डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कहानी

जिनकी मुट्ठियों में सुराख था
नीलाक्षी सिंह


कुछ चीजें शुरू से नहीं होतीं। वे कहीं से भी हो जाती हैं। मुझे अपनी जवानी के बारे में कुछ भी याद नहीं था। एक हर्फ भी नहीं जबकि मेरी उम्र तिरपन साल थी वोटर आई कार्ड के मुताबिक। बचपन के बारे में भी बहुत सी चीजें याद हों यह दावे से नहीं कहा जा सकता है। 'जब मैं सात आठ साल का रहा होऊँगा' या 'बचपन में एक बार' - इस तरह से शुरू कर मैं कोई वाकया नहीं सुना सकता कभी भी। बचपन का कुछ भी अचानक से या बिना किसी तालमेल के टिमटिमा जाता है जेहन में। जैसे अभी अभी याद आ रहा है कि मेरे घर के छप्पर के ठीक ऊपर किसी जानवर का स्थायी बसेरा हुआ करता था। दिन भर घर के छप्पर के ऊपर उनकी उछलकूद चलती रहती और जिस कमरे की छत पर वे पेशाब करते वहाँ से भयानक सुगंध उठती... बासमती चावल की जुड़वा खुशबू।

कभी बचपन में या कभी जवानी में मेरा नाम सूरतलाल उपाध्याय था। मेरी दसवीं की सर्टिफिकेट, राशन कार्ड, वोटर कार्ड आदि तमाम कागजातों में यही नाम दर्ज था मेरा। हालाँकि कोई भी मुझे इस नाम से जानता नहीं था। खुद मैं भी इतने लंबे चौड़े नाम का हिमायती नहीं था। वर्तमान में मेरे नाम से पीछे की तरफ के दो शब्द निकल गए थे और अब मैं लाल उपाध्याय की बजाए बेरंगी भर रह गया था - सूरत बेरंगी। और यही ठीक भी था। मेरे चेहरे पर से रंग उखड़ने लग गया था कहीं कहीं से। हालाँकि मेरा चेहरा उस प्रजाति का था जो कभी भी ज्यादा फैलता या सिकुड़ता नहीं था। कह सकते हैं कि चेहरे को उपयोग में बहुत कम लाया गया था फिर भी उस पर टूट फूट शुरू हो गई थी।

शहर के सबसे ज्यादा बिकने वाले हिंदी दैनिक में रोज पीछे से तीसरे पेज पर गोलमटोल अक्षरों में मेरा नाम छपता था और उसके ऊपर कभी तीन कभी चार चुटकुले छपते थे।

शहर बहुत बड़ा नहीं था और हँसने का ढब पूरी तरह से विलुप्त नहीं हुआ था। इसीलिए बासी पड़ने के पहले अखबार का यह टुकड़ा गली मुहल्ले भर की मुस्कान समेट लेता था अपने लिए।

पर मेरा बस चलता तो मैं रात रात भर जाग कर उस अखबार की तमाम प्रतियों के पीछे से तीसरे पन्ने को पीछे से दूसरे पन्ने के साथ ऐसा साट देता कि उन्हें अलगाना असंभव होता। इस तरह अगर देखा जाए तो चुटकुलों को लिखने से ज्यादा मेहनत मुझे उन्हें जमाने की नजर से छिपाने में लगती लेकिन मुझे मंजूर था। पर सचाई तो यह थी कि मेरा बस नहीं चलता कभी। बल्कि मैंने कभी चलाने की कोशिश भी नहीं की।

यहाँ एक वाजिब सवाल बनता था कि क्या केवल चुटकुले लिख कर एक कामचलाऊ मुक्कम्मिल घर का पालन पोषण संभव है! जी नहीं। बिल्कुल नहीं। मेरे ननिहाल की कुछ जमीन थी जिसे कालांतर में बेच दिया गया था मेरे द्वारा। बैंक से हर महीने उसका सूद मिला करता था। इसके पहले मैं कुछ ट्यूशन आदि पढ़ाया करता था। पर इस स्थायी बंदोबस्त के अस्तित्व में आते ही मैंने वह सब त्याग दिया और पूरी तरह अपने आप को कलात्मक अभियान में झोंक दिया। यह अलग बात है कि मेरे इस अभियान का अस्सी प्रतिशत हिस्सा सादे कागज के पन्ने और कलम को थामे थामे गुजर जाया करता था!

बहरहाल घर के दरवाजे पर एक छह बाई तीन की चारपाई है, जिस पर काले और पीले खाने वाला चादर बिछता है अमूमन। उसके बगल में एक स्टूल है और यही घेरा मेरी चौहद्दी है। कभी अपनी कलम, कॉपी, अखबार, चश्मे को उठा कर मैं चारपाई पर रख लेता हूँ तो कभी स्टूल पर। खाना भी मैं चारपाई पर काले पीले खाने वाले चादर पर ही बैठ कर खा लेता हूँ थाली को अपनी गोद में रख कर। रात को सोता हूँ तो एक ग्लास भरे पानी का, स्टूल पर रहता है। शेविंग करते वक्त मैं जमीन पर बैठा होता हूँ और आईना स्टूल पर होता है। पत्नी कहती है कभी चिढ़ कर कि मेरे मरने पर चारपाई और स्टूल ही दान करेगी वह। पत्नी ऐसा कभी कहती नहीं पर मुझे लगता है कि उसे मौका मिलता तो वह कहती जरूर।

ऐसा नहीं है कि घर छोटा है या कमरे। ज्यादा नहीं हैं रहने वाले। मैं तो बस, आदत लग गई है अब, इसी भरोसे यहाँ रह लेता हूँ। हालाँकि यह भी सच है कि कमरे नहीं हैं ज्यादा रहने लायक। दो कमरों को एक पत्नी और दो बच्चों, एक लड़का एक लड़की, में बाँट दूँ तो वाकई मेरे हिस्से में बरामदा ही आता है।

पत्नी और बेटा एक कमरे में रहते हैं और दूसरा कमरा बेटी का है। पत्नी और बेटे की शक्ल एक दूसरे पर गई है और आदतें भी। बल्कि कभी वे दोनों माँ बेटे से ज्यादा जुड़वा भाई बहन दिखते हैं। लड़का सत्रह अट्ठारह साल के आसपास होगा। न उसका कोई दोस्त है न संगति। कॉलेज ट्यूशन को छोड़ दें तो वह दिन भर घर में रहता है। टीवी भी नहीं देखता न कुछ अलग लिखने पढ़ने का ही शौक है। उसकी माँ आखिरी रोटी बेल चुकती है तो वह चकला बेलना उठा कर उन्हें माँजने लगता है। उसकी माँ कपड़ों को इस्त्री करने चलती है तो वह सूखे कपड़ों पर पानी का छींटा मारता है और प्रेस हो चुके कपड़ों को तहाने लगता है। उसकी माँ सिलाई मशीन पर कुछ सिलती है तो वह तत्पर बैठा होता है मशीन की सूई में धागा पिरोने के लिए। वे दोनों गजब के हँसोड़ हैं और कैसी भी सूखी से सूखी बातों में से हँसी के लिए सुराख निकाल लेते हैं। वे दोनों दिन भर इन सुराखों से रिसने वाली गुदगुदाहट को एक थैली में जमा कर एक साथ रात में मेरे आगे प्रस्तुत करते हैं - बतौर कच्चा माल। उन्हें अहसास है कि मुझे हर दिन चार की औसत से मुस्कुराने की वजह पेश करनी होती है। मेरे साथ मजबूरी थी और मुझे उनसे कच्चे माल की थैली लेनी ही होती थी पर सच कहता हूँ दिल काँप जाता था उसे लेते हुए इस आशंका से कि कहीं मैं बढ़ावा तो नहीं दे रहा - अपने बेटे को - अपना ही पेशा अपना लेने के लिए।

दिल काँपे या उछले सचाई तो यह है कि इसी थैली में से मैं कुछ संभावनाओं को चुनता हूँ और उन्हें ही ठोंकपीट कर तराशता हूँ। मेरे लिए यह तराशना ही हुआ भले ही और पढ़ने वालों के लिए यह मिनट भर की गुदगुदी का मामला हो। शब्द कम कम पर इतने चौकस कि जो शब्द वहाँ नहीं हों उनका भी काम कर जाएँ। अक्सर थैली से निकली यह संभावना अधूरी ही होती है इशारे जैसी। उसे अंजाम तक ले जाने का कौशल मेरा होता है।

पिछले सत्ताईस सालों से यही सब लिख रहा हूँ। मास्टर और टिंकू की बातें, चोर और पुलिस के संवाद, नौकर और मालिक के बयान, संता अैर बंता के कारनामे। पहले मैं कतरन काटा करता था। बाद में छोड़ दिया कभी। ठीक से याद नहीं। बेटे ने भी एक बार उन्हें जमा करना शुरू किया था फिर बाद में उससे भी छूट गया सब। हाँ कोई चुटकुला बहुत पसंद आ जाए उसे मेरा, तो वह उसे सहेज लेता है कहीं। एक बार उसकी इस आदत और छिपे हुए एक हुनर ने मुझे चकमा दे दिया। हुआ यह कि जब वह बारह तेरह साल का रहा होगा तो उसके स्कूल के सलाना जलसे में मैं गया। वहाँ मंच से उसने एक के बाद एक चुनिंदा चुटकुले सुनाए। उसके हाव भाव और प्रस्तुति ऐसी थी कि बाकी के लोग ही नहीं मैं भी दिल खोल कर हँसा। उन कुछ पलों के लिए मुझसे आगे पीछे का सब बिसर गया।

बाद में जब मैंने वापस अपने को इन्हीं आशंकाओं के बीच पाया कि यह मेरी तरह मसखरा तो नहीं बन जाएगा - मैंने उससे पूछ लिया वे लतीफे कैसे थे? मतलब कहाँ से सुनाए उसने? किससे सुन कर आदि आदि... अनेक सवाल। उसने ठठा कर बताया कि वे लतीफे दरअसल मेरे ही थे! मुझे सुकून हुआ था दो तरह से। एक यह कि मेरे बेटे ने लतीफे गढ़ना शुरू नहीं किया था। दूसरा यह कि वह अपने बाप पर नहीं गया था। क्या कि मैं उस अंदाज में कभी कोई चीज सुना सकता था? लोगों को या आईने को ही सही! असल बात यही थी कि मैं अपनी कोई चीज सुना कर किसी को भी कभी हँसा नहीं सकता था। कितना अच्छा हुआ कि मैं आज के समय में पैदा नहीं हुआ या कि आज के समय में जवान नहीं हुआ... रोजी रोटी तलाशने की शुरुआत करने वाला जैसा। वरना कहाँ टिकता इस कमी के साथ।

रिमोट का जो भी बटन दब जाता है उधर कोई न कोई हँसा रहा होता है। रोज हँसा रहा होता है। चौबीसों घंटे हँसा रहा होता है। खुद भी हँस रहा होता है। मैं चार चुटकुलों में शीर्षासन करने लगता हूँ। कोई मुझे लिखते देख ले तो! देख ही लेता होगा। जबकि सारी दिनचर्या मैं बरामदे की चौकी पर निबटाता हूँ, पर किसे दिलचस्पी है जो देखेगा। पर दिलचस्प है। मैं दो लाइन तेज लिख कर लेट जाता हूँ चित्त। फिर चुक्के मुक्के बैठ जाता हूँ। पता नहीं समझने वाली भाषा में इसे कैसे कहते हैं।

फिर कलम से पूरे कागज पर जहाँ तहाँ अपने हस्ताक्षर करता हूँ सुंदर तरीके से रच रच कर। फिर उठ कर टहल लेता हूँ। यही सब दुहराते तिहराते कोई चुटकुला बन जाता है और पहली प्रतिक्रिया में मैं उस पन्ने को फाड़ देता हूँ। शायद वह मुझे याद हो चुका रहता है और कागज पर लिखे होने की कोई अहमियत नहीं बची रहती है। या इससे भी प्रबल संभावना यह है कि अपने लिखे की नजर उतार लेने का यह कोई टोटका हो मेरा या एक और सबसे सही कि इस हताशा से उसे फाड़ देता था कि मैं अगला इससे बेहतर लिख पाऊँगा कि नहीं!

थोड़ी देर पहले से बचपन की एक बात याद आ रही है। उस समय से जब मैं टीवी पर दिन रात हँसाने वालों के बारे में सोच रहा था। नानी के गाँव के हिरखी मिसिर। कितनी अजीब बात है जीवन में पहली बार उनकी स्मृति हो रही थी जबकि मैं उनके 'पेशे' से ही जुड़ा हूँ तो हर मोड़ पर उनकी याद का आना जाना लगा रहना चाहिए था। फिर भी। दीवार से लग कर खड़े हुए, धोती को घुटने तक मोड़े हुए, मृदंग बजाने वालों की तरह पैरों को बड़ी कोष्ठक की तरह मोड़े हुए लंबे सुतले हिरखी मिसिर। वे 'आ हो' की तान पर कोई भी मसखरी शुरू करते और 'कि ना' पर जाकर बात समाप्त होती।

उस जमाने में टीवी की कल्पना नहीं थी तो वे सरेशाम दीवार से टिक कर खड़े हो जाते थे और औरतों और बच्चों का मनोरंजन, काम निबटाते निबटाते चलता रहता था। आँगन के कोने में साग चुनती औरतें, एक अलग गोले में बच्चों के साथ उबले आलू के छिलके उतारता मैं और दीवार से सटे हिरखी मिसिर। नट नटिन, सास बहू, बिदेसिया, काबुल के मोर्चे पर जाते लोहा सिंह, फाटक बाबा और दुनिया भर की चहलकदमी। दिन के उजाले में उन्हें कभी देख नहीं पाया था। कम से कम अभी तो ऐसा याद नहीं आता। पर अँधेरे का जो उनका चेहरा याद आ रहा है ढिबरी की रोशनी का, बड़ा निथरा निथरा सा। बेताल बने सज्जन जैसा! बता विक्रम बोल! वरना मैं तेरे सिर के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा... ऐसा। मेरी याद सपने जैसी ही है सुबह के सपने जैसी। कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा। कहाँ हिरखी मिसिर कहाँ बेताल।


कुछ चीजें सच में शुरू से शुरू नहीं होतीं। कहीं से भी हो जाती हैं। एयर कंडीशन के गाढ़ेपन में मेरे रोएँविहीन शरीर पर रोओं की परछाईं ने सिर उठा कर एक साथ खड़े हो जाना किधर से सीख लिया क्या कहूँ! ड्रेस रिर्हसल चल रही थी। मेरे शरीर पर कपड़े कम थे। बाँह, कंधे, पेट, टाँगें... जहाँ भी कपड़े गैरमौजूद थे वहाँ रोओं की परछाईं काँटों के नकाब में तन गई थीं। बड़ी शर्मिंदगी होती है जब अपना ही शरीर उघाड़ने लग जाए सरेआम। बचपन में जब रोएँ हुआ करते थे और ठंड लगने पर ऐसे ही सिर उठाने लगते थे, तब शरीर पर सरसों का तेल चुपड़ लेने से वे करवट बदल कर सो जाते थे वापस। पर अब सरसों का तेल शरीर पर लगाता है कौन! मेकअप मैन ने छूट कर बॉडी लोशन लेपाया है मेरे उघड़े शरीर पर। हम सात हफ्ते से साथ काम कर रहे हैं और वह जानती है कि कमरे के तापमान के कम होने के साथ ही मुझे यह वहम होने लगेगा... रोएँ वाला। वह मेरे इस लगने को कि मेरे शरीर पर काँटे की खेती शुरू हो चुकी है, वहम का नाम देती है। बहरहाल हासिल क्या! अभी लोशन फोशन के बावजूद मेरे शरीर पर सेज सज चुकी काँटों की।

यह साल्सा शैली पर आधारित एक प्रस्तुति थी और मैं प्रकट रूप से अपनी लंबी काया और अप्रकट रूप से कमजोर फुटवर्क के कारण हमेशा की तरह पिछली कतार में थी। हालाँकि यहाँ कतार जैसी कोई बात थी नहीं और लोगों को जोड़ों में नाचना था। कुल छह जोड़े थे अगर मुख्य जोड़े को शामिल कर लिया जाए तो। सहयोगी जोड़ों को नाचने के क्रम में अपनी जगहें बदलनी भी थीं पर ज्यादातर वक्त मुझे पीछे की तरफ ही रहना था। एक दफा चंगुल पर चक्कर लगाते हुए मुझे सामने की तरफ आना था जबकि यही चंगुल पर घूम जाने वाला स्टेप मेरे लिए सबसे कठिन था, जैसाकि मैंने कहा कि मेरा फुटवर्क कमजोर था इस लिहाज से। हालाँकि मैंने इसे अपने हाव भाव से ढाँकने की भरपूर तैयारी रखी थी पर बात यही थी कि सहयोगी जोड़े के एक्शप्रेशन अदाकारी को देखने की फुरसत थी किसके पास! मैं जितनी जल्दी उलट पुलट कर सामने से हट जाऊँ दर्शक उतनी ही तसल्ली पाएँगे। उन्हें सिर्फ और सिर्फ मुख्य जोड़े को देखना था - ऐसा मैं सोचती थी पर हमारा आदिल ऐसा नहीं सोचता था। वह एक सख्त टीचर था और हर जोड़े की फीनिशिंग पर बराबर पैनी नजर रखता था। मुझे बकवास लगती थीं उसकी ये आदतें। और हर बार अपनी गलत फुट स्टेप्स को उसकी नजरों से बचा ले जाकर मुझे बड़ा सुकून मिलता था। हालाँकि हर बार रिप्ले देखते वक्त मुझे दबोच ही लेता और इस फितूर से भर उठता कि वह मुझे सुधार ही लेगा पर मैं हर जगह ठीक होकर भी ऐन वक्त पर गलत पैर गिराना खूब जानती थी। ऐसा नहीं था कि मैं मेहनत करके सुधार नहीं कर सकती थी अपनी कदमताल में। पर देखा जाए तो ऐसा ही था कि मैं मेहनत के खिलाफ कुछ भी करने को अब हमेशा तैयार रहती थी।

बचपन में जबकि मैंने स्कूल जाना शुरू ही किया था, मोमबत्ती की पसनायी रोशनी में भी बगैर होमवर्क पूरा किए मैं टसकती नहीं थी किसी खेल कूद में। तब माँ मेरी पिघलती कनपटी से बालों की लटों को समेट कर उन्हें कान की जड़ों में खोंसती हुई मनुहार करती थी कि बाकी का बचा सबक मैं लाइट वापस आने के बाद बनाऊँ। आदि आदि। पर मैं उनकी बात नहीं मानती थी। माँ कहती थी - 'इतनी मेहनत मत करो', तब भी मैं नहीं मानती थी। आदिल कहता है - मेहनत करो, अब भी मैं नहीं मानती हूँ। न मानना मुझे अच्छा लगता है।

वापस सेट पर। मेरा सहयोगी पार्थो था। उसने बकायदा ओडिसी की शिक्षा ली हुई थी। सीख तो रखा था मैंने भी तीन साल भरतनाट्यम, पर मैं लोगों से कहती थी कि मैंने कभी क्लासिकल की ट्रेनिंग नहीं ली। ऐसा मैं यह जानते बूझते कहती हूँ कि मेरे फुटवर्क की कमजोरी शास्त्रीय नृत्य की पृष्ठभूमि पर और उभर कर दिखेगी। जब मैं ऐसा कहती तो लोग अपनी भौंहों को ऊपर नीचे करते, वजह कि मेरे चेहरे के भाव और हाथों की मुद्राएँ बड़े तालमेल से काम करती थीं। इन्हीं की वजह से जीवन में पहली, और आखिरी बार मुझे एक बड़े मंच पर मुख्य भूमिका मिली थी। कॉलेज में जब मैं डिप्लोमा के तीसरे साल में थी। उस वसंतोत्सव पर आधारित नृत्य नाटिका में सधे सधे पैर थपकाने वाली दूसरी लड़कियों को पेड़, पत्ते, चिड़ियों की भूमिका मिली थी। उन सबको छितर कर स्टेज पर खड़े होना था और मुझे - लड़की को बीचोंबीच रहना था मंच के। मंच पर मेरे प्रवेश के समय ही मुझे एक लंबा चक्कर लगाना था उन सबके सामने से अचम्भित और प्रभावित होकर गुजरते हुए। चक्कर लगा कर जब मैंने स्टेज के बीचोंबीच जगह ले ही ली थी, तब की एक तस्वीर थी। मेरा दाहिना पैर जमीन पर था, बायाँ घुटनों की ऊँचाई तक उठा हुआ था ऊपर। दोनों हाथ सामने की तरफ जुड़े थे। चेहरा बाईं तरफ तिरछा था हल्का। मैंने तोते जैसे हरे रंग की साड़ी पहन रखी थी, जिसका बॉर्डर गहरा हरा था और जो तभी मुझे बहुत बहुत खराब लगी थी। किनारे की लड़कियाँ हरे बॉर्डर की पीली साड़ियों में थीं और उनकी साड़ी का रंग मुझे भीतर से भाया था।

बाबजूद रंगों के मामले में मेरे साथ हुए तथाकथित अन्याय के सब कुछ बहुत सुंदर था तस्वीर में। एक बस रोशनी के किसी बारीक ऐंगल ने दगाबाजी दिखाई थी और मेरी बाईं आँख की पुतली चमक गई थी। मैंने 6' ग8' साइज की तस्वीर निकलवाई थी, जिसमें वह दोष ज्यादा दिख रहा था। तब फिर मैग्नीफाइंग ग्लास में देख कर मैंने अपनी बाईं आँख की लाल पुतली के ठीक ऊपर बिंदी भर का निशान - काले स्केच पेन का, लगा दिया था। इस लीपापोती से आप फोटो को एक झटके में तो देख जाते पर गौर से देखने पर लग जाता था कि आँख के साथ कुछ न कुछ हादसा तो हुआ है। अब फोटो शॉप की तकनीक से लाल निशान को काला तो बनाया जा सकता था पर शिकवा कि तस्वीर ही नहीं थी अब सलामत।

वापस वापस। तो पार्थो था। उसका असली नाम शायद पार्थ था। जब मुझसे किसी बीट पर चूक हो जाती तो वह अजीब व्यंग्य से मुस्कराता। नाचते समय एक जगह पर जब उसे मुझे उठा लेना था और उसकी उँगलियाँ मेरे पेट के खुले हिस्से पर होतीं, तो वह गुलाबी पड़ जाता। मुझे शक है उसका चेहरा गुलाबी छँहक लिए था ही, व्यंग्य से खिंचे होठों वाला। हालाँकि रिहर्सल के अलावा कभी उसका चेहरा देखने की मुझे जरूरत ही महसूस नहीं हुई थी और रिहर्सल के दौरान भी ज्यादा नहीं देखा। हाँ पास पास नाचते हुए जब कभी उसके चेहरे से मेरे बाल छू जाते या उसकी कोई गिरती साँस मेरी गरदन पर पीछे की तरफ ससर जाती, तब मुझे महसूस होता कि उसका कोई चेहरा होगा। इसे हटा दें तो बाकी सब चीजें बड़े प्रोफेशनल तरीके से होतीं, बगैर एक दूसरे के बारे में कुछ महसूस कराए। कितनी अजीब बात थी! पिछले पाँच दिनों से मैं पार्थो के साथ पेयर में नाचते रहने के बाद उसकी साँसों की सांद्रता पहचान गई थी, उसकी उँगलियों की फिसलन भाँप गई थी पर चौक की सब्जी मंडी में बैंगन भिंडी लौकी के भाव की मोल तोल करते हुए उससे टकरा जाती तो उसे पहचान नहीं पाती! ऐसे भी चेहरे पहचानने के मामले में मैं बड़ी कमजोर हूँ। इतने चेहरों को शायद एक के बाद एक या एक साथ देखने की आदत नहीं है दिन भर में।

फिर भी इतने साल इस शहर में रह लिया तो आदत तो हो जानी चाहिए थी अब तक। पर मैंने चेहरों से धोखा खाना नहीं छोड़ा था। म्यूजिक रुक गया था और सब लोग मेरी तरफ देख रहे थे। मैंने भी अपनी ओर देखा। मैं अपनी जगह से तीन हाथ छिटक कर खड़ी थी, उड़ कर दूर छितर गए मुरझाए फूल की पंखुड़ी की तरह। यह एक असहनीय सी चीज थी। पार्थो के लिए, आदिल के लिए, मुख्य जोड़े के लिए, पूरे स्टेज के लिए। आदिल चाहता तो एक सेकेंड में मुझे आउट कर सकता था। वह चाहता क्या था ये तो मुझे नहीं पता पर उसने ऐसा कुछ नहीं किया। न इस बार न पहले कभी इससे मिलते जुलते 'बारों' पर। मेरा अनुमान है कि वह शायद मुझे एक अच्छी लड़की समझता था। जबकि कई बार अपनी हरकतों से मैंने उसके इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश की थी फिर भी। जाने अनजाने मैंने ऐसा कुछ कुछ कर दिया था जिससे अच्छी लड़की होने की जमीन भरभरा जाए। अच्छी लड़की या अच्छा इनसान होने की ही। मैं किसी की भी सगी नहीं हो सकती कभी। अपनी तक की भी नहीं।

मैं इस गलाकाटू दुनिया के पैंतरे अच्छी तरह समझती थी और खुद किसी का भी पत्ता काट डालने के लिए सदा प्रस्तुत। आह... मेरी तेज कराह निकली थी - मेरा पैर सचमुच दबा था किसी व्यस्त एड़ी के नीचे और मैं पिस कर रह गई थी। पर मेरे बुरी तरह से लचक जाने के बावजूद नाच थमा नहीं और ना ही मैं थमी। खेला चलता रहा। मैं जानती थी दुनिया एक बार रुक गई सो रुक गई मेरे लिए। अब कोई मेरे लिए रुकने वाला नहीं था क्योंकि अब मेरा बस अच्छी लड़की होना काफी नहीं था।

जब मैं स्टूडियो से निकल रही थी, आदिल ने एक परचा किस्म का पकड़ा दिया। यहाँ से फिर एक पुरानी बात कि जब मैं दस साल की थी तभी से मेरे भीतर यह कौशल था कि विपरीत लिंग द्वारा थमाए गए परचे को खोलने की क्रिया को धैर्यपूर्वक एकांत की तलाश तक कैसे स्थगित रखा जाए। तब मैं छठी कक्षा में थी और टीचर्स डे के लिए घूम घूम कर चंदा इकट्ठा कर रही थी बच्चों से। किसी ने तभी परचा पकड़ाया था मुझे। बेतरह मोड़ा हुआ। मोड़ मोड़ कर गुल्ली बनाया हुआ। मैंने संदेह को सूँघ लिया था और भयानक संयम धारण करते हुए ट्वायलेट में जाकर खोला उसे। वह कच्ची स्याही से लिखा प्रेमपत्र था। मैंने एक दो हर्फ पढ़ कर उसके परखच्चे उड़ा दिए और सारे सबूत बहा दिए फ्लश के साथ।

हालाँकि मेरे मन में ना दस साल की उस उम्र में कोई सुबहा था ना अब ही संदेह था कोई कि आदिल की दी चीज कोई प्रेमपत्र हो सकती है फिर भी मैंने उसे तत्काल क्या स्टूडियो की छाया से दूर निकल आकर, स्टेशन पर आठ पचपन की बोरीवली फास्ट का इंतजार करते हुए भी पढ़ना जरूरी नहीं समझा। इंतजार करते हुए क्या ट्रेन आने पर धींगामुश्ती करके घुसने और चौथाई कमर टिका कर बैठ सकने लायक जगह मिल जाने के बाद की निश्चिंतता में भी जरूरी नहीं समझा। निश्चिंतता की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती मेरे मामलों में। तो इस उम्र के बीत जाने के बाद वापस केहुनी का कमाल दिखा कर मैं गाड़ी के दरवाजे पर सबसे आगे लटक जाने में सफल हो गई थी। गाड़ी कांदिवली से खुल चुकी थी और अगले पड़ाव पर मुझे उतरना था। मैं दरवाजे पर सबसे आगे की तरफ ठेलाई सी। ठीक इसी वक्त मुझे लगा कि अगर मैंने पर्स से निकाल कर अभी के अभी उसे पढ़ नहीं लिया तो दुनिया की सारी रोशनी खत्म हो जाएगी या दुनिया की सारी स्याही का रंग कागज के रंग जैसा हो जाएगा या दुनिया से उस लिपि की स्मृति ही मिट जाएगी, जिस लिपि में आदिल ने वह परचा लिखा हो या... इतना ज्यादा क्या सबसे आसान कि वह परची ही मेरे हाथ से उड़ जाएगी चलती ट्रेन से। हालाँकि ट्रेन की रफ्तार धीमी पड़ चुकी थी, पर इसके आगे कुछ सोचने के पहले मैंने परची खोल दी। उस पर जो लिखा था उसका छह शब्दों में हिंदी रूपांतर था - कल से आने की जरूरत नहीं।

स्टेशन आ गया था। मुझे पीछे की तरफ से आई एक लहर ने बहा कर सही सलामत उतार दिया था। मैं प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। फिर से एक बार बेरोजगार। शायद बेरोजगार। कल से आने की जरूरत नहीं - का मतलब किसी भी तरह से वही हुआ जो मुझे लग रहा था। हालाँकि परची देने का भी आइडिया बड़ा अजीब था। वह सामने से नहीं कह सकता था तो एक मैसेज मार सकता था। और सामने से ही क्यों नहीं कह सकता था! और यह हैंडराइटिंग उसी की थी या और किसी की! उसे मोबाइल और की पैड छोड़ कर लिखते हुए तो देखा नहीं कभी तो पता कैसे चलेगा! पर कागज उसने थमाया तो और किसका लिखा हो सकता है! पर क्या कागज पक्का उसी ने थमाया था!

रिवाइंड रिवाइंड। पीछे मुड़ने के नाम पर मुझे एक बढ़ा हुआ परचा याद आ रहा है, उसे पकड़ने को लपकती अपनी हथेली याद आ रही है। बस और कुछ नहीं। अगर उतना सब सही सही वही हो तो क्या यह संभव था कि कागज को हाथ से थामने और पढ़ लेने के बीच के रास्ते में कागज ही बदल गया हो! उँहूँ! या फिर ऐसा हो सकता है कि ये कागज उसने किसी और के लिए लिखा हो और दरअसल मेरे हिस्से का परचा कोई और हो और आदिल ने उन्हें गलत हाथों में पकड़ा दिया हो! पर आदिल कोई परचा बाँटने वाला थोड़े था! हो सकता है उसने मैसेज किया भी हो बाद में भूल सुधार का पर खराब नेटवर्क के कारण जिसकी डिलीवरी फँसी हुई हो! मैंने लपक कर मोबाइल को स्विच ऑफ कर दिया। अगर सच का कोई मैसेज हो और वह बीच में ही फँसा हो तो फँसा रहे वहीं। मैं खुद से उसके अपने तक पहुँचने का रास्ता क्यों सुलभ कराऊँ! मैं प्लेटफॉर्म की एक बेंच पर जगह बना कर बैठ गई। ऐसा कि जैसे मुझे ट्रेन पकड़ कर आगे कि पीछे ही कहीं जाना हो फिर से। पर किसी का इंतजार तो था मुझे। ट्रेन का या मैसेज का ही!

ढाई घंटे बीत चुके थे और प्लेटफॉर्म अब थोड़ा थोड़ा व्यवस्थित दिखने लगा था। भीड़ छँट चुकी थी। मैंने चौंक कर देखा - मेरी बेंच तो पूरी खाली थी। खाली दो लोग। एक मैं और दूसरा आदमी। मुझे उसका चेहरा देख कर लगा कि वह भी पिछले ढाई घंटे से बैठा हुआ था वहीं, बेंच के दूसरे छोर पर। कितना बेतुका है ऐसा लगना! ऐसा उसे ही लग सकता है जो अभी अभी बेरोजगार हुआ हो।

कल से आने की जरूरत नहीं। किसे आने की जरूरत नहीं। कहाँ आने की जरूरत नहीं। ऐसा क्यों होगा कि आखिरी प्रस्तुति के ठीक पहले किसी एक्सट्रा को निकाल दिया जाए। मैं जानती थी कि मैं जितना भी चेहरा सुखा कर बैठ जाऊँ, नौकरी से निकाल दिए गए जैसा, पर मेरी नौकरी सुरक्षित थी। यही वाली। यह दरअसल एक टोटका था जो शर्तिया सफल होता था, जिसे मैं बचपन से आजमाती आई थी। जब भी कोई परीक्षा बहुत अच्छी जाए और छप्पर फाड़ नंबर की संभावना हो, ऐन रिजल्ट के पहले ऐसा प्रपंच रच देना चाहिए जैसे आप फेल होने की लक्ष्मण रेखा पर एड़ी गड़ाए खड़े हों। दूसरे सभी लोगों को अपने आप को भी अपने चेहरे से यकीन भर दिला देना है जैसे परिणाम घोषित होते ही आपकी दुनिया खत्म बस। इन सबके बाद रिजल्ट आने से सफलता का असल रंग चढ़ता है।

पर उस स्थिति से अभी की क्या समानता! मैं पुरानी नौकरी में बनी हुई थी - क्या सफलता का मतलब इतने तक सिमट कर रह गया था अब मेरे लिए! और यहाँ था ही दूसरा कौन जिसे अपनी सफलता का चटक रंग दिखाना था? मैंने गरदन घुमा कर बेंच के दूसरे आदमी की तरफ देखा। वह अपने बिल्कुल करीब का कुछ ध्यान से देख रहा था जबकि उसके सामने दूर दूर तक कुछ भी नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे वह एक हाथ की दूरी पर रखे टीवी में क्रिकेट मैच का निर्णायक ओवर देख रहा हो। उसके पैर बेंच पर थे और उसने घुटनों को अपनी बाँह में घेर रखा था। यह सब तो ठीक है पर वह कौन सा मैच था जिसका निर्णायक ओवर पिछले ढाई तीन घंटों से चल रहा था। मुझे ध्यान आ रहा है कि यह आदमी शुरू से ऐसे ही बैठा था। और यह भी स्मरण आता है अब कि शुरू से इस बेंच पर हम दोनों अकेले थे।

मुझे पता नहीं क्यों सिहरन सी हुई। लगा जैसे किसी लावारिस वस्तु के साथ पिछले ढाई तीन घंटे से बैठी हुई हूँ। देखा जाए तो वारिस तो मेरा भी कोई नहीं था। और भी ध्यान से देखा जाए तो लावारिस तो मैं ही थी क्योंकि पिछले इतने समय से साथ एक ही बेंच पर बैठे होने के बावजूद इस आदमी तक को मेरी सुधि नहीं थी। मैंने उसे एक बार भी अपनी ओर देखते या देखने की कोशिश करते नहीं पाया था। मैंने भी आहिस्ता से उसकी तरह दोनों पैर बेंच पर उठा लिए और घुटनों को बाँह मेट कर बैठ गई। प्लेटफॉर्म पर कोई भी तीन घंटे तक लोकल का इंतजार नहीं कर सकता है।

उधर भी मामला कागज के किसी टुकड़े का ही था। कल से आने की जरूरत नहीं जैसी बात। मैंने अपने पर्स में से एक छोटी सी बोतल निकाली, जिसमें कमर के हिस्से तक गरमाया पानी भरा था। मौसम की मार से गरमाया पानी। मैंने तीन बड़े बड़े घूँट भरे - ऐसा कि हर बार पानी के मुँह में जाने के बाद गाल अधिकतम फूल सकें। अब उसमें घूँट भर का ही पानी रहा होगा। मैंने बगल वाले की ओर देख कर बोतल का ढक्कन बंद कर दिया और उसे उधर बढ़ा दिया। कुछ लोगों को आँखें खोल कर सोने की बीमारी होती है। मैंने उसी तरह ऊपर पैर कर बैठे बैठे उछल कर बेंच पर उधर वाले के थोड़ा करीब खिसक जाने की हरकत की और बॉटल उधर बढ़ा कर कहा - 'पानी'

उस आदमी के सामने का स्क्रीन मेरी आवाज से हिल गया और वह ठंडे चेहरे से मेरी तरफ मुड़ा।

'आपकी ट्रेन आई नहीं?'

उसने सिर डुलाया - नहीं में।

'आपको कहाँ जाना है?'

'बंबई।'

'बंबई तो है। यहाँ कहाँ?'

वह मुझे सिर्फ देखता रहा। देखता रहा या पूछता रहा मुझसे। वही सवाल जो पल भर पहले मैंने उससे पूछा था।

'आप कहाँ से आए हैं?'

वह कुछ बुदबुदाया - जवाब मेरे समझने लायक नहीं था।

मेरे मुँह से निकल गया - 'आप कौन हैं?'

'...'

'इति। आपका नाम?'

उधर से पहली बार एक मुकम्मल जवाब आया - 'हिर...'


आज घर में लोग बहुत सुखी हैं। बहुत दिनों के बाद ऐसा है कि चारपाई पर बिछावन के ऊपर अखबार बिछा कर जब मैं खा रहा हूँ तो पत्नी चौकी से लगे दरवाजे के मुहार पर बैठी है और बेटा तीन सीढ़ियों वाले बरामदे पर ऊपर नीचे उतर चढ़ रहा है। मैं जिस अखबार के लिए काम करता हूँ वह अपना मेकओवर करना चाह रहा था। इसी क्रम में मुझे मेरे छिटपुटिया कॉलम की जगह एक खास चरित्र पर आधारित कार्टून कॉलम लिखने का प्रस्ताव मिला था। घर में लोगों की कल्पना ने तो स्केटिंग पहन ही ली थी। मैं भी उत्साहित था इस अहसास से कि मॉर्डन रूप धारण करते वक्त भी मेरे अखबार ने मेरी बरसों पुरानी नौकरी का खयाल रखा और यह विश्वास भी कि मैं अब भी कुछ नया कर सकता था। इस बात ने मुझे कृतज्ञ बना दिया और मैंने ठान लिया कि अखबार के लिए बेहतर से बेहतर कुछ भी करूँगा। बेटे के दिमाग में हर आधे पौने घंटे पर कोई विचार आ जा रहा था और वह अपनी माँ को बीच में रख कर उसे मुझ तक पहुँचवा रहा था। कभी कभी उसकी माँ गड़बड़ा जा रही है मेरे आगे बताने में तो वह बगल वाले कमरे से ऊँची आवाज में माँ को सुधार दे रहा है। मैं मुस्कुरा कर रह जा रहा हूँ। मुझे सर्वोत्तम विकल्प की तलाश जो है।

पत्नी का विचार था कि घर के सबसे विशाल कमरे को, जिसमें कि हर सुबह झाड़ू लगाने में वह सबसे ज्यादा थकती थी, बंद कर दिया जाए एक ताला जड़ कर। जब किसी का आना जाना उठना बैठना जरूरत सरोकार नहीं था उस कमरे से तो उसे धूल गर्द घुसने के लिए खुला छोड़ देने का तर्क भी क्या था! मैं बरसों पहले से सिद्धांततः इसी पक्ष में था पर घर के किसी कोने को ऐसे काट कर फेंक देना संभव था क्या! संभव था। एक रात खाना खाने के बाद थाली रसोई में रख कर हाथ पोंछते हुए लौटते समय मैंने देखा कि उधर एक पुरानी चलन का ताला लटकता था।

मैं बिस्तर तक आकर लेट गया। दिमाग किसी ऐसे पात्र को तलाश रहा था, जो अखबार के प्रति मेरी कृतज्ञता का भार ढो सके। एक लंबी पारी खेल सके। पर एक दो घड़ी से ज्यादा केंद्रित नहीं कर पा रहा था दिमाग को। बार बार लग रहा था कि मुझे ताले को खींच कर परख लेना चाहिए था कि पत्नी ने वाकई चाभी घुमा कर उसे बंद किया था या नहीं। मन में एक बार धुकधुकी लग गई तो चैन का तब तक नहीं आना तय था जब तक एक बार जाकर पड़ताल न कर ली जाए।

मैं लपक कर उठा। उस दरवाजे तक पहुँचने के लिए पहले घर का भीतर से बंद मुख्य दरवाजा खुलवाना जरूरी था। मैं उस पर थाप मारने लगा। तलहथी के कोर से दरवाजे के छुआते ही लगा पचास साठ साल पीछे चला गया होऊँ। बचपन में गर्मियों में बाबूजी के साथ बाहर सोता था ओसारे के नीचे के मैदान में। जिस सोई रात में आँधी तूफान आता, बाबू जी हड़बड़ा कर उठते और खाट की कोरों पर डंडे से बँधी मच्छरदानी को उखाड़ने लगते। बिस्तर समेट कर वे एक हाथ से तोशक चादर तकिया मच्छरदानी और दूसरे हाथ से खाट उठा कर ओसारे की ओर भागते और मैं उन्हें टॉर्च दिखाता हुआ दरवाजे पर थाप मारने लगता। घर के आँगन में सोई औरतों में भूचाल आ जाता। खाट बिस्तर चादर आँचल बच्चे और इन सबसे निबटने के बाद बाहर का दरवाजा खोलना होता और यह ओरहन कि घोड़े बेच कर क्यों सोती हैं... इतनी देर कर दी खोलने में तबसे पीट रहे हैं कुंडी... आदि इत्यादि। बैसाख जेठ में हर दूसरी रात छोड़ कर तीसरी रात यही प्रपंच होता। आज की रात यदि आँधी आती भी थी तो पत्नी दरवाजा खोलने वाली नहीं थी। क्योंकि अब घर में कोई आँगन था ही नहीं और पत्नी कमरे में सोती थी। ऐसे में आँधी आ जाए उसे पता क्या चलता!

सूरज मेरे लिए एक समाचार की तरह उगा। ऐसा समाचार जिसे देख कर मुँह से प्रतिक्रिया निकल जाए पर मेरे मुँह से निकला- ओह इतने दिन चढ़े मुँह तक सोता कैसे रह गया। मैंने लोटा भर उजास को माथे से उलीच लिया और टेढ़ी माँग काढ़ कर चौक तक बढ़ गया। जो भी काम मुझे सौंपा गया था मैं उसे जल्दमजल्द पूरा कर लेना चाहता था। लिहाजा मैं हर राह गुजरने वाले से लेकर रास्ते के कंकड़ पत्थर गड्ढे नाले सभी को संभावित कैरेक्टर की तरह देखने लगा। गौर से। कहीं कुछ दिख जाए! कहीं कुछ। क्योंकि जो कुछ भी खोजना था वर्तमान से ही शायद। क्योंकि मेरे पास बचपन के बाद सीधे गैर जवानी का हिस्सा था... अब चूँकि जवान लम्हों के नाम पर एक बड़ा सा फाँका था जीवन में, मैंने उस फाँकेपन को भरने के लिए अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

अपनी कल्पना का ऐसा विस्तार किया और कल्पित घटनाओं से उस खाली हिस्से को ऐसा भर दिया कि जीवन का एक उबड़खाबड़ ही सही ठीक ठीक चलने लायक रास्ता तैयार हो गया। और झूठ नहीं कहूँगा कि दरअसल जवानी के फाँके को भरने की इसी कवायद ने मेरी रचनात्मकता पर... मेरी व्यावसायिक रचनात्मकता पर विपरीत असर डाला था। इसे थोड़ा और स्पष्ट करूँ तो ऐसा कि बचपन से गैर जवानी तक के सफर की लय बनाए रखने के लिए जवानी के हिस्से में जो घटनाएँ मैंने डालीं उनमें संघर्ष थकान और सूखेपन का स्वाद था और जितना वक्त मैंने इस बुनावट में खरचा उतने वक्त में दरअसल मुझे लतीफे गढ़ने थे - रस और ताजगी से भरे लतीफे। यानी कि करना था मुझे जीवन की कटुता का गुदगुदी में रूपांतरण पर करता रहा मैं गुदगुदाने वाले लम्हों का रुक्ष सत्यों में अनुवाद और यही वजह कि मेरी व्यावसायिक रचनात्मकता आज इस कगार पर थी। फावड़ा लेकर घूम रहा पर सोते के ऊपर की जमीन ढूँढ़ नहीं पा रहा।

चौक की सबसे चलती फिरती दुकान पर ही मेरा अड्डा था। अड्डा मेरे हिसाब का जहाँ मैं महीने तीन महीने पर चला जाया करता था। पान की एक दुकान - जिसने कालांतर में अपनी जटाएँ फैली लीं थीं और जिन जटाओं से अब गुटके और शैंपू के सैशे और लाल पीले नीले मोबाइल के रिचार्ज कूपन के विज्ञापन लटकते थे। दुकान के भीतर के संकुचित प्रदेश में प्लास्टिक के स्टूल पर मेरे बैठने की व्यवस्था होती। दुकान के मालिक और मुझमें हल्के पीलेपन की अवस्था वाली मित्रता थी। किसी चीज के अधिकतम उपयोग कर सकने के कौशल पर अगर भविष्य में कोई रियलिटी शो आया तो मेरा दावा है कि पब्लिक वोटिंग की अवस्था तक मेरे इस मित्र का पहुँचना तय था। चश्मा घड़ी आईना... जैसी पेट की सचरित्र चीजों को भी वह कई कई रूप धरने पर मजबूर कर देता था। अखबार के पन्नों पर उँगली फिसला फिसला कर अक्षर अक्षर वह चाट जाता और दिन भर में हर एक छोटी बड़ी खबर का एक बार रियाज कर वह उन्हें अपना बना लेता।

लिहाजा उसके पोर पोर में घटनाएँ भरी थीं। हर मौके पर माकूल उद्धरण थे। कभी कभी तो किसी घटना के पूरी तरह घटने के पहले ही उनसे मिलती जुलती घटनाएँ उसके भीतर से छलक पड़तीं। चौक तक आने वाले हर रिक्शा का यात्री चालक विवाद उसकी दुकान पर ही सद्गति पाता। अखबार से वह मेरा चार अंगुल का कोना रोज अलगा लेता और तीन अंकों वाली राशि से जो भी ग्राहक अपना मोबाइल रिचार्ज कराने आता उसे बतौर उपहार अखबार के उस टुकड़े से पढ़ कर मेरे चुटकुले सुनाता। मौजूद होने पर इस समय मैं अपनी नजरें किसी दूसरे काम में ऐसे गड़ा लेता मानों उस सबसे मेरा कोई नाता रिश्ता खोजे न निकलता हो, पर अंश अंश धुधकता रहता कि सामने वाला कुछ ऐसा न कह दे जो रात में आखें बंद करने तक मेरा पीछा करता रहे।

उसे, बल्कि अपने आप को यह जताने के लिए कि मैं खाली बैठा वहाँ पहर नहीं काट रहा, मैं खुद ही दुकान में जो भी मोबाइल रिचार्ज कराने आता उसके नंबर अखबार की खाली जगह पर लिखने और रिचार्ज हो चुकने पर काट देने का काम सँभाल लेता। स्टूल जो मुझे मिला था, बैठने के लिए, उसका कद काउंटर से काफी कम था। लिहाजा लिखने के लिए या तो मुझे खड़ा हो जाना पड़ रहा था या अखबार को गोद तक खींच लेना पड़ता था। इतनी संकुचित परिधि पर बैठने से एक बीते कल की चीज याद आती थी। तब मैं अपने बच्चों को स्कूल से लिवाने जाया करता था। स्कूल से लगी मुख्य सड़क के पार वाली स्टेशनरी की दुकान पर मैं उनका इंतजार करता था। दुकानदार, इस दुकान के मालिक जैसा ही भला आदमी था। एक टीन के कनस्तर को उलट कर उस पर तौलिया बिछा कर वह दुकान के अंदर ही मुझे बैठाता, धूप से बचाने के लिए। स्कूल की छुट्टी होते ही मेरा बेटा, दौड़ कर सड़क पार कर मुझ तक पहुँचना चाहता। उसकी बड़ी बहन उसे इत्मीनान से सड़क पार करवाती और इस पार आते ही वह अपने भाई से होड़ लगा लेती भाग कर मुझ तक पहुँचने की!

कमर की एक जरा सी मिलती जुलती टीस से क्या सब बकवास याद करने लग गया! (जबकि मेरा दावा था कि जवानी का कुछ भी मुझे याद नहीं तो फिर ये क्या था! कहीं 'मुझे जवानी का कुछ भी याद नहीं' की आड़ में छिपा असली सच ये हो कि मैं कभी जवान था ही नहीं); या या या कहीं ऐसा तो नहीं जो कुछ अभी याद किया वह दरअसल सत्य घटनाओं पर आधारित बयान नहीं था बल्कि मेरा गढ़ा हुआ सच था... खाईं को पाटने के लिए किए गए रचनात्मक उद्यम का नतीजा भर! आह! हाँ तो यहाँ अखबार के कोने की कोरी जगह पर घिस घिस लीड पेन से दस अंक लिखते काटते हुए मुझे यकीन था कि इस दुकान के मालिक या यहाँ के किसी ग्राहक को ही मेरी कल्पना के किरदार बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा। इति। इति नहीं! दूसरा कुछ।


मैंने सिर को ढलका लिया पीछे की तरफ। ऐसे कि जैसे ऐन केन प्रकार लपेटा जूड़ा लहरा कर ढलक जाए और बाल झूल से जाएँ बेंच पर उस पार। लंबा वक्त गुजारना था इस अहसास के साथ। उसका नाम क्या था सब धुँधला... एक दूसरे पर चढ़ा चढ़ा... पर यही तसल्ली क्या कम कि उसका नाम था कोई। इतना भी लावारिस नहीं साथ वाला।

'तो?' - मैंने घूम कर उस तरफ उछाला - 'तुम्हारा घर बार परिवार बच्चे?'

उसने दोनों कानों की दिशा में सिर डुलाया। इस बार उछलने की बारी खुद मेरी थी - 'मेरे भी नहीं!'

उसके चेहरे पर जो लानत लिख आया उसने मुझे सँभाल दिया। मैं वापस सीधी घूम गई पर एक बात खुली थी सामने कि वह अपने चेहरे पर लिखने का हुनर कमाल का जानता था! पर ऐसे मेरे सामने घूम कर बैठ जाने से बात का सिलसिला (जो यकीनन अभी शुरू तक नहीं हुआ था...) थम जाने वाला था। मैं अपने साथ कुछ पल पहले हुए सब कुछ को सिरे से भूल जाना चाहती थी इसलिए किसी और जगह खुद को पाना जरूरी हो गया था।

मैंने फिर से बाती की लौ उझकाई।

'यहाँ पहली दफे आए हो?'

गौर कीजिएगा मैं उसके साथ तुम तड़ाका के स्तर पर थी। इसका यह मतलब नहीं कि मेरे संस्कार कच्चे थे याकि बूढ़े झुरकुट से बात करने की तमीज नहीं थी मुझे। वजह शायद ये कि मैं विशुद्वतः दो अजनबी के स्तर पर उससे मुखातिब थी।

हाँ तो 'पहली दफे आए हो?'

यहाँ से आगे मैं थोड़ी कलाबाजी करूँगी। वह दरअसल जिस भाषा में बोल रहा था (अभी तक दो शब्द के नाम का उच्चारण था कुल उसके हिस्से पर जैसा कि मैं बचपन से पाक कला में सुघड़ थी और जानती थी कि चावल सींझ गया है यह परखने के लिए एक दाने की पड़ताल ही पर्याप्त होती है, तो उसी गूढ़ ज्ञान के आधार पर) उसकी जुड़वा गिटिर पिटिर अपने घर में कभी या पड़ोस में सुनने की अभ्यस्त थी मैं पर अपने घर वाले दिनों में भी बीच राह में इस बोली का अपनी भाषा में अनुवाद कर ही अपने तक आने दिया करती थी, तो आज भी उसकी बोली का अनुवाद कर ही मैं बात को आगे बढ़ाऊँगी।

फिर से 'पहली दफे आए हो?'

'हूँ'

'रुकना है यहाँ?'

'उहूँ'

'सुनो! मैं तो बोलूँगी, क्योंकि मुझे लगता है तुम एक अच्छे श्रोता साबित हो सकते हो! और उससे बढ़ कर कि अभी मैं बोल भी बेहतर सकती हूँ।'

मैं उठ खड़ी हुई और मैंने बीज वक्तव्य पढ़ना शुरू किया मंद स्वर से... जरूरी नहीं कि हर सपने का एक बचपन हो या वह कभी किशोर रहा हो! वह सीधे अपनी भरीपूरी जवानी में भी प्रकट हो सकता है या कि अनुभवी बुढ़ापे में ही। मेरी आँखें छोटी थीं पलकें बड़ी। इसीलिए शायद एक बार कि मैंने किसी तरह एक बड़े सपने को (जो जाहिर है अपनी जवानी में प्रकट हुआ था) अपनी आँखों में जत्न जुगाड़ से घुसा लिया तो फिर लंबे पहरेदारों ने उसे बाहर नहीं जाने दिया कभी।

थोड़ा बहुत कच्चा पक्का नाचना सीख लेने के बाद मैंने सँजो लिया मन मन कि मुझे इसी सफर पर आगे बढ़ना है। मेरे सीमित जरूरत वाले माता पिता के ख्वाबों की अपनी अपनी हैसियत थी। माँ के सपनों की साँस मुझे गृहिणी बना देने तक जितनी खिंची थी और पिता मुझे डॉक्टर इंजीनियर या ऐसी ही कोई वजनदार ठप्पे वाली शख्सियत बनाना चाहते थे। पर अक्सर लड़कपन की आँखों का सपना, अनुभवी आँखों पर भारी पड़ता है! तो वैसा ही हुआ... अक्सर जैसा! मैंने प्रवेश परीक्षाओं की कोचिंग के मुखौटे में घरेलू शहर की दहलीज लांघी और यहाँ तक आकर फड़फड़ाते पंख, देशी विदेशी लयों पर नाचना सीखने में व्यस्त हो गए। पैरों में आती सुघड़ता के साथ साथ घर वालों से दूरी बढ़ती चली गई और बढ़ते बढ़ते बढ़ते बढ़ते... एक दिन बढ़ने को कुछ भी न बचा। किस दिन... ठीक ठीक इसकी खोज नहीं की जा सकती। पर एक कोई दिन तो ऐसा जरूर रहा होगा... जिस दिन घरेलू शहर की मुझसे उम्मीद और मेरा उससे मोह- दोनों ने अपना अस्तित्व खो दिया।

दरअसल जो खोया वही मेरा सब कुछ था और कहते हैं एक बार जो सब कुछ खो बैठे, उसे रोक पाना असंभव हो जाता है। तो मुझे भी कोई रोक न सका... भले मेरे कदम दूसरों को जगह देते देते इतनी दूर खिसक आए थे कि उनके लिए हाशिए की जगह ही बची रह गई थी... बल्कि उस जगह के लिए ही संघर्ष करना अब जिंदगी का सपना था! एक जवान सपने की अनुभवी परिणति।

मैं बैठ गई। मेरा हिस्सा समाप्त हो चुका था

मानना होगा वह मंच कला के नियमों का जानकार था और श्रद्धा भी रही होगी कुछ मन में तभी तो वह उठ खड़ा हुआ... भले उसके पास कुछ था नहीं बोलने को या शायद बोलने का अभ्यास इतने दिनों से छूट गया था कि पहले वाक्य की हिम्मत जुटती ही नहीं थी। उसने बेंच के दो हाथ अगल बगल के हिस्से तक अपनी सीमा रेखा खींची और दो चक्कर लगाए पूरी लंबाई में। एक ठहरे हुए पार्श्व संगीत की संगति पर उसकी धड़फड़ चाल गुदगुदाने वाली थी। अपनी चाल ढाल से सुनगुनी जगा कर वह वापस अपनी जगह पर बैठ गया। भले उसने कुछ कहा नहीं... पर उसके पास भी कहने के लिए कुछ था... यह थाह चुकी थी मैं। उसने इस बार पहली दफा मेरी ओर देखा। मैं एकबारगी समझ गई कि आगे क्या था!

मैंने अपना बयान जारी रखा...

हम छोटे थे - मैं और मेरा भाई - एक भाई भी था... है। मेरी आधी लंबाई का था उम्र में भी आधा तभी। मैं जो जो करती... वह भी वही वही करता। जिन उलटे पुलटे रास्तों पर चलती उस उम्र में... अपनी नन्हीं परछाईं के साथ वह भी उन्हीं पर आता मेरे पीछे पीछे। स्कूल की छुट्टी की घंटी बजने से लेकर बाहर सड़क पर तक (जहाँ हमें लेने पिता मौजूद रहते) आने के वक्त में... हम रोज कुछ न कुछ खा लिया करते खोमचे वाले से लेकर... हबड़हबड़। हम अपनी तरफ से हर निशान को मिटा देने का भरसक प्रयास करते पर किसी न किसी निशान को हमारे कपड़े (खासकर शर्ट) अपने दामन में सँजो ही लेते। जैसे ही कपड़ों की धुलाई शुरू होती, राज के परत दर परत खुलने की आहट भाँप भाई जोर जोर से सुबकने का अध्याय शुरू कर देता और जाहिर है गाज असली अपराधी पर ही गिरती। एक वही वक्त था जब मैं अपने पिता को कँपकँपाते देखती। गुस्से से हिलते। दाहिने हाथ में कपड़ा साफ करने वाला ब्रश और बायाँ हमारी मासूम शर्ट समेत काँपता। उस वक्त मुझे सिर्फ और सिर्फ अपनी माँ पर गुस्सा आता। उसी वेग से कँपकँपाता गुस्सा कि दूसरे बच्चों की माँओं की तरह यों नहीं धोती हमारे कपड़े!

पर सारी शिकायत मेरी उस वक्त रवाँ दवाँ हो जाती जब नीली गोराई वाली कलफदार ड्रेस पहन कर हम अगली सुबह निकलते। इसका यह मतलब कतई नहीं कि मेरे क्रोध की उम्र कपड़े धोए जाते वक्त होने वाले हंगामे से लेकर अगली सुबह स्कूल के लिए निकलने के वक्त तक की होती... बल्कि मेरा क्रोध तो कपड़ों के तार पर फैलते ही उनसे टपकने वाली बूँदों के साथ बह जाता। पिता के हाथ से भी ब्रश और साबुन की झाग के अलग होते ही वे वापस अपने जैसे हो जाते। प्रतिक्रिया विहीन। एक सफेद कागज और कलम को लिए लिए दिन गुजार देने वाले... और फिर भी कभी कभी कागज सफेद ही रह जाता। इतनी दूर से देखने पर अभी ऐसा लग रहा है कि कहीं हमारे सफेद शर्ट और कपड़ों के सफेद जूतों को ब्रश से घिसघिस कर उन्हें नील टीनोपॉल नींबू आदि आदि के घोल में डुबा कर निखारने के उनके जुनून के पीछे हमारे आवरण को कागज के उन पन्नों जैसा उजला और कोरा बना देना तो नहीं था... जो कहीं न कहीं उनकी जिंदगी के सच थे! और कोरे कागज पर एक जरा सी हमारी असावधान स्याही या खिलंदड़ निशान को वे बर्दाश्त नहीं कर पाते थे हालाँकि खुद उस कागज पर किसी खिलंदड़पन को गढ़ देने के प्रयास में ही वे दिन पर दिन गुजार दिया करते थे। कैसी बिडंबना है!

मैंने देखा - बिडंबना शब्द ने उसे प्रभावित किया। उसमें सुगबुगाहट हुई (हालाँकि सुगबुगा वह पहले से ही रहा था) पर इस बार थोड़ी मुखर सुगबुगाहट।

मैंने फिर से दुहराया - 'कैसी बिडंबना है!'

पर इस दुहराव ने शायद उसे सचेत कर दिया। और वह वापस सामने की ओर मुड़ कर बैठ गया।

मैंने कड़ी थाम ली। जो भी सामने दिखी वही...

नाचना मुझे पसंद था। पसंद ही था इतना - ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। बचपन से जो वार्षिक समारोह में दूसरी पंक्ति में जगह पा लेने जितना कामचलाऊ नाचे... वह कॉलेज के खत्म होते होते तक अचानक से नृत्यांगना बनने की सनक पाल ले... यह बात पचती नहीं। घरवालों ने उगल ही दिया तो कोई अनहोनी नहीं की।

मैं पढ़ने में होशियार थी। लिख भी लेती थी पढ़ा हुआ। पर अंदर में एक कोई चीज थी जो बचपन से 'मैं बड़ी होकर क्या बनना चाहती हूँ' इस सामूहिक सवाल का उत्तर खोजा करती - जो ग्रुप में सबसे अलग हो; मसलन पायलट, अंतरिक्ष यात्री, वैज्ञानिक आदि आदि जो छोटे शहर के अवयस्क सपनों का हिस्सा नहीं होते अमूमन। गूढ़ बात ये थी कि भीड़भाड़ वाले प्रोफेशन से मैं भगा लेती थी अपने को दूर। सपनों में भी कॉम्पीटिशन से दूर दूर रहना ही अच्छा। पर जैसे जैसे बड़ी होती गई... पायलट... वैज्ञानिक... पत्रकार... चित्रकार आदि आदि (चित्रकार तुकबंदी की झोंक में कह गई... उस खेमे में कोई नहीं था) के कुछ दावेदार प्रकट होते गए और मैं जबरन अन्य विकल्पों की तलाश में ठेल दी गई। विकल्प ऐसा जिसमें सफल होने के पहले का ठुक ठुक इंतजार इतना लंबा हो कि आधे पौने रास्ते ही लोग या तो आपको भूल जाएँ या अपने सवाल को ही! मैं मेहनत कर जूझ कर सामने वाले प्रतिद्वंद्वी की आँखों में आँखें डाल झपट कर सफलता को पा लेने से कतराने के अभियान पर थी छुटपन से और इसीलिए मैंने परदे की ओट में लंबे वक्त तक खींचे जा सकने वाला रास्ता चुन लिया अपने लिए - यह बेदर्द व्याख्या मेरे जीवन पथ की। मैं लोगों की नजर से अपने आप को छिपा कर रखना चाहती थी... पर बिडंबना... मेरा प्रिय शब्द बिडंबना (मैंने कनखी से उसकी ओर देखा)... कि आज जहाँ पहुँच गई वहाँ लोगों की आँखों के सामने उघड़े बदन खड़ी हूँ... हाँ एक तसल्ली है कि लोगों के पास फुरसत नहीं (अजी शऊर नहीं) मेरे खुलेपन को देखने की।


दिन के उजाले में मैंने बजाब्ता परख लिया था कि दरवाजे पर ताला लगा था। बहुत पुरानी चलन का ताला था। ऊपर से मुड़ी हुई नाल वाला एक हिस्सा और नीचे उसमें फँसाने वाला दूसरा हिस्सा लोहे का धड़। धड़ की तली में चाभी घुसाने की जगह बनी थी। जाने पत्नी उसे किस तहखाने से निकाल कर लाई थी। यह तय था कि वह उस कमरे पर कुछ भी खरचने को अब तैयार नहीं थी। एक नया ताला तक नहीं। ऐसा है कि जिस वक्त मैं ताला कुंडी परख रहा था... मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि ताला कुंडी से लटक रहा था जरूर, पर दरवाजे दोनों दो पार खुले हुए थे! तो! मैंने झाँक कर देखा... पत्नी भीतर थी। आधा रास्ता एक गूँगे सवाल के साथ तय किया मैंने कि अँधेरी कोठरी में क्या कर रही थी वह चुपचाप! पर आधे रास्ते पर मेरा सवाल ठिठक गया। एक हल्की सी रोशनी... दरवाजे या खिड़की या रोशनदान... कहीं... से तिराती उसके चेहरे को दो भागों में बाँट रही थी। वह एक दराज पर झुकी... दरअसल कुछ उलट पुलट में लीन थी।

सुंदर थी मेरी पत्नी। मुझमें ही सौंदर्यबोध नहीं था कभी भी। उसने मेरे कदमों की आहट या मेरे सवाल की आहट थाह ली और चौंक कर सिर उठा कर वह मुझे देखने लगी। मैं उस कमरे के बीचोंबीच रखे एक ऊँचे से पलंग पर हौले से बैठ गया... पलंग को बिना चूँ चपर का मौका दिए। मैंने इशारे से पत्नी को बुलाया अपनी ओर। जाने ऐसी आज्ञाकारिता उसमें कहाँ से समा गई और तत्क्षण उठ कर वह मुझ तक आ गई। मैं उसके करीब आते ही जोर से हँसा... कारण कि एक खयाल मुझे गुदगुदा गया कि क्या मेरे उस बहुप्रतीक्षित संभावनाशील पात्र को ढूँढ़ने वह दराज तक आई थी चोरी छिपे! मुझे वैसी निश्छल हँसी में लिपटा देख वह खिल (खुल) गई। कैसे भूले बिसरे पल थे! एक गुदगुदाहट को गढ़ने के जुनून में अपने जीवन की ऐसी पवित्र गुदगुदी को कैसे भुला दिया मैंने! कितने दिनों बाद... हाह अरसे बाद... अपनी ही पत्नी को इतने करीब से देख रहा था मैं। मैंने अपने आप को उसके हवाले कर दिया। अगर संभव है तो सँभालो मुझे... मेरी समस्त नाकामियों समेत... और अनुवाद कर दो मेरा एक मुस्कान में... एक ऐसी मुस्कान, जिसे मैं अपने पीछे छोड़ जाऊँ... जो कि सादे कागज और स्याही लिए लिए अपनी उम्र के कीमती पलों को गुजार दिए जाने का सच्चा प्रतिदान हो!

वह एक आदर्श पत्नी थी। वह अनुवाद की प्रक्रिया में जुट गई। कागज तो मैं था खुद बिछा... उसके सामने, उसने स्याही छलकाती कलम निकाल ली। शब्द भी थे उसके पास बिल्कुल माकूल और उसे लिखने की कला भी मालूम थी, पर ऐन कागज पर कलम टिकाते वक्त वह भभाकर रो पड़ी! और जो लिखा भी नहीं गया स्याही में... उसे भी अपने आँसुओं से मिटाने लग गई। मैं हतप्रभ नहीं था। मैं जान गया था कि ऐन कलम टिकाते वक्त पलंग चर्र की आवाज के साथ हिल गया था और उसके भीतर की आदर्श माँ जाग उठी थी। वह बिलख बिलख कर रो रही थी। गलत। हम बिलख बिलख कर रो रहे थे! मैं हिचकियों के बीच उससे कहना चाहता था कि मैं शुरू से जानता था कि तुम दरअसल उस दराज में कुछ उकट पुकट नहीं... कुछ खोज नहीं... बल्कि कुछ छिपा रही थी। पहली संतति की जिन यादों को हम पुरानी चलन के ताले की नाल के पीछे बंद कर देना चाहते थे... उन्हीं यादों की आत्मा को दुलरा कर तुम दराज में दुबक जाने पर राजी करने आई थी... आज... यहाँ... उसे दुलरा कर आज तुम दराज में दुबक जाने पर राजी करने आई थी... आज यहाँ...


दफ्तर में हर एक चीज अपने आप को तेजी से बदलने पर तुली थी। मेज कुर्सी फर्श छत पन्ने स्याही अक्षर... सब। बदलाव का छोटा से छोटा आसार भी मेरे दिल की धुकधुकी बढ़ा देता था इस खयाल से कि लोगबाग अपने काम में भिड़ गए और मैं आज भी अपना किरदार नहीं खोज सका। बेटे और पत्नी के पास हर रोज जो किरदारों का पिटारा रहता था वह अब खाली हो चुका था। या शायद उनका उत्साह जाता रहा था या शायद उन्हें यह अहसास हो चुका था कि मैं इस अभियान में उनकी मदद लेने का इच्छुक नहीं हूँ। रास्ते में, दफ्तर में, चौक में, पूरे मेरे जीवन में घटनाओं ने घटना कम कर दिया था। या वे घटतीं भी थीं तो बेहद मामूली तरीके से दबे पाँव, जिससे मेरे हाथ कोई विचार न लग सके। गलती मेरी ही थी। इस खबर के शुरुआती दिनों में ही मैंने जीवन में सबको बड़े खुले तरीके से यह बतला दिया था कि इस बार मैं अपने ढंग से पात्र गढ़ना चाहता हूँ कि चुनना चाहता हूँ और इसी से सबने अपने पैर खींच लिए लगता है। हालाँकि कहना मैं ऐसा नहीं चाह रहा होऊँगा जरूर क्योंकि बिना परिवेश की मदद के अपने दम पर कोई भी कुछ कर सकता है क्या! खैर अब तो निकल ही चुका था!

इस स्थिति के मद्देनजर कुछ अतिरिक्त पहल मेरी तरफ से हुई थी। अब मैं अपनी चौकी पर नहीं सोता था रात में बल्कि एक खाट लगा लेता था अपने लिए ओसारे के नीचे खुले आसमान में। मकसद यह था कि मेरी सोच का कैनवास बड़ा हो सके, स्वच्छ हो सके। पर होने यह लगा कि सारा ध्यान मेरा तारों की चालचलन पहचानने में खप गया। कौन तारा किस वक्त निकलेगा, फिर किस ओर चल देगा, कब टूटेगा या कि डूब जाएगा! मैं उनकी चाल में उलझने लगा था। वक्त फिसलता जा रहा था और मैं बगैर कुछ हासिल किए, बस अपने आप को तसल्ली देता कि मैं कोशिश में लगा हूँ, वक्त को फिसलते देख रहा था।

इस वक्त की फिसलन में मुझे हल्की सी लड़खड़ाहट दिखने लगी अपनी... अपनी नीयत पर शक जैसा। क्या मैं वाकई ईमानदार था अपने काम के प्रति! वह जो व्यक्ति था मेरे बचपन की परतों में ढँका कहीं... उसे शायद हँसाने के लिए चुटकुले गढ़ने नहीं पड़ते थे। कोई किरदार नहीं तलाशना पड़ता था। उसने दरअसल अपनी जिंदगी में इस तरह रचा बसा लिया था हास्य को कि कोई बाहरी या बनावटी उठापटक करनी ही नहीं होती थी। और मैं! जितनी देर तक चुटकुले गढ़ता उतनी ही घड़ी गिन कर अपने जीवन की कटुता को गुदगुदी के रंग में रँग पाता। उसके आगे पीछे वही आटा सत्तू बेसन दाल। यही वजह यही वजह हाँ यही वजह... आइंसटीन की तरह मेरी आँखें चमकीं... कि मेरा लिखा काम की तरह दिखता था जिंदगी की तरह नहीं। ओह! कड़वा सत्य था पर फिर भी बजाए बुझने के आँखें चमकी थीं। शायद इसलिए कि वह खोज उस वक्त ज्यादा महत्वपूर्ण थी... उसका स्वाद नहीं।

एक बार खोज का चस्का मुँह लग जाए तो इनसान उस डगर पर आगे बढ़ना ही चाहता है... मेरी स्मृति में अचानक से बचपन कौंधा... एक दफा मैंने आँगन के एक कोने में लुकझुक अँधेरे में आम की गुठली चूसते हिरखी मिसिर को देखा था! जिस घड़ी मैं पहुँचा था... कार्यक्रम का लगभग समापन हो चुका था और गुठली में जान कुछ भी नहीं बची थी। मुँह से एक चटखारे की आवाज के साथ उँगलियों का चूसना जारी था... मैंने हैरत के साथ देखा थी कि पूरी की पूरी प्रक्रिया जिसमें रस आम का केहुनियों तक टपक आए और जिह्वा उसे आज्ञाकारी बनी चाटती चली जाए... सब तो आम लोगों के जैसा ही था।

तो इसका मतलब यह कि उसके जीवन में भी ऑन कैमरा ऑफ कैमरा जैसा कुछ रहा होगा। ऑफ कैमरा वह निहायत मामूली ढंग से जो काम संपन्न करता था ऑन कैमरा वही गुठली... वही आम... वही स्वाद हमें हँसा हँसा कर लोटपोट कर देते। ...और अभी थोड़े वक्त पहले का हासिल सत्य मिलावटी... कि उसने जीवन में हास्य को एकसार कर लिया था! क्योंकि वह भी दरअसल कभी कभी मामूली होता था। पर इससे सत्य की शुद्धता पर कोई शक क्यों किया जाए। इसका एक पाठ यह भी तो बनता था कि वह भी था दरअसल एक इनसान ही। एक इनसान। जो अपने अकेलेपन में उतना ही याद रखता था अपने को और अपनी कटुता को जितना कि कोई भी हाँड़ मांस का इनसान।

इसी खोज पर खोज पर खोज वाले दिनों में से एक किसी दिन मेरे उच्चाधिकारी के कक्ष में मुझे बुलवाया गया। वहाँ मुझसे नए अखबार में मेरे नए कोने की बाबत सलाह मशविरा करने कुछ जानकार आए थे। ग्राफिक्स, एनिमेशन, सेंट्रल कैरेक्टर जैसे वजनी शब्दों की उपस्थित में भी मेरे कानों तक सिवाय मेरे तलुवों की थरथराहट के कुछ भी न पहुँचा। मैं बगैर किसी के कुछ भी माँगे, हफ्ते भर के भीतर पूरा का पूरा प्रारूप तैयार कर के उपस्थित होने का वायदा देकर बाहर निकल आया। बाहर निकलते ही सबसे पहला जो ख्यालसवाल जो भी, मन में आया वह यह था कि घर के उस कमरे के दरवाजे पर पत्नी ने ताला वाकई लगाया था या ऐसा कुछ सपने में देखा था मैंने! यह मेरे दिमाग के विचलन की इंतहा थी।

हफ्ता भर! बस इतनी सी चौहद्दी थी वक्त की, जिसमें मुझे खोज लेना था उसे। अपने जैसा कमजोर कतई नहीं, एक ऐसा कद्दावर पात्र जो हँसा सके लोगों को सालों साल। बस मनोरंजन रमन चमन का साधन नहीं, ऐसा जो उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाए। एक बार लोगों कि हँसा लेने के बाद जिसे इस सोच से रात भर नींद न गँवानी पड़े कि पता नहीं अगली बार भी वह ठहाकों की वजह बन पाएगा कि नहीं! सबसे बड़ी बात कि जिसे बस तलाश कर दुनिया के सामने ला देने भर से मेरी भूमिका समाप्त हो जाए, उसके आगे लोगों की मुस्कान की वजह कैसे बनना है यह उसका अपना कौशल हो!


हर मध्यमवर्गीय माता पिता की तरह मेरे पिता भी मुझे वो सब कुछ बनाना चाहते थे... वे खुद जिसके आसपास कभी फटक नहीं सके। मेरे घर से मुख्य सड़क तक का रास्ता बरसात के आते आते टूट जाया करता था हर साल। ज्यादा नहीं करीब दस मिनट का सफर पैदल पैदल। पर दो तीन दिन लगातार बारिश हो जाए तो वह सफर भी साफ शफ्फाक तय कर पाना एक चुनौती। हमारे लिए असल समस्या स्कूल के जूते मोजे उत्पन्न करते। बगैर पहने कैसे जाएँ और पहन कर भी कैसे जाएँ। पर पिता मेरे हार नहीं मानते। हमारे जूते मोजों को एक प्लास्टिक के थैले में कसा जाता और पिता के एक हाथ में वह थैला दूसरे में पानी से भरी एक वाटर बॉटल। पीछे पीछे कंधे पर स्कूल बैग लटकाए हम। मुख्य सड़क पर आकर हमारी चरण वंदना होती और फिर कोरे करारे जूते मोजे पहन कर हम निकल पड़ते विद्या अर्जन अभियान पर।

हर दिन जारी रहता नियति के खिलाफ उनका कोई न कोई छोटा प्रयास। पर सचाई यह थी कि मुझे ऐसा कछुआ प्रजाति प्राणी बनाने के पीछे सबसे बड़ा योग उनका ही था। जबसे मैंने होश सँभाला उन्हें एक ऐसे पेशे में पाया जो दुनिया से छिपा कर रखे जाने योग्य था - मेरे लिए। मैं कभी किसी से यह नहीं कह सकी कि मेरे पिता एक चुटकुलेबाज थे। उनके चुटकुले पढ़ कर कभी मुझे हँसी नहीं आई। मुझे शक है कि खुद उन्हें भी कभी आई होगी। उनके चुटकुले पढ़ कर मेरे मन में जो भाव उठते थे, दरअसल उनकी पूरी की पूरी जिंदगी उसी का प्रतिरूप थी - बेमजा और बेस्वाद। और इसीलिए शायद उनकी कमियों का प्रतिशोध लेने के लिए मैंने अपने आप को खोल में कैद कर दिया - कितनी ओजस्वी व्याख्या हाह! जैसे अपने लिए कोई दूर गगन के सपने खोजती फिरती थी मैं, वैसे ही मेरा वश चलता तो अपने पिता के लिए भी पत्रकार चित्रकार विचित्रकार... कोई भी सम्मानजनक पेशा खोज कर उनकी चुटकुलों की कथरी को ताउम्र छिपाए रखती मैं... पर जैसा कि विधान था... शहर छोटा था...। उसमें यथार्थ और यहाँ तक सपनों को समोने की अपनी सीमित क्षमता थी। यथार्थ का तो वह जितना बिगाड़ सकता था उसने किया और हमने सहा पर सपनों को उसके हवाले कैसे कर सकती थी। वजह यही शायद कि सपने की लंबाई छत तक पहुँचती कि उसके पहले ही मैंने समेत उसके, वह शहर छोड़ दिया।

मुझे लगा कि कुछ खाली खाली सा है। मैंने घूम कर देखा। बगल की जगह खाली थी !!! इस घड़ी जरा सी भी इच्छा न हुई जानने की कि वह कहाँ था! कभी कभी ऐसा लगता है कि जो हो रहा है उसे हो जाने दिया जाए। बिना किसी बिघ्न बाधा। बिना महसूस किए हुए कुछ भी। गुजर जाने दिया जाए! वही किया मैंने। तब बचता क्या था सिवाए इसके कि अपने आप से बातें की जाएँ!

जब इस शहर आई थी नई नई उठ कर, चार हजार रुपये स्वीकृत हुए थे मेरे खाते में। एक भारी भरकम रकम। पर उन्हें जी भर कर बार बार गिन ही सकूँ इत्मीनान से इतनी भर उम्र भी नहीं लिखवा कर लाए थे वे अपने साथ। मैथ्स और फिजिक्स की ट्यूशन, हॉस्टल, मेस, आना जाना और बाकी बचे (बाकी बचे भी!) में अपनी ऐश की तमाम चीजें। ऐसा एकरेखीय हिसाब कुछ महीने ही चल सका। कुछ गिने चुने महीने उसके बाद सेंधमारी होने लगी। पीछे के तीन खाते जस के तस रहे। अग्रिम खाते में सबसे पहले हेरफेर शुरू हुई। एक दिन एक रात में ऐसा नहीं होता कि जिंदगी से हिसाब निकल जाए और किताब भी और नाचना गाना शामिल हो जाए! इसकी कच्ची गीली पृष्ठभूमि पहले कहीं बनी होगी जरूर... वहीं लंबे समय तक खिंचे जा सकने वाले... एपीसोड के इर्दगिर्द या कि इस अहसास के ही कि कोई भी ऐढ़ा टेढ़ा काम करना है पर वह हरगिज नहीं जिसमें पिता की इच्छा शामिल हो जरा भी। तो कुल जमा ये कि हिसाब किताब को रवाँ दवाँ करने के लिए बहुत किस्म की कतरब्यौंत करनी पड़ी। दो एक ट्यूशन, कतरा कतरा जमा की गई हिम्मत और फड़ड़ फड़ड़ पंखों की अकुलाहट ने कच्चा बंदोबस्त कर दिया।

जहाँ जाना शुरू किया था, वहाँ चूल चूल को हिला कर रख देने वाली मेहनत थी। अब तक का सब सीखा बेकाबिल था। ककहरे से की गई शुरुआत और भागने का पीछे... कोई रास्ता भी नहीं। बस इसी जोश की डोर थी थामे कि दुनिया को हिला देने की पीठिका तैयार की जा रही है! और वाकई दुनिया तो हिली ही थी! पर जिस सुर ताल पर मैंने सोचा था उस पर नहीं। साल दो साल तीन साल घर ने इससे ज्यादा साल नहीं खरचे सूँघने में कि मैं छल के रास्ते पर थी! मैं जानती थी मेरे घर में चीख पुकार कोलाहल वाला दृश्य उपस्थित नहीं होगा बल्कि जो जहाँ है वहीं से अपने को स्थगित कर लेगा! और मेरा जाना मेरा परखा कभी गलत हुआ है भला कि तभी होता!

अभी हुआ! वह मुझे देख रहा था! सौ प्रतिशत मुझे।

उसने कहा... 'चाय पी लो थोड़ी...'

चाय! मैंने दोनों हाथों से चाय की प्याली को थाम लिया। बल्कि दोनों हाथ भी कम पड़ गए थाम सकने में। मैंने दसों उँगलियों से छितरा कर छोटे घेरे वाली प्याली को थामा और पहला सिप जो लिया चाय का वह पनियाया खारा था। सुसुम सुसुम खारा स्वाद चाय का। आँसुओं का रचा एक व्योम जाल! चाय में बूँद भर टपक कर उसे अपना स्वाद दे दिया था कि आँखों के आगे तिरे होने मात्र से जिह्वा पर भी अपना परदा डाल दिया! जो भी... दो तीन घूँट से ज्यादा लंबी साँस न थी कुल्हड़ भर सुसुम आँसुओं की। गट गट गटमुझे तब अहसास हुआ कि मेरे गले को नमी की कितनी सख्त जरूरत हो आई थी! ठहरिए! यह अहसास को जानने का वक्त है क्या! यह तो केवल सुनने का समय था। दुर्लभ वचन - मेरे गाँव के कुल्हड़ जिनकी उम्र थोड़ी हुआ करती थी... ही मेरे एकमात्र राजदार थे। केवल वे ही जानते थे कि मेरे कोश में भी अपने लिए बहा सकने वाले आँसू रहा करते थे। जिन आँगनों में मैं जाया करता शाम के शाम अपनी कला का बाजार फैलाने , वहाँ रात का खाना बन चुकने के बाद बड़ी तसलियों में चाय उबालता। जब सबकी चाय बँट जाती तब चायछन्नी में बची रह गई चाय पत्तियों को दबाने से ही इतनी चाय निकल आती कि मेरी खुराक का बंदोबस्त हो जाता। मुझे चाय कुल्हड़ में दी जाती और मेरे मुँह तक आते आते उनकी गरमाहट अपनी आँच खो बैठती। फिर भी जो भी था जैसा भी काफी होता मन में जमी हुई परतों को पिघलाने के लिए... और कुल्हड़ के कोरों का स्वाद मेरे लिए नमकीन बन जाता। कोई भी जान न पाता कि मेरी आँखें दरअसल छलकती थीं। चाय पीने के क्रम में की जाने वाली जोर जोर की सुर्र सुर्र में आँसुओं वाली सुर्र दब जातीं और लोग कहते तू चाय पीते वक्त आवाजें बहुत निकालता है!

एक भी लाइन पल्ले नहीं पड़ी पर यह क्या कम था कि उसने कुछ कहा। कुल्हड़ चाय आँसू आँगन कला...। यह तो तय था कि उसके पास भी कहानी थी भले आउटडेटेड! पर वह और इंतजार कराने के मूड में था। और खास बात ये थी कि ये इंतजार भी मुझे भला लग रहा था। बल्कि कभी कभी (अभी अभी) ऐसा लग रहा था कि हम जिस बेंच पर बैठे थे उसके ठीक पीछे कैलेंडर तेजी से बदला जा रहा था... लोग बदल रहे थे...दिन रात उजाला अँधेरा चहचहाहट सन्नाटासब बदले जा रहा था अपने को पर हम जहीं के तहीं थे।

'छल!' - उसने पूछा - कहा।

(छल! यह क्या था? ओहो तो वह चाहता था कि मैं बोलूँ... बोलती जाऊँ... तभी उसने मेरे आखिरी वाक्य में से एक कड़ी तलाशी थी।)

मैंने अपने दोनों घुटने मोड़ कर ऊपर की तरफ उठा लिए। खूब ऊपर कंधे की सीध तक और माथा नीचे धँसा दिया घुटनों तक। मेरा शरीर अब एक टेढ़े मेढ़े गोले की शक्ल अख्तियार कर चुका था। घर से भागी लड़की का परिक्रमा वृत्त। अगर पलकें मूँदती हूँ तो एक साँस में माँ की केवल बिंदी दिखाई देती है। बड़ी सी सिंदूर की पसीने से लेपाई बाईं ओर। ऊपर की तरफ उसके लेपाएपन को अगर पोंछ दें... दुपट्टे की कोर से, और बदले में ये माँग बैठूँ कि चेहरे की झलक मिल जाए जरा सा तो क्या मिलेगा! आँख होंठ... सब मेरी माँ के भी थे... मतलब हैं, पर मोमबत्ती की लौ से ऐसे काँपते हुए मेरे सामने कि एक हिस्सा दूसरे पर चढ़ने लग जाए। इस कँपकँपाहट ने एक चीज की सुंदरता को बिल्कुल हिला कर रख दिया था... मेरी माँ की ठोढ़ी को। एक सुडौल उभार वाली चीज दो भागों में बंट कर इतनी खोखली इतनी साधारण हो सकती है, मैंने अभी ही जाना था। जाना तो और भी कुछ था अभी ही। अपनी ही माँ का चेहरा एक साँस को तेज खींच लेने भर से सामने से उड़ जा सकता है! उसे दुबारे से सँजो पाने के लिए मैं साँस को आहिस्ता आहिस्ता खींचने से लेकर लेने ही न के भी तरीके आजमाऊँ तो भी उस हिलती डुलती तस्वीर की झलक वापस पाना असंभव सा था।

माँ की टेढ़ी ठुड्डी वाली पत्ती अगर उड़ जाती तब फिर कुछ नहीं बचता मेरे अतीत में... मेरे लिए। वो छोटा सा कमरा भी नहीं जिसके एक ताखे पर हरे गेंद में आलपीन धँसा कर बनाई गई गुड़िया रखी थी। वो लकड़ी के दो पालों वाले नीले दरवाजे भी नहीं, जिन्हें बंद कर दिया जाए तो भी सुराख बची रह जाए बीचोंबीच। वो ऊँचा सा पलंग भी नहीं जिसके चारों पैरों के नीचे ईंटें रखी थीं और जो एक जरा सी करवट के बदले जाने की चुगली घर भर में खा आया करता था। वह सिर्फ एक सूखी पत्ती वाला अतीत तो नहीं हो सकता! तो फिर क्या था जो मेरी यादों में आना ही नहीं चाहता था!

कभी कभी उन शुरू के दिनों में ऐसा होता कि मैं डांस क्लास जाने के लिए तैयार खड़ी होती दरवाजे पर और दरवाजा खोला कैसे जाता है... यह भूल चुकी होती। सच में भूल चुकी होती कि दरवाजा खोला कैसे जाता है। यह सुनने में अटपटा लग सकता है पर सच है कि सब मिट गया होता! एक गोल सी मोठ थी जिसे बाएँ घुमाया जाता था शायद। मैं उसे दाएँ बाएँ हर तरफ घुमा कर देख चुकी होती पर खुलता नहीं था कुछ भी। तब उसे कहीं भी घुमाना छोड़ कर मैं उसे थपकाना शुरू कर देती। दस्तक दरवाजे पर। दस्तक देते देते दरवाजे की छुअन बदलती जाती और मुझे लगता कि वह लकड़ी के एक खुरदुरे दरवाजे में बदल जाता जिसका कि रंग नीला था और जिस पर सुराखें थीं जहीं तहीं। कुंडी लगा दरवाजा। तो मेरी वापसी पर किसी ने बाहर से ताला लगा दिया था! बहुत पुरानी चलन का ताला! चाभी, जाहिर है इस ताले की नहीं होगी किसी के पास भी...


कुछ तो कर देना ही था! आज की रात कुछ होता नहीं तो आगे फिर कुछ भी नहीं होता! अगले सूरज का निकलना आज की रात पर टिका था कुल्लम। 'बेरंगी सूरत वाले एक इनसान' की नाभि से तेज तेज हूक उठ रही थी। नाकामी और उससे भी बढ़ कर अपने ही प्रयास में रह जाती कमी को याद कर। पिछली कुछ रातों से मैंने अपने मन के विचलन को साधने के लिए भूमध्य पर ध्यान लगा साँसों की आवाजाही को महसूसने का नुस्खा भी अपनाया था पर बजाए कुछ सोच पाने के मैं अपनी चैतन्यता ही गँवा देता... जिसका अहसास भोर की उजास को चेहरे पर महसूसते वक्त होता मुझे। पर चूक गई रातों के लिए और असफल प्रयासों के लिए आज कोई जगह न थी। आज आरपार की रात थी। कुछ करना था! क्या करना था!

कहीं कुछ तो ऐसा था जो ठीक ठीक काम नहीं कर रहा था। जिंदगी ठुँसी पड़ी थी लोगों से घटनाओं से सामानों से... पर कोई भी आगे नहीं आ रहा था मुझ तक! संसद से लेकर सड़क तक... हर जगह तो थीं संभावनाएँ पर शायद मेरी जिंदगी मेरा लिखना उसकी प्रक्रिया सब खुद इतना फूहड़ चुटकुला बन चुका था कि उससे बड़ा और संभावनाशील मैं कुछ खोज ही नहीं पा रहा हूँ।

मैं कूद कर खड़ा हो गया। जमीन पर। अपने दोनों पैरों को साट कर और घुटनों को अलगा कर हर संभव। वही मुद्रा। वही झुकाव। बस दोनों घुटनों के बीच की कोष्ठकाकार जगह को भरने के लिए धोती न थी यहाँ। टखनों से सटा कम मोहरी का पायजामा था यहाँ। मैंने ऐसा मान लिया कि मेरे शरीर में किसी ने दाखिला ले लिया या कि सूरज देवता ने अगली सुबह न निकलने देने की धमकी के बचाव में अतीत के किसी पात्र को समो दिया था मुझमें... वजह चाहे जो भी! मैं दिशा की सूचना देने वाले तारों की उपस्थिति में कुछ हरकतें करने लगा। ...फिस फिस जुबान की लय पर। कोई भी तो उपस्थित नहीं था फैसला देने के लिए वहाँ कि यह किसी अन्य के मेरे शरीर में दाखिले से निकली प्रतिभा थी या मेरे जिंदगी भर के संचित ताप और दमित इच्छाओं की भड़ास! जो भी था... अनगढ़ बेहूदा अश्लील भौंडा विकृत... जाने अनजाने जीवित मृत वास्तविक काल्पनिक... जो भी जैसे भी भूत भविष्य के पात्रों की नकल... साँय साँय सी फिसफिसी सीटी की आवाज के साथ हँसना... मुँह विकृत कर एक साँस रो लेना बीच में जाने क्या क्या होता रहा।

साम दाम दंड भेद पर उतर आए क्षण भर पहले के उतावले सूरज देवता ने मुँह फेर लिया। दिशा की सूचना देने वाले तारों ने एक मटमैले दुपट्टे की ओट में अपने आप को समेट लेना चाहा। हर कोई यही चाहता था कि घुप्प अँधेरे के सिवा और कोई भी गवाह न बचे उस प्रस्तुति का... जोकि अब अपने आखिरी चरण में थी और दबे पैर एक खुली चारपाई पर आकर सिसकियों में थिरा चुकी थी। रात इतनी नीरव थी कि किसी में भी हिम्मत नहीं जुटी परिणाम को परखने की कि आज की रात कुछ हुआ! या आगे फिर कुछ नहीं होने वाला था!


एक रात की यात्रा थी। जहाँ मैं बैठा था उसकी खिड़की का काँच एक छोटी तिरछाई में टूटा हुआ था। उस तरफ से आती हवा मुझे कुछ भी सोचने नहीं दे रही थी। अगर इस बात को मैं सच का पक्ष लेकर बयाँ करूँ तो बात ये आती है कि दिमाग मन से कम चंचल नहीं। अगर वह भी फिसलने की ठान ले तो वजह की तलाश कोई मायने नहीं रखती। काँच की टूटन का क्या बहाना!

सच तो यही था, बल्कि ये यात्रा भी सोच से भागने का परिणाम ही थी। सोच से भागने का कि मानसिक संत्रास से मुक्ति का। काँच के टुकड़े की उस खाली जगह पर मेरी तीन उँगलियाँ हैं और उसके खुरदुरेपन पर मैं लगातार उँगलियाँ घिस रहा हूँ। याद नहीं आ रहा इस रास्ते से पिछली दफा कब गुजरा था मैं। ननिहाल- माँ के ननिहाल। सुनने में अजीब लग रहा है। अब के बच्चों के लिए शायद यह शब्द कम जान पहचान वाला हो पर हमारे लिए इस जगह का मतलब हुआ करता था। एक बात और है कि बचपन के बीत जाने के बाद मैं उस जगह फिर दुबारा नहीं गया। आज भी बस से वहाँ जाना बड़ा बनावटी सा लग रहा था। किसी फंतासी तक पहुँचने के लिए फिर से बैल के कंधों की जरूरत थी। मैं दूसरों के पिछड़ेपन की कीमत पर एक मायानगरी को छूना चाहता था। हाँ छूना ही तो था मुझे, छूना था, अपने काम की चीज बीन लेना था और वापस लौट आना था अपनी तरक्की में जुटी दुनिया में। काम की चीज! जिसे ढूँढ़ने मैं जा रहा था। वह आदमी जीता ही होगा अभी- यह इतने यकीन से कैसे कह सकता था मैं - एक कोई उँगली कट गई कहीं से - शीशे की चुभन ने मुझे बताया ऐसा। छटाक से उँगली - वही कटी वाली - मुँह में घुस गई। जीभ के ऊपर।

जीभ की प्राथमिक मरहमपट्टी के बाद मुँह के भीतर से जो बाहर निकली, वह एक छह सात साल के बच्चे की उँगली थी। मानों ढक्कन खुल गया और उस उँगली के बाहर निकलते ही ढेरों यादें झाग की तरह उधक आईं। गन्ने की लग्गी को छीलते वक्त किसी उँगली से छलका लाल रंग और उँगली का झट से जीभ के भीतर जाकर दुबक जाना- कुछ भी तो नहीं हुआ की तर्ज पर। किस गाँव में हुआ था ये सब जहाँ मैं जा रहा था वहाँ या कि दादी के गाँव में... कौन सोचे पर ये मैंने जरूर सोचा कि अच्छा हुआ कि जमाने ने तरक्की कर ली और मैं बस से जा रहा था... जल्दी पहुँच जाऊँगा बहुत कम समय में घंटे दो घंटे तीन घंटे। कितने सारे हिले मिले चेहरे सामने आ गए। चेहरा किसी का, पहचान किसी की, आवाज किसी की, बात किसी की...। एक लंबे बूटों वाले फुटबॉल के खिलाड़ी मामा जिनका अंग्रेजी राज के जेल में आना जाना लगा रहता था और जो एक दफे जेल से स्वेटर बुनना सीख कर आए थे - एक घुँघराले छोटे बालों वाली पगली बुआ, जो कभी मुझे सोया पाकर एकांत में छूना चाहती थी पर ऐन वक्त पर मेरी नींद खुल जाती और मेरी चीख छत को उछाल कर रख देती।

मेरे दिल की धड़कन एक कदम फाँदते फाँदते मेरे मुँह तक आ गई और मैंने धड़कन को अपने कस कर बंद जबड़ों के ठीक पीछे महसूस किया। ये उबड़खाबड़ चलती बस कई साल पीछे की यात्रा कर मुझे मेरे उद्गम तक ले जाने वाली थी और उस अहसास की चमक में वहाँ तक जाने का आरंभिक मकसद बहुत पीछे छूट गया। घायल उँगली पर अँगूठे को फिरा कर मैंने परख लिया कि दरद का अब कोई वजूद था नहीं। खिड़की के तिकोने झरोखे से आती हवा जख्म को बुहार कर उड़ा चुकी थी।

कितना सुखद उँगली का कटना कि मैं आँखें मूँद कर कल्पना करने लग गया कि मैं बस से उतरता हूँ और एक बूढ़े रिक्शे वाले के रिक्शे पर अपना सामान रखता हूँ। मैं अपने नाना मामा या किसी का नाम लेता हूँ और वह चौंक कर मुझे देखता है। फिर वह बगैर मुझसे कोई और पता पूछे आड़े कटारे रास्ते से सवारी को एक घर के आगे खड़ा कर देता है और इसके पहले कि मैं उतर कर उससे किराया या सही पते पर पहुँचाया या नहीं... ऐसा कुछ तसदीक करूँ- वह खुद झटक कर घर के भीतर दाखिल हो जाता है। मैं अचकचाया एक पाँव रिक्शे के नीचे एक रिक्शे पर - ऐसी हालत में खड़ा रहता हूँ और घर के भीतर से एक फौज रिश्ते मिलते हैं - बूढ़े जवान बच्चे और किनारे खड़ा रिक्शे वाला, जो नाना पर गई मेरी शक्ल के कारण मुझे पहचान चुका है। एक हल्की सी हँसी खिल गई। फिर से।

एक और कि रिक्शे वाला जो रिक्शे की सीट पर बैठ कर खैनी मल रहा होता है तलहथी पर, मेरे सामान रखते ही हाथ रोक कर नीचे उतर जाता है और गौर से देखता पूछता है - 'जमीरन बाबू के यहाँ का!'

मैं गरदन डुलाता कोई और नाम लेता हूँ तो वह हँस कर कहता है - 'बाबू उन्हीं के तो लरिका हुए जमीरन बाबू। चलिए हम तो पहिले ही बोले थे।'

माँ की शक्ल ननिहाल पर गई थी और मेरी माँ पर, ऐसा सुना था कभी। अब इस एक बात को इतनी लंबी साँस तक तो खींचा ही जा सकता था। जमीरन बाबू... मैं मुस्कुराया। कितनी सुघड़ बात थी कि मेरी कल्पना के घटनाक्रम में हर बार दूसरे ही मुझे पहचान पा रहे थे, मैं किसी की पहचान नहीं कर पा रहा था बल्कि पूरे वक्त कहीं न कहीं असमंजस ही रहा मेरे चेहरे पर। ठीक भी तो है! बचपन की याद्दाश्त की उम्र हो भी कितनी लंबी सकती है और जवानी का तो मैंने कहा ही कि...। खैर हटाइए इस बात को।

बस एक झटके से आकर रुकी थी कि रुकते रुकते... इस अहसास से वंचित रहा जरूर पर बस के मंजिल छूते ही आँख खुल गई मेरी। इसे नींद का खुलना नहीं कह सकते हैं। यह सिर्फ और सिर्फ आँखों का खुलना था। पलकों का बिछुड़ना बल्कि। जगहें खाली होने लगीं। चप्पलों और बक्सों की घिस घिस। मेरा अपना सामान सीट के नीचे था या शायद सीट के ऊपर। या मैं बगैर सामान के आया था या मेरा सामान लेकर कोई पहले उतर चुका था! जो भी था, मेरा सामान मेरे जेहन में दूर दूर तक नहीं था। इस वक्त मैं सिर्फ अपने शरीर को अपनी आत्मा में छुपाने का ढब जुगाड़ रहा था। कुछ ऐसा, जिससे मैं होकर या ना होकर भी दिखता किसी को नहीं। और सच का ऐसा हुआ भी था। कोई भी पास से गुजरता हुआ - मैं उतरता क्यों नहीं - ऐसे, नहीं देख रहा मुझे। बस खाली हो गई और नीचे कोई रिक्शा भी नहीं बचा अब खाली।

मैं पैदल ही आगे बढ़ गया। दायाँ बायाँ दोनों ही रास्ते खुले थे। पर यह जानते हुए कि जीवन में आज तक कुछ भी नहीं सही चुन पाया मैं, बगैर डगमगाए मैंने बाएँ रास्ते को चुन लिया।


सुनो और सुनो। एक बार स्कूल में एक निबंध प्रतियोगिता हुई थी - 'मैं बड़े होकर क्या बनना चाहता/चाहती हूँ'। मैं प्रथम आई थी और स्कूल फंक्शन के दिन मुझे एक बड़ा सा शील्ड मिला था। बाद में जब मैं परिवार समेत लौट रही थी अचानक कहीं से प्राचार्य टपक पड़े और उन्होंने सबसे मिलने के बाद... मेरे उज्ज्वल भविष्य की कामना के बाद पिता जी से पूछ लिया कि वे क्या करते है। सामान्य सवाल सामान्य से जवाब की आशा में। पर पिता जी खाली मुँह खोल पाए थे... बाकी का मैंने हड़प लिया था सब... वकील हैं कोर्ट में। मुझे लगा कि पीछे के दो शब्द इतने वजनदार थे कि आगे के दो शब्दों का लुजपुजपन उसके पीछे छिप गया होगा जरूर।

मेरे इस तत्पर प्रयास का नेक उद्देश्य इस नए नवेले प्राचार्य महोदय को चुटकुलों के पुलिंदों से दूर रखना था बस। मामला तो सलट गया पर मैंने एक तेज नजरों से पिता जी को देखा था (जिससे शायद देखना उन्हें था मुझे) बाद में मुझे ऐसा लगता गया कि पिता जी छिप छिपा कर उस शील्ड को देखते थे अक्सर जो कहीं न कहीं इस बात का अहसास दिलाती थी कि उन्हें बड़े होकर क्या बनना चाहिए था

उसे बोलने का चस्का लग गया था। उसने कहा (हाह वह क्या कहेगा मैंने ही कहा) - उनकी छोड़ो। अपनी कहो! कहाँ पहुँच गई...

रंगमंच की नायिका को पहला कमर्शियल स्टेज शो जो मिला उसमें उसे अलग अलग पोशाकों में लहरा कर आना था... जाना था जाना था... आना था... बस आते जाते रहना था। मन में कहीं भी यह भ्रम नहीं था कि मेरी पोशाक के चटक रंगों के सिवा किसी भी चीज पर किसी की नजर ठहरेगी। व्यावसायिक रूप से जीवित (?) रहने के लिए यह जरूरी है कि मन में किसी भ्रम को पलने तक की मोहलत ही न दी जाए। मैं और मेरे जैसी बहुत सी लड़कियाँ रंगों की एक लहर भर थीं... पर लहर भर बनने के लिए ऐसी हाड़तोड़ मेहनत कि कहना क्या। हाथ पैर चेहरा मोहरा सब को प्रशिक्षित कर देने की कवायद। तयशुदा से एक इंच हेरफेर नहीं। परदा उठने से गिरने के बीच (परदा गिरने उठने का जमाना रहा कहाँ जो भी है बेपरदा) मैं लगातार यह सोच कर खुश होती रही कि कोई भी मुझे ढूँढ़ निकालने की कोशिश में परेशान नहीं था... दर्शकर्दीघा में!... टेलीविजन पर जब उसका प्रसारण होता तो मुझे घनघोर तसल्ली होती यह सोच कर कि जब ठीक ठीक लोकेशन और पोजिशन जानते होने के बाबजूद मैं अपने आप को नहीं खोज पा रही तब घर वाले क्या खाक देख पाते होंगे कभी!

रुपये जो मिलने थे, उनका पेमेंट चेक से होना था... इसलिए बैंक में एकाउंट खुलवाने चेक मिलने जमा करवाने और उसके क्लियर होने तक की प्रक्रिया ने उस रहे सहे उल्लास को भी छीन लिया... जो कि आमतौर पर मध्यमवर्गीय परिवार का 'पेट पालने को कुछ भी करेगा...' टाइप ट्रेजडी क्वीन सहनायिकाओं को मिला करता था। पता है इस सारी बयानबाजी के पीछे दरअसल मैंने क्या सोचा था... मैंने उम्मीद की थी कि अपने आप को भावनाशून्य बना कर, बढ़ चढ़ कर अपने अपमान की प्रक्रिया का हिस्सा बन कर दरअसल मैं अपने भीतर की सुप्त किसी चिनगारी को हवा दूँगी और वही चिनगारी मेरे आत्मसम्मान को झकझोर देगी और... और और सब कुछ ठीक हो जाएगा। ठीक हो जाएगा का मतलब सही समझा आपने... मैं अपने नाम पर लिखी किस्मत की इबारत को मिटा दूँगी और वह मुख्य भूमिका... जिस पर सिर्फ मेरा ही अख्तियार था... वह मेरी होगी। पर हुआ क्या! धीरे धीरे मुझे उसकी आदत पड़ती गई और इस बात पर यकीन होने लगा कि या तो सुप्त चिनगारी की तरफ फेंकी गई हवा में प्राणवायु की कमी थी या कि चिनगारी की बारूद ही सिली सिली थी। मेरी दुनिया दूसरी डांसरों से प्रतियोगिता करने... और अगला शो हथियाने तक ही सीमित होकर रह गई।

वह मेरा पाँचवा शो था। तब मैं मरील शॉ के ग्रुप में थी। शो के एक शाम पहले गोरेगाँव के एक स्टूडियो में फाइनल रिहर्सल के बाद पार्टी थी। रंग अभी मद्धम ही चढ़ा था कि मेरा एक सहयोगी बहक गया। पहले अनदेखी फिर प्रतिवाद... मैं मुखर होती गई पर कोई मेरे साथ खड़ा नहीं हुआ। सब मजे ले रहे थे ऐसा भी नहीं था बल्कि कोई ध्यान तक नहीं दे रहा था। हल्के छेड़छाड़ से शुरू हुआ वाक्या चुभन तक पहुँच गया पल में। मैं किसी जतन से अपने आप को छुड़ा कर सरपट भागती सड़क पर पहुँच गई। ऑटोवाला अपने आप रुक गया था पर मुझे लगा जैसे रुका नहीं वह। मेरी नजर में वह भी साजिश का एक हिस्सा था और जानबूझ कर मुझे नहीं ले जाना चाहता था। मैंने कपड़े के झोले के भीतर से अपने पर्स को उसकी पीठ पर सटाते हुए उसे जान से मार डालने की धमकी दी। ऑटो चल पड़ा... तेज गति। मुझे लग रहा था कि कोई खयालों से उनकी गति उधार लेकर मेरा पीछा कर रहा था... (हाह! जबकि उसमें कितनी सचाई रही होगी आप समझ ही गए होंगे) मैं एक बित्ते के पर्स को उसके कंधे पर भिड़ाए उससे तेज तेज गाड़ी हँकवाती घर तक पहुँच गई। फिर मैंने उसके सामने ही उसी झोले में से उसी पर्स से निकाल कर किराया अदा किया और बिना कुछ कहे मुड़ गई। अनजान शहर की भयावह सड़कों पर गुमनाम देश से कमाने आए ये रिक्शावाले सड़क के मोड़ से पहले सवारी की नब्ज पहचानने लगते हैं। मुझे शक है कि वह शुरू से जानता था कि मेरे झोले में रखी सख्त चीज दरअसल पर्स ही था... जो कि खाली भी हो सकता था!

बहरहाल आगे क्या हुआ? बताती हूँ। आगे यह हुआ कि मैं अगले दिन वही झोला वही पर्स उठाए (बहुत संभव है उसी रिक्शे से) वापस स्टूडियो गई और उसी व्यक्ति के साथ बटाटा बड़ा खाते हुए उसी के साथ मेन आर्टिस्टों के नखरे पर छींटाकशी करते हुए और उसी के करीब नाचते हुए... एक चेक लेकर वापस आ गई। वाकई 'प्रोफेशनल'! यह मेरा शॉ के ग्रुप का आखिरी शो था। पर सच था कि मेरे भीतर कुछ मर गया था। या शायद कुछ जाग गया था।

उसके बाद? उसके बाद आदिल था! जिंदगी में। मैं अब उसके साथ थी। उसने मुझे चलना उठना बैठना मटकना लचकना... जाने क्या क्या सिखाया। कह सकते हैं उँगली पकड़ कर ही।

यहाँ एक तरह से मैं बिल्कुल सुरक्षित थी... पर दूसरी तरह से बिल्कुल असुरक्षित! भावनाओं में, दिल में, दिमाग में कोई तो सेंध लगा रहा था। हलचल थी सुगबुगी थी... मुझे अच्छा लगता था उसका सिखाना झुँझलाना पछताना फिर सिखाना बर्दाश्त करना। करते जाना। पर मैं पहले तो ऐसी नहीं थी। पहले मुझमें स्वाभिमान था, ललक थी, ऊँचे सपने थे, जिद थी... मैं मौका ही नहीं देती किसी को टोकने देने का... अब कुछ भी नहीं बचा था सिवाए जिद की परछाईं के...। इसलिए अब मुझे बुरा नहीं लगता था बल्कि हल्का हल्का अच्छा ही लगता था... जैसाकि मैंने कहा। शायद अपने आप को मारते मारते या मारे जाते देखते देखते मैं एक साधारण लड़की में तबदील हो चुकी थी।

पर आदिल को अच्छा नहीं लगता था... उसे अच्छा नहीं लगता मुझे उस तरह देखना बिखरते हुए... टोके जाते हुए... नाचते हुए... पीछे एक ऐसी चीज में परिवर्तित होते जाते हुए... जिस पर किसी की नजर जाए तक नहीं...। मैं उसके लिए खास थी। वह मुझे इस तरह गिरते कैसे देखते जा सकता था...

और इसी की परिणति ये चिट... मैं पड़ोसी की ओर देख कर मुस्कुराई। उसने भौंहें उचका कर मुझे देखा (देख पहले से ही रहा था... अभी उसने सवाल उछाला भौंहें उचका कर)। पहली बार इस पूरे संवाद में मुझे लगा कि उसने पूरी तरह अपने आप को डूब जाने दिया है। उसने सवाल किया था जरूर भौंहों को माध्यम बना कर... वह यही जानना चाहता था कि आदिल मुझे इस तरह नहीं देख सकता नेपथ्य में... पर दरअसल मैं क्या चाहती थी... (देखिए न संवाद हमारे बीच वाकई अभी ही बना था क्योंकि अभी ही मैं उसके सवालों को ठीक ठीक पढ़ पा रही थी बगैर 'शायद' का सहारा लिए... खैर)

तो सुनो! एक बार सुन चुके हो... फिर भी सुनो! मैं नाचना चाहती थी बहुत सारी रोशनी के बीच। बेधड़क अकेली। एक बड़ा सा घेरा घेर कर। अपने पैरों को नाभि बना कर एक वृत्त की परिकल्पना अपने आप में पूर्ण करती हुई। मैंने सालोंसाल मेहनत की। किताब से अलग हो चुके पन्ने की तरह इधर से उधर उड़ियाती रही धूल गर्द में... इस शहर के बेपहचान झंझावात में। पर वक्त बीतता गया और हर गुजरता पल मुझे केंद्र से दूर और कोने की ओर जरा जरा सा खिसकाता गया। और धीरे धीरे मैं एक कोने में जाकर पूरी तरह फिट हो गई। नहीं ये भी सही नहीं। फिट नहीं हुई दरअसल इसी कोने के लिए अब रोज रोज लड़ाई लड़नी होती है मुझे... रात होती है तो सुबह के आने की लड़ाई... सुबह हुई तो शाम के चैन से ढल जाने की लड़ाई। अब यही मेरा मुस्तकबिल है... हाशिए तक पहुँचने के लिए सब कुछ छोड़ आई पीछे और अब जो सामने है वही कहता है कि मुझे इस तरह नहीं देखना चाहता कोने में। मैं जानती हूँ आदिल को किस बात की तकलीफ है। कोई भी नहीं देखना चाहेगा अपने प्यार को इस तरह हाशिए पर बने रहने के लिए भी संघर्ष करते।

पर पर पर आदिल जो भी मुझसे करता था या नहीं करता था... वह ऐसी ही बिखरी बिखरी मुझे देख कर... फिर अब टुकड़ों को जोड़ कर मुझे खास बना देने की चाह क्यों? मैं जिस मुकाम पर हूँ... मुझे वहीं जूझना है और जिसने मुझे पसंद किया उसे भी मुझे ऐसे ही देखने का अभ्यास बनाना होगा। अभ्यास नहीं... उसे मुझे रोज नए स्वाद से बिखरते हुए देखना होगा... उफ! वक्त अगर रेत है तो मेरी मुट्ठियों में वाकई सुराख था!!! इस सुराख से समय को फिसलते देखना मुझे कुबूल था... वाकई इस बिखरते जाते रेत पर अपने कदमों के निशान दर्ज कर मैं आगे बढ़ जाना चाहती थी...


कुछ चीजें शुरू से नहीं होतीं। वे कहीं से भी हो जाती हैं... यह रास्ता भी ऐसा ही। बल्कि इसके तो आखिर पर भी प्रश्नचिह्न था। बीचोंबीच एक गोल पोखर और उसके इर्द गिर्द शाखाओं उपशाखाओं में जन्मे हुए रास्ते। बगैर किसी की मदद लिए मैं सही जगह तक पहुँचना चाहता था। पर रास्तों ने ऐसी पहेली बुन रखी थी कि किसी चाहने न चाहने का विकल्प था ही नहीं खुला। वैसे देखा जाए तो यह सब व्यूह दरअसल उपसवाल थे। मुख्य सवाल तो कुछ और ही था। एक पल के लिए मान ही लिया जाए कि पता पूछने की सहूलियत होती तो पूछता क्या? किसके घर जाना था मुझे। किसकी तलाश थी आखिर! तो क्या मैं किसी सही जवाब के सही पते के नहीं बल्कि खुद सवाल की ही तलाश में भटक रहा था! और उस वक्त मेरा वहीं रुक कर सवाल की सही सही पहचान कर लेना ज्यादा आवश्यक था! वहीं रुक कर या वापस बस की तरफ चलते हुए। या कि दुबारे से बस में बैठ कर... जहाँ से आया था... वहीं लौटते हुए भी कर सकता था मैं इस सवाल की खोज पर विचार!

यह द्वंद्व एक साजिश थी। मुझे मेरे उद्देश्य से भटका देने की। किसी और की नहीं। खुद मेरे अंतर्मन की साजिश। मैं लगभग दौड़ने लगा। अपने आप से पीछा छुड़ा लेना था मुझे। ऐसे दौड़ते हुए मेरे कदमों में कच्चे आम की खुशबू भर गई और लगा कि उस सोंधे खट्टे स्वाद का असली मालिक पीछे से हाँक लगा रहा है। मैंने अपने हाथ का बैग समेटा कि कच्चे आम से भरा गमछा समेटा और कदमों की रफ्तार बढ़ा दी बेसँभार। मैं बीच बीच में पीछे की तरफ देख तेज तेज भाग रहा था कि आगे की तरफ किसी चीज से जोर से टकरा गया मैं... सामने बच्ची थी एक! और नीचे जो बिखरा पड़ा था वह वाकई कच्चा आम ही था! सामने वाले के गमछे से गिरा हुआ... और अभी जिसे मैं चुन रहा था... बल्कि चुनने में उसकी मदद कर रहा था... क्योंकि वह ज्यादा तेजी से हाथ चला रही थी और बीच बीच में विघ्नकर्ता को तेज नजरों से देख भी ले रही थी। इसका अर्थ यह था कि गाँव में आम के पेड़ उस दिशा की विपरीत दिशा में थे, जहाँ से अभी अभी मैं टिकोरे चुरा कर भाग रहा था!

चूँकि मेरे साथ अभी अभी धोखा हुआ था, मैंने भी एक जरा सा धोखा किया सामने वाले के साथ... वह एक बच्ची थी... इस बात का लिहाज किए बगैर। जब वह अपनी कैरियाँ चुनने में व्यस्त थी, मैंने आँख बचा कर अपने गमछे के टिकोले भी उसके गमछे में डाल दिए। सारे के सारे। उसे जरा सी भी भनक नहीं हुई और वह अपनी पोटली समेट कर उठ गई। वह न आगे की तरफ गई न पीछे की तरफ बल्कि उसने कूद कर एक तीसरा रास्ता अपना लिया। वह तीसरा रास्ता दो खेतों के बीच एक तलुवे के सँकरेपन में बना था। उस रास्ते पर उसके पीछे होने के लिए मुझे पहले तो जूते और मोजे का तत्क्षण त्याग करना पड़ा। मैं जब तक ये औपचारिकता निभाता, वह बहुत आगे बढ़ चुकी थी। वह एड़ियों पर कूदती बाँहों में पोटली दबाए मछली की तरह फिसलती चली जा रही थी। मैं कदम कदम रोपता दाएँ बाएँ चल रहा था उस रास्ते पर इसलिए वापस पीछे लौट कर मुड़ आना आसान था बनिस्पत कि...। फिर भी! मैं बढ़ता गया... हाँ छुटपन का एक अनुभव जरूर आगे आया मदद के लिए और मेरे दोनों हाथ समानांतर उठ गए दाहिने बाएँ, एक एक जूते को थामे। बैग कांधे पर। हाथ दोनों बाजू में खुले हुए जूतों समेत, पैर दोनों एक एक कर गिरते माटी में सने हुए। उस फुदकती गौरेया के पीछे पीछे चला जा रहा था मैं... जाने कहाँ... कहीं भी।

उसे थोड़ा शक पड़ गया था मेरी नीयत पर और अब वह पीछे मुड़ मुड़ कर देख ले रही थी कि उसकी कैरियों का दुश्मन अपनी दुश्मनी अभी तक निभा रहा था कि नहीं! इस शक ने उसकी चाल की मौलिकता को छीन लिया और वह भी मेरी तरह सतर्क चाल चलने लग गई। बाबजूद इसके मुझे उसके पीछे चलना भला लग रहा था।

खेत के मोड़ पर वह बगैर किसी पूर्व भनक के कमर पर दोनों हाथ रख कर और हाथ की पोटली को कमर पर टिकाए घूम कर खड़ी हो गई मेरी तरफ। अब आरपार सामना के और कोई उपाय था नहीं। उसने एकटक मेरी आँखों में देखते हुए भौंहें ऊपर की तरफ उचकाईं जिसका पाठ 'क्या है...' ऐसा कुछ हो सकता था। मैं दोनों हाथों से अपनी याददाश्त के पन्ने उलटने पुलटने लग गया कि कौन सी क्षेत्रीय भाषा थी दरअसल उस गाँव की। जवाब देने के लिए मुझे कैसे वाक्य विन्यास चुनने थे अभी इसकी उहापोह चल ही रही थी कि वह पतली छोटी मिरची के तीखेपन में प्रकट हुई - 'क्या चाहिए????'

संवाद अदायगी के समानांतर उसकी पोटली कमर के और पीछे और पीछे छुपती गई... बगैर देखे दिख गया। मूर्ख लड़की! जो अपना भी सब कुछ दे चुका हो उसे क्या चाहिए हो सकता है भला!

'अपने घर जाती हो?'

पलकें झपका कर ताकना भली लड़की की तरह उसे नहीं आता था बस घूरने तक सीखा था उसने अभी तक... मालूम होता था।

'अकेले चुराया इतना?'

वह क्षण भर ठिठकी। फिर उसने सिर डुलाया हाँ में।

'गाँव में सबके घर जानती हो?'

पहले उसने ना में सिर डुलाया फिर हाँ में। जवाब तो अस्पष्ट था पर ये स्पष्ट था कि पोटली कमर के पीछे से धीरे धीरे सामने आ रही थी।

'तुमको जाना कहाँ था?'

'तुमको'? और उससे भी बढ़ कर 'था'?

'तुमको' तो चलिए मान भी लें उसके तीखे तेवर देख कर पर 'था' का क्या किया जाए! उसे कैसे मालूम चल गया कि मैं फिलहाल बेलीक हो चुका था अपने मकसद से!

'चलो सिर्फ मेरे आगे आगे बताता हूँ मुझे जाना कहाँ है।'

अगले ही पल वह घूमी और उसने रफ्तार पा ली रिदम के साथ साथ और मछली वापस फिसलने लग गई अपनी धुन में... खेतों को पार कर अब हम सूखी जमीन पर थे। वह सीधा जाकर एक चापाकल के पास रुकी और अपना कीमती सामान जमीन पर रख कर उसने मुस्तैदी से चापाकल का हैंडिल थाम लिया। मुझे क्या करना था इसका बहुत खुला इशारा था। मेरे तलुवों से गीली मिट्टी अलग हो चुकी थी।

लड़की जूते पहनने तक चुपचाप मेरा इंतजार नहीं कर रही थी बल्कि वह अपने कीमती खजाने की दुनिया में मग्न थी। मुझे लगा वह गिनती कर यह पुख्ता कर लेना चाह रही थी कि एक भी नगीना अपने स्थान से विचलित तो नहीं हो गया। पर जब पोटली वापस बांधी जा रही थी तब प्रकट हुआ कि मेरा अनुमान खोखला था और दरअसल ध्यान एकाग्रचित्त कर पोटली की सबसे छोटी कैरी की तलाश की जा रही थी और जो अब हमारे सामने प्रस्तुत थी। खूब! तो मोहतरमा टिकोरे चुराने से लेकर कंजूसी तक में हमसे होड़ लेने पर आमादा थीं। और ये देखिए हमारी खामोशी को उन्होंने हमारा असामंजस्य समझ लिया और टप्प से बोल पड़ीं - 'ले लो...।'

फिर आगे दुनिया में कौन हो सकता था इतना निर्मोही जो इनकार कर सके। मैंने हाथ बढ़ा दिए। पर ठीक मेरे हाथों में उसे सौंपते वक्त उसके हाथ काँप गए और उसने यह साबित कर दिया कि दरअसल वह मुझसे एक हाथ आगे थी गैरदरियादिली में। बहरहाल न उससे दिया गया न मैं लेने ही पाया।

इस पर्याप्त बेइज्जती के बाद भी मैंने कहा - 'चलें'

वह फुदक कर चलने लगी आगे आगे। मुझे याद नहीं आ रहा कि इतनी बेसँभार खूबसूरती के पीछे पीछे मैं कब भागा था पहले कभी! धूल के पीलेपन में सने महीन कंकड़ों का बिछौना और गौरेया की गरदन से फुर्तीले उसके तलुवे। मैं कुदरत की कारीगरी को अभी जी भर कर पी ही रहा था कि सुंदरता ने करवट बदल ली और गौरेये की गरदन की चाल धीमी और कलात्मक हो गई... पुरानी अल्हड़ता गायब हो गई कहीं... और महीन कंकड़ों का बिछौना पुरानी चलन के ताले के ठंढेपन में तब्दील हो गया। सामने जो थी वह एक बड़ी बहन थी, जो अपने भाई को इत्मीनान से सड़क पार करवाया करती थी और इस पार आते ही अपने भाई से होड़ लगा लिया करती... भाग कर मुझ तक पहुँचने की! मुझ तक। अपने पिता तक। इति...!

'इति? अभी बहुत चलना है आगे।'

ये आवाज तो लड़की की थी और जिस पर वह खड़ी थी वह - कंकड़ीली जमीन।

'चलो न'- वह आगे आगे भागने लग गई थी। मैंने अपने आप को किसी तरह घसीटा उसके पीछे। ये कैसा भ्रम था जिसने उस शख्स को सामने लाकर धर दिया था जिसका अस्तित्व बरसों पहले साथ छोड़ चुका था।

क्या होता है किसी इनसान का रिश्ता उसकी संतान से! जन्म देना सपने देखना उस सपने को हकीकत मे तब्दील करने में जुट जाना और एक किसी दिन दूर बैठ कर उस सपने की आँखों में एक नए सपने को अँकुराता देखना...! और अगर कहीं बीच में यह क्रम लड़खड़ा जाए तो! जब सपने को हकीकत में बदल देने की उम्र हो तभी उसकी आँखों में नए सपने जागने लग जाएँ तो!

लड़की रुक गई। अपनी झोंक में चलता मैं, उससे टकराते टकराते बचा। कैसा खेल था जिसमें निकले थे हमारे कदम किसी और पते पर और उलझा लिया था हमने खुद को किसी और ही पते में। उसने सामने की तरफ इशारा किया। वहाँ कुछ लोग सुबह को उलटपुलट रहे थे अपने हिसाब से।

'किसके घर जाना हुआ? भोर से देख रहे हैं कभी इस रास्ते... कभी उस रास्ते।'

अब यही शेष रह गया था। मुझे खुद कोई खबर होती तो न दुनिया को थमाता कोई पता।

'हिरखी मिसिर का घर कौन हुआ?।' मैंने बिना लागलपेट अरसे बाद कोई बात कही।

'कौन!!!!!!'- वह ऐसे चौंका जैसे तीन पुश्त पुराने किसी कब्र की शिनाख्त कर बैठा होऊँ मैं।

'हिरखी मिसिर... पंडित जी।'

'ये नाम तो किसी बुजुर्ग से पूछना होगा।'

'हाँ हाँ बुजुर्ग ही हुए।' मेरी जान में जान आई। जैसे मैंने गुमशुदा की विशिष्ट गुप्त पहचान थमा दी सामने वाले के हाथों में।

'काम काज क्या करते थे? पूजा पाठ करवाते थे?'

'नहीं नकल काढ़ते थे। खाना भी बना लेते थे भोज भात में।'

'नकल! कोई बहुत बूढ़ पुराने लगते हैं। आप उनके संबंधी हुए?'

मैंने सिर ना में डुलाया और कहा - 'हाँ'

'नहीं!!!' - उसने लंबी साँस भरी और कहा - 'खोजना तो पड़ेगा।'

त्वरित उपलब्ध लोगों ने अपने अपने संचित कोश को उलीचा और उसमें से भूले बिसरे गीत की खोज प्रारंभ हुई। एक कटार जुबान वाली उमरदराज महिला ने 'हरसी मिसिर' नामक व्यक्ति के रूप में उनकी पहचान की, जो घर छोड़ कर भाग गए थे और कालांतर में साधू बन गए थे। पर तत्काल उस पहचान को दो गंभीर सज्जनों के द्वारा 'लबरी' विशेषण का चाबुक मार कर लहूलुहान कर दिया गया। पर वह इस हमले से रत्ती भर भी विचलित नहीं हुई और अगली तलाश में जुट गई। इस बार वह एक हकीम को निकाल लाई जो जिंदगी भर जड़ी बूटी के राज खोजता रहा पर अभी जिसके अंतिम दिनों की ठीक ठीक खोज कोई भी नहीं कर पा रहा था। लोग बहुत गंभीरता से उसकी इस बात को भी नहीं ले पा रहे थे। पर मानना होगा कि उसके पात्र थे संभावनापूर्ण और सबके सब अपने अंतिम दिनों में रहस्य का आवरण ओढ़ ले रहे थे।

मिलाजुला कर यह सामूहिक मनबहलाव का छोटा मोटा सम्मेलन बन गया, जिसकी गति जरा सी भी मद्धिम नहीं पड़ी होगी, मुझे विश्वास था, अभी भी, जबकि मैं चुपके से वहाँ से खिसक चुका था। मैं अब बहुत तेज कदम बढ़ा रहा था। मुझे ढूँढ़ लेना था किसी को और कैसे करना था यह सब... ये युक्ति मेरे दिमाग में आ चुकी थी। मुझे गाँव के सबसे बूढ़े आदमी तक पहुँचना था बस। उसके बाद सारा रास्ता अपने आप आसान हो जाने वाला था। बहुत रास्तों से एक ही जगह पर पहुँचने और एक ही रास्ते से हो कर बहुत सी जगहो पर पहुच चुकने के बाद मुझे गाँव का लगभग सबसे बूढ़ा व्यक्ति मिला। हालाँकि वह अपनी उमर के बारे में जरूरत से ज्यादा बढ़ा चढ़ा कर झूठ बोल रहा था पर फिर भी उसकी उम्र हो चुकी थी... यह साफ था। उस तक पहुँचा कैसे मैं जानते हैं आप! वही हल्के टाँगों वाली चिड़िया... जाने कहाँ से टप से फिर प्रकट हो गई (इस मर्तबा टिकोले कहीं छिपा कर आई थी) मेरे सामने! और खर खर खर खर दो टाँगों से सृष्टि को लाँघती ले जाकर खड़ा कर गई मुझे एक बूढ़े के सामने।

काम की बात। मैंने उस बूढ़े से जब की काम की बात तो वह खिलखिला कर हँसने लगा। एक 'गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी' कैसे खिलखिला कर हँसेगा इसकी क्या कल्पना! पर वह हँसा। कल्पना की सीमा में बँध कर ही। उसकी हँसी की स्वरलहरी मुझे कुछ याद दिला रही थी... ऐसा जैसे रंगमंच का परदा लड़खड़ा कर उठता हो... और उस पार कुछ स्त्रियाँ उसी तरंग में ऊपर नीचे उठती गिरती हँस रही हों... दिमाग में सब कुछ दबे पाँव खुलता है। उस पार हँसती स्त्रियाँ... सामने अपनी अद्भुत कारीगरी से अनजान एक इनसान, जिसे लोगों की हँसी का कारण बन चुकने पर भी खुद कभी हँसते नहीं पाया गया। लोग कहते थे यह भी उसकी अदा का ही हिस्सा था... खुद न हँसना कभी, अपनी बात पर। ...जो भी था... इस तरह की खिलखिली हँसी वही हँस सकता था जो पहले भी कभी हँस चुका हो... गाँव के सबसे माहिर फनकार के जादू पर। बहुत पहले ही क्यों न!

इन सबसे यह जरूर हुआ कि मेरे जेहन में कब से दुबकी एक बात सिरे से गलत साबित हो गई कि हिरखी मिसिर की दर्शक सिर्फ गाँव की औरतें ही थीं। दरअसल सच यह था कि मैंने उन्हें सिर्फ औरतों के बीच में मंच सँभालते देखा और यह मान लिया कि उनका फन लिंग विशेष की धरोहर था।

तो इस 'गाँव के सबसे बूढ़े आदमी' को किसी और प्रमाण की जरूरत नहीं थी। एक हँसी ही काफी थी यह जताने के लिए कि वह जानता था उसे, जिसे खोजता खोजता मैं इस गाँव तक आया था। फिलहाल वह व्यक्ति हँसी को इतनी बेदर्दी से अपने से दूर अलगा चुका था कि मेरे लिए अगले पल के झटके में यह मान लेना कि हँसने वाला यही था... दुष्कर। बहरहाल वर्तमान के सच में वह उदास था। क्या वजह! जो भी हो! मेरे लिए इस वक्त ये जानना जरूरी था कि जिसकी तलाश में मैं आया था... वह अभी था? बिना उसकी उदासी में समय गँवाए मैंने अपने सवाल को आगे ठेल दिया।

'कबका मर खप गया' - सवाल से ज्यादा हड़बड़ी में जवाब था। मैं बैठ चुका था अगर उसकी खाट पर पहले से, तो उठ कर खड़ा हो गया। उठ कर खड़ा ही जो था अगर, तो ढह कर बैठ गया। मेरे इस स्थिति परिवर्तन को मेरा पलट सवाल समझ कर जो उसने जवाब दिया उसका लब्बोलुआब यह कि एक साल बाढ़ में शौच के लिए गए हिरखी मिसिर लोटा धोती सहित बह गए... इस सफाई से कि किसी भी निशान का पता नहीं लगा। और निशान खोजने की लगी भी किसे थी। घर में बची रह गई एक नाबालिग विधवा बहू थी। अधेड़ उम्र की संतान की सफेद घरवाली।

मैंने उस पसीने से लथपथ स्थिति में भी याद किया अपने बचपन की उन सौगातों को, जिन्हें वे लाया करते थे और पीछे इस लेनदेन की गवाह बनी औरतें लंबी आहें भरती थीं उनकी संतानरहित तकदीर पर। मैं अगर ढह कर बैठ गया था खाट पर तो उठ कर खड़ा हो गया... अगर खड़ा था तो भी खड़ा ही रहा... क्योंकि मुझे पीछे मुड़ना था और पूरे दम से भागना था और भागते ही जाना था... अपनी तलाश के सवाल से और और... और उसी तलाश के जवाब से भी। नहीं मैं किसी सवाल या जवाब से नहीं बल्कि मैं भाग रहा था उस वक्त को लपक लेने के लिए जिसे मैंने सवाल गढ़ने या जवाब ढूँढ़ने में गँवाया। बहुत सारे काम बचे रह गए थे जवानी के दिनों के... जवानी के बाद के दिनों के... जवानी के बाद के बाद के दिनों के भी हिस्से के। पुरानी चलन के ताले के दोनों सिरे को अलगा कर कुंडी को मुक्त कर देना था। और एक पात्र को भी जो जमाने की धरोहर था और जिसे जमाने को ही सौंप देना था... क्योंकि दरअसल मैं जिसे तलाश रहा था वह किसी गपोरी स्त्री की दंतकथाओं... गाँव के सबसे बुर्जुग व्यक्ति की झुर्रियों की किसी स्मृति से ज्यादा तो खुद मेरे भीतर था! मेरी हर साँस के साथ अंदर जाता हुआ और उसकी हर अगली साँस के साथ बाहर नहीं आता हुआ सा! तो मुझे भागना था... भागते जाना था।


मैंने आँखें खोलीं तो मुझे लगा हो सकता है वह जा चुका हो (झूठ! ऐसा कुछ नहीं था... बस बात बनाने के लिए कह दिया)। मैंने आँखें खोलीं और उसे देखा, वह होगा... ऐसे अहसास के साथ। वह वाकई था। वह मेरे पास आ चुका था। मुझे पता तक लगने दिए बगैर। उसने जुबान खोली। उसके मुँह से एक अजीब सी भाषा निकली। तितर बितर। शब्द हिले हुए। एक दूसरे पर चढ़े हुए। नहीं ऐसे कहें कि भाव जो थे वे फैले थे हर कहीं और शब्दों का ब्रश ऐसी तेजी से फिसल रहा था उन पर कि हर कहीं केवल झाग ही झाग था। वो झाग बैठती तब भी उसकी सतह की फेनिल तलहटों के नीचे ठहरा हुआ सन्नाटा ही बचता। पर किस्मत उस वक्त मेरे साथ थी! उसने जो भी कहा वह मेरे सामने था। कोई था जो उस बिखरे बिखरे को मेरे सामने लाकर रख रहा था जोड़ जमा कर -

तुम्हें लगता है मैं जीवित हूँ... शायद नहीं। अगर मृत हूँ तो वह भी शक के घेरे में है। मेरी स्थिति के बारे में कुछ भी यकीन से नहीं कहा जा सकता है। लोग कहते हैं कि मैं कभी रातबिरात दिशा मैदान के लिए गया लोटा उठाए और बाढ़ के पानी ने मुझे उफना कर कहीं का कहीं पहुँचा दिया। इसके आगे कोई नहीं जानता। जानना ही नहीं चाहता। कुछ दहाड़ती बिलखती चीखों ने जरूर जानना चाहा था पर वे बार बार रोती हुई ऐसी घिस चुकी थीं कि उनका निस्तेज प्रयास कदम उठाते ही लड़खड़ा गया। और मुझे! शुरू में पानी के अबूझ रेले के बीच मुझे दुख हुआ... लोटे के बिछड़ जाने का दुख... फिर फिर कपड़ों का साथ छूटते जाने का दुख... फिर हार कर उनसे, जीवन की डोर फिसल जाने का दुख। इतने सारे दुखों के बीच एक आशा जो जागी वह जीवन भर के ताप से मुक्त हो पाने की चाह थी।

स्त्रियों के बीच में स्त्री और पुरुषों के बीच में भी स्त्री। मर्दाना मुझे जनाना समझते थे और जनाना भी जनाना। मेरे ठुमकों से मेरी मसखरी से मेरे ढोंग से सब होंठों की कोर में साड़ियाँ दबा दबा कर हँसती थीं सब तालियाँ पीट पीट कर हँसते थे। अपने चेहरे की रेखाओं को अपनी भंगिमाओं को अपने हाथ पाँव की एक एक हरकतों को साधने में मैंने अपना सब कुछ झोंक दिया... और इस हद तक साध चुका था कि लोगों को हँसाने के लिए कभी कभी मेरा उनसे मुखातिब होकर खड़े हो जाना मात्र काफी होता।

मैं अगर एक दो मिनट ले लेता सोचने में कि आज किसकी नकल से शुरुआत की जाए... तो इस हरकतविहीन सोचने के एक दो मिनट में ही लोग हँस हँस कर पागल हो जाते। और मैं लय पकड़ लेता। मैं दो घड़ी माथा खुजला कर उनकी ओर अचरज से देखता तो यही मनोरंजन की टेक बन जाती। और जैसे ही ' आ हो' की टेक पर कोई तान छेड़ी... किसी चरित्र पर आया कि बस। लोग अपनी अपनी डोर मेरी हथेली में सौंप देते। एक ही चरित्र एक ही गाथा मैं दोहराता भी था 3-4 दिनों के अंतराल पर, लेकिन लोग एक बार भी जाहिर नहीं करते कि चीज नई नहीं है। उन्होंने भी मेरे समानांतर शायद माँज लिया था अपने भीतर के कलाकार को याकि वे परखना चाहते थे कि वे जाहिर ना करें कि चीज पुरानी है तो भी मैं चौकन्ना हूँ कि नहीं कि उसे एक नया जीवन दे सकूँ...। पर चौकन्नापन मेरी रग बन चुका था। एक फनकार चौकन्ना न रहे तो टिकेगा कैसे! मेरा प्रतिद्वंद्वी कोई नहीं था... न आदमी कोई न आविष्कार कोई... फिर भी मैं चौकन्ना था। अपने आप को विरोधी मान कर सजग था। हर पल! कि हर दिन अपने कल को मात दूँ!

इस शह मात के खेल में मैं इतना रम गया कि जिंदगी खेल बन गई और खेल जिंदगी। अपनी हार जीत खुशी आँसू अभाव परिपूर्णता... सब पर खेल का आवरण चढ़ गया। लोग भी कदम भर पीछे नहीं रहे। जितनी तत्परता से मैं अपना निजी कोना खाली करता गया लोग उतनी तेजी से लपकते गए उन जगहों को। घर में खाना कम है, गर्मी अधिक है, ठंड अघिक है, संतान नहीं है, पत्नी दुखी है... पर श्रोता सुखी हैं कलाकार सुखी है...। पर कोई भी चीज जब आदत बन जाए तो महत्व में आई कमी चुभने लगती है।

सब कुछ पहले जैसा ही था बल्कि एक संतान भी हुई देरसवेर पर मन में गाँठ बैठने लगी कि मेरी कला का कोई नाम न था! एक मूर्ति बनाने वाले की कला मूर्तिकला, एक गाना गाने वाला गवैया, लोहार... सोनार... यहाँ तक कि दीवार जोड़ने वाला भी राजरेजा। पर मैं क्या था!! आँगन या ओसारे के कोने की चीज बने रहने में अपनी जिंदगी का सच्चा सुख झोंक दिया मैंने। और हासिल क्या हुआ! लोगों की जिंदगी में शामिल था जरूर, पर एक बासी लगी हुई आदत की तरह जिसे छह चार दिनों में भुलाया जा सके।

मैंने आँखें बंद कर ली थीं। रोज रोज खुद को थोड़ा मरते देखने के मुकाबिल सुकूनदायक था झटके में एक मुकम्मल मौत देखना। ...और उस दिन शायद मैं मर गया था। पानी के ऊपर तैरता शीतल पड़ चुका जीवन भर का ताप...

'और अगर मैं मानूँ कि जिंदा हैं तो?'

तो जब तक मैं जिंदा रहूँगा तब तक कोने की जगह बची रहेगी... या जब तक हाशिए की संभावना बची रहेगी... तब तक मैं रहूँगा... जिंदा।

मैंने हाथ बढ़ा कर उसे छूना चाहा... सिर्फ चाहा... हिम्मत नहीं पड़ी छू लेने की। हो सकता है कि वह जिंदा होता... हो सकता है कि वह जिंदा नहीं भी होता। अगर कि वह जिंदा नहीं होता तो मेरी अब तक की पूरी यात्रा बेमानी साबित हो जाती एक जरा सी छुअन से... अगर कि वह जिंदा होता... नहीं फिर भी मैं उसे नहीं छूना चाहती... अपने अस्तित्व को छूकर देखने की चाह उस पर शक करने जैसा ही हुआ न।

मैं तेज पलट कर भागी। बहुत तेज। स्कूल की घंटी बज चुकने पर सड़क पार कर अपने पिता के पास जितना तेज भागती थी... उससे भी तेज। मैं जानती थी जितना भी तेज भागूँगी वह मुझसे जरा सा ही पीछे होगा। फिर भी मैं भाग रही थी... भागी चली जा रही थी... क्योंकि उसे छूकर देख लेना... और अपनी ही यात्रा पर शुबहा करना मैं अर्फोड नहीं कर सकती थी!


आखिर में मैं..


कुछ चीजें शुरू से नहीं होतीं। वे कहीं से भी हो जाती हैं। मैं पानी की धार पर बहता हुआ कहाँ गया... फिर क्या हुआ मेरा... और अभी प्लेटफॉर्म की उसी बेंच पर कबसे बैठा था... कौन जाने... क्योंकि कुछ भी शुरू से नहीं हुआ... पर यह तय था कि मैं अभी अभी वहीं बैठा रह गया था किसी के बगल से उठ जाने के बाद भी। मैं सच में नहीं जानता था कि मैं जीवित हूँ या मृत! पर एक चीज स्पष्ट थी कि दो लोग भाग रहे थे। एक ढलती उम्र का व्यक्ति... मेरे पीछे। एक चढ़ती उम्र की लड़की मेरे आगे...। पर भाग दोनों रहे थे और मुझे उनके भागने में अपने भविष्य का रास्ता दिख रहा था क्योंकि उन दोनों में से किसी ने जीवन के ताप से निजात पाने के लिए... पानी की तेज धार के ऊपर अपने को तैरते जाने के लिए... श्लथ नहीं छोड़ दिया था बल्कि दोनों अपने झुलसते तलुवों की परवाह किए बगैर भी भाग रहे थे उसी कोने की जगह के पक्ष में... जो कभी मेरी हुआ करती थी! मैं तसल्ली कर सकता था इस बात का कि ये मुझे जीवित रखेंगे... क्योंकि हाशिए के लिए गुंजाइश अभी बाकी थी...


End Text   End Text    End Text