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लोककथा

आस्तिक और नास्तिक
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


प्राचीन नगर अफ़कार में दो विद्वान रहते थे। वे एक-दूसरे को नफरत करते थे और लगातार एक-दूसरे के ज्ञान को नीचा ठहराने की कोशिश में लगे रहते थे। उनमें से एक देवताओं के अस्तित्व को नकारता था, जबकि दूसरा उनमें विश्वास करता था।

एक बार वे दोनों बाजार में मिल गए। अपने-अपने चेलों की मौजूदगी में वे वहीं पर देवताओं के होने और न होने पर तर्क-वितर्क करते भिड़ गए। घंटों बहस के बाद वे अलग हुए।

उस शाम नास्तिक मन्दिर में गया। उसने अपने आपको पूजा की वेदी के आगे दण्डवत डाल दिया और देवताओं से अपनी पिछली सभी भूलों के लिए क्षमा माँगी।

और उसी दौरान, दूसरा विद्वान जो आस्तिक था, उसने अपने सारे धर्मग्रंथ जला डाले। वह नास्तिक बन चुका था।


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