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लोककथा

चतुर शासक
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


विरानी नाम के एक सुदूर नगर पर किसी समय एक राजा शासन करता था। वह शक्तिशाली भी था और चतुर भी। लेकिन उसे अपनी सामर्थ्य पर कम, बुद्धि पर भरोसा अधिक था।

उस नगर के बीचोबीच एक कुआँ था। उसका पानी एकदम साफ और ठण्डा था। नगर में क्योंकि दूसरा कोई अन्य कुआँ नहीं था, इसलिए सभी नगरवासी यहाँ तक कि राजा और उसके दरबारी भी, उस कुएँ का ही पानी पीते थे।

एक रात, जब सभी सोए हुए थे, एक चुड़ैल नगर में आ घुसी। उसने किसी अनजाने द्रव की सात बूँदें कुएँ के पानी में टपका दीं और बोली, "इसी पल से, जो भी इस कुएँ का पानी पियेगा, पागल हो जाएगा।"

अगली सुबह, राजा और उसके प्रधानमंत्री को छोड़कर सभी नगरवासियों ने कुएँ का पानी पिया और चुड़ैल की भविष्यवाणी के अनुसार पागल हो गए।

उसके बाद छोटी-छोटी गलियों से लेकर बड़े-बड़े बाजारों तक, सभी जगह, पूरे दिन लोग एक-दूसरे से यों बतियाते रहे, "राजा पागल है। हमारे राजा और उसके प्रधानमन्त्री का दिमाग घूम गया है। ऐसे आदमी को हम पर शासन करने का कोई अधिकार नहीं है। हम इसे गद्दी से उतार देंगे।"

उसी शाम राजा ने सोने का एक घड़ा उस कुएँ के पानी से भर लाने का आदेश दिया। जैसे ही वह लाया गया, राजा ने पेटभर उसे पिया और अपने प्रधानमन्त्री को भी पीने को दिया।

ऐसा करते ही पूरे विरानी नगर में खुशी की लहर दौड़ गई।

राजा और प्रधानमन्त्री ने राजगद्दी पर अपने बने रहने के कारण को पुन: पा लिया था।


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