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लोककथा

अह ब्रह्मास्मि
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


अपनी जाग्रत अवस्था में उन्होंने मुझसे कहा - "वह दुनिया जिसमें तुम रहते हो अन्तहीन किनारे वाला असीम सागर है और तुम उस पर पड़े एक कण मात्र हो।"

और अपने सपने में मैंने उनसे कहा - "मैं असीम सागर हूँ और पूरी सृष्टि मेरे किनारे पर पड़ा एक कण मात्र है।"


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हिंदी समय में खलील जिब्रान की रचनाएँ