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उपन्यास

अथ मूषक उवाच
सुधाकर अदीब


जनपद की कचहरी के दो भाग थे। एक कलक्टरी कचहरी। दूसरी जजी कचहरी। मैंने देखा, कलक्टरी कचहरी में तीन तरह के मजिस्ट्रेट थे - बड़ा, मँझला और छोटा। बड़ा, मँझला और छोटा। बड़ा वाला मँझले को आदेश देता था। मँझला वाला छोटे को आदेश देता था। छोटा मजिस्ट्रेट सब काम करता था। लेकिन छोटा वाला काम करने के साथ-साथ मँझले से इस बात को लेकर सशंकित रहता था कि यह हमेशा अपनी बंदूक उसके कंधे पर रख कर दागता है। अगर कभी निशाना गलत बैठ गया तो मँझला मजिस्ट्रेट तो बंदूक उसके हाथ में थमाकर रफूचक्कर हो जाएगा। उधर मँझला मजिस्ट्रेट सोचता था कि यह बंदूक तो छोटे को ही चलानी चाहिए, मगर बड़ा हर आदेश उसे ही देता है। ऐसी दशा में अगर गाड़ी फँस गई तो बड़ा छोटे के साथ-साथ कहीं उसकी भी खबर न ले ले। इसलिए मँझला ऊपर से मिलने वाले आदेशों को किसी छूत के रोग की भाँति बिना एक पल गँवाए छोटे की टेबल पर भेज देता था। इस तरह मँझले और छोटे के बीच इन दिनों शीतयुद्ध चल रहा था।

अंग्रेज कह गए थे कि विभाजन करके राजकाज चलाना सर्वश्रेष्ठ प्रशासनिक नीति होती है। बड़े मजिस्ट्रेट को यह नीति आज भी याद थी। और इसीलिए वह एक सफल अधिकारी थे। 'कानून' और 'व्यवस्था' दोनों चकाचक चल रही थीं। कलक्ट्रेट कार्यालय भी 'गज-गति' से चल रहा था।

जजी कचहरी का हालचाल और भी दिव्य था। अदालतों के कारीडोरों से लेकर बार-भवन तक अधिवक्तागण की चहलकदमी देखते ही बनती थी। मुकदमों का कामकाज भले ही तेज रफ्तार से न चल पाता हो, किंतु अधिवक्ता संघ में गहमागहमी दिनोदिन बढ़ती जाती थी। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्व के मसलों से लेकर छोटी-सी-छोटी बात तक वहाँ नित्यप्रति चर्चा का विषय हुआ करती थी। वादकारी अपने दुःख-दर्द से कम अधिवक्ताओं की विश्वव्यापी चिंताओं से अधिक परेशान रहा करते थे। अधिवक्ताओं के शेड्स में रखे उन तख्तों पर वादकारियों की भेंट वकील साहब से कम और उनके मुंशियों से ही ज्यादातर हुआ करती थी।

दूर-दूर के देहातों से आए वादकारी दिन-भर गुड़-चला-लाई खाकर और नल का पानी पी पीकर अपनी पुकार का अदालतों के बाहर इंतजार किया करते थे। पुकार पड़ने पर नजराना-शुकराना अदा करते हुए वकील साहब को बुलाने भागकर जाते। वकील साहब अधिवक्ता संघ की बैठक में व्यस्त रहते और मुंशी जी पेशकार से अगली तारीख दिलवाने की जुगाड़ बैठाते। इस प्रकार हर बार अगली तारीख पड़ जाती।

इस कचहरी में फौजदारी वादों का निर्णय युवा वादकारी के प्रौढ़ वादकारी बनने तक और प्रौढ़ वादकारी की वृद्धावस्था आ जाने तक चलता रहता था। जबकि दीवानी वादों से वादकारी के लड़कों के बाद उसके पोतों-पड़पोतों तक लड़ने की स्वस्थ परंपरा का निर्वाह भी यहाँ सम्यक् रूप से हो रहा था।

टंडन साहब शहर के एक सुप्रसिद्ध वकील तो थे ही, किंतु पिछले दिनों जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने जाने के बाद से उनका कद एकाएक और ऊँचा उठ गया था। यद्यपि अपने अध्यक्ष चुने जाने के प्रस्ताव का उन्होंने स्वयं ही भरपूर प्रतिरोध किया था, लेकिन अधिवक्ताओं के एक बहुत बड़े वर्ग के दबाव के आगे अंततः उन्हें झुकना पड़ा था और अध्यक्ष-पद, जिसे वह 'काँटों भरा ताज' की संज्ञा शुरू से दिया करते थे, स्वीकार करना ही पड़ा।

आजकल मैं टंडन साहब के ही घर का मेहमान था। नगर में 'आरक्षण विरोधी आंदोलन' की लहर आई हुई थी। इसलिए स्कूल-कॉलेज और दफ्तरों के साथ-साथ कचहरी भी बंद थी। अथवा यों कहा जाए कि वकीलों ने बंद करा रखी थी। टंडन साहब दिन-भर अपने बँगले के बाहरी बरांडे के कोने में स्थित अपने स्टडी रूम में पधारे हुए बार के सदस्यों से ताजा स्थितियों पर विचार-विमर्श करते थे। या फिर खाली समय में मुकदमों की फाइलों से जूझते रहते थे। और उधर मैं उनके किचन में पकने वाले स्वादिष्ट व्यंजनों का लुक-छिपकर मजा लूटा करता था।

शाम होते ही वकील साहब की दोनों लड़कियाँ, पत्नी और यहाँ तक कि बूढ़े माँ-बाप भी सबके-सब टी.वी. के सामने जम जाते और आधी रात तक उसी कमरे को ड्राइंगरूम, बेडरूम, डाइनिंग रूप तथा स्टडी रूम के रूप में इस्तेमाल करते। सब पर आजकल 'केबिल टी.वी. नेटवर्क' का भूत सवार था। इन दिनों अनेक प्राइवेट कंपनियों ने जनता के मनोरंजन का ठेका ले रखा था। 'सांस्कृतिक उत्थान' के इस महान दौर में सरकारी दूरदर्शन को भी कुछ-कुछ उसी तरह का जुकाम हो चला था। इन्हीं सबके बीच एक नया धमाकेदार टी.वी. प्रसारण कुछ दिनों से चला था। उसका नाम था सी.टी.वी. अर्थात चकल्लस टी.वी.।

चकल्लस टेलीविजन में 'चुम्मा-चुम्मा' से लेकर 'चोली' और 'लंगोट' तक पर फिल्माए गए फिल्मी गीतों के कार्यक्रम आजकल दिखाए जाते थे। दर्शकों का सौंदर्य बोध कल्पना-जगत् को छोड़कर इतना यथार्थवादी हो गया था कि सुमित्रानंदन पंत की 'एक वीणा की मृदु झंकार' को लोग भूल चुके थे। अब तो उन्हें जैसे विशुद्ध मांसल देह ही संतुष्ट कर सकती थी। 'आधुनिकता' अपने चरम बिंदु तक शायद इसी तरह पहुँचा करती होगी। सारे प्रयास उसी की भूमिका जैसे लगते थे।

टी.वी. सीरियलों में नारी-पुरुष के अंतःसंबंधों को दिखाया जाना ही अब पर्याप्त नहीं माना जाता था। विज्ञापन-व्यवसाय की कृपा से 'ताकत की गोलियों' और 'चिकनाईयुक्त कंडोम' के उन्मुक्त विज्ञापन भी दर्शकों को न केवल तृप्ति प्रदान करते थे बल्कि उन्हें बेहतर ढंग से सुरुचिसंपन्न भी बनाते थे। भला हो प्राचीन कालीन 'कोकशास्त्र-रचयिता' का। अब न जाने उस बेचारे की आत्मा किन-किन भोगों को भोग रही होगी।

'साँप और नेवला', 'फटीचर जासूस' जैसे न जाने कितने प्रचुर बौद्धिकता एवं मनोरंजन से युक्त सीरियल दर्शकों के ज्ञान और आनंद दोनों की ही तीव्र गति से अभिव्यक्ति कर रहे थे। इन सीरियलों की एक प्रमुख विशेषता यह भी थी कि जैसे ही कोई गुदगुदी-भरा या खुजली-भरा क्षण छोटे पर्दे पर आता, टेलीविजन के अंदर बैठे आयातित दर्शक भरभरा कर हँस पड़ते। किसी-किसी क्षण वे पुरजोर तालियाँ बजाने लगते। या फिर परम आह्लाद की स्थिति में मुख से सियारों की भाँति कुछ समवेत स्वर निकालने लगते। शुरू-शुरू में तो मैं इन सियार-स्वरों से भयभीत हो उठा, परंतु जब उन नकली स्वरों की असलियत मैंने जानी तो मैं शीघ्र ही सहज भी हो गया।

इस समय भी कोई हास्यास्पद सीरियल आ रहा था परंतु वकील साहब के इकलौते लड़के संजय टंडन को ऐसे कार्यक्रमों में कोई रुचि नहीं थी। वह ड्राइंगरूम में एक कोने में लगी अपनी स्टडी टेबल पर झुका हुआ अध्ययन में व्यस्त था।

कॉलबेल बजी। थोड़ी देर बाद पुनः बजी। किसी का ध्यान आगंतुक की ओर नहीं था। सब टी.वी. में मस्त थे। संजय ने ही उठकर ड्राइंगरूम का दरवाजा खोलकर बाहर झाँका।

''अरे मनोज, तुम?'' उसने कहा - ''इलाहाबाद से कब लौटे?''

मनोज सिंह भीतर आया। वह संजय का घनिष्ठतम मित्र था।

''आज ही।'' आते ही उसने कहा और उस पुराने तथा विशालकाय सोफे पर पसर गया, जिसके स्प्रिंग ढीले हो चुके थे। जिस पर आच्छादित हरे रंग का कवर जगह-जगह से बदरंग हो चला था। सोफे पर पसरने के बाद मनोज सिंह उसके उछाल से काफी देर तक ऊपर-नीचे हिलता रहा।

उस सोफे को लेकर वकील साहब की पत्नी अक्सर नाक-भौं सिकोड़तीं तथा उसे बदलकर नया खरीदने की पेशकश करती रहती थीं, लेकिन वकील साहब पत्नी से इस बिंदु पर सहमत नहीं हो पाते थे और कहते थे -

''देखो प्रिये!... तुम नहीं समझती... यह बाबा आदम के जमाने का सोफा मुगलई- शानोशौकत का प्रतीक है।''

''अरे भाड़ में गई तुम्हारी मुगलई शानोशौकत। इतना मनहूस दिखने लगा है ये कि किसी कायदे के मेहमान को बैठाते हुए भी शर्म महसूस होती है।''

''इतने ऊँचे और इतने लंबे-चौड़े सोफे को तुम मनहूस कहती हो! ... किसी बड़े से बड़े आदमी के घर भी देखा है तुमने ऐसा सोफा? ... खैर जो भी हो, मैं अपनी जिंदगी में इसे बदल नहीं सकता।''

''क्यों? श्रीमती टंडन विस्फारित नेत्रों के लगभग चीखती हुई कहतीं।

''क्योंकि वह हमारा पुश्तैनी सोफा है। इस पर बैठकर मेरे पिता ने वकालत की। उनसे पहले उनके पिता ने ऑनरेरी मजिस्ट्रेटी की। अब मैं वकालत कर रहा हूँ। मेरे बाद संजय भी...''

''संजय वो सब नहीं करेगा जो तुम करते हो। उसकी बात तुम छोड़ो। यह घटिया चीज तुम्हें बदलनी होगी।''

''यह तुम क्या रोज-रोज घर की चीजें बदलने को कहती हो। फ्रिज बदल दो। टी.वी. बदल दो। यह सोफा बदल दो। तुम्हें विनी और मिनी की शादी नहीं करनी है क्या? दहेज कहाँ से आएगा?''

''अच्छा? तुम्हें विनी और मिनी के दहेज की इतनी चिंता है इसीलिए इतनी कंजूसी? ... तो फिर यह बताओ कि यह जो अपनी खटारा कार लिए घूमते हो इसे बेचकर कोई स्कूटर क्यों नहीं खरीद लेते। कम से कम सैकड़ों लीटर पेट्रोल की हर साल बचत हो जाएगी।''

''देखो भई... कार तो हमारी अभिजात्यता का प्रतीक है। कचहरी में यह मेरी पोजीशन की सूचक है ... अगर यह न रही तो सोसाइटी में हमें कौन पूछेगा? हमारे घर में अच्छे-अच्छे रिश्ते आने की संभावनाएँ भी कम हो जाएँगी।''

मुझे चूहे ने भी इन दिनों अपना घर उसी विवादित सोफे के भीतर बना लिया था। अपने फुर्सत के क्षणों में मैं उसी में घुसा-घुसा टंडन परिवार की गतिविधियों का जायजा लिया करता या फिर जीवन की अनंत संभावनाओं की कल्पनाएँ किया करता।

मैंने महसूस किया था कि संजय टंडन का एक बिल्कुल अलग प्रकार का लड़का था। वह इस समय एम.ए. उत्तरार्ध का छात्र था और घर से कॉलेज और कॉलेज से घर तक ही स्वयं को अधिकतर सीमित रखता था। वह जितने समय घर पर रहता, सबसे अलग-थलग रहता और अपना अधिकांश समय मोटी-मोटी किताबों में उलझे रहने में व्यतीत करता। एक छोटा-सा 'टू-इन-वन' उसकी टेबल पर रहता था। उससे वह कभी-कभी संगीत सुनता था। संगीत में भी मैंने उसे फिल्मी गाने सुनते कभी नहीं देखा था। वह या तो गजलें सुनता था, या फिर पंडित जसराज अथवा भीमसेन जोशी का शास्त्रीय गायन। संजय नियमित रूप से समाचार भी सुनता था। उसमें भी बी.बी.सी. की खबरें विशेष ध्यान से सुनता था।

घर के प्रायः सभी सदस्य, वकील साहब को छोड़कर, संजय को कभी छेड़ते नहीं थे। उसकी बहनें तो उसकी गंभीरता से इतनी सहमी रहती थीं कि उसके सामने जल्दी कोई हँसी-मजाक भी आपस में नहीं करती थीं। अपने दादा-दादी का वह दुलारा था और माँ की आशाओं का केंद्र। लेकिन पिता के लिए हमेशा एक उलझन का विषय।

टंडन साहब उसे अपनी तरह का एक नामी वकील बनाना चाहते थे, लेकिन संजय के मन में कुछ और था। उसकी रुचि अदालतों के दाँव-पेच में न होकर सतत ज्ञानार्जन, पठन-पाठन और लेखन के अनंत आकाश में उड़ान भरने की थी। वह डिग्री कॉलेज में एक प्रवक्ता बनना चाहता था। एक चिंतक एवं स्वतंत्र लेखक बनना चाहता था।

इसीलिए बी.ए. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद जब उसे वकील साहब द्वारा एल.एल.बी. ज्वाइन करने की सलाह दी गई तो उसने अपनी माँ को ढाल बना लिया और वह सलाह ठुकरा दी। उसने भारतीय इतिहास में एम.ए. में प्रवेश लिया। अब उसके अध्ययन में इतिहास और उसके लेखन में भी इतिहास गहराई के साथ सामने आने लगा। उसकी कल्पना-शक्ति तो प्रखर थी ही, गहन अध्ययन के धरातल पर खड़ा होकर वह सामाजिक विषयों से हटकर अब ऐतिहासिक विषयों पर भी कहानियाँ लिखने लगा। उसकी ये कहानियाँ अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं और सराही जाने लगीं। इस तरह वह एक उभरते हुए इतिहास-कथा-लेखक के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाने लगा था।

''कैसी रही तुम्हारी आई.ए.एस. की मुख्य परीक्षा?'' संजय ने मनोज सिंह से पूछा।

''ठीक ही रही।'' मनोज सिंह ने अनमने भाव से उत्तर दिया।

''हूँ... ठीक ही रही। यह क्या बात रही? तुम्हारी तैयारी तो इस बार बहुत अच्छी थी।''

''हाँ, तैयारी अच्छी थी। परीक्षा भी मैंने उसी के अनुरूप ही दी। ... अगर मैं यह कहूँ कि पेपर्स बहुत अच्छे हुए तो उससे भी क्या होगा?''

''फिर तुम निराशावाद पर उतर आए'' - बात तो समझते हुए संजय ने कहा - ''मनोज! सारे रास्ते अंधी खाई की ओर नहीं जाते। ... यह बात तुम अपने मन से निकाल दो। तुम्हारा परिश्रम एक न एक दिन अवश्य सार्थक होगा।''

''किस सार्थकता की बात करते हो तुम? ... यह मेरा तीसरा अटेम्प है। यदि इस बार भी कुछ नहीं हुआ तो बस फिनिश।''

''क्यों? फिनिश क्यों? क्या आई.ए.एस. ही सब कुछ है? दुनिया में करने को और दूसरा कुछ भी नहीं? अभी तो अन्य सेवाओं में भी तुम्हारे...''

''रहने दो! रहने दो। तुम तो कहोगे ही यह सब कुछ, क्योंकि तुमने तो अपना एक सीधा-सादा रास्ता चुन लिया है। ... अरे, यह नौकरी की लाइन आरक्षण की किन-किन भूल-भुलैयों से गुजरती है यह तुम क्या जानो? ... हमारा अपराध यही है कि हम तथाकथित ऊँची जाति में पैदा हुए हैं। भले ही हमारे पुरखों को हमें पालने-पोसने के लिए ईंट-गारा ढोने से लेकर अपना पेट काटने तक का कैसा भी सफर तय करना पड़ा हो, मगर हमें अपने जीवन का लक्ष्य तय करने का कोई हक नहीं। जो हमें एड़ी-चोटी का जोर लगाने पर भी अत्यंत दुर्लभ है वह उन्हें सिर्फ जाति-विशेष के नाम पर आरक्षण की बदौलत सहज सुलभ है।''

''यह तुम सोचते हो मनोज कि उन्हें सहज सुलभ है। ऐसा वास्तव में हर्गिज नहीं है। उनमें से भी कितने प्रतिशत व्यक्ति ऐसे हैं, जो उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वास्तव में प्रयास करते हैं? या प्रयास कर सकने की स्थिति में हैं? ... अधिकांश व्यक्ति तो आज भी वहीं के वहीं हैं जहाँ वे सदियों पहले खड़े थे। वही धूल-मिट्टी और हाड़-तोड़ पसीना। अभाव और भूख। ... अगर उनमें से किसी को कुछ मिल भी रहा है तो प्रायः उन्हीं की संतानों को, जो स्वयं आरक्षण का लाभ लेकर ऊपर उठ चुके हैं।''

''इसी से तो मैं कहता हूँ कि यह आरक्षण क्यों और किसके लिए? हमारे संविधान-निर्माताओं ने जो व्यवस्था अल्प-काल के लिए दी थी उसे अनंतकाल तक चलाकर लोगों को मानसिक रूप से विकलांग क्यों बनाया जा रहा है? यह आरक्षण की बैसाखी कब तक चलेगी?''

''जब तक राष्ट्र के कर्णधारों के मस्तिष्क में वोट की राजनीति हावी रहेगी।'' संजय ने मुस्कराकर बात समाप्त करने की कोशिश की।

तभी विनी आकर दोनों के लिए चाय रख गई। मनोज ने विनी को कनखियों से देखा और किसी गहरी सोच में डूब गया।

कचहरी एक हफ्ते के अंतराल के पश्चात खुली। टंडन साहब ने दस बजे सुबह अपनी कार निकाली। उसकी बैटरी डाउन हो चली थी, मगर थोड़ा धक्का लगवाने के बाद वह स्टार्ट हो गई। मैं भी कार में सवार हो गया। कई दिन बाद कचहरी फिर से देखने की मेरी बड़ी प्रबल इच्छा थी।

कचहरी पहुँचते ही बहुत-से वकीलों ने टंडन साहब को घेर लिया। वह किसी भावी आंदोलन की रूपरेखा बनाने के लिए उन्हें बार-भवन में ले गए। टंडन साहब जाते-जाते एक वकील से, जो अपेक्षाकृत युवा था, कह रहे थे - ''देखो राजेश्वर! आज कचहरी इतने दिनों बाद खुली है। अभी हम कुछ दिन इंतजार कर सकते हैं।''

प्रत्युत्तर में राजेश्वर का कहना था - ''टंडन जी! मत भूलिए कि अब आप अध्यक्ष हैं और ऐसी बात आपको नहीं करनी चाहिए। आज तो...''

इधर मैं उन्हें छोड़कर कचहरी में उन्मुक्त रूप से विचरण करने लगा। मैंने देखा कि कुछ लोग जिलाधिकारी के कार्यालय के समक्ष उनके पोर्टिको में धरना दिए बैठे हैं। तीन आदमी फर्श पर बिछी एक दरी पर कंबल ओढ़े लेटे थे। दो आदमी पोर्टिको पर टंगे कपड़े के बैनर को फिर से खोलकर ठीक से बाँध रहे थे। बैनर पर लिखा था - 'क्रमिक अनशन द्वारा दादा साहब अर्जुनदास प्रतिमा स्थापना समिति।' उसी बैनर पर एक कागज नत्थी किया गया था, जिस पर स्याही से मोटा-मोटा लिखा था - 'आठवाँ दिन'। हुआ यों, कि ये बेचारे आफत के मारे पिछले सोमवार को अपनी माँग को लेकर कचहरी में अनशन पर बैठे। उसी दिन 'आरक्षण' को लेकर डिग्री कॉलेज के लड़कों और पुलिस के बीच झड़प हो गई। कई लड़के घायल हो गए। कुछ पुलिस वालों के भी सर फटे। नगर में तनाव फैल गया और जिलाधिकारी ने शनिवार तक के लिए सभी स्कूल-कॉलेज बंद करा दिए। अगले दिन पुलिस की ज्यादतियों के विरोध में बार एसोसिएशन में भी एक मीटिंग हुई। उसमें अदालतों का एक सप्ताह के लिए बहिष्कार करने का निर्णय लिया गया। फलतः कचहरी भी बंद हो गई। अब इन परिस्थतियों में इन अनशनकारियों को कौन पूछता?

आज सप्ताहांत के बाद पुनः कचहरी खुलने पर अनशनकारी पुनः चैतन्य हुए थे। उन्होंने अपने कई अन्य समर्थकों को भी बुलवा भेजा था। उन्हीं की प्रतीक्षा चल रही थी। अनशनकारियों की माँग थी कि उनकी कौम के उद्धारक एवं पथ-प्रदर्शक स्वर्गीय नेता दादा साहब अर्जुनदास की एक प्रतिमा कचहरी के पूर्वी सिरे पर स्थित उस तिकोने पार्क में स्थापित की जाए, जिस पर यहाँ का अधिवक्ता संघ अपना कब्जा बताता है।

कचहरी में बड़ी चहल-पहल थी। अनेक वादकारी वकीलों के तख्तों के आसपास मँडरा रहे थे। उनमें से कुछ अदालतों के गलियारों में धक्के खाते फिर रहे थे। आधे कर्मचारी दफ्तरों में थे। आधे बाहर खिली हुई धूप सेंक रहे थे। थाना-कचहरी के दलाल 'बकरों' की तलाश में चाय और पान की दुकानों पर धूनी रमाए थे।

सब पर एक उड़ी निगाह डालता हुआ मैं चलता गया।

राज्य कर्मचारी कल्याण निगम के डिपो पर भी अच्छी-खासी भीड़ थी। बाबू लोग अपना-अपना कार्ड और परचा सेल काउंटर पर पकड़ा रहे थे। तेल-साबुन-डालडा-चाय सभी कुछ सस्ते में उपलब्ध सामान का बंडल शाम को घर जाते समय उठाकर उन्हें घरवाली को रिपोर्ट देनी थी।

शिकायत काउंटर पर एक मैली-कुचैली पोशाक में खड़ा मरियल-सा आदमी शिकायत बाबू से अपनी एक महीना पहले की शिकायत की रसीद दिखाकर उसका परिणाम जानने का इच्छुक था। शिकायत बाबू का कहना था कि पंद्रह दिन बाद फिर से वह पता करने आए।

ए.डी.एम. (प्रशासन) के कार्यालय कक्ष के बाहर कई जीपें खड़ी थीं। उनके अर्दली से एक बंदूक का लायसेंसी पूछ रहा था कि - ''क्या अभी बहुत देर लगेगी?''

अर्दली का कहना था - ''हाँ! ... अधिकारियों की मीटिंग चल रही है।''

अंदर से कहकहों की आवाजें आ रही थीं।

कलक्ट्रेट के पिछवाड़े के प्रांगण में स्थित मैदान के आधे हिस्से में कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे। आधे हिस्से में दूर-दराज से आई हुई जनता अपनी गठरियों और झोलों के साथ धूप में विश्राम कर रही थी। चने-चबैने का अभी नंबर नहीं आया था। अभी तो पूरा निर्मम दिन पड़ा था, एक निरर्थक प्रतीक्षा के लिए।

घूमता-फिरता हुआ मैं कचहरी की बाउंड्री के नीचे से एक नाली के रास्ते बाहर निकल गया। बाउंड्री वॉल के किनारे-किनारे होता हुआ दूर तक घूमा। बाहर फुटपाथ का नजारा और भी वैविध्यपूर्ण था। तरह-तरह के दुकानदार। तरह-तरह के खरीददार। एक जगह काफी भीड़भाड़ थी। एक बड़ी-सी पगड़ी और गले में अनेक रंग की मालाएँ पहने एक वैद्यराज फुटपाथ पर चादर बिछाए अनेक प्रकार की जड़ी बूटियाँ और साँडे का तेल बेच रहे थे। उनसे कुछ हटकर एक ज्योतिषी महाराज लोगों को उनका भाग्य बता रहे थे। उन्होंने अपने सामने एक छोटा-सा पिंजरा धरा हुआ था। उसमें से लाल मुनिया चिड़ियाँ फुदक-फुदक कर बाहर निकलकर भविष्यवाणी से भरे लिफाफे अपनी चोंच से खींच-निकालकर प्रश्नों का समाधान करती थीं। एक अन्य फुटपाथिया रुचिकर साहित्य फैलाए बैठा था। किस्सा तोता-मैना, इंद्रजाल, जीजा-साली के किस्से, नर-नारी यौन विज्ञान, फिल्मी गाने, सोलह सोमवार, अकबर-बीरबल विनोद, अंग्रेजी बोलना सीखो। और भी कई व्यवसाई थे। तेल मालिश वाले, कान का मैल साफ करने वाले, दाँत उखाड़ने वाले।

मैं पुनः कचहरी के भीतर लौटा। राजकीय कोषागार के बाहर बूढ़े और बीमार पेंशनभोगी इंसान बिखरे पड़े थे। अगर उस बड़े-से भवन में घुसते ही एक संगीनधारी संतरी न दिखाई देता तो उस स्थान को देखकर आराम से किसी खैराती अस्पताल का धोखा हो सकता था। जीवन के शेष दिनों में जीवनयापन के लिए सरकारी सिक्कों के लिए हर महीने की जद्दोजहद।

कुछ दूर पर एक नीम के पेड़ के पास एक पुरानी एम्बेसडर कार खड़ी थी। उसकी छत पर एक वायरलेस एंटीना सींग की भाँति खड़ा था। सामने की ओर ए.डी.एम. (नगर) का बोर्ड लगा था।

ए.डी.एम. साहब के कार्यालय कक्ष में टेलीफोन की घंटी बजी। ए.डी.एम. साहब ने फोन उठाया। उधर से आवाज आई -

''डी.एम. सा'ब बात करेंगे।''

''हाँ, कराइए। ... नमस्कार सर! ... जी सर! ... जी सर! ... अच्छा सर! ... अभी देखता हूँ सर!''

ए.डी.एम. साहब ने फोन रखते ही घंटी बजाई। उनका अर्दली भीतर आया। आदेश दिया - ''सिटी मजिस्ट्रेट को बुला लाओ।''

तीन मिनट में सिटी मजिस्ट्रेट आ गए। ए.डी.एम. साहब ने चेहरे को और भी गंभीर बनाकर कहा - ''डी.एम. साहब का फोन आया था। ... मैंने पहले भी कहा था कि ये जो धरने वाले कलक्ट्रेट में जहाँ चाहते हैं वहीं बैठ जाते हैं यह ठीक नहीं है। ... हमें सख्त होना पड़ेगा। विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो अनुमति लिए बिना ही धरना-जुलूस-प्रदर्शन करने पर आमादा होते हैं...। अब ये लोग कौन हैं जो डी.एम. साहब के पोर्टिको में जम गए हैं?''

''पता नहीं सर!'' सिटी मजिस्ट्रेट ने कहा - ''मैं तो अभी एक हफ्ता नैनीताल से रिफ्रेशर ट्रेनिंग कोर्स करके लौटा हूँ। ... अभी दिखवाता हूँ।''

''हाँ, फौरन देखिए... अगर विदाउट परमीशन हों तो उन्हें तुरंत वहाँ से हटवाकर मुझे बताइए... डी.एम. बड़ा बुरा मान रहे हैं।''

सिटी मजिस्ट्रेट ने बाहर निकलकर अपना हैंड-हेल्ड-वायरलेस सेट 'ऑन' किया और कोतवाल को तत्काल कचहरी पहुँचने का आदेश दिया। कोतवाल दस मिनट में हाजिर। उसके पाँच मिनट बाद पेट्रोल कार भी हाजिर।

अनशनकारियों ने तब तक एक माइक लगा लिया था और उनका एक नेता भाषण दे रहा था -

''पूज्य दादा साहब अर्जुनदास अपने जीवन-भर इन भ्रष्ट अधिकारियों तथा भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे। अपना सारा जीवन उन्होंने गरीबी और शोषण के खिलाफ संघर्ष करने में बिता दिया। दादा साहब हमारी कौम के मसीहा थे। उन्होंने हमें जीना सिखाया। अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया...''

''आज जब इन जिलाधिकारी से हम उनकी प्रतिमा कचहरी में लगाने की बात करते हैं तो यह कहता है कि यहाँ जगह नहीं है। यह जगह सरकारी है। भाइयों और बहनों! जरा देखिए तो ये सरकारी दादागीरी। इनके पास हमारे दादा साहब की प्रतिमा के लिए जगह नहीं है। क्या यह जगह सरकारी है?...''

''अरे! ... जरा कोई इस अकल से पैदल आदमी को समझाए कि सरकार भी हमीं बनाते हैं। सरकार भी हमारी और सरकारी जमीन भी हमारी। फिर यह सरकार का नौकर हमें रोकने वाला कौन होता है?''

किसी ने ताली बजाई और कई तालियाँ बजने लगीं। नेता ने हुंकार कर आगे कहा - ''इसी से मैं कहता हूँ कि ये जमीन हम ले के रहेंगे। ले के रहेंगे। ...बोलो, दादा साहब अर्जुन दास''

उपस्थित जन-समुदाय से नारा उठा -

''अमर रहें! अमर रहें!''

''इंकलाब -''

''जिंदाबाद!!''

''इंकलाब -''

''जिंदाबाद!!''

तब तक सिटी मजिस्ट्रेट ने वहाँ पहुँचकर माइक का मुँह घुमा दिया और उस नेता से कहा कि - ''आप लोग यह स्थान तुरंत खाली कर दें, क्योंकि बिना अनुमति के इस प्रकार धरना देना अनशन करना सभा करना कानूनन जुर्म है।''

अनशनकारियों में से दो पढ़े-लिखे व्यक्ति खड़े होकर 'कानून' और 'जुर्म' पर वहाँ बहस करने लगे। तब सिटी मजिस्ट्रेट ने कोतवाल से कहा - ''गिरफ्तार करिए इन्हें और हटाइए यहाँ से।''

इतना सुनते ही पुलिस वाले अनशनकारियों के साथ धींगामुश्ती करने लगे।

आनन-फानन में टंगा हुआ बैनर खींच लिया गया। दरियाँ घसीट दी गईं। तमाशबीनों को घुड़कियाँ देकर खदेड़ा गया। माइक वाले को गालियाँ पड़ीं तो वह भी अपना तार-वार समेटने लगा। अनशनकारी बेबसी में नारे लगाने लगे -

''जिला प्रशासन -''

''मुर्दाबाद!''

''जिलाधिकारी''

''मुर्दाबाद!''

''पुलिस के बल पर गुंडागर्दी''

''नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!''

''अभी तो ये अँगड़ाई है''

''आगे और लड़ाई है!!''

अनशनकारी पुलिस पेट्रोल कार में लाद दिए गए। सबसे अंत में माइक पर भाषण देने वाले वह नेताजी भी लादे गए। गिरफ्तारशुदा अनशनकारियों में से आखिरी नारा लगाया किसी ने -

''हमारा नेता कैसा हो?''

सबने कहा -

''पोपटलाल जैसा हो!''

और सबको लेकर पुलिस पेट्रोल कार कोतवाली रवाना हो गई। लोगबाग फिर से अपने-अपने काम में लग गए। डी.एम. साहब आज कचहरी नहीं आए थे। वह अपने निवास कार्यालय से ही कामकाज निबटाते रहे।

उधर अधिवक्ता संघ की बैठक में हंगामा हो रहा था। वहाँ भी बहस का विषय थी वही जमीन जिस पर 'दादा साहब अर्जुनदास प्रतिमा स्थापना समिति' आजकल उनकी प्रतिमा-स्थापना के लिए कटिबद्ध थी। अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष टंडन साहब इस समय अपनी कथित अकर्मण्यता के लिए प्रखर आलोचना का केंद्र बने हुए थे।

सदन में इतना शोर-शराबा हो रहा था कि कुछ भी ठीक से सुनाई नहीं दे रहा था। अधिवक्ता संघ का पूरा सभागार खचाखच भरा था। कुर्सियों पर जितने लोग बैठे थे उससे तीन गुना लोग खड़े हुए थे।

इसी बीच महामंत्री राजेश्वर सिंह ने सबसे ऊँचे स्वर से चीखते हुए मेज पर हाथ पटके और कहा - ''कम से कम आप अध्यक्ष जी की बात भी तो सुन लें। ... हाँ अध्यक्ष जी! आप बैठ क्यों गए? आप बोलिए... आप बोलिए!''

टंडन साहब बड़ी मुश्किल और मजबूरी में खड़े हुए और भर्राए हुए गले से कहने लगे -

''देखिए... किसी समस्या का हल... उत्तेजना की अवस्था में... सही तरीके से नहीं हो सकता। न्याय की देवी की प्रतिमा उसी स्थल पर लगेगी जहाँ हम लोग चाहते हैं। मगर हमें उसके लिए धैर्य और सूझबूझ से काम लेना पड़ेगा...।''

उन्होंने अपने चौड़े ललाट पर उभरे स्वेदबिंदु रूमाल से पोंछे। फिर उसी रूमाल से अपना चश्मा साफ करते हुए वह सँभल-सँभलकर कहने लगे -

''अभी हमारा एक हफ्ते का अदालतों का बहिष्कार समाप्त नहीं हुआ। कल उसका अंतिम दिन है। कल हमारा प्रतिनिधि मंडल जिलाधिकारी से समय लेकर मुलाकात करेगा। उसके बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी।''

''कल नहीं, आज ही। ... आपको आज ही निर्णय लेना होगा। नहीं तो हम आपके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाएँगे।'' एक युवा अधिवक्ता चिल्लाकर बोला।

उसके पास खड़े अन्य अधिवक्तागण उसे समझाकर चुप कराने लगे।

टंडन जी भावुक हो गए। कहने लगे - ''अविश्वास प्रस्ताव की क्या आवश्यकता है? मैं तो अभी त्यागपत्र देने के लिए तैयार हूँ।''

इस पर सदन में फिर हो-हल्ला मचने लगा। कई लोग सामूहिक रूप से कहने लगे -

''नहीं-नहीं! आप त्यागपत्र नहीं देंगे।''

''आप त्यागपत्र नहीं देंगे।''

टंडन जी फिर बैठ गए। अब एक बुजुर्ग अधिवक्ता खड़े हो गए और हाथ जोड़कर सबको चुप कराने लगे - ''शांत हो जाइए।... कृपया शांत हो जाइए।''

लोग शांत तो नहीं हुए, लेकिन शोरगुल का स्थान कुछ देर तक भिनभिनाहट ने ले लिया। अब वह बुजुर्ग अधिवक्ता बोलने लगे - ''अध्यक्ष जी ठीक ही तो कहते हैं। इस तरह बेसब्र होकर हम कुछ प्राप्त नहीं कर सकते। जब तक लोगों की सहानुभूति हमारे साथ नहीं होगी, हमारी कोई आकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। हर बात का एक तरीका होता है। बातचीत के जरिए ही रास्ता निकल सकता है। और फिर हमें अपनी जिम्मेदारियों को भी तो नहीं भूलना चाहिए। ... आजकल ये जो नया खून हमारे बीच आ गया है उसमें जोश तो है मगर होश नहीं है। हमारा पेशा लोगों को न्याय दिलाना है। कानून के जरिए। किसी जंगलराज के जरिए नहीं। ... जरा सोचिए भाइयों! हममें से कितने ही लोग महज इसी पेशे के जरिए अपनी दाल-रोटी कमाते हैं। कितने ही वकील ऐसे हैं जिनके पास कोई खेती-बारी या दीगर रोजगार के साधन नहीं हैं। हमारी ये रोज-रोज की हड़तालें और बहिष्कार हमारे उन भाइयों के परिवारों को किस भुखमरी की कगार पर ढकेल रहे हैं? कुछ अहसास है हमें? ... अफसोस! ... हमारे ही बीच एक ऐसा तबका भी घुस आया है वकालत की डिग्रियाँ लेकर, जिसके पास गाँव में अपनी जमीन है, मवेशी हैं। अनाज और घी घर से आ जाता है और भाई लोग यहाँ कचहरी में आए दिन डंड पेलते हैं। पूरा माहौल बिगाड़ रखा है ऐसे गैरजिम्मेदार लोगों ने।...''

अभी वह बुजुर्गवार अपनी बात समाप्त नहीं कर पाए थे। कि सदन के किसी कोने से एक उदंड आवाज आई - ''चुप बे बुड्ढे! ... सठिया गया है तू!'' और वहाँ कोहराम मच गया।

''ये कौन बोला? सामने आए।''

''अरे चौधरी सा'ब जैसे इतने सीनियर एडवोकेट के लिए ये शब्द ... इन्हें बुड्ढा किसने बोला?''

''शर्म! शर्म! ... शेम! शेम!''

''कौन है आखिर ये बदतमीज?''

''सामने आकर माफी माँगो।''

''नहीं! उसे सदन से बाहर करो।''

''होऽऽऽऽ! ... हो हो... हो हो...'' मचा शोर।

कई लोग वहाँ पड़ी मेजों पर चढ़ गए और न जाने क्या-क्या अनाप-शनाप बकने लगे। मैं किसी मेंढक की भाँति सदन के एक कोने में चिपका बैठा था। सभागार के भीतर उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। बस, हस्त-पाद-प्रहार प्रारंभ होने भर की देर प्रतीत होती थी। ऐसे में किसी का पैर मुझ निरीह प्राणी पर न पड़ जाए, इस डर से मैं वहाँ से भाग लिया।


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