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लोककथा

सुर्ख धरती
खलील जिब्रान


एक पेड़ ने आदमी से कहा, "मेरी जड़ें सुर्ख धरती में गहरी गड़ी हैं। मैं तुम्हें अपने फल दूँगा।"

और आदमी ने पेड़ से कहा, "हम दोनों में कितनी समानता है। मेरी जड़ें भी सुर्ख धरती में गहरी गड़ी हैं। तुम्हें यह मुझ पर अपने फल लुटाने की ताकत देती है और मुझे यह सिखाती है कि मैं तुम्हें धन्यवाद देकर उन्हें लूँ।"


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हिंदी समय में खलील जिब्रान की रचनाएँ