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उपन्यास

अथ मूषक उवाच
सुधाकर अदीब


''यह शहर मुझे बार-बार अपनी ओर खींचता रहा है। बचपन से आज तक मैंने इस शहर को न जाने कितने कोणों से देखा है। इसकी सड़कों, चौराहों, गलियों और मोहल्लों में धड़कती जिंदगी को अपने हृदय की गहराइयों में महसूस किया है। यही वह धरती है, जिसके निकट बसी अयोध्या में कभी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने जन्म लिया था। यही वह सरजमीन है, जहाँ के नवाबों ने सांप्रदायिक एकता एवं सौहार्द का एक नया इतिहास रचा था और यही वह जगह है, जहाँ अनेक महान शायर, गायक-गायिकाएँ और आचार्य इस देश की सांस्कृतिक विरासत में अपना महान योगदान करने निरंतर आगे आते रहे।

आज भी वही शहर है। वही मिट्टी है। वही हवा है। लोगों में वही इत्मीनान है। करीब-करीब वही सब बातें हैं। परंतु बहुत कुछ जैसे बदल-सा गया है। अब वह बहँगी पर मटके लटकाकर 'हड़ का पानी' बेचने वाला बूढ़ा दिखाई नहीं देता। अबरार मियाँ के यहाँ बच्चों को लुभाने वाले 'मीठे सेव' नहीं बिकते। सड़कों से इक्के और ताँगे गायब हो चुके हैं। रिक्शों की संख्या तो चौगुनी बढ़ गई है, लेकिन रिक्शों की वह पहले वाली ऊँची गद्दी और पहियों से 'चिर्रीन-चिर्रीन' करके जोरदार आवाज करने वाली खास किस्म की घंटियाँ भी गायब हो चुकी हैं।

''शहर के चौक घंटाघर इलाके को चारों ओर से घेरकर खड़े पुराने ऐतिहासिक दरे आज भी खड़े हैं। किंतु घंटाघर की घड़ी खामोश हो चुकी है। अब उसके घंटे 'टन-टन' की आवाज कर कभी भी शहर के माहौल को गुंजित नहीं करते हैं। ऐसा लगता है कि इस जमाने में हर प्रकार का गुंजन बीते दिनों की बात बन चुका है और उसका स्थान अब एक कभी न थकने वाले शोर ने ले लिया है।

''राष्ट्रीय राजमार्ग की सड़कें अब मध्यरात्रि से पूर्व कभी भी निःस्तब्ध नहीं होने पाती हैं। उन पर दहाड़ती-चिंघाड़ती ट्रकों और बसों का आवागमन बराबर जारी रहता है। बंद खिड़कियों और परदों को भेदकर घर में आने वाली उनके हार्नों की आवाजें ऐसा अहसास रात्रि में कराती हैं जैसे किसी जंगल में हाथियों का कोई झुंड चिंघाड़ता हुआ चला जा रहा हो...।''

''ओहो सुवीर! ... तुम दिल्ली से क्या हमको इसीलिए यहाँ लाए कि वापस अपनी दुनिया में खो जाओ? पहले मुझे इस आलीशान इमारत के बारे में कुछ बताओ।'' लूसी बर्टन नामक उस ब्रिटिश युवती ने आँखें नचाते हुए अपने उस भारतीय गाइड मित्र सुवीर श्रीवास्तव से कहा जो उसे 'भारत-भ्रमण' कराने के लिए दिल्ली से दो हफ्ता पूर्व निकला था। यह उसका अपना शहर फैजाबाद था, इसलिए इसका वर्णन करते हुए सुवीर अनायास ही अतीत में विचरने लगा था। लूसी की मीठी झिड़की ने अचानक उसकी तंद्रा भंग कर दी।

उनकी कंडक्टेड टूर की एयरकंडीशंड बस मेरे सुगंधित कचराघर से कुछ ही दूर खड़ी थी। लूसी आसपास के कुछ फोटोग्राफ अपने कैमरे में कैद कर रही थी और सुवीर फलों की एक छोटी-सी डलिया जमीन पर रखकर बस से टेक लगाए खड़ा था।

फलों का खयाल आते ही मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उन दोनों को उस ओर से बेखबर देखकर अपने कचराघर से अपने नवीन लक्ष्य की ओर एक फर्राटा दौड़ लगाई और आनन-फानन में फलों की उस डलिया में प्रवेश कर उसमें सबसे नीचे रखा एक सेब शीघ्रतापूर्वक कुतर-कुतरकर खाने लगा।

सुवीर ने वह टोकरी उठाई और उस लूसी के पीछे-पीछे चल दिया। अब वह सामने की ऐतिहासिक इमारत का वर्णन कर रहा था -

''नवाब साहब का यह मकबरा एक जमाने में खूबसूरत गुलाबों की क्यारियों, रंगीन मछलियों और फौव्वारों से युक्त जलाशयों के लिए सारे शहर ही में नहीं बल्कि पूरे अवध क्षेत्र में विख्यात था। मकबरे में मरहूम नवाब साहब और उनकी जन्नतनशीं माँ सदियों से सोए पड़े हैं। ...

''ये देखो...  इनकी कब्रों के चारों ओर लगा हुआ चाँदी का ये घेरा वक्त की मार से काला पड़ चुका है। कहते हैं कि शुद्ध चाँदी की चमक यहाँ आने वाले कई लुच्चों की आँखों में अक्सर चुभ जाया करती थी और वे यहाँ से जाते-जाते चाँदी के किसी पतरे को केले के छिलके की भाँति उचाड़कर ले जाने में प्रायः सफल भी हो जाते थे। इसलिए अब मकबरे में देखभाल करने वाले सेवकों ने यह तरकीब सोच ली है कि चाँदी के इस घेरे को झाड़-पोंछकर चमकाने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस तरह फितरती इंसानों की लोभमई दृष्टि से इसे बचाने के लिए इसे जमाने की गर्द और चीकट में अपना असली रंग छिपा लेने हेतु इसे यूँ ही छोड़ दिया गया है। ... ये चाँदी का घेरा लकड़ी के रंग-रूप को ग्रहण करके देखो तो कितनी मनहूस शक्ल अख्तियार कर चुका है। ...

''लूसी! तुम्हें गुलाब के फूल पसंद हैं ना?''

''हाँ, कहाँ हैं वे?'' लूसी बर्टन खुशी से चहककर बोली - 'गुलाब मुझे बेहद प्यारे लगते हैं।'

सुवीर लूसी को मकबरे की प्रदक्षिणा कराता हुआ पृष्ठभाग में ले गया। लंबे-लंबे समानांतर जलाशयों की बीच भाँति-भाँति के फूलों की क्यारियाँ लॉन्स के दोनों ओर बनी हुई थीं, किंतु गुलाबों की विशेष नर्सरी पृष्ठभाग में ही स्थित थी।

लाल, पीले, मैरून, सफेद और काले गुलाब। शायद ही गुलाब की कोई ऐसी वैराइटी हो जो वहाँ पर अनुपलब्ध हो। लूसी रोमांचित हो उठी। वह प्रत्येक पौधे के पास जाकर उससे व्यक्तिगत तादात्म्य-सा जोड़ने लगी। वह फुलवारी के एक सिरे से दूसरे सिरे पर चलती चली गई। गुलाब के एक-एक फूल और उसकी पत्तियों से वह बातें-सी करने लगी। उनकी तारीफ में 'कितना प्यारा', 'कितना मोहक' जैसे शब्द रह-रहकर उसके होठों पर थिरकने लगे।

सुवीर ने फलों की डलिया लान के बीचोबीच रख दी और आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ाकर चित लेट गया। मैं इस बीच डलिया में बैठा-बैठा वह सेब आधे से अधिक कुतर चुका था। अब मुझसे खाया नहीं जा रहा था। आखिर मेरा नन्हा-सा शरीर और उससे चार गुना बड़ा सेब... कितना खाऊँ?

लूसी आ गई और सुवीर के निकट बैठ गई। उसका एक हाथ डलिया के ढक्कन को जरा सरकाकर भीतर आया और ऊपर रखा एक अन्य सेब उड़ा ले गया।

मैं डलिया के तले में और भी दुबक गया। अब मैंने पहली बार लूसी को गौर से देखा। वह एक बाईस-तेईस वर्षीय सुंदर युवती थी। सुनहरे बाल, गौर वर्ण जो कि धूप में तपकर लालिमा ग्रहण कर चुका था, नीली आँखें, लंबी सुतवाँ नासिका, इकहरा बदन तथा लंबी ग्रीवा। उसने अपने सुनहरे बालों को पोनीटेल की शक्ल में बाँध रखा था। स्मित मुस्कान उसके अधरों पर खेल रही थी।

''इस मकबरे के बारे में तुम पहले भी बहुत कुछ बता चुके हो। ... अब कुछ और बताओ'' ... सेब काटते हुए लूसी ने कहा।

''हाँ, इसके अतीत के बारे में तो बता चुका हूँ। अब वर्तमान की सुनो'' सुवीर करवट बदलकर आगे कहने लगा - '' ...अचानक एक दिन मकबरे के बाहरी हिस्से में एक भूचाल-सा आ गया। देखते ही देखते इसके गेट और दीवारों के इर्द-गिर्द अजीबोगरीब किस्म के लोग खूँटे ठोंकने लगे और नाना प्रकार की गुमटियाँ तथा काउंटर लगाने लगे। यों कुछ ही देर में वहाँ एक नए मछलीबाजार का-सा दृश्य उपस्थित हो गया। पता चला कि वे सबके सब लॉटरी वाले थे।''

''लॉटरी का मतलब है एक प्रकार का सरकारी जुआ और लॉटरी वालों से तात्पर्य है लॉटरी बेचने वाले।... जानती हो लूसी! ये वो लोग हैं जिन्होंने हमारे देश में आजकल सरकारी जुए की लत डालने का ठेका ले रखा है। अब बीवी-बच्चों के हिस्से की कमाई को रेसकोर्स या विदेशी चलन के जुएखानों याने कि केसीनोज में गँवाने की खुली सुविधा हर छोटे-मोटे शहर में तो उपलब्ध नहीं हो सकती। इसलिए द्यूतक्रीड़ा के शौकीनों को इक्का-दुग्गी-तिग्गी-चौआ-पंजा जैसे अंकों पर मुद्रा लुटाने या सट खेलने का सुअवसर लॉटरी के धंधे से बेहतर और क्या मिल सकता था? अब तो रिक्शे-ठेले वालों से लेकर दफ्तर के बाबुओं और स्कूली बच्चे तक इस लत के शिकार बन चुके हैं। ... व्यवसाय जोरों पर है।''

''मगर सुवीर, तुम तो मकबरे के वर्तमान के बारे में बात रहे थे। फिर ये लॉटरी बीच में कहाँ से घसीट लाए?''

''वही तो बता रहा हूँ। उसी से कनेक्टेड है। मुझे बीच में मत टोको प्लीज! ... हाँ, तो मैं कह रहा था कि पहले लॉटरी व्यवसाय शहर के बीचोबीच अनेक व्यस्ततम मार्गों के दोनों ओर तथा बाजारों में जगह-जगह बिखरा हुआ था। प्रतिदिन लाखों रुपयों का बीच-बजरिया वारा-न्यारा हुआ करता था। जिन टिकटों का परिणाम निकल जाता वे व्यर्थ के टिकट सरे बाजार 'हुर्र-हुर्र' करके हवा में उछाल दिए जाते और सड़क पर कूड़े की एक नई अलामत बनते। उन्हीं मुर्दा लॉटरी टिकटों में से कई पान की दुकानों में पान लपेटने के काम आ जाते। मनचले लॉटरी में अपना मनमाफिक नंबर न पाने की स्थिति में जमाने को लानतें भेजते या फिर बाजार से गुजरने वाली संभ्रांत महिलाओं को ही अपनी फूहड़ फब्तियों का निशाना बना लेते।''

''अच्छा? ... फिर क्या हुआ?''

''फिर कुछ समाज-सेवकों का ध्यान इस ओर गया। उन्होंने लॉटरी के धंधे को बंद करने के लिए एक जन आंदोलन चलाया। प्रशासन ने आंदोलनकारियों को समझाया कि लॉटरी तो 'ऊपर से ही' स्वीकृत है। हम क्या करें? ... इस पर तय हुआ कि शहर-भर में फैले इस कूड़े-करकट को समेटकर एक जगह इकट्ठा कर दिया जाए ताकि वहाँ सिर्फ वे ही लोग जाया करें जो इस बदबू को सूँघने के आदी हैं।''

''आखिर में क्या हुआ?''

''एक शाम पुलिस ने सड़कों पर डंडे फटकारे और लॉटरी के देवता हर दिशा में गुलाबों से युक्त बगीचे वाले इस मकबरे की ओर कूच कर गए। अभी तुमने मकबरे की उत्तर-पश्चिमी चारदीवारी के बाहर जो एक क्रांतिकारी नजारा देखा होगा वो यही सब लोग तो हैं। ... अब न किसी को गरज है उन स्वास्थ्य प्रेमियों की, जो यहाँ सुबह-शाम सैर करने या फिर मौज-मस्ती के इरादों से आते हैं और न ही किसी को मतलब है नवाब साहब और उनकी जन्नतशीं वालिदा की, जिनकी रूहें इस नए दोजख के इतने करीब सिमट आने की वजह से बेचैन होकर अपनी कब्रों में करवटें बदलने लगी हैं। ...''

''ओह नहीं सुवीर! ... ऐसा नहीं कहते।'' लूसी ने एकाएक अपने गाइड मित्र के मुख पर अपना हाथ धर दिया। उसने डलिया में से एक केला निकालकर उसे खाने को दिया।

सुवीर केला खाता गया और कहता गया - ''मकबरे के बाहर शोर है... बेहद शोर... हुर्र-हुर्र...  हवा में उड़ते लाटरी टिकट...  और उन पर मरते-मिटते और लुटते हुए हजारों-हजार लोग।''1

बाहर टूरिस्ट बस का हॉर्न बजा और वे दोनों अपना कैमरा तथा डलिया सँभालते हुए उठ खड़े हुए। मैंने सुवीर को भी एक बार गौर से देखा। वह एक पैंतीस-छत्तीस वर्ष का दोहरे बदन का लंबा-सा पुरुष था। उसका चेहरा चौकोर था। रंग गेहुआँ। चेहरे पर घनी दाढ़ी, जिसे देखकर एक ही शब्द कहने का मन करता था - 'दढ़ियल'।

उस समय मेरे मन में एक और भाव भी उभरा कि 'इस विदेशी कबूतरी को घुमाने के लिए क्या यही एक दढ़ियल मिला?'

1. उपन्यास लिखे जाते तक लॉटरी का भारतवर्ष में प्रचलन था। अब लॉटरी कानूनन प्रतिबंधित है।


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