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लोककथा

महल और झोंपड़ी
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


पहला भाग

जैसे ही अंधेरा घिरा और महल में बत्तियाँ झिलमिलाईं, नौकर उठ खड़े हुए और आने वाले मेहमानों के इंतजार में मुख्य दरवाज़े की ओर ताकने लगे। उनकी मखमली पोशाकों पर सोने के बटन चमक रहे थे।

खूबसूरत पालकियों को महल के पार्क में लाया गया। राजपुरुष उनमें से उतरे। उन्होंने बेशकीमती रत्नजड़ित पोशाकें पहन रखी थीं। वाद्यों ने रोमांसभरी तान वातावरण में बिखेर दी। सभी भद्रजन संगीत की धुन पर थिरकने लगे।

आधी रात के वक्त, दुर्लभ फूलों से सजी सुन्दर मेजों पर अत्यंत स्वादिष्ट और सुगंधित भोज्य परोसे गए। आगन्तुकों ने बेरोक पी जब तक कि शराब ने अपना असर दिखाना शुरू न कर दिया; और भरपेट खाया। भरी-पूरी लंबी रात खाना-पीना दबादब पेट में ठूँसने के बाद उन सबके बदन भारी हो चले थे। अलस्सुबह, वह भीड़ चीखती-चिल्लाती विदा हुई। अपने-अपने घर पहुँचकर वे सब-के-सब बेहोशी के आगोश में चले गये।

दूसरा भाग

दूसरी ओर, बोझिल श्रम से थका एक आदमी अपने छोटे-से घर के बाहर जा खड़ा हुआ। उसने दरवाजे पर दस्तक दी। जैसे ही दरवाज़ा खुला, वह उसमें घुस गया और चहकता हुआ घरवालों से जा लिपटा। फिर वह अपने बच्चों के बीच बैठा जो आग के चारों ओर बैठे थे। इसी बीच उसकी पत्नी ने खाना बनाया और लकड़ी की मेज पर सजा दिया। सबने साथ बैठकर खाना खाया। खाना खा चुकने के बाद वे लालटेन को घेरकर बैठ गए और दिनभर की घटनाओं पर बतियाने लगे। रात जब एक पहर बीत गई, सब चुपचाप खड़े हुए और रात्रि-देवता की स्तुति की। सुखी जीवन के लिए उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया।


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