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विमर्श

यह एक गाथा है... पर आप सबके लिए नहीं!
हावर्ड फास्ट

अनुवाद - सुरेंद्र कुमार


यह गाथा आपमें से बस उनके लिए है जो जिंदगी से प्यार करते हैं और जो आजाद इनसानों की तरह जीना चाहते हैं। आप सबके लिए नहीं, आपमें से बस उनके लिए, जो हर उस चीज से नफरत करते हैं, जो अन्यायपूर्ण और गलत है, जो भूख, बदहाली और बेघर होने में कोई कल्याणकारी तत्व नहीं देखते। आपमें से उनके लिए, जिन्हें वह समय याद है, जब एक करोड़ बीस लाख बेरोजगार सूनी आँखों से भविष्य की ओर ताक रहे थे।

यह एक गाथा है, उनके लिए, जिन्होंने भूख से तड़पते बच्चे या पीड़ा से छटपटाते इनसान की मंद पड़ती कराह सुनी है। उनके लिए, जिन्होंने बंदूकों की गड़गड़ाहट सुनी है और टारपीडो के दागे जाने की आवाज पर कान लगाए हों। उनके लिए, जिन्होंने फासिज्म द्वारा बिछाई गई लाशों का अंबार देखा है। उनके लिए, जिन्होंने युद्ध के दानव की मांसपेशियों को मजबूत बनाया था, और बदले में जिन्हें एटमी मौत का खौफ दिया गया था।

यह गाथा उनके लिए है। उन माताओं के लिए जो अपने बच्चों को मरता नहीं बल्कि जिंदा देखना चाहती हैं। उन मेहनतकशों के लिए जो जानते हैं कि फासिस्ट सबसे पहले मजदूर यूनियनों को ही तोड़ते हैं। उन भूतपूर्व सैनिकों के लिए, जिन्हें मालूम है कि जो लोग युद्धों को जन्म देते हैं, वे खुद लड़ाई में नहीं उतरते। उन छात्रों के लिए, जो जानते हैं कि आजादी और ज्ञान को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। उन बुद्धिजीवियों के लिए, जिनकी मौत निश्चित है यदि फासिज्म जिंदा रहता है। उन नीग्रो लोगों के लिए, जो जानते हैं कि जिम-क्रो और प्रतिक्रियावाद दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उन यहूदियों के लिए जिन्होंने हिटलर से सीखा कि यहूदी विरोध की भावना असल में क्या होती है। और यह गाथा बच्चों के लिए, सारे बच्चों के लिए, हर रंग, हर नस्ल, हर आस्था-धर्म के बच्चों के लिए, उन सबके लिए लिखी गई है, ताकि उनका भविष्य जीवन से भरपूर हो, मौत से नहीं।

यह गाथा है जनता की शक्ति की, उनके अपने उस दिन की, जिसे उन्होंने स्वयं चुना था और जिस दिन वे अपनी एकता और शक्ति का पर्व मनाते हैं। यह वह दिन है, जो अमरीकी मजदूर वर्ग का संसार को उपहार था और जिस पर हमें हमेशा फख्र रहेगा।

उन्होंने आपको यह नहीं बताया

स्कूल में आपने इतिहास की जो पुस्तकें पढ़ी होंगी उनमें उन्होंने यह नहीं बताया होगा कि 'मई दिवस' की शुरुआत कैसे हुई थी। लेकिन हमारे अतीत में बहुत कुछ उदात्त था और साहस से भरपूर था, जिसे इतिहास के पन्नों से बहुत सावधानी से मिटा दिया गया है। कहा जाता है कि 'मई दिवस' विदेशी परिघटना है, लेकिन जिन लोगों ने 1886 में शिकागो में पहले मई दिवस की रचना की थी, उनके लिए इसमें कुछ भी बाहर का नहीं था। उन्होंने इसे देसी सूत से बुना था। उजरती मजदूरी की व्यवस्था इनसानों का जो हश्र करती है उसके प्रति उनका गुस्सा किसी बाहरी स्रोत से नहीं आया था।

पहला 'मई दिवस' 1886 में शिकागो नगर में मनाया गया। उसकी भी एक पूर्वपीठिका थी, जिसके दृश्यों को याद कर लेना अनुपयुक्त नहीं होगा। 1886 के एक दशक पहले से अमेरिकी मजदूर वर्ग जन्म और विकास की प्रक्रिया से गुजर रहा था। यह नया देश जो थोड़े-से समय में एक महासागर से दूसरे महासागर तक फैल गया था, उसने शहर पर शहर बनाए, मैदानों पर रेलों का जाल बिछा दिया, घने जंगलों को काटकर साफ किया, और अब वह विश्व का पहला औद्योगिक देश बनने जा रहा था। और ऐसा करते हुए वह उन लोगों पर ही टूट पड़ा जिन्होंने अपनी मेहनत से यह सब संभव बनाया था, वह सब कुछ बनाया था जिसे अमेरिका कहा जाता था, और उनके जीवन की एक-एक बूँद निचोड़ ली।

स्त्री-पुरुष और यहाँ तक कि बच्चे भी अमेरिका की नई फैक्टरियों में हाड़तोड़ मेहनत करते थे। बारह घंटे का काम का दिन आम चलन था, चौदह घंटे का काम भी बहुत असामान्य नहीं था, और कई जगहों पर बच्चे भी एक-एक दिन में सोलह और अठारह घंटे तक काम करते थे। मजदूरी बहुत ही कम हुआ करती थी, वह अक्सर दो जून रोटी के लिए भी नाकाफी होती थी, और बार-बार आने वाली मंदी की कड़वी नियमितता के साथ बड़े पैमाने पर बेरोजगारी के दौर आने लगे। सरकारी निषेधाज्ञाओं के जरिये शासन रोजमर्रा की बात थी।

परंतु अमरीकी मजदूर वर्ग रीढ़विहीन नहीं था। उसने यह स्थिति स्वीकार नहीं की, उसे किस्मत में बदी बात मानकर सहन नहीं किया। उसने मुकाबला किया और पूरी दुनिया के मेहनतकशों को जुझारूपन का पाठ पढ़ाया। ऐसा जुझारूपन जिसकी आज भी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती।

1877 में वेस्ट वर्जीनिया प्रदेश के मार्टिन्सबर्ग में रेल-हड़ताल शुरू हुई। हथियारबंद पुलिस बुला ली गई और मजदूरों के साथ एक छोटी लड़ाई के बाद हड़ताल कुचल दी गई। लेकिन केवल स्थानीय तौर पर; जो चिनगारी भड़की थी, वह ज्वाला बन गई। 'बाल्टीमोर और ओहायो' रेलमार्ग बंद हुआ, फिर पेन्सिलवेनिया बंद हुआ, और फिर एक के बाद दूसरी रेल कंपनियों का चक्का जाम होता चला गया। और आखिरकार एक छोटा-सा स्थानीय उभार इतिहास में उस समय तक ज्ञात सबसे बड़ी रेल हड़ताल बन गया। दूसरे उद्योग भी उसमें शामिल हो गए और कई इलाकों में यह रेल-हड़ताल एक आम हड़ताल में तब्दील हो गई।

पहली बार सरकार और साथ ही मालिकों को भी पता चला कि मजदूर की ताकत क्या हो सकती है। उन्होंने पुलिस और फौज बुलाई; जगह-जगह जासूस तैनात किए गए। कई जगहों पर जमकर लड़ाइयाँ हुईं। सेंट लुई में नागरिक प्रशासन के अधिकारियों ने हथियार डाल दिए और नगर मजदूर वर्ग के हवाले कर दिया। उन लोमहर्षक उभारों में कितने हताहत हुए होंगे, उन्हें आज कोई नहीं गिन सकता। परंतु हताहतों की संख्या बहुत बड़ी रही होगी, इस पर कोई भी, जिसने तथ्यों का अध्ययन किया है, संदेह नहीं कर सकता।

हड़ताल आखिरकार टूट गई। परंतु अमरीकी मजदूरों ने अपनी भुजाएँ फैला दी थीं और उनमें नई जागरूकता का संचार हो रहा था। प्रसव-वेदना समाप्त हो चुकी थी और अब वह वयस्क होने लगा था।

अगला दशक संघर्ष का दौर था, आरंभ में अस्तित्व का संघर्ष और फिर संगठन बनाने का संघर्ष। सरकार ने 1877 को आसानी से नहीं भुलाया; अमेरिका के अनेक शहरों में शस्त्रागारों का निर्माण होने लगा; मुख्य सड़कें चौड़ी की जाने लगीं, ताकि 'गैटलिंग' मशीनगनें उन्हें अपने नियंत्रण में रख सकें। एक मजदूर-विरोधी प्राइवेट पुलिस संगठन 'पिंकरटन एजेंसी' का गठन किया गया, और मजदूरों के खिलाफ उठाये गए कदम अधिक से अधिक दमनकारी होते चले गए। वैसे तो अमेरीका में दुष्प्रचार के तौर पर 'लाल खतरे' शब्द का इस्तेमाल 1830 के दशक से ही होता चला आया था, लेकिन उसे अब एक ऐसे डरावने हौवे का रूप दे दिया गया, जो आज प्रत्यक्ष तौर पर हमारे सामने है।

परंतु मजदूरों ने इसे चुपचाप स्वीकार नहीं किया। उन्होंने भी अपने भूमिगत संगठन बनाए। भूमिगत रूप में जन्मे संगठन नाइट्स ऑफ लेबर के सदस्यों की संख्या 1886 तक 7,00,000 से ज्यादा हो गई थी। नवजात अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर का मजदूर यूनियनों की स्वैच्छिक संस्था के रूप में गठन किया गया, समाजवाद जिसके लक्ष्यों में एक लक्ष्य था। यह संस्था बहुत तेज रफ्तार से विकसित होती चली गई। यह वर्ग-सचेत और जुझारू थी और अपनी माँगों पर टस-से-मस न होने वाली थी। एक नया नारा बुलंद हुआ। एक नई, दो टूक, सुस्पष्ट माँग पेश की गई : 'आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम, आठ घंटे मनोरंजन'।

1886 तक अमेरिकी मजदूर नौजवान योद्धा बन चुका था, जो अपनी ताकत परखने के लिए मौके की तलाश कर रहा था। उसका मुकाबला करने के लिए सरकारी शस्त्रागारों का निर्माण किया गया था, पर वे नाकाफी थे। 'पिंकरटनों' का प्राइवेट पुलिस दल भी काफी नहीं था, न ही गैटलिंग मशीनगनें। संगठित मजदूर अपने कदम बढ़ा रहा था, और उसका एकमात्र जुझारू नारा देश और यहाँ तक कि धरती के आर-पार गूँज रहा था : 'एक दिन में आठ घंटे का काम - इससे जरा भी ज्यादा नहीं!'

1886 के उस जमाने में, शिकागो जुझारू, वामपक्षी मजदूर आंदोलन का केंद्र था। यहीं शिकागो में संयुक्त मजदूर प्रदर्शन के विचार ने जन्म लिया, एक दिन जो उनका दिन हो किसी और का नहीं, एक दिन जब वे अपने औजार रख देंगे और कंधे से कंधा मिलाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे।

पहली मई को मजदूर वर्ग के दिवस, जनता के दिवस के रूप में चुना गया। प्रदर्शन से काफी पहले ही 'आठ घंटा संघ' नाम की एक संस्था गठित की गई। यह आठ घंटा संघ एक संयुक्त मोर्चा था, जिसमें अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर, नाइट्स ऑफ लेबर और समाजवादी मजदूर पार्टी शामिल थे। शिकागो की सेंट्रल लेबर यूनियन भी, जिसमें सबसे अधिक जुझारू वामपक्षी यूनियनें शामिल थीं, इससे जुड़ी थी।

शिकागो से हुई शुरुआत कोई मामूली बात नहीं थी। 'मई दिवस' की पूर्ववेला में एकजुटता के लिए आयोजित सभा में 25,000 मजदूर उपस्थित हुए। और जब 'मई दिवस' आया, तो उसमें भाग लेने के लिए शिकागो के हजारों मजदूर अपने औजार छोड़कर फैक्टरियों से निकलकर मार्च करते हुए जनसभाओं में शामिल होने पहुँचने लगे। और उस समय भी, जबकि 'मई दिवस' का आरंभ ही हुआ था, मध्य वर्ग के हजारों लोग मजदूरों की कतारों में शामिल हुए और समर्थन का यह स्वरूप अमेरिका के कई अन्य शहरों में भी दोहराया गया।

और आज की तरह उस वक्त भी बड़े पूँजीपतियों ने जवाबी हमला किया - रक्तपात, आतंक, न्यायिक हत्या को जरिया बनाया गया। दो दिन बाद मैकार्मिक रीपर कारखाने में, जहाँ हड़ताल चल रही थी, एक आम सभा पर पुलिस ने हमला किया। उसमें छह मजदूरों की हत्या हुई। अगले दिन इस जघन्य कार्रवाई के विरुद्ध हे मार्केट चौक पर जब मजदूरों ने प्रदर्शन किया, तो पुलिस ने उन पर फिर हमला किया। कहीं से एक बम फेंका गया, जिसके फटने से कई मजदूर और पुलिसवाले मारे गए। इस बात का कभी पता नहीं चल पाया कि बम किसने फेंका था, इसके बावजूद चार अमेरिकी मजदूर नेताओं को फाँसी दे दी गई, उस अपराध के लिए, जो उन्होंने कभी किया ही नहीं था और जिसके लिए वे निर्दोष सिद्ध हो चुके थे।

इन वीर शहीदों में से एक, ऑगस्ट स्पाइस, ने फाँसी की तख्ती से घोषणा की :

'एक वक्त आएगा, जब हमारी खामोशी उन आवाजों से ज्यादा ताकतवर सिद्ध होगी, जिनका तुम आज गला घोंट रहे हो।' समय ने इन शब्दों की सच्चाई को प्रमाणित कर दिया है। शिकागो ने दुनिया को 'मई दिवस' दिया, और इस बासठवें मई दिवस पर करोड़ों की संख्या में एकत्र दुनियाभर के लोग ऑगस्ट स्पाइस की भविष्यवाणी को सच साबित कर रहे हैं।

शिकागो में हुए प्रदर्शन के तीन वर्ष बाद संसारभर के मजदूर नेता बास्तीय किले पर धावे (जिसके साथ फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत हुई) की सौवीं सालगिरह मनाने के लिए पेरिस में जमा हुए। एक-एक करके, अनेक देशों के नेताओं ने भाषण दिया।

आखिर में अमेरीकियों के बोलने की बारी आई। जो मजदूर हमारे मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहा था, खड़ा हुआ और बिल्कुल सरल और दो टूक भाषा में उसने आठ घंटे के कार्यदिवस के संघर्ष की कहानी बयान की जिसकी परिणति 1886 में हे मार्केट का शर्मनाक कांड था।

उसने हिंसा, खूरेजी, बहादुरी का जो सजीव चित्र पेश किया, उसे सम्मेलन में आए प्रतिनिधि वर्षों तक नहीं भूल सके। उसने बताया कि पार्सन्स ने कैसे मृत्यु का वरण किया था, जबकि उससे कहा गया था कि अगर वह अपने साथियों से गद्दारी करे और क्षमा माँगे तो उसे फाँसी नहीं दी जाएगी। उसने श्रोताओं को बताया कि कैसे दस आयरिश खान मजदूरों को पेनसिल्वेनिया में इसलिए फाँसी दी गई थी कि उन्होंने मजदूरों के संगठित होने के अधिकार के लिए संघर्ष किया था। उसने उन वास्तविक लड़ाइयों के बारे में बताया जो मजदूरों ने हथियारबंद 'पिंकरटनों' से लड़ी थीं, और उसने और भी बहुत कुछ बताया। जब उसने अपना भाषण समाप्त किया तो पेरिस कांग्रेस ने निम्नलिखित प्रस्ताव पास किया :

'कांग्रेस फैसला करती है कि राज्यों के अधिकारियों से कार्य दिवस को कानूनी ढंग से घटाकर आठ घंटे करने की माँग करने के लिए और साथ ही पेरिस कांग्रेस के अन्य निर्णयों को क्रियान्वित करने के लिए समस्त देशों और नगरों से मेहनतकश अवाम एक निर्धारित दिन एक महान अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन संगठित करेंगे। चूँकि अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर पहली मई 1890 को ऐसा ही प्रदर्शन करने का फैसला कर चुका है, 'अतः यह दिन अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन के लिए स्वीकार किया जाता है। विभिन्न देशों के मजदूरों को प्रत्येक देश में विद्यमान परिस्थितियों के अनुसार यह प्रदर्शन अवश्य आयोजित करना चाहिए।'

तो इस निश्चय पर अमल किया गया और 'मई दिवस' पूरे संसार की धरोहर बन गया। अच्छी चीजें किसी एक जनता या राष्ट्र की संपत्ति नहीं होतीं। एक के बाद दूसरे देश के मजदूर ज्यों-ज्यों मई दिवस को अपने जीवन, अपने संघर्षों, अपनी आशाओं का अविभाज्य अंग बनाते गए, वे मानकर चलने लगे कि यह दिन उनका है और यह भी सही है, क्योंकि पृथ्वी पर मौजूद समस्त राष्ट्रों के बरक्स हम राष्ट्रों का राष्ट्र हैं, सभी लोगों और सभी संस्कृतियों का समुच्चय हैं।

और आज के मई दिवस की क्या विशेषता है

पिछले मई दिवस गत आधी शताब्दी के संघर्षों को प्रकाश-स्तंभों की भाँति आलोकित करते हैं। इस शताब्दी के आरंभ में मई दिवस के ही दिन मजदूर वर्ग ने पराई धरती को हड़पने की साम्राज्यवादी कार्रवाइयों की सबसे पहले भर्त्सना की थी। मई दिवस के ही अवसर पर मजदूरों ने नवजात समाजवादी राज्य सोवियत संघ का समर्थन करने के लिए आवाज बुलंद की थी। मई दिवस के अवसर पर ही हमने अपनी भरपूर शक्ति से असंगठितों के संगठन का समारोह मनाया था।

लेकिन बीते किसी भी मई दिवस पर कभी ऐसे अनिष्टसूचक लेकिन साथ ही इतने आशा भरे भविष्य-संकेत नहीं दिखाई दिए थे, जितना कि आज के मई दिवस पर हो रहा है। पहले कभी हमारे पास जीतने को इतना कुछ नहीं था, पहले कभी हमारे खोने को इतना कुछ नहीं था।

जनता के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं है। लोगों के पास अखबार या मंच नहीं है, और न ही सरकार में शामिल हमारे चुने गए प्रतिनिधियों की बहुसंख्या जनता की सेवा करती है। रेडियो जनता का नहीं है और न फिल्म बनाने वाली मशीनरी उसकी है। बड़े कारोबारों की इजारेदारी अच्छी तरह स्थापित हो चुकी है, काफी अच्छी तरह - लेकिन लोगों पर तो किसी का एकाधिकार नहीं है।

जनता की ताकत उसकी अपनी ताकत है। मई दिवस उसका अपना दिवस है, अपनी यह ताकत प्रदर्शित करने का दिन है। कदम से कदम मिलाकर बढ़ते लाखों लोगों की कतारों के बीच अलग से एक आवाज बुलंद हो रही है। यह वक्त है कि वे लोग, जो अमरीका को फासिज्म के हवाले करने पर आमादा हैं, इस आवाज को सुनें।

उन्हें यह बताने का वक्त है कि वास्तविक मजदूरी लगभग पचास प्रतिशत घट गई है, कि घरों में अनाज के कनस्तर खाली हैं, कि यहाँ अमेरिका में अधिकाधिक लोग भूख की चपेट में आ रहे हैं।

यह वक्त है श्रम विरोधी कानूनों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का। दो सौ से ज्यादा श्रम विरोधी कानूनों के विधेयक कांग्रेस के समक्ष विचाराधीन आ रहे हैं, जो यकीनन मजदूरों को उसी तरह तोड़ डालने के रास्ते खोल देंगे, जिस तरह हिटलर के नाजीवाद ने जर्मन मजदूरों को तोड़ डाला था।

संगठित अमेरिकी मजदूरों के लिए आँख खोलकर यह तथ्य देखने का वक्त आ गया है कि यह मजदूरों की एकता कायम करने की आखिरी घड़ी है वरना बहुत देर हो जाएगी और एकताबद्ध करने के लिए संगठित मजदूर रहेंगे ही नहीं।

आप यहाँ पढ़ रहे हैं गाथा, उन लोगों की जो बारह से पंद्रह घंटे रोज काम करते थे, आप पढ़ रहे हैं गाथा, उस सरकार की, जो आतंक और निषेधाज्ञाओं के बल पर चल रही है।

यह है उन लोगों का लक्ष्य, जो आज श्रमिकों को चकनाचूर करना चाहते हैं। वे अपने 'अच्छे' दिनों को फिर वापस लाना चाहते हैं। इसका सबूत यूनाइटेड माइन के खनिक मजदूरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। आप जब मई दिवस के अवसर पर मार्च करेंगे तो आप उन्हें अपना जवाब देंगे।

वक्त आ गया है यह समझने का कि 'अमरीकी साम्राज्य' के आह्वान का, यूनान, तुर्की और चीन में हस्तक्षेप से क्या रिश्ता है! साम्राज्य की कीमत क्या है? जो दुनिया पर राज कर दुनिया को 'बचाने' के लिए चीख रहे हैं, उन्हें दूसरे साम्राज्यों के अंजाम को याद करना चाहिए। उन्हें यह आँकना चाहिए कि जिंदगी और धन दोनों अर्थों में युद्ध की क्या कीमत होती है।

वक्त आ गया है यह देखने के लिए जाग उठने का कि कम्युनिस्टों के पीछे शिकारी कुत्ते छोड़े जाने का क्या अर्थ है? क्या एक भी ऐसा कोई देश है, जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी को गैरकानूनी घोषित किया जाना फासिज्म की पूर्वपीठिका न रहा हो? क्या ऐसा कोई एक भी देश है, जहाँ कम्युनिस्टों को रास्ते से हटाते ही मजदूर यूनियनों को चकनाचूर न कर दिया गया हो?

वक्त आ गया है कि हम हालात की कीमत को समझें। कम्युनिस्टों को प्रताड़ित करने के अभियान की कीमत था संगठित मजदूरों को ठिकाने लगाना - उसकी कीमत है फासिज्म। और आज ऐसा कौन है, जो इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि फासिज्म की कीमत मौत है?

मई दिवस इस देश के समस्त स्वतंत्रताप्रिय नागरिकों के लिए प्रतिगामियों को जवाब देने का वक्त है। मार्च करते जा रहे लाखों-लाख लोगों की एक ही आवाज बुलंद हो रही है - मई दिवस प्रदर्शन में हमारे साथ आइए और मौत के सौदागरों को अपना जवाब दीजिए।

 


(वर्ष 1947 के मई दिवस के अवसर पर लिखा गया प्रसिद्ध अमेरिकी उपन्यासकार हावर्ड फास्ट का यह लेख मई दिवस की गौरवशाली परंपराओं की याद एक ऐसे समय में करता है जब अमेरिका में लंबे संघर्षों से हासिल मजदूर अधिकारों पर हमला बोला जा रहा था। 'मजदूर बिगुल' से साभार।)


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