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विमर्श

अफ्रीकी साहित्य और विद्वत्ता का भविष्य
न्गुगी वा थ्योंगो

अनुवाद - आनंद स्वरूप वर्मा


मैं सौभाग्यशाली था कि इस भाषण की तैयारी के दौरान मुझे एरिक एस्बी की पुस्तक अफ्रीकन यूनिवर्सिटीज ऐंड वेस्टर्न ट्रेडीशन हाथ लगी और सरसरी तौर पर इसे देखने के बाद मुझे अपनी पहचान का एहसास हुआ। इस पुस्तक ने मेरे खुद के जीवन की विडंबनाओं को सामने ला दिया और मेरे अपने कई सरोकारों से परिचित कराया। यह पुस्तक 1964 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में गौडकिन भाषणमाला के अंतर्गत एस्बी के दिए गए भाषणों का संकलन है। यही वह वर्ष था जब अंग्रेजी में लंदन यूनिवर्सिटी की ऑनर्स की डिग्री के साथ मैंने मैकरेरे कॉलेज से स्नातक किया था। इसी साल विलियम हाइनमन ने अंग्रेजी में लिखा मेरा उपन्यास वीप नॉट चाइल्ड प्रकाशित किया था जो मैकरेरे में किए गए मेरे पाँच वर्षों के परिश्रम का परिणाम था। मैं और मेरा उपन्यास उसी तरह के विश्वविद्यालयों के उत्पाद थे जिसकी चर्चा एरिक एस्बी ने की थी और जिनकी सामाजिक जिम्मेदारी 'ऐसे पुरुषों और महिलाओं को पैदा करनी थी जो सरकारी नौकरी के मानकों को समझते हों और जिनके अंदर स्वशासन के लिए जरूरी नेतृत्व क्षमता हो।' संक्षेप में कहें तो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जो नई राजनीतिक व्यवस्था कायम होने वाली थी उसमें शासन करने के लिए कुछ अभिजात लोगों की जरूरत थी। 1950 के दशक में कुछ कॉलेजों की स्थापना हुई। इससे पहले 1925 से ही अनेक समितियों और सिफारिशों के बाद जो समिति बनी थी उसी के फलस्वरूप ऐस्कीथ कमेटी और 'इंटर-यूनीवर्सिटी कौंसिल फॉर हायर एजुकेशन' की स्थापना हुई। लेकिन अफ्रीका में आधुनिक विश्वविद्यालय का नक्शा इन आधिकारिक समितियों की मदद से 20वीं शताब्दी में नहीं शुरू हुआ। इसकी शुरुआत तो 19वीं शताब्दी में ही हो गई थी और इसके प्रणेता 1868 में जेम्स अफ्रीकन्स बीले हॉर्टन और 1872 में एडवर्ड ब्लाइडेन थे।

हॉर्टन और ब्लाइडेन दोनों अफ्रीकी थे और सिएरा लियोन के थे। जाहिर है कि वे अफ्रीका के लिए अच्छा से अच्छा ही चाहते रहे होंगे। तो भी इन दोनों के नजरिए में फर्क था। एस्बी के अनुसार हॉर्टन अफ्रीका में एक ऐसी शुरुआत करना चाहते थे जो 'विशुद्ध पश्चिमी शिक्षा' पर आधारित हो और उनकी इस व्यवस्था में 'अफ्रीकी भाषाओं, इतिहास अथवा संस्कृति को उच्च शिक्षा में समाहित करने की कोई गुंजाइश नहीं थी।' उनके हिसाब से अफ्रीकी आधुनिकता का रास्ता ग्रीस क्लासिक्स और यूरोपीय भाषाओं और संस्कृति से होकर गुजरता था। दूसरी तरफ ब्लाइडेन चाहते थे कि अफ्रीका में उच्च शिक्षा उस 'निरंकुश यूरोपीकरण' से मुक्त हो जिसने 'नीग्रो मस्तिष्क को बौना कर दिया है और कुचल कर रख दिया है।'

1883 में ब्लाइडेन ने लिखा :

'हमारी सभी परंपराएँ और अनुभव एक विदेशी नस्ल से जुड़ गए हैं। हमारे पास अपनी कोई नहीं बल्कि अपने मालिकों की कविताएँ हैं। हमारे कानों में जो गीत सुनाई देते हैं और हमारे होंठों पर प्रायः जो तैरते रहते हैं वे वही गीत हैं जिन्हें हम उन लोगों के मुँह से सुनते हैं जो हमारी पीड़ा और कराह पर हमारे ऊपर चीखते रहते हैं। वे अपने उस इतिहास के गीत गाते हैं जो हमारी दुर्दशा का इतिहास है। वे अपनी विजय के गीत गाते हैं जिनमें हमारे अपमानों की दास्तान लिखी हुई है। यह हमारी बदकिस्मती है कि उनके पूर्वाग्रहों और उनके जज्बों को हम सीख लेते हैं और यह समझते हैं कि हमारे अंदर भी उन जैसी ही ताकत और ख्वाहिशें आ गई हैं।'

वह एक ऐसी शिक्षा पद्धति चाहते थे जो अफ्रीकियों के बारे में हर तरह के भ्रमों और मुगालतों को खारिज कर दे। अफ्रीकी विश्वविद्यालय के बारे में अपना दृष्टिकोण बताते हुए उन्होंने लिखा है कि बेशक पाठ्यक्रम में ग्रीक और लातिन भाषा के क्लासिक्स को स्थान दिया जाए लेकिन साथ ही अफ्रीकी भाषाएँ शिक्षा का अविभाज्य अंग बनें। घाना (जो उन दिनों गोल्ड कोस्ट था) के जे.ई. कैसले हेफोर्ड ने तो ब्लाइडेन से एक कदम आगे बढ़कर 1911 में अपनी पुस्तक इथियोपिया अनबाउंड में अफ्रीकी विश्वविद्यालय के बारे में एक ऐसी कल्पना को भी प्रकट किया जहाँ शिक्षा का माध्यम अफ्रीकी भाषा हो और संबद्ध पाठ्य सामग्री की जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ विद्वानों की नियुक्ति की जाए जो अन्य भाषाओं के ग्रंथों का अफ्रीकी भाषाओं में अनुवाद कर सकें।

अंततः ऐस्कीथ कमेटी की सिफारिशों के बाद अफ्रीका में जब विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई - 1948 में इबादान विश्वविद्यालय, 1948 में ही यूनिवर्सिटी ऑफ गोल्ड कोस्ट और 1950 में मैकरेरे यूनिवर्सिटी - तो हॅार्टन के नजरिए की ही जीत हुई। बेशक उन्होंने जहाँ श्रेष्ठता की बुनियाद के लिए ग्रीक और लातिन की कल्पना की थी उसकी जगह इनका स्थान अंग्रेजी ने ले लिया। अपनी बात को सहज ढंग से कहने के लिए मैं इसे बलाइडेन-हेफर्ड मॉडल के विपरीत हॉर्टन-ऐस्कीथ मॉडल कहना चाहूँगा।

हॉर्टन-ऐस्कीथ मॉडल और ब्लाइडेन-हेफर्ड मॉडल के नजरिए में यह भिन्नता उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में श्रेष्ठता हासिल करने की जरूरत को लेकर महज असहमति नहीं थी बल्कि यह भिन्नता इस बात पर भी थी कि यह श्रेष्ठता कैसे हासिल की जाए और अफ्रीकी भाषाओं के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाया जाए।

हॉर्टन-ऐस्कीथ मॉडल में अफ्रीकी भाषाओं का अवमूल्यन कर दिया गया था और किसी गोले की परिधि में उन्हें डाल दिया गया था जबकि ब्लाइडेन हेफर्ड मॉडल में उन्हें इस गोले के केंद्र में स्थान प्राप्त था। अफ्रीकी भाषाओं को परिधि पर रखा जाए अथवा केंद्र में - मतभेद का यह मुख्य मुद्दा था। आज भी अफ्रीकी विद्वत्ता और राजनीति को यह सवाल बेचैन करता रहता है कि इन दोनों में से कौन से मॉडल ने कामयाबी पाई और किसको स्थान मिलना चाहिए। संक्षेप में कहें तो आज, जबकि 21वीं शताब्दी में विश्व समुदाय के आर्थिक और राजनीतिक नक्शे पर अपेक्षाकृत ज्यादा समानतापूर्ण स्थान पाने के लिए अफ्रीका संघर्ष कर रहा हो, इस सवाल का जवाब अभी भी बहुत प्रासंगिक है कि क्या अफ्रीकी भाषाएँ केंद्र में हैं अथवा वे परिधि पर ही पड़ी हुई हैं।

अपनी अधिकांश पुस्तकों में और खास तौर पर डीकोलोनाइजिंग दि माइंड, पेनप्वाइंट्स, गनप्वाइंट्स ऐंड ड्रीम्स और राइटर्स इन पॉलिटिक्स में मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि भाषा का सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी समाज में संपत्ति, सत्ता और मूल्यों के संगठन के समूचे मर्यादाक्रम में भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मैं अपनी बात को थोड़ा और आसान बनाकर कहूँगा। भाषा देश काल के संदर्भ में किसी समुदाय के आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकासक्रम का उत्पाद है। प्रकृति और मनुष्य के रूप में एक दूसरे के साथ संपर्क स्थापित करने में लोगों ने संवाद की एक व्यवस्था को जन्म दिया जिसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति और संकेतों को इसने भाषा कहा। लेकिन भाषा किसी समुदाय की उत्पादक भी है क्योंकि आखिरकार भाषा ही मानव समुदाय की प्रकृति से और प्रकृति से बाहर तालमेल की सामर्थ्य देती है। सच्चाई यह है कि भाषा ही उनके बहुआयामी विकास को संभव बनाती है। इस तालमेल के तहत ही एक समुदाय दूसरे समुदाय के मुकाबले अपनी विशिष्टता को समझ पाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि एक जैसे प्राकृतिक परिवेश में एक जैसे नियमों के तहत एक जैसा काम करते हुए, जो यह निर्धारित करता है कि प्रकृति से क्या लिया गया है, कैसे लिया गया है और आपस में इसका बँटवारा कैसे हो, कोई समुदाय उसी ज्ञान को विकसित करता है जो एक पीढ़ी से होते हुए दूसरी पीढ़ी तक पहुँचा है और जो उनके भावी क्रियाकलापों और उनकी जीवन पद्धति का आधार बनता है। प्रत्येक समुदाय के जीने का अपना तरीका है। उसका तरीका है कि वह कब, कैसे और कहाँ प्रकृति के साथ, एक दूसरे के साथ, अन्य समुदायों के साथ, खुद के साथ और दुनिया के साथ तालमेल स्थापित करे। भाषा उस समुदाय विशेष के सांस्कृतिक जगत की वाहक है और उस जगत के अंदर उस समुदाय विशेष की समूची मूल्य व्यवस्था है। मानव जाति के प्रत्येक समुदाय की अपनी विशिष्टताएँ हैं और इन विशिष्टताओं के साथ यह धारणा जुड़ी हुई है कि सही और गलत क्या है, अच्छा और बुरा क्या है, सुंदर और असुंदर क्या है। संक्षेप में कहें तो उसके पास नीति और सौंदर्यबोध की समूची प्रणाली है जो भावनाओं, आवेगों और प्रवृत्तियों से संबद्ध है और यही उनकी पहचान अथवा अस्मिता का आधार तैयार करती है, या उनके होने का उन्हें एहसास कराती है।

19वीं शताब्दी के जर्मन दार्शनिक हेगेल ने साइंस ऑफ लॉजिक और फेनामेनोलॉजी ऑफ स्पिरिट में और अन्य पुस्तकों में भी प्रायः अस्तित्व और होने की अवधरणा की, खुद में होने और खुद के लिए होने के विभेद की अवधारणाओं की चर्चा की है जिस पर ज्याँ पाल सार्त्र ने काफी कुछ अपनी पुस्तक बीइंग ऐंड नथिंगनेस में लिखा है और दूसरों के लिए होने की बात की है। हम खुद में होने की सोच सकते हैं क्योंकि जब कोई तत्व वस्तुगत तौर पर खुद के लिए होने की उलट के समरूप होता है तभी उसे अपने होने का एहसास होता है। भाषा किसी समुदाय को खुद में होने की अवस्था से खुद के लिए होने की अवस्था तक की यात्रा में मदद करती है और यह आत्मचेतना ही किसी समुदाय को वह आत्मिक शक्ति देती है जो अपने होने की क्रिया को आगे बढ़ाता रहता है क्योंकि निरंतर संस्कृति में, सत्ता संबंधों में और समूचे परिवेश के साथ अपने संवाद में अपना नवीकरण करता रहता है। समुदाय की संस्कृति ही उसे खुद को इतिहास में कल्पित और पुनर्कल्पित करने में समर्थ बनाती है। इसीलिए किसी समुदाय के लिए संस्कृति वैसी ही है जैसे किसी पौधे के लिए फूल। एक फूल बहुत खूबसूरत, बहुत रंगीन और प्रायः बहुत नाजुक होता है। लेकिन यह फूल ही है जो प्रायः तरह तरह के पौधों की पहचान को आसानी से परिभाषित कर देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह फूल ही है जो उन बीजों का वाहक है जिनके माध्यम से उस पौधे की जड़ों और तनों का पुनरुत्पादन संभव है। आप तने को काट दीजिए और यहाँ तक कि जड़ को भी समाप्त कर दीजिए लेकिन बीज को बचाकर रख लीजिए और देखेंगे कि वह पेड़ फिर तैयार हो गया। आप चाहें तो वह खुद को पुनर्कल्पित कर सकता है। भाषा जो संस्कृति की वाहक है, कल्पनाशीलता की चरम और अत्यंत प्रारंभिक साधन भी है। साम्राज्य निर्माताओं को हमेशा इसकी जानकारी रही और शासित लोग अपने भविष्य की कल्पना कैसे करें, इसे आकार देने के प्रयास में उन्होंने स्पष्ट तौर पर देखा कि शासित समुदाय के अभिजनों को उनकी भाषाओं से असंबद्ध करने और साम्राज्यवादी सत्ता की भाषाओं को उनके मस्तिष्क में अक्षरशः प्रत्यारोपित करने का कितना महत्व है। जहाँ परंपरागत अभिजात वर्ग ने भाषा के इस प्रत्यारोपण का प्रतिरोध किया क्योंकि वे अपनी भाषाओं और संस्कृतियों से बेहद गहराई के साथ जुड़े थे, साम्राज्य निर्माताओं ने नए स्कूलों और कालेजों के ऑपरेशन थियेटरों में बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक शल्य चिकित्सा के जरिए एक नए अभिजात वर्ग का निर्माण कर दिया। इसके ढेर सारे उदाहरण मौजूद हैं और हमें बागानों की दासता जैसे विशेष मामलों को भी देखने की जरूरत नहीं है जहाँ समूचे समुदाय को उनकी मूल भाषाओं से अलग कर दिया गया है। इस मामले में औपनिवेशिक भारत का उदाहरण देखा जा सकता है।

भारत चूँकि आधुनिक ब्रिटेन के निर्माण के केंद्र में था, वह अंग्रेजों की सामाजिक प्रयोगशाला बन गया और इस प्रयोगशाला से निकले नतीजों का बाद में अन्य उपनिवेशों में निर्यात किया गया। 1834 से 1838 तक सुप्रीम काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य के रूप में टॉमस बैबिंग्टन मैकाले के वक्तव्यों ने उपनिवेश की शिक्षा प्रणाली को सुधारने और इसकी दंड संहिता तैयार करने में मदद की और इसका एक विशेष महत्व है। आपको याद होगा कि भारतीय शिक्षा पर अपनी मशहूर टिप्पणी में उन्होंने अंग्रेजी भाषा पर अपना दृष्टिकोण व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे 'व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग पैदा होगा जो अपने खून और रंग में तो भारतीय होगा लेकिन अपनी रुचियों, विचारों, नैतिक मूल्यों और मेधा में अंग्रेज होगा'। ध्यान देने की बात है कि यह निष्काम सांस्कृतिक इंजीनियरिंग के सौंदर्यबोधक आनंद के लिए नहीं था बल्कि व्यक्तियों के उस वर्ग के लिए था जो 'हमारे और हमारे द्वारा शासित लोगों के बीच व्याख्याकार का काम कर सके।' इसके ठीक 87 वर्ष बाद केन्या के तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर सर फिलिप मिशेल ने मैकाले के इन्हीं शब्दों को दुहराया। उन्होंने माऊ-माऊ छापामार सेना के विरुद्ध सशस्त्र अभियान को मजबूती देने के लिए एक नैतिक अभियान चलाने के रूप में अफ्रीकी शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी भाषा के प्रभुत्व की नीति तैयार की और उन्होंने देखा कि इस नई भाषा की शिक्षा से एक ऐसे 'सभ्य राज्य' का निर्माण हो सकेगा 'जिसमें सभी मूल्य और मानक वही होंगे जो ब्रिटेन के हैं, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की, चाहे उसका मूल कुछ भी हो, दिलचस्पी होगी और वह इसका एक अंग होगा।' दोनों मामलों में यानी 19वीं शताब्दी के मैकाले के भारत में और 20वीं शताब्दी के मिशेल के केन्या में संदर्भ औपनिवेशिक था और लक्ष्य बहुत स्पष्ट थे।

जिस प्रकार सैनिक क्षेत्र में औपनिवेशिक शक्तियों ने एक देशज सेना का निर्माण किया था जिसे उन्होंने शेष जनता से अलग थलग कर दिया था और जो उन्हीं ताकतों का साथ दे रही थी जिन्होंने उन्हें गुलाम बनाया था, उसी प्रकार मस्तिष्क के क्षेत्र में भी किया गया - शासित लोगों के बीच से एक बौद्धिक सेना का निर्माण जो आम लोगों से अलग थलग हो और शासकों की मदद करे। आप खुद के लिए न होकर दूसरे के लिए होने की अवस्था में पहुँच जाएँ और इस प्रकार अपने खुद के अस्तित्व के खिलाफ खड़े हो जाएँ।

इस प्रकार हॉर्टन-एस्किथ मॉडल पूरी तरह औपनिवेशिक परंपरा और सिद्धांतों पर आधारित था और यही वह मॉडल था जिसे कोई फेरबदल किए बगैर आजादी के बाद विरासत में ले लिया गया। यह मैकालेवादी शिक्षा पद्धति का एक मॉडल था जिसका मकसद गोरे जजों, वकीलों, सरकारी वकीलों, कानून निर्माताओं, गवर्नरों, सैनिक नेताओं और शिक्षा के क्षेत्र में विभागाध्यक्षों की खाली जगहों को भरने के लिए तैयार किया गया था। क्या गजब की चीज अफ्रीका को विरासत में मिली थी। इतिहास के भाग्य का यह एक दिलचस्प खेल था कि वे लोग जो औपनिवेशिक साँचे में ढले थे उनको ही यह जिम्मेदारी मिल गई थी कि सैनिक, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में नए राष्ट्र को वह स्वरूप दें। उन अभिजनों की हैसियत की तुलना करना विडंबनापूर्ण और दिलचस्प है जिन्होंने अफ्रीका में एस्किथ कालेजों की स्थापना से पूर्व लंदन, पेरिस और वाशिंगटन में शिक्षा पाई थी। इन लोगों ने राष्ट्रवाद और अफ्रीका से बाहर अफ्रीकावाद (पैन अफ्रीकनिज्म) की नेग्रीच्यूड और अफ्रीकी व्यक्तित्व की अवधरणा के रूप में सांस्कृतिक पहचान के जरिए राजनीति की मशाल जलाई थी। वे अफ्रीकी भाषाएँ बोलते हों या नहीं पर उन्होंने इन भाषाओं को सम्मान दिया। जूलियस न्येरेरे ने किस्वाहिली भाषा में शेक्सपीयर का अनुवाद किया, क्वामे एन्क्रूमा ने ब्यूरो ऑफ अफ्रीकन लैंग्वेजेज की स्थापना की, बिरागो ड्योप और चेख ड्योप ने अफ्रीकी भाषाओं की केंद्रीय स्थिति पर जोर दिया और इन सबने अफ्रीका के आत्मउद्धार के लिए इसे जरूरी बताया। लेकिन एस्किथ कालेजों से निकले लोगों ने किसी धार्मिक भाव की तरह अंग्रेजी को गले लगाया और इसे आधुनिकीकरण और विश्व समुदाय में सम्मान की भाषा माना। अनेक तरीकों से उन्होंने दलीलें दीं और खुद को सहमत कराने का प्रयास किया कि अंग्रेजी अब एक अफ्रीकी भाषा हो गई है।

इसके नतीजे सचमुच विरोधाभास से भरे हैं। अफ्रीका को स्वतंत्र और आधुनिक बनाने के विचारों से संबंधित अनुसंधान के लिए नए राष्ट्रों को इस शिक्षा प्रणाली ने जो जिम्मेदारी सौंपी है और जिसके लिए ये नए राष्ट्र अपनी कुल राष्ट्रीय आय की अच्छी खासी रकम इस पर खर्च करते हैं उसके फलस्वरूप आधुनिक शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में अत्यंत मेधावी लोग उभरकर आए हैं, लेकिन उन्होंने जो ज्ञान हासिल किया है उसका सारांश भी वे किसी अफ्रीकी भाषा में नहीं लिख सकते। इसमें कोई संदेह नहीं कि इन कॉलेजों ने खासतौर पर अपने उत्कर्ष के दिनों में उत्कट विद्वानों को पैदा किया। अफ्रीकी विद्वान जिन्होंने पहली डिग्रियाँ हार्टन एस्किथ मॉडल के कालेजों से हासिल कीं, अफ्रीका और विदेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में पाए जाते हैं। लेकिन वे वस्तुतः अलगाव में पड़े बुद्धिजीवी हैं, घर से भी निर्वासित और बाहर से भी या एक ऐसी जगह की तलाश में निर्वासित जिसे वे सही अर्थ में अपना कह सकें। एक सामूहिक सामाजिक निकाय के संदर्भ में वे दूसरों के लिए होने की स्थिति में हैं और उनका अस्तित्व खुद उनके खिलाफ और उस धरती के खिलाफ है जिसने उन्हें जन्म दिया। अफ्रीकीभाषी समुदाय एक ऐसी बौद्धिकता के लिए पैसे देता रहा जो कृषि हो या स्वास्थ्य या व्यापार अथवा जनतंत्र या वित्त किसी भी बारे में एक भी विचार वे उस भाषा में नहीं प्रस्तुत कर सकते जिसमें वे पैदा हुए। अफ्रीकी विद्वता का यह महान विरोधाभास खासतौर पर सबसे प्रखर रूप में अफ्रीकी साहित्य के निर्माण में देखा जा सकता है।

चूँकि नए कॉलेजों में शिक्षण के हर क्षेत्र में अंग्रेजी की मुख्य भूमिका थी इसलिए अंग्रेजी विभाग बेहद सम्मानित विभाग था और सच कहें तो यह शब्दों में बता पाना भी कठिन है कि अंग्रेजी अगर किसी की अच्छी हो तो उसे कितनी इज्जत मिलती थी। अंग्रेजी के छात्र अभिजनों में भी अभिजन थे और अंग्रेजी में फर्स्ट क्लास लाने का मतलब समान बौद्धिकता वालों के बीच पहला स्थान प्राप्त करना होता। अंग्रेजी साहित्य का इतिहास बकौल प्रोफेसर अबिओला स्पेंसर से स्पेंडर तक जाता था और पाठ्यक्रम में केंद्र में यह होता था। सभी नए कॉलेज अधिकांशतः लंदन विश्वविद्यालय से संबद्ध होते थे इसलिए इनमें वही इतिहास और वही लेखक पढ़ाए जाते थे। बात चाहे उगांडा में मैकरेरे विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की हो या नाइजीरिया में इबादान विश्वविद्यालय की, हर जगह स्थिति एक ही थी। यही वजह है कि इन विश्वविद्यालयों के विकसित होने का ऐस्बी ने जो वर्णन किया है उसमें मैं खुद को बहुत साफ तौर पर देख पाता था। मैं निश्चय ही हॉर्टन एस्किथ मॉडल का एक उत्पाद था जैसा कि 1950 और 1960 के दशक के लगभग सभी प्रमुख लेखक थे। वे सभी अंग्रेजी विभाग की उपज थे और उनकी शुरुआती प्रेरणा का स्रोत उन मॉडलों से उपजा था जिनके वे या तो प्रशंसक थे या जिनसे उनकी असहमति थी। इसे क्लार्क-बेडेकेरेमो ने एक बार फिर दि एक्जांपुल ऑफ शेक्सपीयर में बताया था। शुरुआती वर्षों में अगर सरसरी तौर पर अफ्रीकी कथा साहित्य की कुछ पुस्तकों के नाम देखें तो यह बात काफी स्पष्ट हो जाती है। चीनुवा एचेबे के दोनों उपन्यासों थिंग्स फॉल अपार्ट और नो लांगर ऐट ईज के शीर्षकों की प्रेरणा यीट्स के सेकंड कमिंग और टी.एस. इलियट के जर्नी ऑफ दि मागी से मिली है। मैंने खुद अपने पहले प्रकाशित उपन्यास वीप नॉट चाइल्ड शीर्षक की प्रेरणा वाल्ट व्हिटमैन से ली। मुझे पूरा विश्वास है कि ढेर सारी कविताओं और लंबे चौड़े कथानकों में टॉमस हार्डी, डिकेंस, डी एच लॉरेंस, जोसेफ कोनरॉड, टी.एस. इलियट और एजरा पाउंड की झलक मिल सकती है। अपने लेख नेम्ड फॉर विक्टोरिया, क्वीन ऑफ इंग्लैंड में चीनुवा एचेबे ने बताया है कि लिखने की प्रेरणा उन्हें सबसे पहले तब मिली जब उनका साबका कुछ ऐसे जबर्दस्त उपन्यासों से पड़ा जो अफ्रीका के बारे में थे। इनमें जायस केरी का उपन्यास मिस्टर जॉनसन भी था। इन उपन्यासों को पढ़ने के बाद उन्होंने तय किया कि 'हमें जो कहानी लोगों को बतानी है उसे और कोई नहीं बता सकता भले ही वह कितना भी विद्वान क्यों न हो अथवा उसके इरादे कितने भी नेक क्यों न हों।' लेकिन यहाँ मैं इस बात से बहुत परेशान नहीं हूँ कि किस मॉडल ने हमारे ऊपर प्रभाव डाला बल्कि हमारी चिंता इस बात से है कि हमने उन मॉडलों पर किस भाषा में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। यह काफी विडंबनापूर्ण है कि हॉर्टन एस्किथ मॉडल की सबसे बड़ी उपलब्धि जहाँ अंग्रेजी में अफ्रीकी साहित्य के सृजन की थी वहीं यह एक ऐसा साहित्य था जो प्रायः अफ्रीकी छवि के सकारात्मक स्वीकार के ब्लाइडेनबादी नजरिए से प्रेरित था :

'सभी अंग्रेजीभाषी देशों में (ब्लाइडेन ने 1983 में यह लिखा था), किसी भी प्रतिभाशाली नीग्रो बच्चे के दिमाग में अपनी प्रारंभिक पुस्तकों-भूगोल, यात्रा वृत्तांत, इतिहास, उपन्यास आदि में नीग्रो के वर्णन को पढ़कर विद्रोह धधक उठता है। हालाँकि नीग्रो के हास्यास्पद छवि चित्रण और गलत प्रस्तुतीकरण से उसके अंदर एक सहज वितृष्णा तो पैदा होती है लेकिन साल दर साल उसे ये चीजें पढ़नी ही पड़ती हैं। स्कूल छोड़ने के बाद उसे यही बातें अखबारों में देखने को मिलती हैं और कुछ दिनों के बाद उसे लगता है कि उसकी नस्ल के बारे में जो कहा जा रहा है वह ठीक ही है। वह इसे स्वीकार करने लगता है - उसी बात को जिसे शुरू के दिनों में उसने हमेशा खारिज किया था। किसी चीज को बार बार दुहराने का ऐसा ही असर होता है... खुद अपने बारे में इन उलटी सीधी और झूठ पर आधारित बातों को स्वीकार करने के बाद वह इस नतीजे पर पहुँचता है कि सम्मानित जीवन की ऊँचाई तक पहुँचने की वह तभी उम्मीद कर सकता है जब उन चीजों को स्वीकार कर ले जो बिलकुल उससे मेल नहीं खातीं और जो उसकी रुचियों के लिए पूरी तरह अजनबी हैं।' (न्गुगी की पुस्तक राइटर्स इन पॉलिटिक्स, 1981, 1997)।

नए कॉलेजों के प्रारंभिक उत्पादों में से एक के बयान में इस तरह के शब्दों और भावनाओं की गूँज सुनाई देती है। चीनुआ एचेबे ने अपने प्रसिद्ध लेख 'दि नॉवेलिस्ट ऐज ए टीचर' में 1963 में लिखा कि 'अगर मैं ईश्वर होता तो नस्ली हीनता को सबसे बुरा और अस्वीकार्य मानता चाहे कारण जो भी हो।' उन्होंने फिर आगे लिखा कि शिक्षक के बतौर अपनी लेखक की भूमिका को उन्हें अगर परिभाषित करना होता तो वह इस बात का प्रयास करते कि उनका समाज 'खुद के अंदर विश्वास करना सीखे और अपमान और आत्मकुंठा की वर्षों की हीन भावना से अपने को मुक्त करे।'

इस प्रकार इस साहित्य की दो अंतर्विरोधी प्रवृत्तियाँ थीं। यह प्रायः राष्ट्रवादी और नस्लगत गर्व की भावना से प्रेरित और संचालित थीं जो ब्लाइडेन मॉडल की अवधारणाओं में सहज रूप से शामिल था तो भी इसके मॉडल प्रायः कक्षा में पढ़ाए जाने वाले अंग्रेजी के लेखक होते थे। किसी यूरोपीय भाषा में लिखे होने के बावजूद अफ्रीका से बाहर रहने वाले आम आदमी के लिए यह अफ्रीका को काफी निकट से पहचानने वाला साहित्य होता था। जब वोले सोयिंका को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला तो उनकी इस उपलब्धि और कामयाबी का जश्न अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में मनाया गया। चीनुवा एचेबे, अमा अता आइडू, क्वाई अरमा जैसे लेखकों की ख्याति समूचे अफ्रीका में है। इनके उपन्यासों के प्रेरणास्रोत 19वीं शताब्दी के विक्टोरियन उपन्यास रहे हैं जिनमें एक सहज यथार्थवाद और सीधी सादी वर्णनात्मकता होती है। इनके वृत्तांत प्रायः परंपरागत होते हैं और कहीं कहीं इनमें दुहराव भी होता है तो भी अपने वर्णनों की दृष्टि से 20वीं शताब्दी के अफ्रीका में काफी लोकप्रिय रहे हैं। जिस मॉडल की तर्ज पर इनकी रचना की जाती है उनके मुकाबले ये अपने स्वरूप और सार में एक भिन्नता लिए होते हैं और इनमें एक नयापन भी होता है।

इनमें किस तरह का नयापन होता है? ये मॉडल उसके नहीं हो सकते हैं जिनसे इन्होंने रोष में अथवा आह्लाद में प्रेरणा ली थी। और इससे हमारे सामने और विरोधभास प्रकट होता है। इसकी वजह यह है कि नएपन की वजह से इनका जो अलग स्वरूप दिखाई देता है वह अफ्रीकी भाषा और उन भाषाओं में विद्यमान अत्यंत समृद्ध मौखिक साहित्य की महान विरासत का योगदान है। इन भाषाओं में प्रतीकों, मुहावरों, पहेलियों, वीरतापूर्ण कहानियों आदि का बहुत बड़ा भंडार है जहाँ से यूरोपीय भाषाओं में लिखा जाने वाला यह साहित्य अपनी रचनात्मकता को समृद्ध करता है। एचेबे ने थिंग्स फॉल अपार्ट में लिखा कि इबो लोगों के बीच मुहावरे खजूर से बनी शराब की तरह हैं जिनकी मदद से शब्दों को गटका जाता है।

ये भाषाएँ ऐसे जादुई झरने हैं जिनसे अंग्रेजी या फ्रेंच या पुर्तगाली भाषा में लिखा गया अफ्रीकी साहित्य निकलता है और इसे निरंतर युवा बनाए रखता है। नकल और वास्तविक जीवन के चरित्रों की बोलचाल में यूरोपीय भाषाओं के इस्तेमाल की वजह से जो पीलापन पैदा होता है वह अफ्रीकी भाषाओं से प्राप्त रक्त और स्फूर्ति से और भी ज्यादा ताजगी से भर उठता है।

ये सारी बातें यानी अफ्रीका से बाहर तक इसकी पहुँच, इसकी नस्लगत वर्ग की भावना, मानवीय और जनतांत्रिक मूल्यों के लिए इसकी ललक - ये सब वे बातें हैं जिन्हें मैं सबसे ज्यादा सकारात्मक मानता हूँ और जो मुझे उस अफ्रीकी साहित्य में दिखाई देती हैं जिसे यूरोफोन (यूरोपीय भाषाभाषी) साहित्य कहा जाता है। इसकी यह विशिष्टता निश्चय ही हार्टन मॉडल की सीधी सादी उपज है इसलिए इसमें जो कुछ भी सकारात्मक होगा वह हार्टन की इस उम्मीद को न्यायोचित ठहराएगा कि क्लासिक साहित्य और पश्चिमी सभ्यता की महान उपलब्धियाँ अफ्रीकी पाठकों के बीच श्रेष्ठता को जन्म देंगी।

लेकिन यूरोफोनिज्म की खुद की न तो कोई भाषा है और न इसका कोई सांस्कृतिक जगत है। यह जिस साहित्य को पैदा करता है - यूरोफोन लिटरेचर - उसे इन भाषाओं को बोलने वाले बाजार में इसको पहचान देते हैं लेकिन इसमें अफ्रीकी जीवन और भाषाओं से निकले बिंबों का भंडार है। इसलिए इसका एक नकारात्मक और लगभग परजीवी पक्ष भी है। किसी जोंक की तरह यह रक्त और शक्ति अफ्रीकी भाषाओं से चूसता है और उन लोगों को बदले में कुछ भी नहीं देता है जिन्होंने इन भाषाओं को जन्म दिया अथवा जिन्होंने उस मौखिक साहित्य को जिंदा रखा जिससे यह खुलकर इतना कुछ ले लेता है जिसके जरिए यूरोपीय भाषा में विश्वव्यापी स्तर पर लिखे जा रहे बाजार में अपनी पहचान स्थापित कर सके।

यूरोफोन अफ्रीकी साहित्य में दो प्रवृत्तियाँ सहज रूप से इससे जुड़ी हुई हैं जो हार्टन-एस्किथ मॉडल के तहत विकसित सभी विद्वानों के लिए सच हैं। एक तो इसकी रचनात्मक प्रवृत्ति है जो विद्वता है वह उसे अफ्रीकी विरासत से दूर ले जाती है और अफ्रीकी साहित्य और जीवन के अनेक पहलुओं पर महान कृतियों की रचना करती है जिनमें से अधिकांश को सारी दुनिया के पुस्तकालयों में पाया जा सकता है।

इस विद्वता का एक परजीवी पहलू भी है जो बस इतना ही जानता है कि किस तरह कुछ लिया जाए - उसे यह कभी पता नहीं चला कि उन भाषाओं और जनसमुदायों को कैसे कुछ वापस किया जाय जिनके नाम पर इन्होंने कला, विज्ञान और टेक्नोलॉजी में विश्व समुदाय के बीच अपने पांडित्य का डंका बजाया है। अफ्रीका के बारे में ज्ञान, अफ्रीका के बारे में इस महाद्वीप के बेटों और बेटियों द्वारा किए गए व्यापक शोधों, अनुसंधनों और खोजों के नतीजे वस्तुतः यूरोपीय भाषा के गोदामों में डाल दिए गए हैं।

अब हम हॉर्टन-ऐस्किथ मॉडल के निहितार्थों को देख सकते हैं। किसी को संपत्ति और यहाँ तक कि सत्ता से वंचित किया जा सकता है, लेकिन सबसे बड़ी वंचना उन साधनों से उन्हें वंचित कर देना है और इस प्रकार उस दृष्टि और रणनीति के विकास को रोक देना है जिसकी मदद से वे इसके विरुद्ध लड़ सकते थे। बेशक, इसके लिए हम उपनिवेशवाद को दोषी ठहरा सकते हैं और मैंने अपनी कई पुस्तकों में दोष मढ़ने का यह काम किया भी है लेकिन इसे याद रखना चाहिए कि हमें उपनिवेशवाद को इस बात के लिए कठघरे में नहीं खड़ा करना चाहिए कि उसने वह काम नहीं किया जिसकी सचमुच उससे अपेक्षा नहीं थी। उपनिवेशवाद और औपनिवेशिक मॉडल कभी भी इस बात के लिए नहीं अस्तित्व में आए थे कि वे उपनिवेशों का इस तरह विकास करेंगे जिसका लाभ उपनिवेशों में रहने वाले लोगों को मिले। मैं समझता हूँ कि इसीलिए अब अफ्रीकी विद्वानों और विश्वविद्यालयों ने हॉर्टन-ऐस्किथ मॉडल और इसकी विरासत के रूप में इससे उपजी भाषा नीति पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है।

मैंने एक जगह कहा था कि यह बात अपने आप में कितनी अंतर्विरोधपूर्ण लगती है कि आज के अफ्रीका में और दुनिया के अन्य स्थानों में अफ्रीकी यथार्थ के बारे में लिखने वाले अफ्रीकी विद्वान उस परिवेश की भाषा के बारे में एक शब्द भी नहीं जानते जिसके वे विशेषज्ञ माने जाते हैं। आप क्या समझते हैं कि अगर मैं सच-सच यह कह दूँ कि मुझे फ्रेंच भाषा का एक भी शब्द नहीं आता तो यहाँ कैंब्रिज में मुझे फ्रेंच साहित्य के प्रोफेसर की नौकरी मिल जाएगी? लेकिन अफ्रीका और अन्य देशों के स्कूलों में ऐसे विशेषज्ञ भरे हुए हैं जो जरूरी नहीं कि अफ्रीकी हों, जरूरी नहीं कि वे अफ्रीकी हितों के प्रति सहानुभूति रखते हों, जरूरी नहीं कि वे प्रगतिशील हों और जिन्हें किसी अफ्रीकी भाषा की विशेषज्ञता की बात तो दूर उस भाषा से अपना परिचय भी न प्रदर्शित करना पड़े। वे बड़े पदों पर बैठे हैं और किसी अफ्रीकी भाषा की जरूरत के बिना आए दिन डॉक्टरेट की उपाधि से लैस लोगों को पैदा कर रहे हैं। विदेशों में जो संस्थाएँ हैं उन्हें दोषी ठहराना कठिन है क्योंकि वे तो वही कर रही हैं जो अफ्रीकी विश्वविद्यालयों में हो रहा है। इसका नतीजा यह है कि खुद अफ्रीका में शैक्षणिक क्षेत्र में अफ्रीकी भाषाएँ हाशिए पर पहुँचती चली जा रही हैं। वे खुद अपने देश के मैदान को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वे यूरोप की जुबान से संचालित होते हैं।

लेकिन यही बात विश्व स्तर पर भी अफ्रीकी भाषाओं के संदर्भ में सही है। 20वीं शताब्दी के विश्व समुदाय की संस्कृति और विचार पर व्यापक तौर पर मुट्ठी भर यूरोपीय भाषाओं का प्रभुत्व है। यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र और इसकी एजेंसियाँ अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यूरोपीय भाषाओं की केंद्रीयता को ग्रहण कर चुकी हैं। इस प्रकार अफ्रीकी भाषाएँ अपने अपने देशों में और विदेशों में बौद्धिक और राजनीतिक तौर पर अदृश्य हो गई हैं। उन्हें एक तरह की बौद्धिक और राजनीतिक मौत के लिए मजबूर कर दिया गया है।

इस संदर्भ में भाषाओं की मौत के मुद्दे पर हौनानी के-ट्रास्क के शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। अपनी पुस्तक 'फ्रॉम ए नेटिव डॉटर' में उन्होंने दलील दी है कि देशज भाषाओं के स्थान पर औपनिवेशिक भाषाओं के आगमन ने मृत भाषाओं को जन्म दिया है। लेकिन जिसे मृत कहा जा रहा है वे भाषाएँ नहीं बल्कि लोग हैं जिन्होंने अपनी भाषाएँ खो दीं और जो एक के बाद एक आने वाली पीढ़ियों तक अपनी मातृभाषा में बातें पहुँचाते रहे हैं। हर ओर ऐसा लगता था जैसे यूरोपीय भाषाएँ भगवद्गीता के इन शब्दों को चीखते चिल्लाते टूट पड़ी हों :

मैं मृत्यु हूँ
विश्व की विनाशक।

शारीरिक विलोप के अर्थ में जब हम मृत्यु को देखते हैं तो बहुत संकीर्ण हो जाते हैं। मृत्यु अनेक रूपों में आती है और सांस्कृतिक मृत्यु भी उतनी ही विनाशकारी होती है जितनी शारीरिक मृत्यु। इस सांस्कृतिक मृत्यु की संभावना को हम अफ्रीका में पहले से ही देख रहे हैं। पिछले चार सौ वर्षों में हमने देखा है कि पश्चिमी देशों में अफ्रीकी मूल के लोगों ने अपने नामों को पूरी तरह बदल दिया है और अब जोन्स, जेम्स ओर जेन्स के रूप में ही उनका अस्तित्व बचा हुआ है। आज खेलकूद में, शिक्षा के क्षेत्र में, विज्ञान और कला के क्षेत्र में जो भी उपलब्धियाँ हासिल होती हैं, यूरोपीय नाम प्रणाली और सांस्कृतिक व्यक्तित्व की इस पद्धति को ही मजबूत करने के लिए होती हैं। इन नाम प्रणालियों के मूल में निस्संदेह भाषा है। अपनी भाषाओं के गुम हो जाने से हम समूची नाम प्रणाली को गुम कर देंगे। और ऐसी हालत में जो भी ऐतिहासिक हस्तक्षेप होगा भले ही वह कितना भी क्रांतिकारी क्यों न हो, एक यूरोपीय नाम प्रणाली की सीमा के अंदर होगा और अच्छे या बुरे के लिए इसकी क्षमता को तीव्र करेगा। इस प्रकार अपने अपने क्षेत्र में वे जो कुछ भी करेंगे या करेंगी, उनके कार्यों से गोरे यूरोप के सांस्कृतिक व्यक्तित्व को ही प्रतिष्ठा मिलेगी।

मेरे लिए भाषा का सवाल पूरी तरह अपने खुद के अफ्रीकी होने के अस्तित्व के सवाल से जुड़ा है अथवा आप कह सकते हैं कि किसी भी समुदाय से वंचित होने के सवाल से जुड़ा है। इसी वजह से मैं यूरोफोनिज्म को अफ्रीका के विकास के लिए अत्यंत खतरनाक बौद्धिक प्रणाली मानता हूँ। इसके पीछे जो दलीलें दी जाती हैं उनका उद्देश्य विश्व के सांस्कृतिक नक्शे से अफ्रीकी व्यक्तित्व का पूरी तरह सफाया कर देना है। हम महज यूरोपीय भाषा प्रणाली की अनेक शाखाओं में से एक शाखा बन कर रह जाते हैं और फिर हमारे सामने एकमात्र संघर्ष यह बचता है कि किसी यूरोपीय समुदाय की सांस्कृतिक शाखाओं के बीच बराबरी की मान्यता वाली लड़ाई लड़ें।

शायद यही वह समय है जब अफ्रीकी विद्वानों को ब्लाइडेन नजरिए पर दूसरे ढंग से गंभीरता के साथ सोचना होगा। ब्लाइडेन-हेफोर्ड मॉडल उन अवधारणाओं को अस्वीकार करता है जो विश्व के साथ अफ्रीका के संबंधों के मूल में निहित है। उन धरणाओं को अस्वीकार करता है जो ज्ञान, आधुनिकता, आधुनिकता का भाव, सभ्यता, प्रगति, विकास आदि को यूरोपीय जुबान की उपलब्धि मानता है। अफ्रीका में और दुनिया में सैकड़ों भाषाएँ हैं और इनमें से हर भाषा के पास स्मृतियों, विचारों और अनुभवों का ऐसा अद्भुत भंडार है जो मानव समुदाय के लिए बेहद उपयोगी है। यह सही है कि सूचना प्रौद्योगिकी में आज जो क्रांतियाँ हो रही हैं उनसे सारी दुनिया मैक्लुहान के शब्दों में एक ग्लोबल विलेज बन गई है। लेकिन इसी ग्लोबल विलेज ने मानव समुदाय के विस्तार की अपार संभावनाएँ भी खोल दी हैं। शैक्षिक और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं को सबसे पहले आगे आना चाहिए और विश्व की विविध भाषाओं में यथार्थ और ज्ञान के अस्तित्व के बारे में विश्व समुदाय को संवेदनशील बनाना चाहिए। बेशक इसमें कुछ ऐसी नीतियों को कार्यान्वित करने में व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं जो भाषाओं की बहुलता और विविधता को पूरी तरह महसूस करे लेकिन ज्ञान की विभिन्न शाखाओं को सचेत ढंग से इस बात का प्रयास करना चाहिए कि वे यूरोप के अलावा अन्य स्थानों में भी विभिन्न भाषाओं में ज्ञान के अस्तित्व को स्वीकार करें और इससे लाभ उठाने की कोशिश करें और इसी प्रक्रिया में विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद कायम करने में मदद करें। भाषाओं के बीच संवाद निश्चय ही उस भाषा को कुछ प्रदान करने का एक तरीका है जिससे हम जीवन ग्रहण करते हैं। उस दिशा में प्रयास भी किए जा रहे हैं। 1966 में स्पेन के बार्सिलोना में मैंने एक सम्मेलन में भाग लिया जिसे आंशिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय संस्थान 'पेन' ने आयोजित किया था और जिसमें एक ऐसे मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा की गई जो छोटी और बड़ी भाषाओं के बीच समानता और संवाद की जरूरत को स्वीकार करती थी।

लेकिन अफ्रीका के लिए भाषाओं का सवाल अब इतने ही तक सीमित नहीं रह गया है कि दुनिया को भाषाओं की बहुलता के प्रति संवेदनशील बनाया जाए। यह मामला अब पूरी तरह हमारे अस्तित्व से जुड़ गया है। और यही वजह है कि मैंने हमेशा इसे अफ्रीकी विद्वानों और लेखकों और विश्वविद्यालयों के सामने मुख्य चुनौती के रूप में स्वीकार किया है - एक ऐसी चुनौती जो हमें पथ प्रदर्शक की भूमिका के लिए मजबूर करे। यही वह चेतना थी जिसने मुझे अपने रचनात्मक कार्यों के लिए गिकुयू भाषा की ओर मोड़ दिया और अब मैं वापस नहीं आ सकता। मैं न्यूयार्क विश्वविद्यालय में काम करता हूँ और मैंने अभी तुरंत गिकुयू भाषा में लिखे जा रहे 1,142 पृष्ठों के अपने एक उपन्यास में चौथी बार संशोधन का काम समाप्त किया है। इस उपन्यास का मोटे तौर पर शीर्षक गिकुयू में 'मुरोगी वा कागूगो' होगा जिसे अंग्रेजी में 'दि विजार्ड ऑफ दि क्रो' नाम दिया जाएगा। मैंने न्यूयार्क युनीवर्सिटी की मदद से गिकुयू भाषा में प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका की भी स्थापना की है जिसमें विकास के हर पहलू पर मैं शोध पत्र प्रकाशित करूँगा और यह उम्मीद करूँगा कि यह पत्रिका अफ्रीकी भाषाओं में और भी पत्रिकाएँ प्रकाशित होने के लिए प्रेरणा का काम करेगी। इसके अलावा मैं इस बात की भी प्रबल संभावना देख रहा हूँ कि इस तरह की पत्रिकाओं के जरिए अनुवादों के माध्यम से परस्पर आदान प्रदान विकसित होगा और अन्य अफ्रीकी भाषाओं के बीच संवाद की स्थिति बनेगी। नई दशाब्दी की शुरुआत में जनवरी में इरीट्रिया के अस्मारा शहर में साहित्य और अफ्रीकी भाषाओं पर एक सम्मेलन होने जा रहा है। इस सम्मेलन में अफ्रीका के विभिन्न देशों से वे लेखक और विद्वान भाग लेंगे जो अफ्रीकी भाषाओं में लिखते हैं और जो अफ्रीकी भाषाओं, ज्ञान और विद्वता से जुड़े सवालों से जूझ रहे हैं और जो यह मानते हैं कि नई दशाब्दी में अफ्रीकी भाषाओं को प्रकट रूप से दिखाने में उनकी भूमिका होनी चाहिए। वे यह भी मानते हैं कि अफ्रीकी भाषाओं के खिलाफ जो धरणा बनाई गई है उनसे इन्हें मुक्ति मिलनी चाहिए।

मैंने इस लेख के प्रारंभ में एरिक एस्बे के एक भाषण को उद्धृत किया था जो उन्होंने हॉर्वर्ड में दिया था। 1964 में प्रकाशित उनकी पुस्तक की शुरुआत में ही दो उद्धरण हैं। इनमें से एक 1934 में भारत के गवर्नर जनरल को लिखे पत्र से लिया गया है जिसमें उन्होंने एलान किया है कि भारत पर वे जिस तरह की शिक्षा व्यवस्था थोपना चाहते हैं उसमें विज्ञान, कला, दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में वही चीजें पढ़ाई जानी चाहिए जो यूरोप में पढ़ाई जाती हैं। संक्षेप में कहें तो यूरोपीय ज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए। यह एक तरह का हॉटर्न मॉडल है। दूसरा उद्धरण घाना विश्वविद्यालय के 1959 के चार्टर से लिया गया है। उस समय तक घाना स्वतंत्र हो गया था और इस चार्टर में यह माना गया था कि यह विश्वविद्यालय दुनिया के अग्रिम विश्वविद्यालयों में से एक होगा। अफ्रीकी शिक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण होने के नाते यह अफ्रीकी विचार, अफ्रीकी विद्वत्ता और अफ्रीकी विकास के क्षेत्र में नेतृत्व देगा। उस उत्तम विचार को आज भी अनेक अफ्रीकी संस्थाएँ और अफ्रीकी विद्वान मानते हैं। लेकिन अफ्रीकी भाषाओं का सवाल विचार, विद्वत्ता और विकास के मामले में उस नेतृतव के लिए बुनियादी शर्त है और मैं उम्मीद करता हूँ कि सभी अफ्रीकी विद्वान और लेखक इस पर ध्यान देंगे। हमें फिर उस जादुई झरने की ओर वापस जाना चाहिए और वह सब हासिल करना चाहिए जो इस महाद्वीप में सामाजिक परिवर्तन के वास्तविक कारकों को सत्ता और ज्ञान प्रदान करते हैं - सामान्य पुरुषों और महिलाओं को जो संभवतः अपनी ही भाषा में बातचीत करते-करती हैं। जब अफ्रीकी लेखक अपने अस्तित्व के होने के एकमात्र तरीके के रूप में यूरोफोनिज्म को अस्वीकार कर देंगे, वे सार और स्वरूप दोनों में अपने साहित्य में वास्तविक क्रांति ला सकेंगे। वैसी हालत में उस जादुई झरने से हमेशा कुछ ताकत और प्रेरणा लेने की बजाए हम अन्य किसी भी स्रोत से कुछ भी ले सकते हैं और उस झरने में योगदान कर सकते हैं। हम अपनी दुनिया से असंबद्ध हुए बिना समूचे विश्व से जुड़ सकते हैं। और तब गुयाना के मार्टिन कार्टर के साथ अफ्रीका कह सकेगा :

मैं आता हूँ कल के निग्गर यार्ड से
उत्पीड़क की नफरत को फाँदते हुए
और अपनी खुद की पीड़ा को भी।
मैं आता हूँ दुनिया में अपनी आत्मा पर खरोंचे लिए
शरीर पर घाव और हाथों में क्रोध लिए
मैं पलटता हूँ पन्ने लोगों के इतिहास के और जनता की जिंदगी के।
मैं जाँचता हूँ चिनगारियों की बरसात और सपनों की संपदा।
मैं खुश हूँ वैभव से और दुखी हूँ दुखों से।
समृद्ध हूँ समृद्धियों से और निर्धन हूँ खोए लोगों से।
गुजरे कल के निग्गर यार्ड से मैं आता हूँ अपने बोझ के साथ
आने वाले कल की ओर मैं मुड़ता हूँ ताकत के साथ।

मैं आज पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा शिद्दत के साथ महसूस करता हूँ कि अफ्रीका को अपनी भाषाओं और अपने लोगों का उपयोग एक ताकत के रूप में करना चाहिए जिसकी मदद से वह भविष्य में छलाँग लगा सकता है। 21वीं सदी में प्रवेश के समय अफ्रीकी विद्वानों और लेखकों को रास्ता दिखाना चाहिए।

संदर्भ ग्रंथ :

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(समकालीन तीसरी दुनिया, दिसंबर , 2013 से साभार)


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हिंदी समय में न्गुगी वा थ्योंगो की रचनाएँ