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लोककथा

ईश्वर और जीव
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


पहाड़ियों के बीच एक औरत अपने बेटे के साथ रहती थी। वह उसकी पहली और आखिरी सन्तान था।

उस बेटे की बुखार के दौरान एक दिन उस वक्त मौत हो गई, जब डॉक्टर उसके सिरहाने खड़ा था।

माँ का हृदय पीड़ा से फट पड़ा। वह डॉक्टर पर गरज उठी, "बताओ, बताओ मुझे… कैसे उसका उछलना-कूदना और बोलना-गाना बन्द हो गया है?"

डॉक्टर ने कहा, "उसे बुखार था।"

माँ ने कहा, "कैसा बुखार?"

डॉक्टर बोला, "कैसे समझाऊँ? यह एक बहुत-ही महीन वायरस है जो बदन में घुस जाता है। हम अपनी नंगी आँखों से उसे नहीं देख सकते।"

यह कहकर डॉक्टर चला गया। वह अपने-आप से बार-बार यह कहती रोती रही, "बहुत महीन… बहुत छोटा वायरस। उसे हम अपनी नंगी आँखों से नहीं देख सकते!"

शाम को सांत्वना देने पादरी उसके घर आया। वह यह कहती हुई रोती-चिल्लाती रहीं, "हाय, क्यों मेरा लाल छिन गया… मेरा इकलौता बेटा… मेरी पहली सन्तान?"

पादरी ने कहा, "मेरी बच्ची! ईश्वर की ऐसी ही इच्छा थी।"

"क्या है और कहाँ है ईश्वर? उसके पास ले चलो मुझे। मैं अपनी छाती फाड़कर उसे दिखाऊँगी। अपने जिगर के खून से मैं उसके कदमों को धोऊँगी। बताओ मुझे वो कहाँ है?" औरत बोली।

पादरी ने कहा, "ईश्वर अनन्त व्यापक है। इन आँखों से उसे नहीं देखा जा सकता।"

औरत चीत्कार कर उठी, "उस अनन्त की इच्छा से बहुत-ही महीन वायरस ने मेरे बेटे को मार डाला। फिर, हम क्या है?… हम क्या है?"

उसी क्षण उस औरत की माँ मृत बच्चे का कफन लेकर कमरे में दाखिल हुई। उसने पादरी के शब्द और अपनी बेटी का विलाप - दोनों सुने। उसने कफन को जमीन पर बिछाया दिया। बेटी का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, "मेरी बच्ची! स्वयं हम सब बहुत ही महीन और अनन्त व्यापक हैं। और इन दोनों के बीच का मार्ग भी हम खुद ही हैं।"


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