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लोककथा

अहं-विखण्डन
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


बाइब्लस का राजा नफ्सीबाल राज्याभिषेक के बाद अपने शयनकक्ष में जा पहुँचा। उस कक्ष को तीन सिद्ध पहाड़ी तांत्रिकों ने खास उसके लिए बनाया था। उसने अपना ताज और शाही पोशाक उतार दी। कमरे के बीचो-बीच खड़ा हो वह अपने यानी बाइबलस के सर्वाधिक ताकतवर इन्सान के बारे में सोचने लगा।

अचानक वह पलटा। अपनी माँ द्वारा दिए चाँदी के दर्पण से उसने एक नंगे आदमी को बाहर आते देखा।

राजा चकित रह गया। वह उस व्यक्ति पर चिल्लाया, "कौन हो तुम?"

नंगा आदमी बोला, "सवाल मत करो। यह बताओ कि उन्होंने तुम्हे राजा क्यों चुना?"

"इसलिए कि देश में मैं ही आदर्श पुरुष हूँ।" राजा ने कहा।

नंगा आदमी इस पर बोला, "अगर तुम आदर्श पुरुष होते तो राजा न बनते।"

राजा ने कहा, "मुझे राजा बनाया गया क्योंकि मैं देश का सबसे ताकतवर इन्सान हूँ।"

नंगे आदमी ने कहा, "अगर तुम इतने ताकतवर होते तो राजा न बनते।"

राजा बोला, "मैं सबसे अधिक बुद्धिमान हूँ, इसलिए उन्होंने मुझे राजा चुना।"

नंगे ने कहा, "अगर तुम बुद्धिमान होते तो राजा बनने को बिल्कुल तैयार न होते।"

इस पर राजा फर्श पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रो पड़ा।

नंगे आदमी ने उसे देखा। फिर उसने ताज को उठाया और आराम से राजा के झुके सिर पर रख दिया।

ऐसा करके नंगा आदमी प्यारभरी दृष्टि से राजा को निहारता हुआ दर्पण में चला गया।

राजा चौंक उठा। वह अपलक दर्पण में निहारता रहा। उसमें कोई और नहीं, अकेला वही ताज पहने खड़ा था।


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