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कविता

वापसी
ताद्यूश रोजेविच

अनुवाद - अशोक वाजपेयी


अचानक खिड़की खुल जाएगी
और माँ पुकारेगी
अंदर आने का वक्त हो गया।

दीवार फटेगी
मैं कीचड़ सने जूतों में
स्वर्ग-प्रवेश करूँगा

मैं मेज पर आऊँगा
और सवालों के ऊलजुलूल जवाब दूँगा।

मैं ठीकठाक हूँ मुझे अकेला
छोड़ दो। सर हाथ पर धरे बैठा हूँ -
बौठा हूँ। मैं उन्हें कैसे बता सकता हूँ
उस लंबे उलझे रास्ते के बारे में?

यहाँ स्वर्ग में माँएँ
हरे स्कार्फ बुनती हैं

मक्खियाँ भिनभिनाती हैं

पिता ऊँघते हैं स्टोव के बगल में
छह दिनों की मेहनत के बाद।

न, निश्चय ही मैं नहीं कह सकता उनसे
कि लोग एक
दूसरे का गला काटने पर उतारू हैं।

 


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