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लोककथा

छोटा तिनका बड़ा तिनका
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


जून माह के एक दिन एक तिनके ने घने पेड़ की छाया से कहा, "तुम अक्सर ही कभी दाएँ और कभी बाएँ घूमती रहकर मेरी शान्ति भंग करती रहती हो।"

छाया ने जवाब दिया, "नहीं, मैं नहीं। ऊपर की ओर देखो। सूरज और जमीन के बीच खड़ा वह पेड़ हवा के झोकों से पूरब की ओर और पश्चिम की ओर घूमता रहता है।"

तिनके ने ऊपर देखा। पहली बार उसका ध्यान पेड़ पर गया। वह अपने मन में बोला, "अरे बाप रे! इतना बड़ा तिनका!!"

इससे अधिक वह कुछ न बोल सका।


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