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लोककथा

आह्वान
रामदेव धुरंधर


रात की घनी परतें आच्छादित थीं। वह जिस रास्ते से अपने घर लौट रहा था उस रास्ते में तो मानो सन्नाटा चुप रह कर भी चिंघाड़ कर रहा था। इस रास्ते से वह घर जल्दी पहुँच सकता था। इसीलिए चलनसार रास्ता न ले कर यह रास्ता लिया था। इस रास्ते पर दूर तक चलने पर कोई न दिखा तो उसे घबराहट होने लगी। वह अकसर इस रास्ते से रात के वक्त घर लौटा करता था। बड़ी सहजता होती थी। पर आज जैसा पहले कभी नहीं हुआ। उसने सोचा पीछे लौट जाना होगा। पर पीछे जाने में अब उतना ही वक्त लगता जितना इस रास्ते को पूरा कर जाने में। यही सोच कर वह आगे बढ़ता रहा। मन की घबराहट जैसी थी परिणाम भी वैसा ही हुआ। सहसा उसे लगा कोई उस पर झपटा मारने वाला है। पर ऐसा न हो कर कुछ और हुआ। एक नकाबपोश ने उसे चुरा लिया और सन्नाटे में उसे लिए उड़ चला। उसने डर से चीख कर कहा - मैं तुमसे मुक्ति चाहता हूँ।

नकाबपोश ने कहा - मुक्ति का नाम मत लो।

आवाज उसे जानी पहचानी लगी। उसने नकाबपोश से जब कहा कि शायद तुम मेरे लिए परिचित हो तो उसे उत्तर मिला - हम एक दूसरे के परिचित तो हैं। हमारी उम्र एक है। सिंकिया तो हम दोनों हैं। पर इस वक्त मेरा पलड़ा अधिक भारी है। तुम रोओ तो मैं हँस सकता हूँ।

नकाबपोश की बातों का यह कैसा पिटारा हुआ? यह उसकी समस्या तो हुई वह नकोबपोश के हाथों कहीं खो जाने वाला हो। अब उसकी दूसरी समस्या यह हुई नकाबपोश ने जैसे कहा तुम खोओ तो मैं खुशी का उत्सव मना सकता हूँ। नकाबपोश उसे ले कर जहाँ पहुँचा आश्चर्य ही था कि अँधेरे के उस बियाबान में प्रकाश न होकर भी प्रकाश था। पर इस प्रकाश में उसे यहाँ लाने वाला नकाबपोश नहीं था। जो यहाँ था यहाँ की उदात्त प्रकृति थी। कहीं का भी घृणित झूठ यहाँ आ कर सत्य में अपना कायाकल्प करता था। रोगी यहाँ भले चंगे होने के लिए आते थे। नफरत आती थी तो प्रेम का स्वरूप लिए यहाँ से लौटती थी। चोर धर्मात्मा बनना चाहे तो यहाँ आने पर बिना कहे उनका परिष्कार हो जाता था। कसाई जहाँ भी जीव वध के लिए हाथ में छुरी लेते हों यहाँ से चंदन उड़ कर उन तक जाता था और उनकी आत्मा में अहिंसा की लौ जगा कर लौट आता था। कसाई अब वध क्या करे। वे वंदनीय सज्जन हो जाते थे। आदमी चाहे रावण जैसा हो उसे यहाँ पूर्णतः राम की काया मिल जाती थी।

यह पाताल हो नहीं सकता था। स्वर्ग भी नहीं। तो फिर यह कौन सी जगह थी? नकाबपोश के हाथों यहाँ पहुँचे हुए आदमी ने अंततः यहाँ अपनी ही दुनिया को देखा। अंतर यह था कि वह वर्तमान से था। जब कि यह उसकी अपनी दुनिया जितना अतीत से थी उतना ही भविष्य से होने वाली थी।


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