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लोककथा

साम्राज्य
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


ईशान की महारानी प्रसव की स्थिति में थी। खबर के इंतजार में महाराज और उनके दरबार के उच्च अधिकारी विंग्ड बुल्स के बाहर साँस रोके खड़े थे।

शाम के समय अचानक एक संदेशवाहक हाँफता हुआ आया और साष्टांग प्रणाम करके बोला, "मैं अपने महाराज के लिए, इस राज्य के लिए, महाराज के गुलामों के लिए अनमोल खुशखबरी लाया हूँ। महाराज के जन्मजात दुश्मन, हरामजादे मिहराब की मौत हो गई है।"

राजा और उसके सभी अधिकारियों ने इस संदेश को सुना। वे उठे और खुशी से चिल्ला पड़े। अगर मिहराब और-अधिक जीवित रहता तो अवश्य ही इशान को जीत लेता और उन सबको बन्दी बना लेता।

उसी समय राज्य की मुख्य-चिकित्साधिकारी विंग्ड बुल्स में दाखिल हुई। उसके पीछे राजकीय नर्सें भी थीं। अभिवादनस्वरूप महाराज के सामने झुककर चिकित्साधिकारी बोली, "मेरे स्वामी महाराज सदा जीते रहें। वे ईशान की अनगिनत पीढ़ियों पर राज करें। हे महाराज, आपको इस समय पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई है जो आपका उत्तराधिकारी बनेगा।"

राजा का हृदय आनन्द से भर उठा। यह ऐसा अभूतपूर्व क्षण था जब राज्य का जानी दुश्मन दुनिया से उठ गया था और उत्तराधिकारी दुनिया में आ गया था।

ईशान शहर में एक सच्चा संन्यासी रहता था। वह जवान था और वचन का पक्का था। उस रात राजा ने आदेश दिया कि संन्यासी को उसके सामने पेश किया जाय। और जब उसे लाकर राजा के सामने पेश किया गया तब राजा ने उससे कहा, "ध्यान लगाओ और बताओ कि आज पैदा होने वाले मेरे बेटे का भविष्य क्या है?"

संन्यासी जरा भी नहीं हिचका और बोला, "सुन राजा, मैं अवश्य ही ध्यान लगाकर तेरे आज उत्पन्न हुए बेटे का भविष्य बता दूँगा। तेरा दुश्मन मिहराब, जो कल शाम मरा था, उसकी आत्मा किसी शरीर की तलाश में हवा में तैरती रही। और जिस शरीर में वह प्रविष्ट हुई है वह तेरे बेटे का है जिसने आज जन्म लिया है।"

राजा उठा और अपनी तलवार से उसने संन्यासी का सिर उड़ा दिया।

उस दिन से आज तक ईशान शहर के बुजुर्ग चुपचाप एक-दूसरे से कहते हैं - "तुम्हे नहीं मालूम! अरे, पुराने समय से ही क्या यह नहीं कहा जाता रहा है कि ईशान पर दुश्मन का कब्जा है!!"


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