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कविता

फूलों का गाँव
मस्सेर येनलिए

अनुवाद - रति सक्सेना


मैंने फूल से सीखा कि किस तरह
अपनी जगह खड़ा हुआ जाए
मैंने कोई दूसरा सूरज नहीं देखा
मैंने कोई दूसरा पानी नहीं देखा
मैंने अपनी जड़े अपने गाँव में पाईं
मेरी जमीन ही मेरा आसमान है

मौसम मुझ पर से गुजरते हैं
चींटियों के घरोंदों के दोस्त
मैंने एक फूल बनना सीखा
बिना रुके खड़े रहने से

 


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