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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का चिंतन
ओमप्रकाश सिंह


आचार्य रामचंद्र शुक्ल के चिंतन की चुनौतियों को समझने से पहले यह समझना जरूरी है कि उनका चिंतन क्या है, किन-किन क्षेत्रों में है और आचार्य रामचंद्र शुक्ल कौन थे? आचार्य रामचंद्र शुक्ल के चिंतन को समझने के लिए हम उनका 'हिंदी साहित्य का इतिहास' पढ़ते हैं। कुछ समझते हैं और कुछ नहीं समझते हैं। जो नहीं समझते हैं, उसे समझने के लिए दूसरे साहित्य के इतिहासकारों की तरफ घूमते हैं। और उनके माध्यम से साहित्य की स्थापनाओं को समझने की कोशिश करते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के चिंतन की चुनौतियों को समझने के लिए अगर व्याख्यानमाला आयोजित की जाए और कई लोग बोलें तो कुछ बात बन सकती है।

बीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध में जोरदार ढंग से यह बात चली कि साहित्य के समाजशास्त्र पर गंभीर बात की जाए। साहित्य के समाजशास्त्र की एक मूल स्थापना यह भी है कि हम जिस रचनाकार को पढ़ रहे हैं उसको जानें कि वह कौन है, क्या है? उसके व्यक्तित्व का विकास किस तरह हुआ है। कहा जाता है कि साहित्य By-product है। मैं थोड़ा सा शब्द बदलूँगा कि साहित्य की तरह चिंतन भी By-product है। हमें जिस तरह का संस्कार और परिवेश मिलता है, हमारा चिंतन उसी ओर जाता है। कहा जाता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के पहले आलोचक हैं। मैं थोड़ा-सा बदल कर कहूँगा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी आलोचना के पहले व्यवस्थित आलोचक हैं। वे हिंदी सैद्धांतिक आलोचना के पहले और अंतिम आलोचक हैं। उनके बाद हिंदी में सैद्धांतिक आलोचना के बारे में किसी ने कुछ नहीं लिखा, उनको दोहराया तक नहीं। आज हम इतिहास दर्शन पढ़ कर परिपक्व हो गए हैं। बिना इतिहास दर्शन पढ़े हिंदी साहित्य को जो शुक्ल जी ने ढाँचा दिया, आज तक हम उस ढाँचे को तोड़ नहीं पाए हैं। आचार्य शुक्ल को पढ़ते हुए हम उलझ जाते हैं। हम उनके बरक्स हजारीप्रसाद द्विवेदी को रख देते हैं। भक्तिकाल, रीतिकाल और छायावाद पर आचार्य शुक्ल के लेखन पर बात करते हैं। इस क्रम में शायद हम उनके साथ न्याय नहीं करते हैं। आचार्य शुक्ल ने कबीर पर बहुत कम लिखा है, पर जो लिखा है वह बहुत महत्वपूर्ण है। खैर, इन सब चीजों पर हम बाद में आएँगे। पहले मैं शुक्ल जी के जीवन के दो तीन प्रसंगों की चर्चा करना चाहूँगा जिनका उनके चिंतन पर बहुत प्रभाव पड़ा है। आप सब जानते हैं कि आचार्य शुक्ल का जन्म 1884 ई. में बस्ती जिले के अगौना नामक गाँव में हुआ था। वे वहाँ के थे नहीं। उतर प्रदेश के देवरिया जिले में भेड़ी गाँव है। यह गाँव शुक्ल लोगों का डीह स्थान है। इनके पूर्वज वहाँ रहते थे। उनकी दादी आजी पढ़ी लिखी स्वाभिमानी विधवा थीं। विधवा की तरह जीवन व्यतीत कर रही थीं। एक लिबास में रहना, कहीं आना जाना नहीं, एक समय खाना खाना, खाना बनाते समय बिना सिले हुए वस्त्र पहनना। इसी तरह एक दिन धोती लपेटे हुए वे खाना बना रही थीं। घर में एक कंगन की चोरी हुई थी। कुछ स्थितियाँ ऐसी बनी कि कहीं से उन्हें भनक लगी कि उस चोरी का आरोप उन पर लग रहा है। वह ब्राह्मणी चोरी के आरोप से तमतमा उठीं और घर से बाहर निकल आईं और पैदल ही चल दीं। गाँव घर के लोग मनाने गए लेकिन उन्होंने कहा - 'नहीं, अब नहीं, अब मैं इस गाँव का पानी तक नहीं पिऊँगी। वहाँ से वे पुत्र चंद्रबली शुक्ल के साथ बस्ती आ गईं। बस्ती जिले की राजमाता उनकी सहेली थीं। उन्हीं के यहाँ गई। उन्हें जब पूरी बातें पता चलीं तो उन्होंने आचार्य शुक्ल की आजी से वहीं रहने का प्रस्ताव दिया लेकिन उन्होंने कहा कि वे वैसे नहीं रहेंगी, मेहनत मजदूरी करके रहेंगी। अपना खर्च स्वयं चलाएँगी। इसके बाद राजमाता ने उन्हें 80 बीघा सीरमाफी जमीन दी और अगौना में बसा दिया। धीरे-धीरे यह परिवार वहीं बस गया। वहीं पर उन्होंने चंद्रबली शुक्ल की पत्नी को भी बुला लिया। शुक्ल जी के पिताजी राजकुमार के साथ पढ़ने लगे। वहीं शुक्ल जी का जन्म हुआ था और चार पाँच साल की उम्र तक वे वहीं रहे। शुक्ल जी के पिताजी कानूनगो थे। मुस्लिम संस्कृति में पूरी तरह रचे बसे थे। कहा तो यह जाता है कि वे नमाज भी पढ़ते थे। मुझे ऐसा लगता है कि उस समय मुस्लिम तौर तरीके से जीवन जीना शान की बात समझी जाती थी। वहाँ से उनके पिताजी का तबादला नजदीक के हमीरपुर जिले के राठ में हो गया। शुक्ल जी की शिक्षा दीक्षा राठ से शुरू हुई। वहाँ से उनके पिताजी का तबादला मिर्जापुर हो गया। वे मिर्जापुर पदभार ग्रहण करने गए उसी समय शुक्ल जी की माता का देहांत हो गया। राठ में ही वे जलाई गईं। शुक्ल जी पितामही की छत्रछाया में ही पूरी तरह से पले बढ़े। शुक्ल जी उन्हें 'दूधू माँ' कहते थे और लोग उन्हें 'बच्ची साहब' कहते थे। पितामही पूरी तरह हिंदू संस्कारों का पालन करती थीं। रामचरितमानस, भागवत, महाभारत का पाठ नियमित रूप से करती थीं और इन्हीं की कहानियाँ सुनाया करती थीं। शुक्ल जी के चिंतन पर उनकी सुनाई कहानियों का बहुत प्रभाव है।

शुक्ल जी चित्रकार भी थे। नौकरी की शुरुआत उन्होंने मिर्जापुर में ड्राइंग टीचर के रूप में की थी। शुक्ल जी ने दो काम जीवन भर किया। चित्रकार के रूप में शुक्ल जी एक चित्र जीवन भर बनाते रहे, वह चित्र था राम वनगमन का। राम, लक्ष्मण और सीता वन जा रहे हैं। इस चित्र को वे अपने सिरहाने रखते थे और जीवन भर उसमें कुछ न कुछ जोड़ते रहे लेकिन पूरा नहीं कर पाए। ग्रंथावली में मैंने वह चित्र दिया है, चित्र अब अनुपलब्ध है मगर मुझे कहीं से उसकी प्रति उपलब्ध हो गई थी। घर से दूधू का निकलना और अयोध्या से राम का निकलना ये दोनों शुक्ल जी के चिंतन को कहीं न कहीं से प्रभावित करते हैं। आज हम शुक्ल को कभी वर्णाश्रमी कहते हैं, कभी जातिवादी कहते हैं, कभी कबीर का घोर निंदक कहते हैं और तुलसी का घोर प्रशंसक कहते हैं। हम कुछ भी कहें पर शुक्ल के व्यक्तित्व और चिंतन के निर्माण में इन घटनाओं के योगदान अवश्य देखें।

शुक्ल जी के पिताजी नहीं चाहते थे कि वे हिंदी पढ़ें। मिर्जापुर में शुक्ल जी की एक मित्र मंडली थी। उन्हीं के साथ वे रहते थे और धोती पहनते थे। यह उनके पिता को नागवार गुजरता था। वे कहते थे - 'ये हरामजादा बेशऊरों में वशिष्ठ बना घूमता है'। शुक्ल जी के पिताजी सदर के कानूनगो थे। उस समय वहाँ के कलक्टर विंढम थे। उन्होंने शुक्ल जी के पिताजी को एक नक्शा बनाने के लिए दिया। नक्शा शुक्ल जी ने बनाया। विंढम के पूछने पर उन्होंने बताया कि नक्शा बेटे ने बनाया है। विंढम ने शुक्ल जी को बुलाया। शुक्ल जी गए पर उन्हें यह बुरा लगा कि विंढम को बहुत झुक कर सलाम करना पड़ा। उस समय तहसीलदारी के लिए कलक्टर नाम प्रस्तावित करता था। विंढम ने शुक्ल जी का नाम प्रस्तावित कर दिया। शुक्ल जी जब विंढम के पास से लौट कर आए तो उन्होंने अंग्रेजी में एक लेख लिखा - 'What has India to do' (भारत को क्या करना चाहिए)। भारत उस समय गुलाम था। उस लेख का परिणाम यह हुआ कि विंढम ने उनका नाम तहसीलदारी से वापस ले लिया और यह लिख दिया कि इस आदमी को जीवन भर सरकारी नौकरी न दी जाए। अब शुक्ल जी की स्थिति यह थी कि वे सरकारी नौकरी कर नहीं सकते थे, पढ़ाई ज्यादा की नहीं थी, पिता ने दूसरा विवाह कर लिया था, विमाता से बनती नहीं थी। ऐसी स्थिति में शुक्ल जी की व्यवस्थित पढ़ाई तो नहीं हो सकती थी, लेकिन इनका स्वाध्याय गंभीर रूप से चलता रहा।

शुक्ल जी के चिंतन के निर्माण में बनारस से अधिक मिर्जापुर का योगदान है। अपने लेखन की शुरुआत उन्होंने मिर्जापुर से की थी। मिर्जापुर उन्हें बड़ा प्रिय था। उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की थी कि लोग काशी में मरकर मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं पर वे मिर्जापुर में मरना चाहते हैं। उन्होंने लिखा कि मरते समय मिर्जापुर की पहाड़ियाँ, वहाँ की हरियाली दिखाई देती रहे, यही मेरी अंतिम आकांक्षा है। सरकारी नौकरी न मिलने की बात पर पिता बहुत नाराज हुए। उन्हें घर से निकाल दिया। वे अगौना जाकर रहने लगे, शिक्षा से कट गए। उस समय उनका साथ उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' ने दिया। वे 'आनंदकादंबिनी' पत्रिका निकालते थे। उन्होंने 1903 ई. में 'आनंदकादंबिनी' का संपादक बनाकर शुक्ल जी को मिर्जापुर बुला लिया। वे 'आनंदकादंबिनी' का संपादन करने लगे। वे कविताएँ भी लिखते थे। उनका एक काव्य संग्रह 'मधुस्रोत' है। वे अंग्रेजी में लेख लिखते थे और जमकर अंग्रेजी पढ़ते थे। रामगरीब चौबे ने उन्हें अंग्रेजी की तरफ प्रेरित किया, जो अंग्रेजी के अच्छे ज्ञाता थे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे रामप्रसन्न घोष (बंगमहिला के पिता) के संपर्क में आए। रामप्रसन्न घोष मिर्जापुर की मेयो लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन थे। शुक्ल के परिवार से उनका घनिष्ठ संबंध था। शुक्ल जी ने मेयो लाइब्रेरी की सारी अंग्रेजी की पुस्तकें पढ़ डालीं। आप लोगों ने भवदेव पांडेय का नाम सुना होगा! उन्होंने रामचंद्र शुक्ल और बंगमहिला पर लिखा है। भवदेव पांडेय को यह लगता था कि रामचंद्र शुक्ल और बंगमहिला में रागात्मक संबंध था। वे खुलकर तो इस बात को नहीं कह पाए मगर उनके लेखन में जगह-जगह इस बात की झलक मिलती है। बंगमहिला ने 'दुलाईवाली' कहानी लिखी थी। यह कहानी पर्दा प्रथा के विरोध में लिखी गई पहली कहानी है। वे बाल विधवा थीं और उनकी खुद की हालत यह थी कि उनके कमरे में एक पर्दा टँगा रहता था। वे उस पर्दे की आड़ से ही किसी से बात कर सकती थीं। भवदेव पांडेय ने यह नहीं सोचा कि बंगमहिला ने शुक्ल जी की पत्नी को बंगला सिखाई थी। अगर रामचंद्र शुक्ल और बंगमहिला में वैसे संबंध होते जिसकी तरफ भवदेव पांडेय ने इशारा किया है तो बंगमहिला और शुक्ल जी की पत्नी में न पटती। इसके विपरीत बंगमहिला ने शुक्ल जी की पत्नी को इतनी बंगला सिखा दी थी कि उन्होंने कई बंगला उपन्यासों का अनुवाद भी किया था। खैर, रामचंद्र शुक्ल के जीवन से जुड़े कुछ प्रसंगों की चर्चा करने से मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूँ। मिर्जापुर में ही उनका परिचय एक ऐसे व्यक्ति से हुआ जो विज्ञान, ज्योतिष, व्याकरण, संस्कृत आदि के ज्ञाता थे, नाम था उनका विंदेश्वरी प्रसाद। कुछ ऐसे भी लोग थे जो पशु प्रेमी थे। रात में वे पूड़ियों का खोमचा बाँधकर निकलते थे और कुत्तों को बाँटते थे। जब वे घर से निकलते तो सारे कुत्ते उनके पीछे-पीछे चलते। एक दिन कुत्तों को दौड़ाते हुए वे विंढम साहब के बँगले तक पहुँचे। कुत्तों ने बहुत उपद्रव मचाया। होली का दिन था, यह खोज होने लगी कि वह व्यक्ति कौन था। शुक्ल जी के विनोदी स्वभाव में कहीं न कहीं उस व्यक्ति का योगदान था। शुक्ल जी के गंभीर व्यक्तित्व के निर्माण में रामगरीब चौबे की अंग्रेजी, रामप्रसन्न घोष द्वारा उपलब्ध कराई गई अंग्रेजी की किताबों का योगदान था। इस तरह शुक्ल जी के व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। 1908 ई. में शुक्ल जी बनारस आए। उस समय नागरीप्रचारिणी सभा से 'हिंदी शब्दसागर' का संपादन हो रहा था। शुक्ल जी 'हिंदी शब्दसागर' के सहायक संपादक नियुक्त किए गए। 'हिंदी शब्दसागर' के प्रधान संपादक श्यामसुंदर दास थे। इनके अलावा कई और सहायक संपादक थे। 'हिंदी शब्दसागर' का प्रकाशन 11 खंडों में हुआ। धीरे-धीरे सभी सहायक संपादक हटते गए और अंत में केवल श्यामसुंदर दास और रामचंद्र शुक्ल बच गए। 'हिंदी शब्दसागर' के निर्माण में मुख्य रूप से रामचंद्र शुक्ल ने ही काम किया। श्यामसुंदर दास ने आत्मकथा में यह स्वीकार करते हुए लिखा भी है कि आचार्य शुक्ल ने शब्दसागर बनाया और शब्दसागर ने आचार्य शुक्ल को।

मिर्जापुर में रहते हुए ही आचार्य शुक्ल ने दो महत्वपूर्ण अंग्रेजी लेखों का अनुवाद किया था। इनमें से पहला है - 'ऐसे आन इमेजिनेशन' का 'कल्पना का आनंद' शीर्षक से किया गया अनुवाद और दूसरा है - न्यू मैन के 'आइडिया ऑफ ए यूनिवर्सिटी' के 'लिटरेचर' नामक निबंध का 'साहित्य' शीर्षक से किया गया अनुवाद। 'साहित्य' शीर्षक से शुक्ल जी ने अनूठा अनुवाद किया है। दरअसल 'लिटरेचर' के आधार पर लिखा गया यह उनका स्वतंत्र निबंध है। शुक्ल जी ने मनोवैज्ञानिक निबंध लिखे - 'लोभ और प्रीति', 'क्रोध', 'श्रद्धा और भक्ति' आदि। उसी काल में जयशंकर प्रसाद ने 'कामायनी' का लेखन मनोविकारों के आधार पर किया। ध्यान दीजिए कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कल्पना और मनोविकार इन दोनों के आधार पर ही साहित्य का निर्माण होता है। उनका सबसे महत्वपूर्ण निबंध जो उनके चिंतन की बुनियाद है - 'कविता क्या है' है। यह निबंध 1907-1908 ई. में मिर्जापुर में लिखा गया और 1909 ई. की 'सरस्वती' में छपा। इस निबंध को शुक्ल जी जीवन भर लिखते रहे। इसके तीन संस्करण छपे। तीनों संस्करणों को मैंने ग्रंथावली में दिया है। पहला संस्करण नौ पेज का है और तीसरा सत्ताईस पेज का। इसका मतलब यह है शुक्ल जी जैसे जैसे उस विषय पर सोचते गए, निबंध को बढ़ाते गए। इसी निबंध में कविता की परिभाषा मिलती है और साहित्य के बारे में जानकारी भी। इसी निबंध को पढ़कर हम साहित्य के मर्म को समझ सकते हैं। शुक्ल जी के अनुवाद 'कल्पना का आनंद' और 'साहित्य' तथा 'कविता क्या है' निबंध से आलोचना की शब्दावली निकालने पर उनका चिंतन खड़ा हो जाता है। क्षात्र धर्म का सौंदर्य, लोकमंगल, रसदशा, आत्मा की मुक्तावस्था, हृदय की मुक्तावस्था, विरुद्धों का सामंजस्य जो उनके चिंतन के केंद्र बिंदु बने, उनके आधार ये ही निबंध हैं। शुक्ल जी ने सभी मनोवैज्ञानिक निबंध सभा में काम करते हुए लिखे थे, लेकिन वे छपे बहुत बाद में 1930 ई. में 'विचारवीथी' के नाम से।

1919 ई. में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त होने के साथ शुक्ल जी के जीवन में निर्णायक मोड़ आया। वहाँ शुक्ल जी की नियुक्ति अंग्रेजी माध्यम से हिंदी निबंध पढ़ाने के लिए हुई। उस समय अंग्रेजी माध्यम से बी.ए. में हिंदी पढ़ाई जाती थी। एम.ए. में हिंदी की पढ़ाई 1923 ई. में शुरू हुई। अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' को मालवीय जी ने पढ़ाने के लिए बुलाया लेकिन वे नहीं जानते थे कि हरिऔध जी को अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती है। हरिऔध जी 20-30 साल पहले विधुर होकर वीतरागी हो चुके थे। जब मालवीय जी ने देखा कि हरिऔध जी विभाग में नहीं चल पा रहे हैं तो उन्हें महिला महाविद्यालय में भेज दिया। हरिऔध जी वहाँ जाना नहीं चाहते थे पर महामना की आज्ञा का उल्लंघन भी नहीं कर सकते थे। इसीलिए वे अवैतनिक रूप से महिला महाविद्यालय में पढ़ाते रहे और कुढ़ते रहे। रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी पढ़ाते हुए हिंदी साहित्य के इतिहास की जरूरत महसूस की। शुक्ल जी से पहले गार्सा द तासी का इस्तवार द ला लितरेत्यूर ऐंदुई ऐंदुस्तानी, शिवसिंह सेंगर का 'शिवसिंह सरोज', जार्ज ग्रियर्सन का 'द मार्डन वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान और मिश्रबंधु का 'मिश्रबंधु विनोद' आदि इतिहास ग्रंथ लिखे गए थे लेकिन ये सभी कविवृत्तसंग्रह हैं। इनसे शुक्ल जी का इतिहास अलग था। उनके इतिहास का ढाँचा चिंतन पर आधारित था।

शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने साहित्य के इतिहास को जनता की चित्तवृत्ति से जोड़ा और व्यवस्थित काल विभाजन किया। इतना अवश्य है कि शुक्ल जी की कुछ सीमाएँ थीं। उस समय साहित्य के बहुत कम ग्रंथ उपलब्ध थे। कुछ ग्रंथ नोटिस मात्र थे। जाहिर सी बात है कि शुक्ल जी को भी बहुत कम साहित्यिक पुस्तकों की जानकारी रही होगी। उन्हीं उपलब्ध जानकारियों के आधार पर उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास का ढाँचा तैयार किया और पूरे इतिहास को चार भागों में बाँटा। वीरगाथाकाल के पूर्व का जितना साहित्य है उसे उन्होंने सांप्रदायिक माना क्योंकि बौद्धों, जैनों का साहित्य अपने संप्रदाय की चर्चा से जुड़ा है इसीलिए उन्हें साहित्य से बाहर कर दिया। इसके अलावा शुक्ल जी पता नहीं क्यों रहस्यवाद से बहुत चिढ़ते थे। जहाँ कहीं भी उन्हें रहस्यवाद दिखलाई पड़ता उसे वे इतिहास से निकाल बाहर करते। नाथों के यहाँ, सिद्धों के यहाँ उन्हें रहस्यवाद दिखाई दिया। रहस्यवाद को वे अभारतीय मानते थे, बाहर की वस्तु मानते थे। उसी कारण उन्होंने कबीर पर भी गंभीरता से विचार नहीं किया। शुक्ल जी की इतिहास दृष्टि पर विचार करते समय यह ध्यान देना आवश्यक है कि उन्होंने लोक को किस दृष्टि से देखा। उन्होंने 'लोक' के अंतर्गत केवल शिक्षित समुदाय की बात की, जबकि उस समय एक बड़ा समुदाय अशिक्षित था। बाद में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसी अशिक्षित समुदाय को पकड़ा। ध्यान देने की बात यह है कि अगर शुक्ल जी ने शिक्षित समुदाय की बात न की होती तो द्विवेदीजी को अशिक्षित समुदाय न दिखलाई देता। खैर इस तरह कालविभाजन करके उन्होंने छात्रों को पढ़ाने के लिए जो नोट्स तैयार किए वही 'हिंदी शब्दसागर की भूमिका' बना। बाद में (1929 ई. में) वही 'हिंदी साहित्य का इतिहास' नाम से प्रकाशित हुआ। इसके पीछे भी दो तीन घटनाएँ हैं। जिस तरह से शुक्ल जी ने 'शब्दसागर की भूमिका' के लिए 'हिंदी साहित्य का विकास' लिखा उसी तरह श्यामसुंदर दास ने 'हिंदी भाषा का विकास' लिखा। श्यामसुंदर दास की यह इच्छा थी कि दोनों भूमिकाएँ संयुक्त रूप से प्रकाशित हों और लेखक के रूप में दोनों का नाम छपे। शुक्ल जी ने इसका घोर विरोध किया। यह कहा जाता है कि सभा में लाठी के बल पर रात में अयोध्यासिंह उपाध्याय ने जाकर इतिहास पर शुक्ल जी का नाम छपवाया। हिंदी में उस समय श्यामसुंदर दास का बहुत दबदबा था। उतना दबदबा अपने जमाने में डॉ. नगेंद्र का भी नहीं रहा। शुक्ल जी के इतिहास में वीरगाथाकाल, भक्तिकाल और छायावाद पर प्रश्नचिह्न लगता है। इन सभी कालों को शुक्ल जी की रहस्यवाद संबंधी धारणा से जोड़कर देखना चाहिए। जहाँ कहीं भी शुक्ल जी को रहस्यवाद दिखलाई दिया वे भड़क उठे। 'हिंदी साहित्य का इतिहास' 1929 ई. में छपा और उसका परिवर्द्धित, परिमार्जित रूप 1940 ई. में। ध्यान देने की बात है कि तब तक 'छायावाद' समाप्त हो चुका था। शुक्ल जी के आलोचक छायावाद के संबंध में उनकी धारणा के बारे में बताते हुए लिखते हैं कि शुक्ल जी ने निराला पर तीन पेज लिखा तो पंत पर तेरह पेज। शुक्ल जी के चिंतन में 1929-30 के कालखंड को मैं बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ। शुक्ल जी ने 1929-30 के पहले क्या लिखा और बाद में क्या लिखा इसकी गंभीर जाँच पड़ताल होनी चाहिए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं है और हमारे गंभीर विद्वान लोग ऐसा होने देना नहीं चाहते। इसका कारण है कि यदि ऐसा हुआ तो शुक्ल जी को फिर से पढ़ना होगा, उनके बारे में नई धारणाएँ बनानी पड़ेगी। ऐसे में वे किस मुँह से अलग धारणाएँ पढ़ाएँगे। हम तो उन्हें ब्राह्मणवादी, जातिवादी मानते रहे हैं तो अब हम कैसे कहें कि शुक्ल जी वर्णाश्रमी नहीं थे। वैसे समस्या तो यह भी है कि हम कैसे कहें कि वे भौतिकवादी नहीं थे।

शुक्ल जी के चिंतन का दायरा केवल साहित्य तक सीमित नहीं था। समाजविज्ञान, भाषाविज्ञान, अन्य कलाओं, अनुवाद, कविता, कहानी इन तमाम चीजों तक फैला हुआ था। याद करिए और पढ़िए उनकी कहानी 'ग्यारह वर्ष का समय', निबंध, कविताएँ, अंग्रेजी लेख और अनुवाद। 'टा इंडिका' की चर्चा मैंने की ही है। इसके अलावा उन्होंने हैकेल की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'रिडिल ऑफ युनिवर्स' का अनुवाद 'विश्वप्रपंच' नाम से किया था। रिडिल ऑफ युनिवर्स जब अंग्रेजी में प्रकाशित हुई तो उसे काफी विरोध सहना पड़ा। यह पुस्तक पादरियों के विरोध में लिखी गई थी। लेकिन शुक्ल जी द्वारा उसके अनुवाद की नोटिस भी नहीं ली गई क्योंकि लोगों को कुछ ऐसी गंध आ रही थी कि इससे समाज के सोचने समझने की क्षमता दूसरे ढंग से विकसित होगी। बीसवीं शताब्दी का समय विज्ञान और पौराणिक कथाओं या हृदय और बुद्धि के द्वंद्व का समय है जैसा कि 'कामायनी' में मिलता है - 'सिर चढ़ी रही पाया न हृदय'। हम यह मान कर चलते हैं कि सृष्टि का विकास मनु और श्रद्धा से हुआ। हैकेल इस बात का विरोध करता है। वह सृष्टि के विकास के दैवीय सिद्धांत को नहीं मानता है। उसके अनुसार सृष्टि के विकास का वैज्ञानिक और प्राणिशास्त्रीय सिद्धांत है। आगे चलकर वानर से मानव के विकास की बात की गई। शुक्ल जी ने सृष्टि के वैज्ञानिक विकास की बात की। शुक्ल जी के विरोध में कहा जाता है कि उन्होंने अंग्रेजों की नकल की। अगर उन्होंने नकल भी की है तो यह एक सराहनीय प्रयास है और यह शुक्ल जी जैसा चिंतक ही कर सकता था। शुक्ल जी ने सृष्टि के विकास, आकाश का नीला रंग आदि पर लंबा निबंध लिखा, 'ईथर की भँवर और संसार की उत्पत्ति' लिखा। कहाँ लेखन का इतना वैविध्य और हम घूम फिर कर उसी 'हिंदी साहित्य का इतिहास', कबीर, प्रसाद, पंत और निराला पर बात करते हैं। शुक्ल जी ने 'हिंदी साहित्य के इतिहास' का संशोधित संस्करण तैयार किया था। वह दो बार गायब हो गया। एक बार गायब होने के बाद शुक्ल जी ने उसे दोबारा लिखा। निराला पर शुक्ल जी की मान्यता में अंतर आया था। पहले उनके संबंध खराब थे पर बाद में बहुत अच्छे हो गए थे। आप इसी बात से समझ लीजिए कि शुक्ल जी की मृत्यु पर जैसी शोक कविता निराला ने लिखी है, वैसी आज तक किसी की मृत्यु पर नहीं लिखी गई है। 'हिंदी साहित्य का इतिहास' का संशोधित संस्करण उनके घर पर पड़ा था। शुक्ल जी की मृत्यु के बाद उनके नौकर ने रद्दी समझ कर बेच दिया। जब तक घरवालों को पता चला और वे उसे बचाने पहुँचे तब तक उसके ठोंगे बन चुके थे और उसमें चना-मूँगफली बिक चुकी थी। पंजाब के विद्यार्थियों के लिए शुक्ल जी ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' का पंजाब संस्करण तैयार किया था। आज हम जो इतिहास पढ़ते हैं उसका आधुनिक काल उसी पंजाब संस्करण से लिया गया है। इसलिए हमें 3 और 13 पेज की विसंगतियाँ मिलती हैं। शुक्ल जी 'रसमीमांसा' पुस्तक पूरी नहीं कर पाए थे। उसके लिए उन्होंने नोट्स लिए थे। उसी नोट्स को विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने संपादित कर छाप दिया। उस समय हिंदी जिस संघर्ष की स्थिति से गुजर रही थी, उस पर भी शुक्ल जी ने निबंध लिखे हैं। मैं तीन और अंग्रेजी निबंधों का नाम लूँगा - 'What has India to do', 'State of the vernacular', 'Observation on Hindi Literature' पढ़ते समय शुक्ल जी के इंदौर वाले भाषण को याद करें। दूसरी तरफ State of the vernacular (देशी भाषाओं की स्थिति) निबंध है। यह निबंध देशी भाषाओं की तत्कालीन स्थिति पर आधारित है। शुक्ल जी देशी भाषाओं की स्थिति से दुखी थे। उनका एक मशहूर लेख है Hindi & the Musalmans जो उस समय के प्रसिद्ध पत्र 'लीडर' में प्रकाशित हुआ था। उस पर आलोचक ध्यान नहीं देते हैं। जिस समय मुसलमानों ने हिंदी का विरोध किया था उस समय वह लेख उनसे 'सरस्वती' के संस्थापक चिंतामणि घोष ने लिखवाया था। उनका एक और लेख है Non cooperation & merchantile classes यह लेख गांधी जी के असहयोग आंदोलन के विरोध में लिखा गया था। इस लेख में शुक्ल जी ने यह विरोध जताया था कि गांधी जी छात्रों से कह रहे हैं स्कूल छोड़ दीजिए, शिक्षकों से कह रहे हैं नौकरी छोड़ दीजिए, वकीलों से कह रहे हैं वकालत छोड़ दीजिए, अन्य नौकरीपेशा लोगों से कह रहे हैं नौकरी छोड़ दीजिए, व्यापारियों से क्यों नहीं कह रहे हैं कि व्यापार छोड़ दीजिए। बनियों से अगर व्यापार छोड़ने को नहीं कह रहे तो कहीं बनियों के साथ इनकी कोई साठ-गाँठ तो नहीं है। उस लेख का गांधी जी पर इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने असहयोग आंदोलन की अपनी रणनीति बदल दी और बनारस में मालवीय जी के घर शुक्ल जी को बुलाकर उनसे मुलाकात की।

आज हम शुक्ल जी पर कई आक्षेप लगाते हैं। शुक्ल जी की ग्रंथावली पर काम करते हुए मुझे कुछ ऐसे लेख मिले जो अंग्रेजी में और शुक्ल जी के हस्तलेख में हैं। उसे मैंने उसी रूप में ग्रंथावली में दिया भी है जिससे लोग शक न करें कि ये शुक्ल जी के लेख नहीं हैं। उनमें एक बड़ा मशहूर लेख है Cast System, जिसे वे पूरा नहीं कर पाए थे। जो लोग शुक्ल को जातिवादी कहते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि इस लेख में उन्होंने यह लिखा है कि ब्राह्मणों ने तो अपनी श्रेष्ठता का ठेका ले रखा है। आचार्य शुक्ल ब्राह्मणों के इस ठेके की चर्चा करते हुए जाति व्यवस्था के निचले पायदान तक चले जाते हैं। वे जोर देते हैं कि हमें उन लोगों पर भी विचार करना चाहिए जो जातिच्युत हैं, जाति से निकाले गए हैं, जो बिरादरी में नहीं हैं। उन्हें कैसे सम्मान दें। कोई दो राय नहीं है कि शुक्ल जी ब्राह्मण थे, हिंदू थे। उन्हें पितामही द्वारा हिंदू संस्कार भी मिला था लेकिन उन्हीं शुक्ल जी ने 'सभ्य संसार का भावी धर्म' नामक लेख लिखा और यह प्रतिपादित किया कि अभी उस धर्म का विकास नहीं हो पाया है जो सभ्य संसार का धर्म होगा। सभ्य संसार का जो धर्म होगा वह अभी गर्भ में है जो आगे चलकर पैदा होगा जिसे हम सभी लोग स्वीकार कर सकेंगे। शुक्ल जी ने जाति व्यवस्था पर, धर्म पर बहुत गंभीरता से विचार किया है। उनका चिंतन बहुत गंभीर रहा है, इस पर हमें विचार करना चाहिए। अंत में मैं कहना चाहूँगा कि साहित्य में शुक्ल जी ने जो स्थापनाएँ दीं और जिन मान्यताओं को खारिज किया उसके विपरीत न हम स्थापनाएँ दे पाए हैं और न उनकी खारिज की हुई मान्यताओं को साहित्य में वापस ला पाए हैं। सबसे पहला काम जो शुक्ल जी ने किया वह यह कि उन्होंने अभिव्यंजनावाद को साहित्य से निकाल बाहर किया। आज तक हम साहित्य में क्रोचे के अभिव्यंजनावाद को स्थापित नहीं कर पाए हैं। शुक्ल जी का हिंदी में एक महत्वपूर्ण लेख है - 'काम नहीं सुरक्षा कला की मूल प्रेरणा है'। उनके अनुसार कला की मूल प्रेरणा Sex नहीं Security है। इस लेख द्वारा फ्रायड के सिद्धांत का विरोध किया गया है।

शुक्ल जी ने केशव को कठिन काव्य का प्रेत कहा। हम आज भी साहित्य के विद्यार्थियों से पूछते हैं कि क्या केशव कठिन काव्य के प्रेत थे? केशव को उस प्रेत ने आज तक नहीं छोड़ा। बड़ी छोटी-छोटी चीजों को शुक्ल जी ने पैनी निगाहों से देखा। एक और बात कि भगवतीचरण वर्मा को 'चित्रलेखा' से बहुत सम्मान मिला। शुक्ल जी के अंतिम शिष्यों में शिवमंगल सिंह 'सुमन' एक थे। वर्माजी ने सुना कि शुक्ल जी ने 'चित्रलेखा' को कोर्स में लगा दिया है। वे उसके प्रशंसक भी हैं। उन्होंने शिवमंगल सिंह 'सुमन' को पकड़ा कि किसी तरह शुक्ल जी से मेरी मुलाकात करा दीजिए। कहा जाता है कि शुक्ल जी जब 'हिंदी साहित्य का इतिहास' लिख रहे थे तो उनके आसपास साहित्यकारों का जमावड़ा लगा रहता था कि किसी तरह उनका नाम भी इतिहास में आ जाए। वर्मा जी उनसे मिलने गए। शुक्ल जी बड़े आदर से वर्मा जी से मिले और 'चित्रलेखा' की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने बड़ा महान काम किया है। इस पर वर्मा जी ने 'चित्रलेखा' की प्रशंसा करते हुए कहा कि शुक्ल जी आपने 'चित्रलेखा' में इन इन तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया है, इन्हें भी देख लीजिए। शुक्ल जी समझ गए कि वर्माजी मद से पागल हो रहे हैं। उन्होंने वर्माजी से कहा - ''ठीक है देख लूँगा, पहले आप यह बतलाइए कि 'चित्रलेखा' की रचना तो गुप्तकाल की पृष्ठभूमि में हुई है फिर इसमें कुमारगिरि जैसे नाम कैसे आ गए हैं। गिरि/पुरी की संकल्पना तो आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने की। आप ये कहाँ से ले आए? जाकर इन नामों को बदल दीजिएगा, सुधार दीजिएगा। वर्मा जी अपनी औकात में आ गए। महादेवी वर्मा के शुक्ल जी प्रशंसक थे लेकिन रहस्यवाद के कारण उनके विरोधी भी थे। महादेवी जी की कविता की पंक्ति कुछ ऐसी थी - 'शेफालिका गिरती झर झर'। शुक्ल जी ने संदेश भिजवाया जरा उसको बता दो कि यही फूल ऐसा है जिसे गिरते हुए कोई नहीं देखता है। यह रात में गिरता है और सुबह धरती पर बिछा हुआ मिलता है। फिर वह कैसे लिख रही हैं कि 'शेफालिका गिरती झर झर'। इन दोनों उदाहरणों से मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि हम साहित्य को सीमित करके देखते हैं पर आचार्य शुक्ल तो साहित्य के विद्यार्थी नहीं थे, उन्होंने साहित्य को कितना व्यापक बनाया - विज्ञान, धर्म, समाज, साहित्य, भाषा, व्याकरण, अनुवाद आदि पर एक साथ कार्य किया है। उस समय कुछ साहित्यकार ऐसे थे जो बंगला या मराठी के उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद कर उसे अपने नाम से छपवाते थे। शुक्ल जी ने लंबा लेख लिखकर उनका विरोध किया और ऐसे स्वनामधन्य लेखकों का पर्दाफाश किया। उन्होंने लिखा कि ऐसे लोगों को जो साहित्य में 'गड़बड़झाला' मचाए हुए हैं उन्हें साहित्य से निकालना चाहिए, ऐसी चीजें साहित्य में नहीं होनी चाहिए। दूसरी चीज उन तमाम स्वस्थ परंपराओं का विकास होना चाहिए जो हमारे जीवन को समृद्ध करें। आचार्य शुक्ल के चिंतन की इन चुनौतियों पर अगर थोड़ा भी ध्यान देंगे और हम एक बार उन्हें इन दृष्टियों से देखेंगे तो शायद उनके प्रति यह हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

प्रो. ओमप्रकाश सिंह , भारतीय भाषा केंद्र , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली द्वारा ' आचार्य रामचंद्र शुक्ल के चिंतन की चुनौतियाँ ' विषय पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा दिनांक 20.05.13 को साहित्य विभाग में दिया गया व्याख्यान।


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