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लोककथा

अलमस्त
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


रेगिस्तान से एक गरीब आदमी एक बार शेरिया नगर में आया। वह स्वप्नद्रष्टा था। उसके तन पर पूरे कपड़े नहीं थे और हाथ में सिर्फ एक लाठी थामे था।

शेरिया नगर असीम सुन्दर था। वह जिस गली से भी गुजरता - मन्दिरों, मीनारों और महलों को आँखें फाड़कर देखता रह जाता। बगल से गुजरने वालों से वह अक्सर कुछ बोलता, शहर के बारे में उनसे सवाल करता - लेकिन वे उसकी भाषा नहीं समझते थे और न वह ही उनकी भाषा समझता था।

दोपहर के समय वह पीले संगमरमर की बनी एक विशाल सराय के सामने जा खड़ा हुआ। लोग बेरोक-टोक उसमें जा-आ रहे थे।

"यह कोई तीर्थस्थल होना चाहिए।" उसने सोचा और अन्दर दाखिल हो गया। जब वह हॉल में पहुँचा तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। उसने बहुत-से स्त्री-पुरुषों को एक मेज के चारों ओर बैठे देखा। वे खा-पी रहे थे और संगीत सुन रहे थे।

"नहीं," गरीब आदमी ने मन में कहा, "यह कोई पूजास्थल नहीं है। यह तो खुशी के मौके पर राजा की ओर से जनता को दिया जाने वाला भोज है।"

उसी समय एक आदमी, जिसे उसने राजा का गुलाम समझा था, उसके पास आया। उसने उससे बैठ जाने का अनुरोध किया। बैठ जाने पर माँस, शराब और कीमती मिठाइयाँ उसके सामने रख दी गईं।

खा-पीकर वह गरीब जाने के लिए उठ खड़ा हुआ। दरवाजे पर उसे शानदार तरीके से सजे-धजे एक कद्दावर आदमी द्वारा रोक लिया गया।

"निश्चय ही यह राजकुमार है।" उसने अपने-आप से कहा। इसलिए उसने झुककर उसका अभिवादन किया और मेहमाननवाजी का शुक्रिया अदा किया।

तब कद्दावर आदमी ने अपने शहर की भाषा में उससे कहा, "सर, आपने अपने खाने का भुगतान नहीं किया।"

गरीब आदमी की समझ में कुछ न आ सका और उसने पुन: उसे धन्यवाद दिया। तब कद्दावर कुछ सोचने लगा। उसने ध्यान से उसको देखा और पाया कि यह तो अजनबी है! उसके कपड़े गंदे हैं और निश्चय ही उसके पास खाने का भुगतान करने को कुछ नहीं होगा। उसने ताली बजाकर किसी को पुकारा। शहर के चार पहरेदार वहाँ चले आए। उन्होंने कद्दावर की बात सुनी। फिर दो आदमियों ने आगे और दो ने पीछे खड़े होकर गरीब को घेर लिया। उनकी बेहतरीन पोशाक और शिष्टाचार के मद्देनजर गरीब ने उन्हें सभ्य समझा और मुस्कराकर उनकी ओर देखा।

"ये," वह खुद से बोला, "महाराज के आदमी हैं।"

न्यायालय में पहुँचने तक वे सब साथ-साथ चलते रहे।

वहाँ गरीब ने लहराती दाढ़ी वाले एक सौम्य पुरुष को सिंहासन पर बैठे देखा। उसने सोचा कि यह महाराज हैं। खुद को उनके सामने पेश किये जाने पर वह आत्माभिमान और आनन्द से भर उठा।

फिर, न्यायाधीश, जो कि वह सौम्य पुरुष था, से सम्बन्धित दरबान ने गरीब पर आरोप सुनाया। न्यायाधीश ने दो अधिवक्ता नियुक्त किए - एक आरोप पुष्ट करने के लिए और दूसरा अजनबी के बचाव के लिए। अधिवक्ता उठे। एक के बाद एक, दोनों ने तर्क-वितर्क किया। गरीब इस सबको अपने आगमन के स्वागत की कार्यवाही समझता रहा। उसका हृदय महाराज और राजकुमार, जिन्होंने उसके लिए इतना सब किया, के प्रति आभार से भर उठा।

फिर उस गरीब के खिलाफ निर्णय सुना दिया गया। यह कि एक तख्ती पर उसका अपराध लिखकर उसके गले में लटका दी जाय। उसे एक घोड़े की नंगी पीठ पर बैठाकर पूरे शहर में घुमाया जाय। एक तुरही वाला और एक ढोल वाला उसके आगे-आगे चलें।

निर्णय का पालन किया गया।

गरीब को घोड़े की नंगी पीठ पर बैठाया गया। तुरही वाला और ढोल वाला उसके आगे-आगे चले। उनकी आवाज सुनकर शहर के लोग उनकी ओर भागे। वे उसे देखते और हँसते। बच्चे तो झुंड-के-झुंड इस गली से उस गली तक उसके पीछे-पीछे घूमते रहे। गरीब का हृदय आनन्दातिरेक से भर उठा। उसकी आँखों में उनके लिए चमक उमड़ आई। वह समझता रहा कि स्लेट पर लिखी इबारत महाराज द्वारा लिखी गयी प्रशस्ति है तथा यह जलसा उसके सम्मान में चल रहा है।

चलते-चलते उसे एक आदमी दिखाई दिया जो उसी के समान रेगिस्तान का निवासी था। उसका हृदय खुशी से भर उठा। वह जोर से चीखकर उसे पुकार उठा :

"दोस्त! दोस्त!! हम कहाँ हैं? हमारी तमन्नाओं का यह कैसा शहर है? मेजबानी का कितना सुन्दर तरीका है कि यहाँ के लोग मेहमानों को अपने घरों में खाने पर बुलाते हैं। स्वयं राजकुमार स्वागत करता है। राजा प्रशस्ति गले में लटकाता है; और सारे शहर में उसे ऐसे घुमाया जाता है जैसे वह स्वर्ग से उतरकर आया हो।"

रेगिस्तान के दूसरे निवासी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने केवल मुस्कराकर अपना सिर हिला दिया।

तुरही वाला, ढोल वाला और नाचते-गाते बच्चे आगे बढ़ते गए।

गरीब स्वप्नद्रष्टा की गरदन तनी हुई थी। उसकी आँखों की चमक देखने लायक थी।


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