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लोककथा

आलोचक
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


एक शाम, समुद्र की ओर जाता, घोड़े पर सवार एक आदमी सड़क किनारे की एक सराय में पहुँचा। वह उतरा। सागर की ओर जाने वाले दूसरे सवारों की तरह वह आत्मविश्वास से भरा था। घोड़े को उसने दरवाजे पर बाँधा और सराय के अन्दर दाखिल हो गया।

आधी रात को, जब सब सो रहे थे, एक चोर उसका घोड़ा चुरा ले गया।

सुबह आदमी जागा। पता चला कि उसका घोड़ा चोरी हो गया है। घोड़े को याद कर वह दु:खी हो गया। उसे अफसोस हुआ कि एक मनुष्य के मन में घोड़े को चुराने का विचार पनपा।

सराय में रुके अन्य यात्री वहाँ इकट्ठे हो गये और बतियाने लगे :

"बेवकूफी तो तुमने की कि घोड़े को अस्तबल से बाहर बाँध दिया।" पहले ने कहा।

"उससे भी बड़ी बेवकूफी यह कि घोड़े की टाँगें खुली छोड़ दीं।" दूसरा बोला।

"असलियत में तो समुद्र की यात्रा के लिए घोड़े पर निकलना ही बेवकूफी है।" तीसरे ने कहा।

"केवल आलसी और गिन-गिन कर कदम रखने वाले ही घोड़े पर चलते हैं।" चौथा बोला।

यात्री इन बातों को सुन-सुनकर उबल पड़ा। वह चिल्लाया, "दोस्तो, क्योंकि मेरा घोड़ा चोरी चला गया है इसलिए आपको मेरी गलतियों और कमियों को गिनाने की जल्दी है। लेकिन आश्चर्य है कि आप में से किसी ने भी घोड़ा चुराकर ले जाने वाले की आलोचना में कोई शब्द नहीं कहा!"


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