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लोककथा

जीवनपथ
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


कदीशा घाटी में, जहाँ गदराई नदी बहती है, दो छोटी धाराएँ मिलीं और बतियाने लगीं।

पहली धारा ने कहा, "कैसे आईं तुम सखी, और तुम्हारा रास्ता कैसा रहा?"

दूसरी ने जवाब दिया, "मेरा रास्ता बहुत तकलीफदेह था। पनचक्की का चक्का टूट गया था और मुखिया किसान, जो पौधों की सिंचाई के लिए मेरा सहारा लेता था, मर गया। उस कूड़े-करकट से चू कर किसी तरह नीचे आई हूँ। तुम्हारा रास्ता कैसा रहा, मेरी बहिन?"

पहली ने कहा, "मेरा रास्ता अलग तरह का रहा। मैं महकते फूलों और शरमीले पौधों के बीच से होती हुई पहाड़ से उतरी। औरतों और मर्दों ने चाँदी के गिलासों में लेकर मेरा पानी पिया। किनारे बैठकर छोटे बच्चों ने अपने गुलाबी पाँव मेरे जल में हिलाए। मेरे चारों ओर हमेशा चहल-पहल रही, खुशनुमा गीतों का माहौल रहा। कितने दु:ख की बात है कि तुम्हारा रास्ता इतना खराब रहा।"

उसी समय नदी ने ऊँची आवाज में कहा, "आ जाओ, आ जाओ! हम सागर में मिलने जा रहे हैं। ज्यादा बातें न बनाओ, आओ। अब मेरे साथ रहो। मुझमें समाकर तुम अपने रास्ते के सारे दु:ख-दर्द भूल जाओगे, आओ। तुम्हें और मुझे अपने जीवनपथ की समस्त बातों को भूलकर अपने जन्मदाता सागर के हृदय में समा जाना है।"


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