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लोककथा

काग-भगोड़ा
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


एक बिजूके से एक बार मैंने कहा, "इस निर्जन खेत में खड़े-खड़े तुम थक जाते होगे।"

वह बोला, "डराकर भगाने का मज़ा ही कुछ और है। वह बेजोड़ है। मैं इससे कभी नहीं थकता।"

एक पल सोचकर मैंने उससे कहा, "ठीक कहते हो। उस आनन्द को मैंने भी जाना है।"

उसने कहा, "भूसा-भरे लोग ही इस आनन्द को जान सकते हैं।"

यह सोचे बिना कि ऐसा कहकर उसने मेरी प्रशंसा की या भर्त्सना, मैं उसके पास से चला आया।

एक साल बीत गया। इस बीच वह दार्शनिक बन चुका था।

उसकी बगल से गुजरते हुए मैंने देखा - दो कौए उसके हैट के नीचे घोंसला बना रहे थे।


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