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लोककथा

वसंत
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


हजार साल पहले मेरे पड़ोसी ने मुझसे कहा - "मुझे ज़िन्दगी से नफरत है क्योंकि पीड़ा के अलावा इसमें कुछ नहीं है।"

और कल, मैं जब कब्रिस्तान की ओर से गुजर रहा था, मैंने देखा - जिन्दगी उसकी कब्र पर लहलहा रही थी।


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हिंदी समय में खलील जिब्रान की रचनाएँ