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लोककथा

सूली चढ़ने पर
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


मैं लोगों पर चिल्लाया, "मुझे सूली पर चढ़ाया जाना चाहिए।"

उन्होंने कहा, "तुम्हारे खून से हम अपने हाथ क्यों रँगें?"

मैंने कहा, "किसी पागल आदमी को इज्ज़त बख्शने के लिए तुम्हारे पास उसे सूली पर चढ़ा देने के अलावा दूसरा तरीका ही क्या है?"

उनकी समझ में आ गया और मुझे सूली पर चढ़ा दिया गया। मुझे बड़ी शान्ति मिली।

और जब मुझे धरती और आकाश के बीच लटका दिया गया, मेरे दर्शन के लिए उन्होंने अपने सिर आकाश की ओर उठा दिए। उन्होंने स्वयं को सम्मानित समझा क्योंकि इससे पहले उनके सिर कभी भी ऊपर नहीं उठे थे।

लेकिन जब वे मेरी ओर देखते हुए खड़े थे, उनमें से एक चिल्लाया, "तुम अपने किस पाप का प्रायश्चित करना चाहते हो?"

दूसरा चिल्लाया, "तुमने किसलिए अपनी बलि देने का निश्चय किया?"

तीसरे ने कहा, "लगता है - दुनियाभर का यश जीतने को तुमने यह कीमत चुकाई है?"

इस पर चौथा बोला, "देखो, वह कैसा मुस्करा रहा है! सूली पर चढ़ने की पीड़ा को इतनी जल्दी कोई कैसे भूल सकता है?"

उन सबको उत्तर देते हुए मैंने कहा :

"सिर्फ यही याद रखो दोस्तो, कि मैं मुस्कराया। न मैंने अपने किसी पाप का प्रायश्चित किया है न अपनी बलि ही दी है और न ही मेरी यश कमाने की इच्छा है। मेरे पास भुला देने लायक भी कुछ नहीं है। मैं प्यासा था और खुद को अपना खून पिलाने के लिए मैंने आपको चुना। क्योंकि किसी पागल की प्यास बुझाने के लिए उसके अपने लहू से बेहतर दूसरी कोई चीज़ नहीं। मैं गूँगा था और खुद को आवाज दिलाने के लिए मैंने तुम्हें चुना। मैं तुम्हारे दिनों और रातों में कैद था। मैंने कहीं… ऽ लम्बे दिनों और कहीं… ऽ लम्बी रातों के दरवाजे अपने लिए खोल लिए हैं।

और अब मैं जाता हूँ क्योंकि सूली पर चढ़ाए गए बाकी-सब जा चुके हैं। हमें सूली पर चढ़ाए जाने से म्लान नहीं होना है क्योंकि इससे कहीं-बड़ी भीड़ द्वारा हमें इससे भी बड़ी धरती और इससे भी बड़े आकाश के बीच सूली पर लटकाया जाना है।"


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