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लोककथा

दाने अनार के
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


एक बार जब मैं अनार के दिल में रहता था, मैंने एक बीज को कहते सुना, "एक दिन मैं पेड़ बन जाऊँगा। मेरी शाखों से हवा के गीत निकलेंगे। धूप मेरी पत्तियों पर नाचेगी। मैं सालों-साल मजबूत और खूबसूरत बना रहूँगा।"

फिर दूसरा बीज बोला, "जब मैं तुम्हारे जितना जवान था, मैं भी तुम्हारी तरह ही सोचता था। आज जब मैं चीजों को नाप-तोल सकता हूँ, देखता हूँ कि मेरी कल्पनाएँ बेकार थीं।"

तीसरा बीज बोला, "मुझे हम-सब में ऐसी कोई चीज नजर नहीं आती जो हमें भविष्य में महान बना सके।"

चौथे ने कहा, "बेहतर भविष्य के बिना हमारी जिन्दगी एक मखौल बन जाएगी।"

पाँचवें ने कहा, "जब तक हमें यह न पता हो कि हम क्या हैं, तब तक इस बात पर झगड़ना कि हम क्या बनेंगे - बेकार है।"

लेकिन छठे ने उत्तर दिया, "हम जो भी हों, भविष्य के बारे में सोचना जारी रखना चाहिए।"

और सातवें बीज ने कहा, "चीज़ें कैसी होंगी - इस बारे में मैं एकदम स्पष्ट हूँ, लेकिन अपनी बात को शब्दों में व्यक्त कैसे किया जाए मैं यह नहीं जानता।"

फिर आठवाँ, नवाँ, दसवाँ… और अन्य भी बहुत-से बीज, यहाँ तक कि सब-के-सब बोले। शोरोगुल के बीच उनका एक शब्द भी मेरी समझ में नहीं आया।

और उसी दिन मैं एक शरीफे में जा बैठा जहाँ बीज कम और करीब-करीब शान्त थे।


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