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लोककथा

पोशाक
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


सुन्दरता और भद्दापन एक दिन सागर किनारे मिल गए। आपस में बोले - "चलो, नहाते हैं।"

उन्होंने कपड़े उतारे और पानी में उतर गए।

कुछ देर बाद भद्दापन किनारे पर आया। उसने सुन्दरता के कपड़े पहने और चला गया।

सुन्दरता भी सागर से बाहर आई। उसे अपने कपड़े नहीं मिले। अपने नंगेपन पर उसे शर्म आने लगी। इसलिए उसने भद्दापन के कपड़े उठाए और पहनकर अपने रास्ते चली गई।

उसी दिन से लोग दूसरे-जैसा दिखने की गलती करते हैं।

अब, कुछ लोग हैं जिन्होंने सुन्दरता की नकल कर ली है। वे उसकी वास्तविकता को, उसकी पोशाक के झूठ को नहीं जानते। कुछ ऐसे भी हैं जो भद्देपन को पहचानते हैं। सुन्दर पोशाक उसको पहचानने से नहीं रोक सकती।


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