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कविता

मैं फिर भी बढ़ती जाती हूँ
माया एंजेलो

अनुवाद - सरिता शर्मा


चाहे मुझे इतिहास में निचला दर्जा दो
अपने कटु, विकृत झूठ के साथ,
भले ही कीचड़ में सान दो
फिर भी, धूल की तरह, मैं उठ जाऊँगी

मेरी जिंदादिली से परेशान हो तुम?
तुमको क्यों उदासी घेरे हुए है?
मैं चलती हूँ मानो खजाना मिला हो
मेरे कमरे के भीतर

चाँद और जैसे सूरज की तरह
ज्वार की निश्चितता के साथ,
आसमान छूती उमंगों की तरह
फिर भी मैं आगे बढ़ूँगी।

मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?
झुके सिर और नीची निगाहों से
अंदर की रुलाई से कमजोर पड़े
आँसुओं की तरह झुके कंधे...

मेरा गर्व से आहत हो तुम
इतने दुखी क्यों होते हो...
क्योंकि मैं हँसती हूँ मानो मिली हो सोने की खान
पीछे घर के पिछवाड़े में खुदाई में
तुम अपशब्दों के तीर चला सकते हो मुझ पर
अपनी आँखों से कर सकते हो मेरे टुकड़े
अपनी नफरत से मार सकते हो मुझे
मगर फिर भी हवा की तरह मैं आगे बढ़ जाऊँगी!!

क्या मेरी यौनिकता से विचलित हो जाते हो तुम!
हैरान हो जाते हो इससे तुम
कि मैं नाचती हूँ मानो मुझे मिले हैं हीरे
मेरी जंघाओं के संधि स्थल पर।

इतिहास की शर्म की झोपड़ियों से निकल
बढ़ती जाती हूँ मैं
दर्द में उगे अतीत से उभरकर
बढ़ती जाती हूँ मैं

ठाठें मारता उत्ताल तरंगों वाला
काला समंदर हूँ मैं
हर ज्वार-भाटे के साथ उठता गिरता हुआ...
आतंक और डर की रातें को पीछे छोड़
बढ़ती जाती हूँ मैं!!
दूधिया उज्जवल प्रभात में
उठती जाती हूँ मैं!!

अपने पूर्वजों से मिले उपहार लेते हुए
मैं गुलामों की उम्मीद और सपना हूँ...
मैं आगे बढ़ती जाती हूँ !!
मैं आगे बढ़ती जाती हूँ !!
मैं आगे बढ़ती जाती हूँ !!

 


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