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लोककथा

लोमड़ी
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


सूर्योदय के समय अपनी परछाई देखकर लोमड़ी ने कहा, "आज लंच में मैं ऊँट को खाऊँगी।"

सुबह का सारा समय उसने ऊँट की तलाश में गुजार दिया।

फिर दोपहर को अपनी परछाई देखकर उसने कहा, "एक चूहा ही काफी होगा।"


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हिंदी समय में खलील जिब्रान की रचनाएँ