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लोककथा

इस दुनिया में
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


पैदा होने के तीन दिन बाद की बात है।

मैं सिल्की परदों वाले अपने हिंडोले में लेटा हुआ चकित और हताश-सा अपने चारों ओर की बाहरी दुनिया को झाँक रहा था। तभी माँ ने आया से पूछा, "मेरा बच्चा कैसा है?"

आया ने कहा, "वह बहुत अच्छा है मै'म। मैं उसे तीन बार दूध पिला चुकी हूँ। इतना गोल-मटोल और हँसता-खेलता बच्चा मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा।"

मुझे गुस्सा आ गया। चीखकर बोला, "यह सच नहीं है, माँ। मेरा बिस्तर बहुत बेआराम है। जो दूध मैं चूसता हूँ, मेरे मुँह में वो कड़ुवाहट घोल देता है। इसकी छातियों की दुर्गन्ध मेरे नथुनों में बदबू भर देती है। मैं बड़ा बदनसीब हूँ।"

लेकिन न तो मेरी माँ और न नर्स ही मेरी बात को समझ सकी क्योंकि भाषा, जो मैंने बोली थी, वहाँ की थी जहाँ से मैं आया था।

पैदा होने के इक्कीसवें दिन, जब मुझे ईसाई संस्कारित किया जा रहा था, पादरी ने माँ से कहा, "आपको नि:संदेह खुश होना चाहिए मैडम, कि आपका बेटा ईसाई परिवार में पैदा हुआ है।"

मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। मैं पादरी से बोला, "तब तो तुम्हारी स्वर्गवासी माँ बड़ी दु:खी होगी क्योंकि तुम पैदाइशी ईसाई नहीं हो।"

लेकिन पादरी भी मेरी भाषा को न समझ सका।

सात माह बाद, एक ज्योतिषी ने मेरी माँ से कहा, "आपका बेटा एक राजनीतिज्ञ और महान जननेता बनेगा।"

मैं चिल्ला उठा, "यह झूठा और पेशेवर है। मैं एक संगीतकार बनूँगा; उसके अलावा कुछ भी नहीं, सिर्फ संगीतकार।"

लेकिन उस उम्र में भी मेरी भाषा समझी नहीं जा सकी - मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।

और तेंतीस वर्षों के बाद, जब मेरी माँ, आया और पादरी मर चुके हैं, (ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे) ज्योतिषी अभी भी ज़िन्दा है। कल, मैं मन्दिर के गेट के पास उससे मिला। जब हम दोनों बातें कर रहे थे, उसने कहा, "मुझे पता था कि तुम बहुत बड़े संगीतकार बनोगे। जब तुम गोद में थे, मैंने तभी इस बात की भविष्यवाणी कर दी थी।"

मैंने उसकी बात मान ली - क्योंकि अब मैं भी उस दूसरी दुनिया की भाषा भूल चुका हूँ।


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