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आलोचना

अज्ञेय : दिक् और काल के बरक्स
राहुल सिंह


हिंदी साहित्य में आधुनिकता को बहस के केंद्र में लाने का श्रेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को दिया जा सकता है। अज्ञेय से पहले हिंदी साहित्य के आलोचक सर्जक आधुनिकता की अवधारणा के प्रति सचेत अवश्य थे पर वह उनकी चिंता और चेतना में एक एजेंडा के तौर पर शामिल नहीं था। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य में आधुनिकता के सवाल को एक एजेंडा की तरह विकसित किया। इस प्रश्न को उनके सर्जनात्मक और आलोचनात्मक लेखन में लक्ष्य किया जा सकता है। उन्होंने आधुनिकता के सवाल को अपने सर्जनात्मक लेखन में विशेषकर तार सप्तक तथा परिमल द्वारा जिस रूप में प्रस्तुत किया उससे हिंदी समाज लगभग परिचित है। ए. अरविंदाक्षन यों ही नहीं लक्ष्य करते कि ''प्रेमचंद, निराला आदि में उपलब्ध आधुनिकता की परिणतियों की तुलना में अज्ञेय की आधुनिकता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी उग्रता है।''1 यहाँ उनकी आधुनिकता की अवधारणा के अपेक्षाकृत कम चर्चित पहलू पर विचार किया जा रहा है जो उनके दिक् और काल संबंधी चिंतन से जुड़ा है। यह दिक् और काल उनकी भारतीयता की अवधारणा से संबद्ध है और भारतीयता की अवधारणा पर थोड़ी बात इसलिए की जा रही है क्योंकि अज्ञेय की आधुनिकता की अवधारणा के केंद्र में भारतीयता की अवधारणा है। अज्ञेय के लिए भारतीयता एक सांस्कृतिक अस्मिता है जिसका मतलब भारतीय अस्मिता की पहचान से है। इस सांस्कृतिक अस्मिता का एक आधार धार्मिक भी रहा है और उस धर्म की अपनी भारतीय परिभाषा भी रही है, जिससे स्वयं भारतीयता भी परिभाषित होती आई है। इस कारण से हिंदी समाज में भारतीयता पर विचार एक जोखिम भरा मामला साबित होता आया है। जिसने भी इन पक्षों पर विचार करने की कोशिश की है वे सभी लगभग एक स्वर से हिंदूवादी और दक्षिणपंथी स्वीकार कर लिए गए हैं। स्वयं मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा भी जब इस दिशा में थोड़ा आगे बढ़े तो उन पर भी हिंदूवादी शक्तियों को मदद पहुँचाने के आरोप लगे। लेकिन जिन भी आलोचक विचारक चिंतकों ने आधुनिकता की समस्या पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है वे स्वयं को भारतीयता के सवाल से नहीं बचा पाए हैं। हिंदी साहित्य में अज्ञेय से लेकर निर्मल वर्मा तक में इसे देखा जा सकता है।

अज्ञेय की आधुनिकता की अवधारणा को समझने के लिए उनकी भारतीयता की अवधारणा को समझना अनिवार्य है। भारतीयता एक सांस्कृतिक अस्मिता है। भारतीयता की पहचान अस्मिता की पहचान है। अज्ञेय के अनुसार इस अस्मिता को पहचानने की अनिवार्यता दो अवसरों पर विशेष रूप में महसूस होती है। पहला, '' इस अस्मिता की पहचान की ओर हमारा ध्यान तब तक नहीं जाता जब तक किसी संस्कृति का या सभ्यता का सहज विकास हो रहा है। तब तक इस तरह की आत्मचेतना और इसको लेकर यह प्रश्न कि हम अपनी अस्मिता की कोई परिभाषा करें, नहीं उठता और इसलिए जब दूसरी सभ्यता से भारत की इस तरह की टकराहट हुई तो उसमें से यह प्रश्न उठा कि हम कौन थे, क्या हो गए हैं। तब यह सवाल उठा कि भारतीयता किस चीज में निविष्ट रही है और किसके आधार पर हम आत्मसम्मानपूर्वक उन सब चीजों के मुकाबले खड़े हो सकते हैं, जिनका मुकाबला हमें करना है। और तभी ये यह प्रश्न बार बार उठता रहा है कि भारतीयता या कि इस भारतीय जाति का जो समग्र अनुभव रहा उसकी उपलब्धि क्या है।'' 2 और अज्ञेय दूसरा अवसर, उन परिस्थितियों से मुक्ति को मानते हैं जिससे भारतीयता का अवस्थिति बोध निर्मित होता है। इसके उदाहरण के तौर पर वे विदेश प्रवास को रेखांकित करते हैं। अज्ञेय 1955 में यूनेस्को के निमंत्रण पर एक वर्ष के लिए यूरोप गए थे। पुनः दूसरे निमंत्रण पर 1957 में जापान गए। रमेशचंद्र शाह इन दोनों प्रवासों को उनकी आधुनिकता और भारतीयता की अवधारणाओं में गुणात्मक समृद्धि का सूचक मानते हैं। स्वयं अज्ञेय अपने चिंतन में इस दिलचस्प तथ्य को अभिप्रमाणित करते हुए लिखते हैं कि '' कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आज की परिस्थिति में वास्तव में भारतीयता की भावना विदेश जाने पर ही जगती है - उन्हीं लोगों में जगी है जो विदेश हो आए हैं या विदेश में रहे हैं। उन्हीं लोगों के द्वारा चर्चित हुई है और लंबे समय तक चर्चित होती रही है जो लंबे अरसे तक प्रवासी रहे हैं और जिन्हें बार बार अस्मिता की चुनौती का सामना करना पड़ा है। ऐसी चुनौती जिसका संबंध धर्म विश्वास से नहीं बल्कि संस्कृति से है। कह सकते हैं कि भारतीय भाषाओं के संबंध में भी अस्मिता के आग्रह वास्तव में विदेशी चुनौती के सामने ही प्रकट होते हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र के लिए विदेश यात्रा की नहीं, केवल विदेशी भाषा की चुनौती काफी रही थी ' निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।' लेकिन जिस हद तक यह चुनौती सीमित थी उसी हद तक सांस्कृतिक अस्मिता के संबंध में भारतेंदु की सजगता भी सीमित रही। वह चुनौती उनके सामने आई ही नहीं जो एक दूसरे प्रकार की जागरूकता की अपेक्षा रखती।'' 3 अज्ञेय स्वीकार करते हैं कि भारतेंदु की सीमा उनकी ऐतिहासिकता की सीमा थी।

भारतीय अस्मिता को परिभाषित करने वाले प्रमुख अवयवों के तौर पर अज्ञेय दिक् काल की भारतीय अवधारणा को सामने रखते हैं। अज्ञेय के अनुसार भारतीय धर्म दर्शन संस्कृति, काल की परिभाषा के लिए देश अथवा दिक् के आयाम का उपयोग करते हैं और देश अथवा दिक् अपनी परिभाषा के लिए काल का। दिक् और काल परस्परावलंबित हैं। उनके अनुसार '' हर संस्कृति की अपनी एक सृष्टि कथा होती है। ...सृष्टि कथा दिक् और काल की अवधारणा के बिना हो नहीं सकती और इन अवधारणाओं के साथ हमारी सारी समस्याएँ आरंभ हो जाती हैं। क्या काल अनादि और अनंत है? क्या दिक् एक छोरहीन असीम विस्तार है? ... विज्ञान की अद्यतन सृष्टि कथा में सृष्टि के एक आरंभबिंदु की अवधारणा है। इसे हम यों कह सकते हैं कि दिक् काल का एक आरंभ बिंदु आज विज्ञान मानता है।''4 भारतीय धर्म दर्शन में काल को अनादि और अनंत माना गया है। ऐसे में जब उसकी गणना किसी एक बिंदु से की जाती है तो उसके कौन से परिणाम सामने आते हैं? अज्ञेय लिखते हैं कि '' ईसवी अथवा विक्रम संवत् मान लेने के बाद भी हम उनके आरंभबिंदु से कम से कम कुछ शतियों पहले की घटनाओं को अपने इतिहास की परिधि में रखते ही हैं। उदाहरण के लिए बुद्ध अथवा अशोक अथवा सिकंदर को अपनी काल गणना के आरंभबिंदु का निर्वाह करते हुए ' ईसा पूर्व अमुक शती अथवा अमुक वर्ष' में रखा जाता है तब क्या इन महद्ग्रंथों के रचनाकाल को हम ऐतिहासिक यथार्थता की उसी कोटि में रख रहे होते हैं जिसमें उदाहरण के लिए महमूद गजनवी के आक्रमण को अथवा बाबर के अभियान को रखते हैं।'' 5 इस प्रकार अज्ञेय बताते हैं कि कैसे सन् संवत् के प्रश्न हमारे लिए सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्न बन जाते हैं क्योंकि 'हमारी जातीय स्मृति का परिदृश्य इससे जुड़ा है।' हमारी जातीय स्मृति और कालबोध के मध्य अज्ञेय एक सहज बोध पाते हैं लेकिन पश्चिम में वे जातीय स्मृति के साथ कालबोध के संबंध को आयाससाध्य मानते हैं : '' वहाँ जातीय अस्मिता से आधारभूत संबंध जोड़ने के लिए कुछ दूसरे ही बिंदु चुने जाते हैं ऐसे घटनाबिंदु जो किसी संवत्सर के आरंभबिंदु तो नहीं हैं लेकिन जो उस आत्म बिंब को पुष्ट करने में मदद करते हैं जिसके अंतर्गत यहूदी जाति एक साथ ही ईश्वर की विशेष चुनी हुई जाति भी हो जाती है और दूसरों के द्वारा शताब्दियों से उत्पीड़ित जाति भी। एक ओर विधाता द्वारा मनोनयन और दूसरी ओर आत्मरक्षा का यह भाव - इन दोनों की स्मृति अस्मिता बनाए रखने में महत्वपूर्ण योग देती है।'' 6 पश्चिमी कालबोध में निहित इस ऐतिहासिकता ने हमारे कालबोध और इतिहासबोध को किस प्रकार संदिग्ध बनाने का काम किया है इसकी ओर संकेत करते हुए अज्ञेय लिखते हैं कि''फिर ऐतिहासिकता के उसी आग्रह ने जिसने भारतीय चिंताधारा और गवेषणा में भी ईसवी सन् की प्रतिष्ठा कर दी, उसे ऐतिहासिक आग्रह ने हमें केवल यह बताया है कि विक्रमादित्य कई हुए बल्कि प्रत्येक विक्रम का काल संदिग्ध बता दिया है।''7 अज्ञेय आगे लिखते हैं कि 'विक्रम संवत् के विक्रम के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने से कुछ बना बिगड़ा तो नहीं लेकिन ईसा मसीह के बारे में कोई प्रश्न उठते ही एक पूरा धर्म संस्थान लड़खड़ाने लगता है।' सवाल यह उठता है कि एक ओर जहाँ पश्चिम में धर्म संस्थान लड़खड़ाने लगते हैं वहीं दूसरी ओर भारतीय संदर्भों में क्यों कुछ बनता बिगड़ता नहीं है? इसके जवाब में अज्ञेय भारतीय धर्म दर्शन संस्कृति की एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता 'बहुकेंद्रिकता' को रेखांकित करते हैं कि '' ईसाइयत जिस प्रकार एक प्रवर्तक और एक आदि बिंदु से जुड़ी है, भारत में धर्म का वैसा रूप नहीं है। ...ईसाइयत जिस प्रकार की ऐतिहासिकता का दावा करती है वैसा दावा भारतीय संदर्भ में कोई अर्थ नहीं रखता। यहाँ धर्म की परिधि के भीतर अनेक संप्रदायों के अनेक प्रवर्तक हुए और इसलिए एक विशेष अर्थ में यह कहा जा सकता है कि यहाँ एकाधिक ऐतिहासिक परंपराएँ भी बनीं जिनके अपने अपने आरंभबिंदु भी हैं। लेकिन ऐसे प्रवर्तन बिंदुओं को काल गणना का आरंभबिंदु नहीं बनाया गया। इन प्रवर्तकों के नाम से संवत् नहीं चले, भले ही कुछ संप्रदायों में वैसा भी एक संवत् साथ साथ लिख देने की परंपरा चली। यह भी लक्ष्य किया जा सकता है कि इस स्थिति के कारण भारतीय सभ्यता में एक बहुकेंद्रिकता रही जिसे उसकी शक्ति भी माना जा सकता है। इस बहुकेंद्रिकता के कारण ही यह संस्कृति ऐतिहासिकतावाद में आक्रांत होकर भी अपनी अस्मिता को टूटने से बचाए रख सकी।'' 8 इस ऐतिहासिकतावाद ने काल गणना का जब एक बिंदु निश्चित कर लिया तो भारतीय संदर्भ में इस पार वाला 'इतिहास' और उस पार वाला 'पुराण' की कोटि में चला गया। काल के आरंभ का एक बिंदु निश्चित कर लिए जाने से भारतीय कालबोध की अवधारणा किस तरह अनैतिहासिकता की रेखाओं को छूने लगती है। अज्ञेय इस पर रोशनी डालते हुए कहते हैं कि 'काल की यथार्थता का बोध', 'काल की सनातनता के बोध' का विरोधी है। ''इस तरह सनातन बोध तक पहुँचते पहुँचते हम काल की यथार्थता का बोध खो देते हैं। सनातन की भावना लंबी काल परंपरा की भावना नहीं, काल की अयथार्थता की भावना है।''9 काल की अयथार्थता अर्थात सनातनता की इस प्रवृत्ति से 'अवस्थिति बोध' और 'स्वीकार्यता' का अभिन्न संबंध मानते हुए अज्ञेय लिखते हैं कि '' अवस्थिति का अद्वितीय बोध भारतीय चरित्र की एक विशेषता है। यह भी कह सकते हैं कि निरक्षर भारतीय में ऐसी चेतना उन लोगों की अपेक्षा अधिक है जो कि आधुनिक शिक्षा नाम की चक्की में से पिस कर निकले हैं और मेरा विचार है कि यह अवस्थिति बोध इतिहास की उस कमी को पूरा कर देता है जिसका आरोप भारतीयों पर प्रायः किया जाता है।'' 10 अवस्थिति बोध का मतलब अवस्थिति के ज्ञान से है। 'अवस्थिति का ज्ञान होते ही उसे देखनेवाला उसके वृत्त से बाहर निकल आता है, पर्यवेक्षक हो जाता है।' ऐसी अवस्था में अज्ञेय के अनुसार "इतिहास का अंग बने बिना भी इतिहास में जिया जा ही सकता है।' जीवन में इस अवस्थिति का विचार करने के लिए एक तो दिक् का विचार करना होता है कि कोई चीज 'कहाँ' है, दूसरे काल का विचार करना होता है कि कोई चीज 'कब' है। और तीसरे कह लीजिए कि अस्ति का, अस्मिता का विचार करना होता है कि कौन है?''11

अज्ञेय एक आम भारतीय में सदियों से दिक् काल चालित इसी अवस्थिति बोध को स्वभाव और संस्कार के स्तर पर कार्यरत पाते हैं। इसको स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि हमारे यहाँ "जब काल ही यथार्थ नहीं रहता, तब उस काल में होनेवाले व्यापार कैसे यथार्थ हो सकते हैं। हमारे यथार्थ दुःख क्लेश, हमारी यथार्थ आशा आकांक्षा, मानव के उद्योग परिश्रम मानवी व्यापार मात्रा अयथार्थ हो जाते हैं।"12 इसे ऐसे समझें, हमारे यहाँ मर्त्य और अमर्त्य लोक का विधान है। अमर्त्य लोक देश काल की सनातनता का प्रतीक है। अर्थात वह अयथार्थ है या ऐसा है जिसकी परख यथार्थता के प्रतिमानों पर नहीं की जा सकती है। वह यथार्थता से परे है। मनुष्य जो इस मर्त्य लोक में आया है उसका उद्देश्य या अभीष्ट पुनः उसी अमर्त्यलोक में लौट जाना है क्योंकि वह उस अविनाशी का अंश है। उस सनातनता के समक्ष उसकी सत्ता नगण्य है। इसलिए ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा के पलक झपकते ही हमारे कितने कल्पांत विलीन हो जाते हैं।"तो ब्रह्मा के सामने यथार्थ ऐहिक मानव न कुछ के बराबर है। अपनी इस नगण्यता से ही स्वीकार की भावना उत्पन्न होती है दुःख के प्रति स्वीकार, दैन्य के प्रति स्वीकार, उत्पीड़न के प्रति स्वीकार यहाँ तक की दासता के प्रति स्वीकार, वह दासता दैहिक हो या मानसिक।"13 यहाँ तक कि इसे मृत्यु के संदर्भ तक में देखा जा सकता है।"पश्चिम भरसक मृत्यु को स्वीकार करना नहीं चाहता है और हमारी दृष्टि यह है कि मृत्यु जीवन से अलग नहीं है, जीवन की जो समग्र प्रक्रिया है उसमें जैसे जन्म लेना अनिवार्य है, वैसे मरना भी अनिवार्य है। हमको उसे एक लंबी प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करना चाहिए।"14 भारतीय और यूरोपीय जीवन दर्शन में इस परिवर्तन को लक्ष्य किया जा सकता है। पश्चिम के चिकित्सा विज्ञान की उन्नति को इस संदर्भ में देखा जा सकता है। (क्लोन के निर्माण या पुनर्जीवन की चाह में अपने शवों को सुरक्षित रखवाने का बढ़ता चलन, इच्छा मृत्यु और जल अग्नि समाधि के प्रसंगों को याद किया जा सकता है।) लेकिन इसी के समानांतर भारतीय संदर्भ में मृत्यु की इस स्वीकार्यता और काल की संरचनात्मक अवधारणा के मध्य सैद्धांतिक अंतर्विरोध को उजागर करते हुए अज्ञेय लिखते हैं कि ''इस पर अचरज हो सकता है कि जिस संस्कृति में मृत्यु का स्वीकार इतना गहरा है, उसका काल प्रतीक मृत्यु की प्रतिज्ञा लेकर न चले, और दूसरी ओर आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता, जिसमें मृत्यु को नकारने का इतना प्रबल आग्रह है, काल की कोई ऐसी अवधारणा न कर सके जिसमें वह मृत्योन्मुख गति से ही इतर कुछ हो सकता है।''15

अज्ञेय इतिहास और हिस्ट्री में अंतर करते हैं। इतिहास का वर्ण विन्यास करते हुए वे इतिहास को इस रूप में व्याख्यायित करते हैं, " 'इति ह आस' वह घटना घटित होती चली आई है।"16 जबकि इतिहास हिस्ट्री के अर्थ में एक कालिक परिप्रेक्ष्य की माँग करता है। इस कालिक परिप्रेक्ष्य के अभाव में इतिहास की तुलना में पुराण संदिग्ध जान पड़ता है। इतिहास अपनी संदर्भवत्ता के कारण पुराणों की तुलना में ज्यादा प्रामाणिक माना जाता है। साक्ष्याधारित होने के कारण इतिहास को पुराणों और मिथकों की तुलना में ज्यादा तर्कसम्मत माना गया है। अज्ञेय अपने चिंतन में मिथकों और पुराणों की मिथकीय सत्ता की वैज्ञानिकता को उद्घाटित करते हुए लिखते हैं कि ''विज्ञान के बारे में हम यह मानकर चलते हैं कि शोध, अनुसंधान और प्रयोग से जुड़ा हुआ है। लेकिन मिथकीय अथवा पुराण भी शोध और अनुसंधान से, अनुमान और प्रयोग से जुड़ा हुआ हो सकता है, ऐसा मानकर हम नहीं चलते। ...पुराण अथवा मिथक विज्ञान से पहले हैं। वह इतिहास से भी पहले है। इस पहले की अवधारणा को भी समझ लें। आज हम विज्ञान की बात करते हैं तो उसे जरूरी तौर पर अनुसंधान, शोध और शंका भाव से जोड़ते हैं। इतिहास हिस्ट्री के अर्थ में उस काल की और उस अनुक्रम की आरंभ और अंत की एक स्पष्ट अवधारणा माँगता है। इसके विपरीत पुराण अथवा मिथक एक निर्भ्रांत सत्य की माँग करते हैं, शंका का निरसन करते हैं। घटनाओं का कालिक परिप्रेक्ष्य रखना उनका प्रयोजन नहीं।'' 17 इस कालिक परिप्रेक्ष्य के अभाव में पुराणों को इतिहास से कम महत्व प्रदान किया गया है। अज्ञेय इस कालिक परिप्रेक्ष्य के अभाव में पुराणों को इतिहास से कमतर मानने को तैयार नहीं थे। अज्ञेय के लिए पुराणों में व्यक्त जिज्ञासा का संबंध इससे है कि काल ही कैसे बना या शुरू हुआ। अज्ञेय ने मिथकीय सत्ता की वैज्ञानिकता का उद्घाटन करते लिखा है कि ''वैज्ञानिक चिंतन और पौराणिक अथवा मिथकीय दृष्टि दोनों को जिस प्रश्न में लाकर हम जोड़ सकते हैं वह प्रश्न यही है कि सृष्टि कैसे हुई? पर्यावरण कैसे बना? समाज कैसे बना? मैं इसमें कहाँ हूँ? मैं कौन हूँ? ये चार बुनियादी प्रश्न हैं। सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि मिथक अथवा पुराण इन चार प्रश्नों के उत्तर का किसी न किसी तरह प्रस्ताव करते हैं और विज्ञान भी यह नहीं कहा जा सकता कि इन चार प्रश्नों से नहीं उलझता था कि इनके उत्तर नहीं खोजना चाहता था। इस समान प्रश्न भूमि से दोनों आरंभ करते हैं यह पहचानना जरूरी है। लेकिन यह पहचानना भी जरूरी है कि कहाँ दोनों के रास्ते अलग हो जाते हैं। रास्ते ही अलग नहीं हो जाते बल्कि जिज्ञासा भी रूपांतरित हो जाती है और इसलिए मंजिलें भी अलग अलग हो जाती हैं। बल्कि यह भी कह सकते हैं कि पुराण की यात्रा में एक यात्रांत भी है क्योंकि वह एक निश्चयात्मक प्रतीति चाहता है, एक ध्रुव विश्वास जिसमें जिज्ञासा का शमन हो जाता है; दूसरी ओर विज्ञान का कोई यात्रांत नहीं है, कोई मंजिल नहीं है बल्कि क्षितिजों का एक क्रम है। विज्ञान मूल प्रश्न की ओर लौटता नहीं क्योंकि यात्रा के दौरान उसके प्रश्न रूपांतरित हो चुके होते हैं। इतना ही कह सकते हैं कि इन मूल प्रश्नों की चिंता विज्ञान भी कभी छोड़ता नहीं है।'' 18

बहरहाल, अज्ञेय इतिहास को हिस्ट्री वाले अर्थ में स्वीकार न करके इतिहास के तौर पर ही स्वीकार करना चाहते थे। काल के पश्चिमी और पूर्वी बोध के मध्य प्रतीत होने वाले अलगाव के दर्शन को सामने रखते हुए, वे उसके मूल में निहित जातीय सांस्कृतिक एवं धार्मिक निहितार्थों को उद्घाटित करना चाहते थे। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अज्ञेय से एक साक्षात्कार के दौरान पूछा था कि 'एक तरफ आपने भारतीय कालबोध (पूर्वी) की चर्चा करते हुए उसे चक्राकार माना है, वर्तुलाकार माना है और दूसरी ओर पश्चिमी कालबोध को आपने एकरेखीय या ऐतिहासिक काल कहा है। बल्कि उसे सावधि काल भी कह सकते हैं। लेकिन लगता यह है कि पश्चिम में भी अंततः इस सावधि काल को लाँघ कर निरवधि काल में प्रवेश ही जीवन का उद्देश्य है क्योंकि अंततः 'पैराडाइज रिगेन' करना है; जो बात हिब्रू परंपरा से शुरू होती है और उससे निकली हुई सारी परंपराओं में हमें दिखाई देती है। तो इस सावधि काल में भी यही लगता है कि यह एक ऐसे बड़े अनंत काल का एक हिस्सा है और हमारे यहाँ भी अगर यह वर्तुल है या चक्र है तो उसका एक हिस्सा। एक रेखा हो जाती है। इसलिए हमारे यहाँ भी ऐतिहासिकता को बिलकुल नकारा नहीं जा सकता।' इसका उत्तर देते हुए अज्ञेय ने कहा था कि '' पश्चिमी चिंतन में जो मनुष्य को केंद्र में रख कर ऐतिहासिक काल की कल्पना होती है, उसका एक आरंभ और अंत है जो कि हमारी परिभाषा के काल के उस महावृत्त का एक हिस्सा है और वह वृत्त बहुत बड़ा है इसलिए उसका अंश रेखा जैसा भी दिख सकता है उसकी थोड़ी गोलाई जो है उसकी उपेक्षा भी हो सकती है। और उस टुकड़े का विचार करें तो उसमें तो आदि और अंत दोनों हैं ही। लेकिन हम तो वहाँ समाप्त नहीं करते। विचार के लिए उतना अंश भी देख सकते हैं। पैराडाइज लास्ट और रिगेंड दोनों की बात करें तो, उसमें अगर आदम ही पैराडाइज से निर्वासित होता है और आदम ही वापस पहुँचता है तो उसके भी दो छोर या दो सीमाएँ हैं। उससे आगे या पीछे के काल की अवधारणा सैद्धांतिक या थ्योरी रूप से तो है लेकिन विचार में नहीं रखी जा रही। उनके देवताओं कायानी फरिश्तों का भी तो एक आरंभ होता है पर फिर वे अमर होते हैं; यानी एक ऐसा काल भी है जो कि अनादि तो नहीं है लेकन अनंत है।'' 19 अपनी एक कविता 'मुझे आज हँसना चाहिए' में अज्ञेय पश्चिमी इतिहासबोध के एप्लिकेशन और फंक्शन दोनों पर कटाक्ष करते हैं। उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं

इसीलिए तो
जिनका इतिहास होता है
उनके देवता हँसते हुए नहीं होते :
कैसे हँस सकते?
और जिनके देवता हँसते हुए होते हैं
उनका इतिहास नहीं होता :
कैसे हो सकता?
इसी बात को लेकर
मुझे आज हँसना चाहिए...

नदी के द्वीप में भुवन रेखा के प्रति दिलचस्पी की एक प्रमुख वजह के तौर पर यह भी गिनाता है कि 'जिस स्त्री का इतिहास होता है, उसमें किसे दिलचस्पी नहीं होती?'20

भारतीय कालबोध की वैज्ञानिकता और उस कालबोध से भारतीय कथा संरचना की संबद्धता के प्रसंग में अज्ञेय के तीन निबंध विशेष रूप से उल्लेख्य हैं : पहला, 'काल का डमरूनाद', दूसरा 'वैज्ञानिक सत्ता और मिथकीय चेतना' और तीसरा 'साहित्यिक काल : यथार्थ का क्रम'। भारतीय कालबोध की वैज्ञानिक व्याख्या करने के क्रम में अज्ञेय लिखते हैं कि '' प्राचीन कालगणना में सदैव चतुर्युग की आवृत्ति की चर्चा होती थी। चक्रावर्तन के आरंभ से चलें तो लक्ष्य करते हैं कि पहला सबसे दूर का युग कृतयुग है जो सबसे लंबा है (17,28,000 वर्ष); दूसरा त्रेता, उससे छोटा (12,96,000 वर्ष); तीसरा द्वापर और छोटा (8,64,000 वर्ष) और वर्तमान कलि सबसे छोटा (4,32,000 वर्ष)। युगों के नामों और प्रत्येक की लंबाई पर ध्यान दें। कालारंभ कृदंत से क्यों? त्रेता में तिगुना होने का भाव है, किससे तिगुना? द्वापर की अवधि कलि से दुगुनी है, त्रेता की तिगुनी, कृत की चौगुनी : हमारी ओर आते हुए काल संकुचित होता हुआ क्यों चलता है? इन प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट हैं और हमारे प्रतीक में निहित हैं। गणना हम आवर्तन के आरंभबिंदु से नहीं करते, वर्तमान से करते हैं, वर्तमान के क्षण से करते हैं - डमरू की कटि से करते हैं। काल हमारी ओर आते हुए संकुचित होता नहीं चलता; हमसे दूर हटते हुए विस्तीर्ण होता चलता है। कृत आरंभ नहीं है, दूरतम निष्पत्ति है। त्रिकोणमिति के तर्क से यह भी तत्काल समझ में आ जाएगा कि कलि से द्वापर की अवधि दुगुनी, त्रेता की तिगुनी और कृत की चौगुनी क्यों है।'' 21 अज्ञेय इसके बाद गणितीय सूत्रों की सहायता से भारतीय काल विभाजन की वैज्ञानिकता और शिव के डमरू, विष्णु के चक्र शंख आदि को भारतीय आवर्तीकाल के प्रतीकों के रूप में व्याख्यायित करते हुए पश्चिम में येट्स की कविता, लारेंस स्टर्न के उपन्यास, मायरहाफ की 'टाइम इन लिटरेचर' आदि से उदाहरण देते हुए पश्चिम के कालबोध से उनके साहित्यिक संरचनाओं प्रभावित होने को सामने रखते हैं। उसके बाद भारतीय साहित्यिक संरचनाओं पर बात करते हुए इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि ''भारतीय आख्यान साहित्य मूलतः आवर्ती रहा है। आवर्ती कथा ही विश्व के आख्यान साहित्य को भारत की विशिष्ट देन है। ईसप के दृष्टांत, अलिफ लैला, डेकामेरॉन सभी के प्रारूप भारतीय हैं। इसके विपरीत पश्चिम की काल परिकल्पना मूलतः ऋजु रेखानुसारी है; उसके उत्तम उदाहरण हमें उस साहित्य में मिलते हैं जिसमें इस सीधी गति की अपरिवर्तनीयता बिजली की कौंध सी हमें चौंका जाती है अर्थात् शार्ट स्टोरी में।'' 22 अज्ञेय अपने निबंध 'साहित्यिक काल : यथार्थ का क्रम' में लिखते हैं कि '' अलफलैला अथवा दशकुमारचरित अथवा पंचतंत्र सभी चक्रमित अथवा शृंखलित कथाएँ हैं। एक दूसरे प्रकार की शृंखलित कथा भी मिलती है जिसे खुली शृंखला कहा जा सकता है। लेकिन महत्व इस बात का नहीं है कि शृंखला के दोनों छोर अंत में जोड़ कर बाँध दिए जाते हैं या नहीं, कि कालसर्प अपनी पूँछ पकड़कर निगलने लगता है या नहीं। कथा में से निकली हुई कथा की शृंखला हो तो उस शृंखला को छोर मिलाने के लिए दूसरी युक्तियाँ भी हो सकती हैं। और खुली शृंखला में वह युक्ति वृत्ताकार आवर्तन की न होकर ऋजु प्रत्यावर्तन की है सीधी रेखा में वापसी की है।'' 23

स्वयं अज्ञेय के सर्जनात्मक साहित्य की बात करें तो उसमें कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर दिक् और काल के प्रश्नों को लक्ष्य किया जा सकता है। कथ्य और शिल्प के स्तर पर उनके तीनों उपन्यासों में इसे देखा जा सकता है। 'अपने अपने अजनबी' में वे लिखते हैं कि ''हम समय की बात करते हैं, जोकि एक प्रवाह है। किसका प्रवाह है? क्षण का। लेकिन क्षण क्या है? यह जानने का मेरे पास कोई उपाय नहीं है। एक ढंग है घड़ी की टिक् टिक् से नापने का, उस टिक् टिक् के और भी खंड किए जा सकते हैं और माना जा सकता है कि वैसा छोटा से छोटा खंड क्षण है। विज्ञान के तरीके दूसरे भी हैं - निरे गणित से सिद्ध किया जा सकता है कि समय का छोटे से छोटा अविभाज्य अंश कितना होता है और उस अंश को क्षण कहा जा सकता है। लेकिन ऐसा विज्ञान और ऐसी जानकारी किस काम की? हमारे लिए समय सबसे पहले अनुभव है - जो अनुभूत नहीं है वह समय नहीं है। सूर्य की गति समय नहीं है, बल्कि उस गति के रहते क्रमशः जो कुछ होता है उसका होते रहना ही समय की माप है।'' 24 जो अनुभूत है वही सच्चा और यथार्थ है। अज्ञेय इस विचार को नदी के द्वीप में ज्यादा विस्तार से सामने रखते हैं, जब रेखा अपने एक पत्र में भुवन को लिखती है कि''एक जमाना था जब मैं स्त्रियों को ऐसे समय का हिसाब रखते देखकर हँसती कि अमुक घटना 'अमुक बेटे या बेटी के जन्म से तीन मास पहले हुई थी', या कि 'जब अमुक एक वर्ष का था' या 'जिस साल अमुक की लड़की की शादी हुई' ...और आज मैं स्वयं हिसाब लगा रही हूँ, तुमसे पहली भेंट से दस महीने बाद, तुलियन से आठ महीने बाद, और तुम्हें अंतिम बार देखा तब से चार महीने... कैसे मानव अपने सारे जगत् को अपने छोटे से जीवन की छोटी छोटी घटनाओं के आसपास जमा लेता है और विराट का समूचा सत्य उस निजी छोटे से सत्य का सापेक्ष्य हो जाता है! लेकिन वह निजी छोटा सत्य छोटा क्यों है? विराट असीम को दिखानेवाले मेरी खिड़की... वह लाख छोटी हो, एक तो मेरी है, दूसरी मेरे लिए विराट बांधे हुए है, विराट का चौखटा है... सोचते सोचते यह ध्यान आता है, यह झरोखे से देखना गलत है, यह अपने को विराट से अलग रख कर देखना है, उसे बाहर मान लेना; मुझे चाहिए कि उसमें लय हो जाऊँ, घर से बाहर निकल अपनी अनुभूति के पिंजरे से बाहर निकलूँ और विराट के प्रति अपने को सौंप दूँ, उसी की हो जाऊँ - उसकी झरोखे से न देखकर स्वयं उसका झरोखा हो जाऊँ ...पर यह भी क्या निरा शब्द जाल नहीं है, घूम फिरकर अपने तक लौट आना नहीं है?'' 25 'शेखर एक जीवनी' में 'अस्ति या अस्मिता' के प्रश्न को देखा जा सकता है। अज्ञेय अवस्थिति बोध के लिए जिस दिक् और काल के साथ अस्ति या अस्मिता को महत्वपूर्ण मानते हैं, उसे उनके तीनों उपन्यासों में प्रमुखता से देखा जा सकता है। इस ओर हल्का संकेत नंदकिशोर आचार्य ने किया है कि '' अज्ञेय के बाद कहानी स्थूल घटनात्मकता में नहीं बल्कि आंतरिक मनोभावों और अंतर्द्वंद्वों के आधार पर विकसित होने लगी और इसी कारण वह अब इकहरे यथार्थ की जगह बहुस्तरीय, जटिल और संश्लिष्ट यथार्थ का वाहन होने लगी। ...उपन्यास के क्षेत्र में अज्ञेय का अवदान शायद और भी महत्वपूर्ण है। अज्ञेय के औपन्यासिक प्रयोगों की केंद्रीय बात यह है कि उनका आधार एकरेखीय कालबोध के बजाय समवर्ती काल का बोध है जिसे वह भारतीय कथा रचना के आधार के रूप में स्वीकार करते हैं। स्मृति और वर्तमान को एक साथ गूँथना इन प्रयोगों की विशेषता है और शायद इसी की वजह से इन कथाकृतियों की भाषा में संवेदना और वर्णन विश्लेषण एक हुए जान पड़ते हैं। यह हिंदी की जो हिकमत विनोद कुमार शुक्ल में दिखाई पड़ती है और कालबोध के जो प्रयोग ' कलिकथा' जैसे उपन्यासों में दिखाई पड़ते हैं, उनकी तात्विक जैविक पृष्ठभूमि में अज्ञेय के औपन्यासिक प्रयोगों का दिखाई दे जाना स्वाभाविक है। काल की सहवर्तिता या उसे एक पट की तरह देखने की जो युक्ति कृष्ण बलदेव वैद के उपन्यासों में मिलती है, उस ' क्रमहीन सहवर्तित्व' की अवधारणा और झलक कुछ बुनियादी भिन्नताओं के बावजूद अज्ञेय के औपन्यासिक प्रयोगों और चिंतन में दिखाई देती है।'' 26 अज्ञेय मानते हैं कि ''कलात्मक विधा के रूप में उपन्यास का प्रयोजन मनोवैज्ञानिक काल परिदृश्य से है, ऐतिहासिक काल परिदृश्य से नहीं।''27 शायद इस कोण से अज्ञेय के उपन्यासों के पुनर्पाठ की संभावना बची हुई है। स्वयं उनकी कविताएँ जिस मनोदशा और भावभूमि का चित्रण करती हैं, उनका संबंध मनोवैज्ञानिक काल परिदृश्य ये ज्यादा जुड़ता है जिसके कारण प्रचलित समझदारी (कनवेंशनल विजडम) के अनुसार उसे विचारधारात्मक स्तर पर यथार्थमूलक नहीं कहा जा सकता है। इस लिहाज से मार्क्सवादी आलोचना नंदकिशोर आचार्य से उलट स्वयं अज्ञेय के यहाँ इकहरे यथार्थ के होने की बात करती है। इस अंतर्विरोधात्मक स्थिति में यह देखना आवश्यक हो जाता है कि स्वयं अज्ञेय यथार्थ के बारे में क्या राय रखते थे? अज्ञेय सत्य और तथ्य के जरिए यथार्थ को परिभाषित करते हैं। 'नदी के द्वीप' में चंद्रमाधव से बहस करता हुआ भुवन कहता है -

'' 'एक उदाहरण लीजिए : दो और दो चार होते हैं, इस बात को आप क्या कहेंगे?'

'सत्य और क्या? '

'लेकिन मैं नहीं कहूँगा। मैं कहूँगा, यह तथ्य है। और इस तरह के सब ' सत्य' केवल तथ्य हैं। सत्य की संज्ञा उन्हें तब मिल सकती है, जब उनके साथ हमारा रागात्मक संबंध हो। यानी जो तथ्य हमारी भावजगत की यथार्थता है, वह सत्य है : जो निरे वस्तुजगत की है, वह तथ्य है, वास्तविकता है, यथाथर्ता है, जो कह लीजिए, पर सत्य से वह ऊनी पड़ती है।"' 28 भुवन के विचारों को अज्ञेय का विचार इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि अज्ञेय ने अपने वैचारिक लेखन में भी लगातार इस अंतर को रेखांकित किया है। इसलिए अज्ञेय के साहित्य में भी हमें भावजगत से संबद्ध आंतरिक यथार्थ की ही बहुलता देखने को मिलती है। अज्ञेय के लिए यथार्थ ऐसा सत्य है जिसके साथ हमारा रागात्मक संबंध हो, वस्तुजगत के यथार्थ को वे तथ्यपरक मानते हैं। इस कारण से अज्ञेय का यथार्थ के प्रति नजरिया मार्क्सवादी साहित्य या विचारधारा से अलग है। मार्क्सवादी साहित्य यथार्थ के नाम पर जिस सामाजिक यथार्थ और सामाजिक परिवेश की बात करता है उससे इतर आधुनिक हिंदी साहित्य में अज्ञेय ने पहली बार इस ओर ध्यान दिलाया कि '' आभ्यंतर जगत के और भी गहरे आयाम हो सकते हैं जिन्हें भी हमें परिवेश के अंतर्गत मानना चाहिए।''29 परिवेश का यह नया बोध उनके समय और समाज से उपजा है। अज्ञेय के अनुसार '' मनुष्य और परिवेश के मध्य संबंध के पश्चिमी अवबोध ने सार्वभौम आत्मघात की स्थिति उत्पन्न कर दी है। इससे बचने का यही उपाय है कि परिवेश की नई पहचान बने, उससे नए प्रकार के संबंध जुड़ें।'' 30

अज्ञेय मानते हैं कि 'पश्चिम के विज्ञान की जैसी प्रगति और प्रवृत्ति 18वीं 19वीं शती में हुई उसके कारण एक चीज विज्ञान से छूट गई जो 17वीं शती के पहले तक उससे भी वैसे ही जुड़ी हुई थी जैसे पुराण और मिथक के साथ।' यह चीज थी सृष्टि में उसके अवस्थिति बोध की अस्ति बोध की। इस अवस्थिति बोध और अस्ति बोध से उसके आचारशास्त्र और नीतिशास्त्र प्रभावित और संचालित होते थे। और जैसे जैसे विज्ञान की उन्नति के साथ यह प्रश्न अप्रासंगिक होता चला गया वैसे वैसे आचार और नैतिकता का संकट व्यक्ति के आभ्यंतर जगत को निगलता गया। जिसने अस्मिता के संकट का रूप धारण किया। पश्चिम में विज्ञान की प्रगति के साथ अस्मिता का यह जो संकट उत्पन्न हुआ उसे पश्चिम में विज्ञान की प्रगति और उसके दिक् काल की परंपरा के साथ संबंधों की सहज परिणति के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह बात लागू नहीं होती है। प्रकृति के संदर्भ को सामने रखें तो भारतीय और यूरोपीय दृष्टिकोण में यह बड़ा अंतर हमें देखने को मिलता है। यहाँ प्रकृति 'आत्म' का हिस्सा है। पश्चिम में वह अन्य है। ''भारतीय चिंताधारा में कभी मानव की सत्ता को 'मनुष्य बनाम प्रकृति' की स्थिति बनाकर नहीं देखा गया। भारतीय संस्कार जीवमात्र को, सृष्टिमात्र को; एक अखंड अविभाज्य ग्रहणशील सातत्य के रूप में देखता रहा; उसकी अनेक केंद्रीय अवधारणाओं में वैसा विरोध संबंध संभव ही नहीं था जो पश्चिमी परिकल्पना का आधार रहा। उसके लिए प्रकृति मानव का प्रतिपक्ष नहीं था बल्कि प्रकृति उस सार्वभौम सहजीविता का ही दूसरा नाम था जिसमें मानव और मानवेतर एक सूत्र में बँधे थे और परस्पर सहायता ही सबकी नियति थी।'' 31 जबकि पश्चिम में विज्ञान की उन्नति ने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर हमारे लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कीं। अज्ञेय मानते हैं कि '' प्राचीन लेखक का विश्व परिवेश सदैव स्थितिशील होता था : वह दिया हुआ होता था।...परिवर्तन होते थे लेकिन हर परिवर्तन एक संतुलित स्थिति से दूसरी संतुलित स्थिति तक ही उसे ले जाता था।'' 32 मतलब परिवर्तन होता था। "लेकिन इस आग्रह के साथ कि वह परिवर्तन सनातन तत्व के साथ अपने नए संबंध के कारण है, उस तत्व में किसी परिवर्तन के कारण नहीं"'33 लेकिन विज्ञान ने आधुनिक विश्व को बहुत बड़ा कर दिया है और यह विस्तार केवल "ज्ञान की परिधि का विस्तार नहीं है बल्कि ज्ञान के स्वभाव में भी है। विकासवाद के सिद्धांत ने जीव जातियों के विकास की बात से आरंभ करके केवल प्राणियों को ही नहीं हर चीज को सापेक्षता के एक क्रम में रख दिया है ; जीव को, मन को, नैतिकता को, मूल्यों को, यथार्थ को। जो कुछ भी हमारे ज्ञान के पकड़ में आ सकता है या आता है, सब बदल रहा है।' 34 यहाँ आकर 'मैं', 'मूल्य' आदि सभी परिवेश हो जाते हैं। इससे 'अस्ति' की आभ्यंतर पहचान और आभ्यंतर यथार्थ में अपनी स्थिति की पहचान की समस्या उत्पन्न होती है। यही अस्मिता का संकट है और अज्ञेय के अनुसार 'इस संकटग्रस्त अस्मिता का बोध सब आधुनिकों को है।'35 अज्ञेय के लिए अस्मिता का संकट एक सांस्कृतिक संकट है। अज्ञेय के लिए 'संस्कृति मूलतः एक मूल्य दृष्टि और इससे निर्दिष्ट होने वाले निर्माता प्रभावों का नाम है। संस्कृतियाँ लगातार बदलती हैं क्योंकि भौतिक परिस्थितियाँ भी लगातार बदलती रहती हैं। भौतिक परिस्थितियों के बदलने से मूल्यदृष्टि में बदलाव आता है। इस बदले हुए मूल्यदृष्टि से संस्कृतियाँ बदलती हैं। मतलब संस्कृति एक साथ उनका परिणाम भी है और उनका आधार भी।' संस्कृति एक मूल्यदृष्टि और मूल्यनिष्ठा दोनों है। विज्ञान के बारे में दावा किया जाता है कि वह वस्तु सत्य से संबंध रखता है इसलिए मूल्य निरपेक्ष है।"अर्थात् हमारी परिभाषा की संस्कृति से ही विज्ञान का कोई वास्ता नहीं है - अर्थात् विज्ञान के संदर्भ में संस्कृति अप्रासंगिक है, भले ही इससे उत्पन्न तर्क यह निकलता हो कि तब फिर संस्कृति के संदर्भ में विज्ञान की कोई प्रासंगिकता नहीं है। लेकिन क्या यह प्रतिज्ञा सच है? क्या सचमुच विज्ञान मूल्य निरपेक्ष है या होता है, या कभी हुआ है?...क्या वास्तव में बात यह नहीं है विज्ञान भी मूल्य निरपेक्ष नहीं है, केवल पूर्वग्रह निरपेक्ष है और कह सकते हैं कि भाव निरपेक्ष है? ...यह कहा जा सकता है कि संस्कृति के सत्यों में और विज्ञान के सत्यों में अंतर होता है।"36 संस्कृति का सत्य रागजन्य होता है तो विज्ञान का विरागजन्य। पूरन चंद्र जोशी ने बर्टेंड रसेल के हवाले से लगभग यही बात इस रूप में कही है कि '' आधुनिक युग के प्रारंभकाल में पाश्चात्य देशों में भी विज्ञान और संस्कृति के पारस्परिक संबंधों का प्रश्न बार बार उठा है। इसी नतीजे पर पाश्चात्य वैज्ञानिक पहुँचे थे कि यदि हमें वैज्ञानिक क्षेत्र में सांस्कृतिक चेतना की आवश्यकता है तो सांस्कृतिक क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की।'' 37

अस्मिता के इस संकट के मूल में व्यक्ति का उसके परिवेश के साथ अनुपल बदलता संबंध है। परिवेश का यह संकट बहुस्तरीय है। एक ओर पल पल परिवर्तित होने वाली प्रकृति को पहचानने की चुनौती है दूसरी ओर उसके समानांतर व्यक्ति के आभ्यंतर जगत में आने वाले परिवर्तनों को पहचानने का संकट और तीसरे स्तर पर इन दोनों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने की समस्या है। इनके मध्य सामंजस्य स्थापित करने का काम चेतना या विवेक का है। लेकिन आधुनिक भारतीय की चेतना का निर्माण जिस अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से हुआ है, उसने इस चेतना को ही निर्मूल करने का काम किया। अज्ञेय इस निगृहता या निर्मूलता को नए लेखक की पहली समस्या मानते हुए इसके दोहरे खतरे को उद्घाटित करते हैं कि "खतरे दो दिशाओं में हैं। एक नया साहित्यकार अपने को तात्कालिक परिस्थिति के प्रति समर्पित कर दे सकता है। युगधर्म के नाम पर क्षणधर्मी होकर एक खतरनाक किस्म का अवसरवादी हो जा सकता है और अपनी चिंतन की स्वाधीनता खो दे सकता है। दूसरा खतरा दूसरी दिशा में है। वह अतीतोन्मुख होकर फिर एक बीती हुई परिस्थिति को लाना चाह सकता है , एक रूमानी लालसा उसे रूढ़िवादी ही नहीं बल्कि प्रतिक्रियावादी बना दे सकती है। पहला खतरा एक प्रकार का आत्मसमर्पण है, दूसरा दूसरे प्रकार का। अंत दोनों का है - व्यक्तित्व की पराजय और मानसिक दासत्व।" 38 कहना न होगा कि खतरों की जिन संभावित परिणतियों की ओर अज्ञेय संकेत कर रहे थे, वे दोनों सच साबित हुईं।

साहित्य उन संवेदनाओं की अनेदखी नहीं कर सकता है, जो उनके संवेदन को आकार प्रदान करती हैं। इन संभावनाओं और इनकी परिणतियों ने अज्ञेय के अनुसार "साहित्य में 'नकार की अनेक मुद्राओं को प्रेरित किया है। नकार एक तो वह है जो पहचान कर मानता है कि जब मैं और परिवेश दोनों मूल्य ही हो गए, तब न मैं रहा और न मूल्य रहे। एक दूसरा नकार है जो इस नगण्य कर दिए जाने के विरोध की चीख है। भय, संत्रास, अजनबीपन, ड्रेड, एलियनेशन, मतली एकाएक बहुत से शब्द हमारी आलोचना और हमारे साहित्य में आ गए हैं, कुछ मूल विदेशी भाषा में और कुछ देशी पर्याय रूप में। यही नहीं की अस्मिता का संकट पश्चिम में हुआ है और हमने खाहमखाह ओढ़ लिया है। संकट हमारा अपना भी है। लेकिन पश्चिम की अस्मिता अलग थी और उसके संकट के कारण भी दूसरे; हमारी अस्मिता और हमारे संकट के कारण अलग हैं। इसलिए शब्दों के पर्यायत्व का कोई खास मतलब नहीं है। फिर भी हमने एक तरफ कोश में दिए पर्याय भी लिए और दूसरी ओर उनमें मनमाना अर्थ भी भरा तो यह कोई ऐसी अनहोनी बात नहीं है, हर भाषा में शब्दों के अर्थ विकास या अर्थांतर की प्रक्रिया चलती रहती है।" 39 अज्ञेय यहाँ जब यह कहते हैं कि, हमारी अस्मिता और हमारे संकट के कारण अलग हैं तब वे एक महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित कर रहे होते हैं। लेकिन उसके बाद की पंक्तियों में जब उस के पर्यायत्व को खास महत्व न देते हुए अर्थ विकास या अर्थांतर की प्रक्रिया की बात करते हैं, तब वे आधुनिक साहित्य के एक महत्वपूर्ण पक्ष को चीन्ह कर भी अनचीन्हा करने का काम करते हैं। अज्ञेय को अपने संदर्भ, संस्कार और संवेदना का जो गहरा बोध था वह उनके द्वारा प्रवर्तित वाद (प्रयोगवाद) के अन्य रचनाकारों में समान परिमाण में मौजूद नहीं था। अज्ञेय स्वयं प्रवर्तित वाद की रक्षा के लिए अपने शिविर के रचनाकारों के सामयिक बोध और इतिहास बोध की रक्षा के लिए इस 'डिफेंस' का सहारा लेते हैं। अज्ञेय जिन प्रतीकों की बात कर रहे थे वही प्रतीक अपनी अर्थवत्ता खोकर उनके समकालीन काव्यांदोलन में रूढ़ियों के रूप में प्रयुक्त होने लगे थे। इस दौर में आधुनिक बोध अर्थात संकट बोध के नाम पर प्रचलित मूल्य भय, संत्रास, अकेलापन, विडंबना आदि अपने संदर्भों की उपज कम और आयातित शब्दावली का प्रतिनिधित्व ज्यादा करते हैं। नवनास्तिवाद, नग्नवाद, देहवाद आदि भी इसी प्रक्रिया से उपजे। जिसको लक्ष्य किया गया। परिणामतः इसके कारण हिंदी साहित्य में 'सैन्यदलीकरण' (रेजिमेंटेशन) की प्रवृत्ति उभरी। शिविर बने। परस्पर आरोप प्रत्यारोपों का दौर आरंभ हुआ। एक 'संवादोन्मुख समकालीनता' की प्रवृत्ति विकसित हुई। जिससे हिंदी साहित्य का छठा दशक आप्लावित रहा। जिसके केंद्र में 'प्रगतिशीलता बनाम प्रयोगशीलता' विषयक विवाद रहा। अन्य सारे विवाद इसी से जुड़े रहे, जिनमें प्रमुख थे - भारतीयता का सवाल, नैतिकता का सवाल, आलोचक राष्ट्र के निर्माण की चिंता, परिवेश का संकट, आत्म का संकट, साहित्य में उत्पन्न गतिरोध की समस्या, संप्रेषण का संकट, श्लीलता और अश्लीलता का प्रश्न, व्यक्तिवाद बनाम समाजवाद, मार्क्सवाद बनाम विश्लेषणवाद, काव्य सत्य और सामाजिक सत्य, वैयक्तिक चेतना बनाम राजनीतिक चेतना, आस्था और सौंदर्य, नए प्रतिमान : पुराने निकष, मानव मूल्यों के संदर्भ में लघु मानव की कल्पना, व्यापकता और गहराई आदि। असल में ये सभी उसी आधुनिकता के मसले से संबद्ध थे। लेकिन इस दिशा में शायद ही हिंदी समाज ने अज्ञेय के विचारों पर सहानुभूतिपूर्ण तरीके से विचार करने की जरूरत समझी हो। आखिर इसकी वजहें क्या रहीं?

अज्ञेय वामपंथियों के लिए दक्षिणपंथी, आधुनिकतावादी और न जाने क्या क्या थे। हिंदी साहित्य के अधिसंख्य प्रभावशाली आलोचक मार्क्सवाद के हिमायती रहे हैं इस कारण से विचारधारात्मक अलगाव के कारण अज्ञेय लगातार उनकी आलोचना के पात्र ही बने रहे। और रही बात दक्षिणपंथ की तो विद्यानिवास मिश्र, रामस्वरूप चतुर्वेदी, नंदकिशोर आचार्य, रमेशचंद्र शाह के प्रयत्नों से अज्ञेय भले संदर्भवान बने रहे लेकिन हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना ने जिस ढंग से अपनी परंपरा का निर्माण किया वैसा सुचिंतित प्रयास इनकी ओर से देखने को नहीं मिला। इसलिए अब भी अज्ञेय के सर्जना और आलोचना के कई आयाम अनछुए हैं। इस शताब्दी वर्ष में जिन्हें विशेष रूप से अज्ञेय की याद आई है उनमें सर्वप्रमुख हैं, अशोक वाजपेयी। इधर अशोक वाजपेयी को दो अवसरों पर सुनने का संयोग मिला। एक हैदराबाद विश्वविद्यालय में 'मैनेजर पांडेय और हिंदी आलोचना' विषयक त्रिदिवसीय (1-3 सितंबर, 2010) संगोष्ठी में और दूसरा पवन वर्मा द्वारा लिखी गई पुस्तक 'भारतीयता की ओर : संस्कृति और अस्मिता की अधूरी क्रांति' के लोकार्पण के अवसर पर 29 अक्टूबर को इंडिया हैबिटेट सेंटर में। हैदराबाद में उन्होंने कहा कि मार्क्सवादी आलोचकों ने जिन पर लिखा है उसमें एक चुनाव दिखता है। मार्क्सवादी आलोचना ने 'कैननाइजेशन' का काम किया है। मैनेजर पांडेय के संदर्भ में तो नहीं लेकिन मार्क्सवादी आलोचना के संदर्भ में उनकी शिकायत वाजिब जान पड़ रही थी क्योंकि मैनेजर पांडेय ने भले स्वतंत्र रूप से अज्ञेय पर कुछ न लिखा हो लेकिन उनकी बातचीत में अज्ञेय का जिक्र बार बार और लेखन में एक प्रसंग अक्सर आता है कि ''1947 में देश का विभाजन हुआ था और उसके साथ भीषण नरसंहार भी। उस समय हिंदी कविता में छायावाद के निराला और पंत जैसे कवि मौजूद थे और प्रगतिशील आंदोलन के नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर तथा त्रिलोचन भी कविताएँ लिख रहे थे। लेकिन इनमें से किसी भी कविता में देश के विभाजन और उससे जुड़े नरसंहार की विराट त्रासदी की कोई महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति नहीं है। उस समय के कवियों में केवल अज्ञेय ने उस भयावह स्थिति पर ' शरणार्थी' नाम से ग्यारह कविताएँ लिखीं।'' 40 अज्ञेय के संदर्भ में इस अपेक्षाकृत कम चर्चित ऐतिहासिक तथ्य का उद्घाटन मार्क्सवादी आलोचक द्वारा किया गया न कि 'अपनों' के द्वारा। अज्ञेय को 'अपना' कहने वाले क्या कर रहे हैं? पवन वर्मा द्वारा भारतीयता पर लिखी गई किताब के लोकार्पण के अवसर पर संयोग से ओम थानवी भी उपस्थित थे। कुछ ही दिन पहले अज्ञेय पर उनके द्वारा जनसत्ता में लिखे गए सुदीर्घ संस्मरणों को ध्यान में रखकर ही उनका स्मरण यहाँ किया जा रहा है। किताब पर बोलते हुए उन्होंने अपने बेहद शुरुआती वाक्यों में ही इस आशय की बातें कहीं कि 'पवन वर्मा द्वारा भारतीयता पर लिखी इस किताब को पढ़ कर ही मैं अपनी जड़ों को जान सका। भारतीयता को समझ सका।' सुनकर काफी हैरत हुई कि अज्ञेय से आत्मीयता का दावा करनेवाला व्यक्ति इस ढंग की बात कैसे कर सकता है? फिर लगा कि शायद अशोक वाजपेयी आगे कुछ भूलसुधार करेंगे। लेकिन उन्होंने भी भारतीयता को 'जातीय अशुद्धता का असमाप्य उत्सव' कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। इस पूरे प्रसंग के जरिए कहना यह है कि मुँह और अवसर देखकर बात करने वाले लोग अज्ञेय क्या किसी के साथ न्याय नहीं कर सकते। मार्क्सवादी आलोचना ने अपनी परंपरा को एक तरतीब देने के क्रम में 'असहमति का साहस और सहमति का विवेक' का लगातार परिचय दिया है। आगे चलकर अज्ञेय के साथ भी न्याय 'असहमति का साहस और सहमति का विवेक' रखनेवाला ही कोई करेगा, न कि भक्तिभाव रखनेवाला।

समग्रता में देखें तो दिक् और काल संबंधी अपने चिंतन के माध्यम से अज्ञेय ने पश्चिम के बरक्स भारतीयता की संकल्पना की वैज्ञानिकता को रेखांकित करने के साथ हमारे परिवेश की चेतना को व्यापक बनाने का काम किया है। इस दृष्टि से विचार करने पर ऐसा जान पड़ता है कि अज्ञेय इतिहासबोध की भारतीय संकल्पना की ओर संकेत कर रहे थे। लेकिन उनके इन विचारों का हिंदी साहित्य में 'रागयुक्त प्रेम की सीमा और विरागजन्य उपेक्षा' के कारण समुचित मूल्यांकन नहीं हो सका और दूसरे अनुशासनों के लिए तो वे 'हिंदीवाले' ही ठहरे। इधर वेलचरू नारायण राव, डेविड शुलमन और संजय सुब्रह्मण्यम् द्वारा संपादित किताब 'टेक्सचर ऑव टाइम' को पढ़ते हुए पुनः अज्ञेय की इतिहास संबंधी इन धारणाओं का ध्यान हो आया। तब लगा कि इतिहास की इस पुस्तक, जो कि अंग्रेजी में लिखी गई है, के हवाले से अगर अज्ञेय के दिक् काल संबंधी विचारों को फिर से प्रस्तुत किया जाए तो शायद इसकी ओर हिंदी समाज का ध्यान आकर्षित हो। इस किताब की भूमिका में संपादक त्रयी ने 'टाइम के टेक्सचर ही नहीं गेस्चर' पर भी कुछ बातें की हैं जो काबिले गौर हैं। अपने संपादकीय में वे लिखते हैं कि '' लगभग हजार साल पहले बहुश्रुत विद्वान अलबरूनी ने भारतीयों के संदर्भ में 'दुर्भाग्यपूर्ण' शिकायत की थी कि हिंदुओं में चीजों की ऐतिहासिकता के प्रति सजगता का अभाव होता है। वे शासकों के वंशानुक्रम के प्रति लापरवाह रहते हैं। जानकारी के लिए बहुत जोर देकर पूछे जाने पर भी उनके पास कोई समुचित उत्तर नहीं होता और वे कहानियाँ सुनाने लगते हैं। थोड़े अंतर के साथ औपनिवेशिक कालखंड के लेखकों द्वारा इस नजरिए को बराबर दुहराया गया है।'' 41 इसके प्रत्युत्तर में इस किताब के संपादकगण इतिहास की प्रचलित परिपाटी से इतर हटकर भारतीय संदर्भ में एक नई इतिहासदृष्टि की प्रस्तावना करते हैं। दक्षिण भारत के इतिहास के संदर्भ में वे तेलुगु, तमिल, संस्कृत, मराठी और फारसी भाषा में रचित कविता कहानियों को उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि '' संभव है कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में परंपरा से पगी उनकी (अंग्रेजों) आँखों को इनमें इतिहास की कोई झलक नहीं दिखी हो क्योंकि इन रचनात्मक कामों में वह चमक नहीं थी जिससे इनकी गणना ऐतिहासिक आख्यानों में की जा सकती। ...लेकिन हम दिखलाएँगे कि दक्षिण भारत में इतिहास कई विधाओं में अभिव्यक्त हुआ है। और इतिहासलेखन किसी विधा या लेखन की किसी खास शैली का मोहताज नहीं है। इस संदर्भ में आधुनिक काल में सामने आए पश्चिमी इतिहासदर्शन से इसकी तुलना महत्वपूर्ण जान पड़ती है। उन्नीसवीं शताब्दी में इतिहास के क्षेत्र में आए विधेयवादी मोड़ से पहले पश्चिमी यूरोप में इतिहास अपेक्षाकृत नियत और निश्चित शैलीगत आकार ग्रहण कर चुका था। इतिहास की इस शैली के कुछ स्पष्ट लक्षण थे। इतिहास कई विशेषताओं से युक्त एक साँचा था जिसकी एक सुस्पष्ट पद्धति थी, जिसमें उन अतीत से जुड़े स्रोतों को इकट्ठा किया जाता था, उसको एक तरतीब दी जाती थी। विश्वसनीयता के आधार पर उनको श्रेणीकृत किया जाता था और अंततः उसे गद्यपरक आख्यान में व्यक्त कर दिया जाता था। ...हीगेल के बाद के इतिहास विषयक लेखन के लिए आखिरकर गद्य पहली पसंद बना। पश्चिमी इतिहासकारों का ऐसा मानना था कि यदि इतिहासकार सत्य को प्रस्तुत करना चाहता है तो गद्य के अलावा इसके लिए दूसरा कोई उपयुक्त माध्यम नहीं हो सकता।'' 42 आगे वे पुनः लिखते हैं कि '' दक्षिण भारत में इतिहास की स्वयं कोई शैली नहीं है और न ही इतिहासलेखन के लिए कोई शैली नियत है। हम चाहें तो तथ्यात्मक और काल्पनिक आख्यान के मध्य फर्क करने का एक सर्वमान्य संकेतक प्रस्तावित कर सकते हैं जिसके माध्यम से किसी भी भाषा का पाठक दिए हुए पाठ को पढ़ते हुए उसके बीच अंतर कर सकता है। ...हम यह प्रस्तावित करते हैं कि किसी भी इतिहास की अभिव्यक्ति उस समुदाय विशेष में प्रचलित प्रभावशाली साहित्यिक शैली में ही होती है और उसका अपना एक देश काल होता है। यदि पुराण सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक शैली है तो इतिहास पुराणों के रूप में लिखा जाएगा, यदि उस दौर में वर्चस्व काव्य का हुआ तो हम इतिहास को काव्य में अभिव्यक्त होता हुआ पाएँगे, यदि गद्य उस क्रम में आगे आता है तो वह भी इतिहास की सेवा करेगा। ...कोई शैली शायद ही सिर्फ एक माध्यम के प्रति समर्पित होती है।'' 43 निष्कर्ष के तौर पर वे लिखते हैं कि ''प्रत्येक समुदाय अपना इतिहास उसी माध्यम में लिखता है जो उसके समय और समाज में साहित्यिक रचनाकर्म के लिए प्रभावशाली तौर पर प्रयुक्त होता रहता है।''44 ''अब भी ऐसे इतिहास और इतिहासकार मौजूद हैं जो यथार्थ के ज्यादा व्यापक आयाम, जिसे हम मिथ कहते हैं, के प्रति उदारमना हैं। और इतिहास साहित्य की तरह लिखा जा सकता है इसे समझने के लिए हमें किसी हेडन ह्वाइट की आवश्यकता नहीं है।''45 संभव है, इसके बाद अज्ञेय के दिक् काल और मिथकों की वैज्ञानिक सत्ता से जुड़े विचारों की किंचित सार्थकता हिंदी समाज को जान पड़े।

संदर्भ

1. ए. अरविंदाक्षन, अज्ञेय की उपन्यास यात्रा, लोकभारती, इलाहाबाद, 1992, पृ. 168

2. रघुवीर सहाय, गोपाल दास, अज्ञेय अपने बारे में : एक साक्षात्कार, आकाशवाणी प्रकाशन, आकाशवाणी महानिदेशालय, नई दिल्ली, पृ. 44

3. अज्ञेय, खुले में खड़ा पेड़, नंदकिशोर आचार्य (संपा), वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, 2002, पृ. 70

4. नंदकिशोर आचार्य (संपा), अज्ञेय संचयिता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001, पृ. 407

5. अज्ञेय, खुले में खड़ा पेड़, पृ. 18

6. वही, पृ. 22-23

7. वही, पृ. 19

8. वही, पृ. 21

9. अज्ञेय, आत्मनेपद, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2003, पृ. 77

10. अज्ञेय, खुले में खड़ा पेड़, पृ. 91

11. कृष्णदत्त पालीवाल (संपा), अज्ञेय से साक्षात्कार, आर्य प्रकाशन मंडल, दिल्ली, 2010, पृ. 52

12. अज्ञेय, आत्मनेपद, पृ. 78

13. वही, पृ. 78

14. रघुवीर सहाय, गोपाल दास, अज्ञेय अपने बारे में, पृ. 47

15. अज्ञेय, लेखक का दायित्व, पृ. 120

16. वही, पृ. 60

17. अज्ञेय संचयिता, पृ. 402

18. अज्ञेय संचयिता, पृ. 402-403

19. कृष्णदत्त पालीवाल (संपा), वही, पृ. 57-58

20. अज्ञेय, नदी के द्वीप, सरस्वती प्रेस, इलाहाबाद, 1951, पृ. 28

21. अज्ञेय, लेखक का दायित्व, पृ. 109

22. वही, पृ. 115

23. वही, पृ. 126-127

24. अज्ञेय, अपने अपने अजनबी, भारतीय ज्ञानपीठ, 2006, पृ. 19

25. अज्ञेय, नदी के द्वीप, पृ. 252

26. अज्ञेय संचयिता, भूमिका से

27. अज्ञेय, लेखक का दायित्व, पृ. 151

28. अज्ञेय, नदी के द्वीप, पृ. 18

29. अज्ञेय, साहित्य का परिवेश, पृ. 6

30. वही, पृ. 8

31. अज्ञेय (संपा), साहित्य का परिवेश, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1985, पृ. 7

32. अज्ञेय, लेखक का दायित्व, नंदकिशोर आचार्य (संपा), वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, 2002, पृ. 25

33. अज्ञेय संचयिता, पृ. 405

34. अज्ञेय, लेखक का दायित्व, पृ. 26

35. वही, पृ. 29

36. अज्ञेय, खुले में खड़ा पेड़, पृ. 60-61

37. पूरन चंद्र जोशी, आजादी की आधी सदी : स्वप्न और यथार्थ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003, पृ. 114

38. अज्ञेय, आत्मनेपद, पृ. 82

39. अज्ञेय, लेखक का दायित्व, पृ. 29-30

40. मैनेजर पांडेय, मैं भी मुँह में जबान रखता हूँ, यश पब्लिकेशन, दिल्ली, 2006, पृ. 56-57

41. Velchery Narayana Rao, David Shulman, Sanjay Subrahmanyam, Texture of Time, Permanent Black, Delhi. 2006, pg 1

42. Ibid, pg 3

43. Ibid, pg 4

44. Ibid, pg 5

45. Ibid, pg 11


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हिंदी समय में राहुल सिंह की रचनाएँ