि इनके नाम पर लोगों और विचारों के आदान-प्रदान एवं आवागमन पर इतने कठोर और व्यापक प्रतिबंधों को लगाया जाए। इससे तो केवल जनसाधारण के बीच की खाइयाँ पटने के बदले और भी चौड़ी होती जा रही हैं।

( छ) मूल हितों की सिद्धि

अपने पड़ोसियों से पारस्परिकता की अपेक्षा किए बिना उनको एकतरफा रियायत देना एक सीमा तक ही संभव है। पड़ोसियों से संबंध-निर्वाह में भारत को भी अपने हितों की रक्षा करनी है। प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह द्विपाक्षिक संबंधों के बारे में जनता की अदालत में हिसाब दे और उन लॉबियों को संतुष्ट रखें जिनको पड़ोसी राष्ट्रों को रियायत देने से नुकसान हो सकता है। भारत दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में रियायतों की पारस्परिकता से समझौता कर सकता है, पर यह हितों की पारस्परिकता त्याग नहीं सकता। इसके ऊपर ध्यान दिए बिना कोई भी द्विपाक्षिक संबंध टिकाऊ नहीं हो सकता। मसलन, भारत अपने पड़ोसियों, खासकर जो न्यूनतम विकसित हैं, को एकतरफा मुक्त बाजार की सुविधा दे सकता है; परंतु इन पड़ोसी देशों को भी स्वीकार करना होगा कि वे शीघ्र ही, उदाहरणस्वरूप 5 साल बाद, पारस्परिक व्यापार उदारीकरण की प्रक्रिया में शामिल होंगे और अंततोगत्वा भारत के लिए भी अपना बाजार मुक्त कर देंगे, जिससे कि मुक्त बाजार संधि एक समय-सीमा के अंदर लागू हो सके। उसी प्रकार, भारत बंगलादेश के नागरिकों के अवैध प्रवसन को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकता और न बंगलादेशी राजनयिकों एवं अन्य संभ्रांत वर्ग के लोगों के इस तर्क को, कि भारत में प्रवसन बंगलादेशियों का मौलिक अधिकार है। भारत यह भी स्वीकार नहीं कर सकता कि पड़ोसी राष्ट्र किसी को अपने सीमावर्ती क्षेत्रों का प्रयोग भारत के खिलाफ विनाशकारी कार्यवाही के लिए करने दें या भारत पर आक्रमण करने वाले आततायियों को प्रश्रय दें। ये कुछ लक्ष्मणरेखाएँ हैं जिसे भारत अपने पड़ोसी देशों को पार करने नहीं देगा।

( ज) वैश्विक रणनीति के निर्माण में पड़ोसी राष्ट्रों के हितों का ध्यान रखना

हम कह चुके हैं कि हमारे पड़ोसी राष्ट्र हमारी वैश्विक रणनीति के कार्यान्वयन के लिए किए गए हमारे कार्यों या उपायों को अपने ऊपर खतरा समझते हैं और इसकी प्रतिक्रिया में ऐसे कदम उठाते हैं जो क्षेत्रीय सुरक्षा की स्थिति को अस्थिर और खतरनाक बना देते हैं। इससे हमारे द्विपक्षीय संबंधों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भारत को चाहिए कि अपनी वैश्विक रणनीतियों के बारे में यथासंभव अपने पड़ोसी देशों का विश्वास प्राप्त करे। इसलिए इन नीतियों में निहित इरादों को पड़ोसी राष्ट्रों के समक्ष स्पष्ट करने के लिए इसे पहल करनी चाहिए। खासकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन नीतियों को अपनाने के पीछे पड़ोसी राष्ट्रों के हितों को क्षति पहुँचाने, खासकर उनकी सुरक्षा को संकट में डालने का उसका कोई इरादा नहीं है। उसके लिए हम एक नियमित परामर्श-प्रणाली स्थापित कर सकते हैं। लेकिन, हम केवल पड़ोसी राष्ट्रों की गलतफहमी को दूर करने के लिए अपने कद को छोटा नहीं कर सकते और न दक्षिण एशिया के बाहर के देशों से आने वाले सुरक्षा-खतरों को नजरअंदाज कर सकते हैं।

( झ) भारत-समर्थक और भारत-विरोधी विभाजन

भारत में बहुत तबकों को पड़ोसी देशों के राजनीतिक दलों या व्यक्तियों को भारत-समर्थक या भारत-विरोधी की संज्ञा देने की आदत है। जैसे बंगलादेश में मुक्तियुद्ध के समर्थकों को भारत-समर्थक और इसके विरोधियों को भारत-विरोधी माना जाता है। उसी आधार पर अवामी लीग को भारत-समर्थक और बीएनपी को भारत-विरोधी कहते हैं। उसी प्रकार नेपाली कांग्रेस को भारत-समर्थक माना जाता है और राजतंत्र से जुड़े राजनीतिक दलों को भारत-विरोधी समझा जाता है।

ऐसा विभाजन कृत्रिम, भ्रामक और ऐतिहासिक एवं तथ्यगत दृष्टिकोण से गलत है। किसी भी व्यक्ति या दल के विचारों, रुखों एवं चिंतन या कार्य-प्रणाली में कालांतर में आमूल परिवर्तन हो सकते हैं। इसलिए कल के भारत-विरोधी आज प्रबल रूप में भारत-समर्थक हो सकते हैं। और इसका उलटा होना भी इतना ही सत्य है। इसके अलावा, प्रत्येक राजनीतिक दल में भारत-समर्थक और भारत-विरोधी दोनों तत्व हैं। जिन्हें हम भारत-विरोधी राजनीतिक दल समझते हैं वे भी सत्ता में आने पर भारत से संबंध बढ़ाना चाहते हैं। इसका कारण है, सभी पड़ोसी देशों के लिए भारत का पड़ोस में सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्र होना। करीब-करीब सभी पड़ोसी देशों की विदेश-नीति की सफलता का एक बहुत बड़ा मापदंड है - भारत के साथ के संबंधों को बढ़ाना या कम-से-कम उन्हें सही रास्ते पर रखना। इसलिए यदि भारत उनका तिरस्कार न करे और घरेलू ताकतों, खासकर फौज की, प्रतिकूल प्रतिक्रिया न हो, तो हर सत्तारूढ़ राजनीतिक दल भारत के साथ अच्छा संबंध बनाए रखने की चेष्टा करता है। इसलिए, भारत का भी यह कर्तव्य है कि किसी भी राजनीतिक दल या सरकार को भारत-विरोधी समझकर तिरस्कार करने के बदले उससे सतत संपर्क बनाए रखे और सतत संलाप के माध्यम से द्विपक्षीय समस्याओं का हल ढूँढ़ने की चेष्टा करे।

पड़ोसियों से संबंध बनाए रखने में भारत को इस मान्यता से चलना चाहिए कि पड़ोसी देश के विदेश-नीति निर्माण से संबद्ध प्रत्येक व्यक्ति और राजनीतिक दल सर्वप्रथम राष्ट्रवादी होगा। उसका उद्देश्य अपने राष्ट्रीय हितों की सिद्धि करने का होगा। ये हित भारत के हितों के प्रतिकूल भी हो सकते हैं। उदाहरणस्वरूप, बंगलादेश में आम सहमति है कि भारत को फरक्का बैरेज कभी नहीं बनाना चाहिए था। पाकिस्तान में आम सहमति है कि कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए था। नेपाल में बहुत लोग वहाँ की बड़ी नदियों पर विशाल बाँध बनाने के खिलाफ हैं। किंतु, भारत के लिए ऐसी परियोजनाओं का बड़ा महत्व है। इन देशों में बहुत लोग जो ऐसा सोचते हैं, भारत-विरोधी नहीं हैं; वे केवल अपने राष्ट्र के हितों के समर्थक हैं। इन लोगों को भारत-विरोधी समझना निष्प्रयोजन और हानिकारक है। ऐसा करने का अंतिम परिणाम होगा - सारे विश्व को ही भारत-विरोधी करार दे देना। यह तो भारतीय कूटनीति का स्वतः प्रदत्त पक्षघात होगा।

( महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के 16 वें स्थापना दिवस ( 29 दिसंबर 2013) के मौके पर प्रस्तुत भाषण)


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में प्रो. मुचकुंद दुबे की रचनाएँ