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कविता

ऊँचाई और गहराई
मार्तिन हरिदत्त लछमन श्रीनिवासी

अनुवाद - पुष्पिता अवस्थी


मैं किस तरह से
ईश्‍वर के नाम के योग्‍य शब्‍द रचूँ
अगर, इस प्रवाह के साथ
मैं अपना नाम रख सकूँ
अगर, मैं इतना
विस्‍तृत हो सकूँ
इस नदी की तरह, जिसकी ऊँचाई और गहराई
अपने देश की राजधानी के सामने है

इसलिए मुझे
अँधेरे और गहरे मोड़ देने हैं
छोटी और छोटी नदियों के लिए
जो अपने रास्‍तों से
हमेशा बँधी रहती है झालरों के साथ

 


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