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लोककथा

विधवा की लोरी
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


उत्तरी लेबनान पर रात्रि का अंधकार उतर आया था। कदीशा घाटी से घिरे गाँव बर्फ से ढँकने लगे थे। दूर-दूर तक फैला समतल मैदान भोजपत्र-सा नजर आने लगा जिस पर कुदरत अपने कर्म लिख रही थी। गलियों-बाजारों से चलकर लोग अपने-अपने घरों में जा घुसे थे। सब ओर सन्नाटा पसर गया था।

उन गाँवों के निकट एक अकेली झोपड़ी में एक औरत अँगीठी के सहारे बैठी ऊन कात रही थी। उसकी एक ओर उसका इकलौता बेटा बैठा था। वह कभी जलती हुई आग को देखता था, कभी अपनी माँ को।

तूफान की एक भयंकर गरज से झोंपड़ी हिल उठी। नन्हा बच्चा डर गया। वह अपनी माँ से आ लिपटा। उसने उसे उठाया और पुचकारने लगी। फिर उसने उसे अपनी गोद में बैठाया और बोली - "डरो मत, मेरे बेटे। विधाता हम कमजोरों पर अपनी ताकत आजमा रहा है। गिरती हुई इस बर्फ से, काले-घने बादलों से और चिंघाड़ते इस तूफान से भी बड़ी एक और ताकत है। वही जानती है कि जिस दुनिया को उसने बनाया है, उसे किस चीज़ की जरूरत है। निरीहों पर वह करुणाजनक दृष्टि डालती है।

"हिम्मत से काम लो मेरे बच्चे। कुदरत वसंत के रूप में हँसती है, ग्रीष्म के रूप में मुस्कुराती है और पतझड़ के रूप में जम्हाई लेती है। लेकिन इस समय वह रो रही है। जमीन के अन्दर छिपे हुए अपने आँसुओं से वह धरती को जीवन प्रदान करती है।

"सो जाओ मेरे प्यारे बेटे। तुम्हारे पापा स्वर्ग से हमें देख रहे हैं। बर्फ और तूफान ने इस समय हमें उनके बहुत करीब ला दिया है।

"सो जाओ प्यारे। यह सफेद कम्बल हमें ठंडा करता है, लेकिन हमारे बीजों, हमारे हौसलों को गर्म रखता है। हमें डराने वाली ये चीजें ही आखिर सुन्दर फूलों का मौसम लेकर आएँगी।

"मेरे बच्चे, मनुष्य दु:ख और जुदाई को झेले बिना प्रेम के मोल को नहीं समझता। सो जा मेरे लाल, मीठे सपने तेरी उस पवित्र आत्मा को जो इस अन्धकार और कोहरे से अछूती रहती है, तलाश लेंगे।"

बच्चे ने उनींदी आँखों से माँ को देखा और बोला - "माँ, मेरी पलकें भारी हो रही हैं। लेकिन लोरी सुने बिना मुझे नींद नहीं आएगी।"

औरत ने उस फरिश्ते के चेहरे को देखा। उसने उसकी बंद होती हुई आँखों को देखा और कहा - "मेरे साथ बोलो मेरे बच्चे - हे ईश्वर, गरीबों पर करुणा बरसाओ और ठंड से उन्हें बचाओ। अपने दयापूर्ण स्पर्श से उनकी काठ-सी देह को गर्मी दो। झोपड़ियों में सोते उन बेसहाराओं पर कृपा करो जो भूख और ठंड से मर रहे हैं। सुनो परमात्मा! उन बेसहारा विधवाओं की पुकार सुनो जो अपने बच्चे के जीवन के लिए डर रही हैं। अपने बंदों के कान हम गरीबों की पुकार सुनने के लिए खोल दो। उन बेचारों पर कृपा करो जो तुम्हारा दरवाज़ा खटखटा रहे हैं। तूफान में फँसे हुओं को सुरक्षित जगहों पर पहुँचाओ। नन्हें परिंदों की रक्षा करो। हमारे खेतों और पेड़ों को इस तूफान से बचाओ। तुम करुणा के सागर हो और प्रेम से लबालब हो।"

जैसे ही नींद की देवी ने बच्चे को अपने आगोश में लिया, माँ ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। अपने काँपते होठों से उसने उसकी आँखों को चूमा और वापस अपनी पीढ़ी पर जा टिकी। अँगीठी के पास बैठकर वह पुन: अपने बच्चे के लिए ऊन कातने लगी।


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