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लोककथा

बुद्धि के विक्रेता
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


कल मैंने दार्शनिकों को बाज़ार में देखा। अपने सिरों को टोकरी में रखकर वे चिल्ला रहे थे - "बुद्धि… ऽ… ! बुद्धि ले लो… ऽ… !"

बेचारे दार्शनिक! अपने दिलों को खुराक देने के लिए उन्हें सिर बेचने पड़ रहे हैं।


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हिंदी समय में खलील जिब्रान की रचनाएँ