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लोककथा

और यह वही था
शंकर पुणतांबेकर


तस्कर ने जब सौगंध खाई कि अब मैं यह धंधा नहीं करूँगा तो इधर उसने उस पर तमंचा दाग दिया। तमंचा सिर्फ आवाज करके रह गया। तस्कर जिंदा का जिंदा। यह देख उसने तमंचा देनेवाले की गर्दन पकड़ी। उस गरीब ने बताया, 'मेरी क्या गलती है! यह तो मैंने खासी भरोसे की जगह सरकारी आर्डनेंस फैक्टरी से चुराया था।' उसने जाकर आर्डनेंस फैक्टरी के बड़े अफसर की गर्दन पकड़ी। उसे अफसर ने बताया, 'मेरा क्या दोष! ऊपर आप अपने पिताजी को ही गर्दन पकड़िए।' और उसने जाकर सचमुच अपने पिता की भी गर्दन पकड़ी। बोला, 'आपकी वजह से देश की फैक्टरियों में ऐसे गलत तमंचे बन रहे हैं।' इस पर पिता ने कहा, 'तुमसे क्या छिपाऊँ बेटे! इसमें दोष मेरा है, पर पूरी तरह से मेरा ही नहीं, माल जुटानेवाले ठेकेदार का भी है। पर ठेकेदार की गर्दन न पकड़ना। हम कहीं के नहीं रहे जाएँगे।' और पिता से जब उसने ठेकेदार का नाम पूछा, तो ज्ञात हुआ वह और कोई नहीं, वही तस्कर था, जिस पर उसने तमंचा दागा था।


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हिंदी समय में शंकर पुणतांबेकर की रचनाएँ