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कविता

नारंगी का सफेद इत्र
मार्तिन हरिदत्त लछमन श्रीनिवासी

अनुवाद - पुष्पिता अवस्थी


भूल गई कैसे तुम !
अपने दाहिने हाथ के अँगूठे से
दबाकर निकाली गई
जंगली नारंगी की सुगंध
जबकि
उसी समय
तुम्‍हारी आँखें निचोड़ रही थी
आग के लिए
नारंगी का तेल

और कैसे हमने बातें की थी हिंदी में
मसाले की सुगंध के साथ
दाल और पोई
लहसुन के टुकडे़
और आम का अचार
साथ में फहराती रही थीं -
लाल-हरे रंग की पन्नियाँ

कैसे भूल गई तुम !
नारंगी का सफेद इत्र
और अपने बीच के शब्‍द
रसीले और चमकदार
सूर्य-रश्मियों की तरह दीप्तिमान

 


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