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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद

अनुक्रम


मियाँ शहसवार का दिल दुनिया से तो गिर गया था, मगर जोगिन की उठती जवानी देख कर धुन समाई कि इसको निकाह में लावें। उधर जोगिन ने ठान ली थी कि उम्र भर शादी न करूँगी। जिसके लिए जोगिन हुई, उसी की मुहब्बत का दम भरूँगी। एक दिन शहसवार ने जो सुना कि सिपहआरा कोठे पर से कूद पड़ी, तो दिल बेअख्तियार हो गया। चल खड़े हुए कि देखें, माजरा क्या है? रास्ते में एक मुंशी से मुलाकात हो गई। दोनों आदमी साथ-साथ बैठे; और साथ ही साथ उतरे। इत्तफाक से रेल से उतरते ही मुंशी जी को हैजा हो गया। देखते-देखते चल बसे। शहसवार ने जो देखा कि मुंशी के पास दौलत काफी है, तो फौरन उनके बेटे बन गए और सारा माल असबाब ले कर चंपत हो गए। सात हजार की अशर्फियाँ, दस हजार के नोट और कई सौ रुपए हाथ आए। रईस बन बैठे। फौरन जोगिन के पास लौट गए।

जोगिन - क्या गए नहीं?

शहसवार - आधी ही राह से लौट आए। मगर हम अमीर हो कर आए हैं।

जोगिन - अमीर कैसे! बोलो? हमको बनाते हो?

शहसवार - कसम खुदा की, हजारों ले कर आया हूँ। आँखें खुल जायँगी।

दुनिया के भी अजब कारखाने है। शहसवार को बाईस हजार तो नकद मिले और जब कपड़ों की गठरी खोली, तो एक टोपी निकल आई, जिसमें हीरे और मोती टँके हुए थे। जोगिन के आशिकों में एक जौहरी भी था। उसने यह टोपी बीस हजार में खरीद ली। जब जौहरी चला गया, तो शहसवार ने जोगिन से कहा - लो, अब तो अल्लाह मियाँ ने छप्पर फाड़ के दौलत दी। कहो, अब निकाह की ठहरती है? क्यों मुफ्त में जवानी खोती हो?

जोगिन - अब रंग लाई गिलहरी। 'ओछे के घर तीतर, बाहर रखूँ कि भीतर।' रुपए क्या मिल गए, अपने आपको भूल गए।

शहसवार सचमुच ओछा था। अब तक तो आप जोगिन की खुशामद करते थे, ढई दिए बैठे थे कि कभी न कभी तो दिल पसीजेगा; मगर अब जमीन पर पाँव ही नहीं रखते। बात-बात पर तिनकते हैं। जोगिन तो दुनिया से मुँह मोड़े बैठी थी, इनके चोंचले क्यों बर्दाश्त करती? शहसवार से नफरत करने लगी।

एक दिन शहसवार हवा के घोड़े पर सवार डींग मारने लगे - इस वक्त हम भी लाख के पेटे में हैं। और लाख रुपए जिसके पास होते हैं, उनको लोग तीन-चार लाख का आदमी आँकते हैं। अब दो घोड़े और लेंगे। मगर हम यह महाजनी कारखाना न रखेंगे कि चारजामा और जीनपोश। बस, अंगरेजी काठी और एक जोड़ी फिटन के लिए। जो देखे, कहे, रईस जाता है। और रईस के क्या दो सींग होते हैं सिर पर? एक कोठी भी बनवाएँगे। कोई ताल्लुकेदार अपना इलाका बेचे, तो खड़े-खड़े खरीद लें।

जोगिन - अच्छा, खाना तो खा लो।

शहसवार - आज खाना क्या पका है?

जोगिन - बेसन की रोटी।

शहसवार - यह तो रईसों का खाना नहीं।

जोगिन - रईस कौन है?

शहसवार - हम-तुम, दोनों। क्या अब भी रईस होने में शक है? हाँ, खूब याद आया, एक हाथी भी खरीदेंगे।

जोगिन - हाँ, बस इसी की कसर थी। दो तीन गधे भी खरीदना।

शहसवार - गधे तो रईसों के यहाँ नहीं देखे।

जोगिन - नई बात सूझी।

शहसवार - हाँ, खूब सूझ़ी।

जोगिन - फिर, यह सब कब खरीदोगे?

शहसवार - जब चाहें! रुपए का तो सारा खेल है। तीस-चालीस हजार रुपए बहुत होते हैं। इनसान गिने, तो बरसों में गिनती खतम हो।

जोगिन - अजी, दो-तीन आदमी तो इतने अर्से में मर जायँ, दस-पाँच की आँखें फूट जायँ।

उस दिन से शहसवार की हालत ही कुछ और हो गई। कभी रोते, कभी बहकी-बहकी बातें करते। आखिर जोगिन ने वहाँ से कहीं भाग जाने का इरादा किया। पड़ोस में एक आदमी रहता था, जो मोम के खिलौने खूब बनाता था। मोम के आदमी ऐसे बनाता कि असल का धोका होता था। उसे बुला कर जोगिन ने उसके कान में कुछ कहा और कारीगर दस दिन की मुहलत ले कर रुखसत हुआ।

नौ दिन तक तो जोगिन ने किसी तरह काटे, दसवें दिन एकाएक शहसवार ने उसे देखा, तो चुपचाप पड़ी है। बुलाया; जवाब नदारत। करीब जा कर देखा तो पछाड़ खा कर गिर पड़े। लगे दीवार से सिर टकराने। जी में आया कि जहर खा लें और इसी के साथ चले चलें। क्या लुत्फ से दिन कटते थे, अब ये रुपए किस काम आवेंगे। जान जाने का रंज नहीं, मगर यह रुपया कहाँ जाएगा? आखिर वसीयत लिखी कि मेरे बाद मेरी सारी जायदाद सिपहआरा को दी जाय। यह वसीयत लिख कर शहसवार ने सिर पीटना शुरू किया। खिलौना बनानेवाला कारीगर उसे समझाने लगा - सब्र कीजिए। हाय, क्या मिजाज था! यह कह कर वह अपने भाई को बुला लाया। दोनों ने लाश को खूब लपेट कर कंधे पर उठाया। मियाँ शहसवार पीछे-पीछे चले।

कारीगर - तुम क्यों आते हो? कब्रिस्तान बहुत दूर है।

शहसवार - कब्र तक तो चलने दो।

कारीगर - क्या गजब करते हो। थानेवालों को खबर हो गई तो मुफ्त में धरे जाओगे।

शहसवार - मिट्टी तो दे दूँ।

कारीगर - बस, अब साथ न आइए।


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